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होम भारत

होलिका एक, कथाएं अनेक

Written byप्रो. भगवती प्रकाशप्रो. भगवती प्रकाश
Mar 17, 2022, 05:40 am IST
in भारत, धर्म-संस्कृति, दिल्ली
मथुरा के नंदगांव में होली का एक दृश्य

मथुरा के नंदगांव में होली का एक दृश्य

होली के उत्सव की प्राचीन परंपरा है और इससे कई कथाएं जुड़ी हैं। इसे नई फसल पकने के उल्लास में समरसता, समृद्धि, आरोग्य एवं बुराइयों के उन्मूलन के पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है। इसका वर्णन वेद से लेकर पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ में ईसा से 300वर्ष पुराने अभिलेख में भी इसका उल्लेख है

वैदिक काल से ही नई फसल पकने के उल्लास में समरसता, समृद्धि, आरोग्य और बुराइयों के उन्मूलन के पर्व के रूप में होलिकोत्सव मनाया जाता रहा है। जौ, चना, गेहूं, माल आदि की नई फसल की बालियों को अग्नि में होम करने व भूनने के इस पर्व को नवशस्येष्टी यज्ञ या नवान्न यज्ञ के रूप में मनाया जाता रहा है। नए अनाज की भुनी हुई बालियों व दानों को संस्कृत में होलाका कहा जाने से इस नवान्न यज्ञ का नाम ‘होलिका’ प्रचलित हो गया।

होलिका के पूर्व उसका झंडा व डंडा गाड़ना होता है। यह सेमल की लकड़ी का होता है। इसमें लकड़ियां, उपले, वाडोलिए या भरभोलिए जलाने की परंपरा है। होलिका में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घुमा कर उतारा जाता है। होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ यह मान कर जला दी जाती है कि इसके साथ भाइयों पर लगी बुरी नजर भी जल जाए

प्राचीनता
नवान्न यज्ञ की इस वैदिक परम्परा के साथ भक्त प्रह्लाद व होलिका का प्रसंग, राजा रघु का प्रसंग, पूतना वध व राजा हर्षवर्द्धन आदि के प्रसंग जुड़ते चले गए। इस पर्व का वर्णन अथर्ववेद (परिशिष्ट), जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र (1.3(15-16),काठक गृह्य सूत्र, नारद पुराण और भविष्य पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ में ईसा से 300 वर्ष पुराने  अभिलेख में भी इसका उल्लेख है। अलबरूनी आदि मुस्लिम इतिहासकारों ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव हिंदू ही नहीं, कई मुसलमान भी मनाते थे। मुगलकाल की अकबर आदि के दरबार की कई प्रामाणिक तस्वीरें आज भी हैं। शाहजहां के दरबार में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) के रूप में मनाया जाता था। मुगल बादशाह बहादुर शाह ‘जफर’ को होली पर उनके सभी मंत्री रंग लगाने जाते थे।


होलिका हेमंत या पतझड़ के अन्त की सूचक है। उल्लासपूर्ण संगीत, नृत्य व गीत बसंत के आगमन के परिचायक है। बसंत की आनंदाभिव्यक्ति रंगीन जल एवं लाल रंग, अबीर-गुलाल के पारस्परिक आदान-प्रदान से प्रकट होती है। कुछ प्रदेशों में यह रंगोत्सव होलिका के दिन ही होता है। दक्षिण में होलिका के पांचवें दिन (रंग पंचमी) मनाई जाती है।


 

प्राचीन भवनों के भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के अनगिनत चित्र मिलते हैं। विजयनगर की राजधानी हंपी में 16वीं शताब्दी का होली का चित्र मिला है। सत्रहवीं शताब्दी की मेवाड़ की एक चित्र कलाकृति में महाराणा अपने दरबारियों के साथ होली मनाते दिखाए गए हैं। बूंदी के लघुचित्र में राजा को बैठा दिखाया गया है जिस पर रंग डाला जा रहा है।

पौराणिक प्रसंग
होली का एक पौराणिक प्रसंग प्रह्लाद का है। हिरण्यकशिपु नामक असुर ने स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही रोक लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था जिसकी ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर भक्त प्रह्लाद बच गया। इस दिन ईश्वर भक्त प्रहलाद के सम्मान में होली जलाई जाती है। प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) को जला देने से प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।

राजा रघु का प्रसंग
हैमाद्रि काल विवेक व भविष्योत्तर पुराण (132/1/51) के अनुसार राजा रघु के राज्य में ‘ढोण्ढा’ उपाख्य ढुध्ढिका नामक एक राक्षसी अदृश्य रह कर बच्चों को दिन-रात डराया करती थी जिससे बच्चे अवसाद में रहते थे। राजा द्वारा पूछने पर उनके पुरोहित ने बताया कि इस राक्षसी को शिव के वरदान के कारण देव, मानव आदि नहीं मार सकते और न ही वह अस्त्र-शस्त्र या जाड़ा या गर्मी या वर्षा से मर सकती है। लेकिन, फाल्गुन की पूर्णिमा को जाड़े की ऋतु समाप्त होने पर लोग हंसें और आनंद मनायें, बच्चे लकड़ी के टुकड़े लेकर बाहर प्रसन्नतापूर्वक निकल पड़ें, अट्टहास करें, लकड़ियां एवं घास एकत्र करें, रक्षोध्न मंत्रों के साथ उसमें आग लगाएं, तालियां बजाएं, अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा करें। इसी शोरगुल, अट्टाहास तथा होम से उस राक्षसी का अन्त होगा। तब लोगों ने यही उपचार किया। आगे यह भी लिखा है कि दूसरे दिन चैत्र प्रतिपदा पर लोगों को होलिकाभस्म व मातृभूमि की मिट्टी को प्रणाम करना चाहिए। मंत्रोच्चारण पूर्वक घर के प्रांगण में वर्गाकार स्थल के मध्य में पूजा करनी चाहिए। इस पर्व पर जो व्यक्ति चंदन लेप के साथ आम्र मंजरी खाता है, वह आनंद में रहता है।’

दोल यात्रा
बंगाल में इस पर्व पर दोल यात्रा का उत्सव होता है। शूलपाणिकृत ‘दोलयात्राविवेक’ के अनुसार यह उत्सव तीन से पांच दिनों तक चलता है। पूर्णिमा की पूर्व चतुर्दशी को संध्या के समय मंडप के पूर्व में अग्नि के सम्मान में एक उत्सव होता है और गोविंद की प्रतिमा का निर्माण होता है। एक वैदिका पर 16 खंभों से युक्त मंडप में कृष्ण प्रतिमा रखी जाती है। इसे पंचामृत से नहलाया जाता है, षोडशोपचार पूजा कर सात बार झूले में डोलाया जाता है। प्रथम दिन की अग्नि अंत तक रखी जाती है। अन्त में प्रतिमा 21 बार डोलाई या झुलाई जाती है। इंद्रद्युम्न राजा ने वृन्दावन में भी इस झूले का उत्सव आरम्भ किया था। इस उत्सव के करने से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है (शूलपाणि)।

 
होलिका हेमंत या पतझड़ के अन्त की सूचक है। उल्लासपूर्ण संगीत, नृत्य व गीत वसंत के आगमन के परिचायक है। वसंत की आनंदाभिव्यक्ति रंगीन जल एवं लाल रंग, अबीर-गुलाल के पारस्परिक आदान-प्रदान से प्रकट होती है। कुछ प्रदेशों में यह रंगोत्सव होलिका के दिन ही होता है। दक्षिण में होलिका के पांचवें दिन (रंग पंचमी) मनाई जाती है। कहीं-कहीं रंगों के खेल पहले से आरंभ कर दिए जाते हैं और बहुत दिनों तक चलते रहते हैं। नगर के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र, सभी इस पर्व को साथ-साथ आत्मीयतापूर्वक मनाते हैं।

श्लोक:
प्रभाते विमले जाते ह्यंगे भस्म च कारयेत्।
सर्वांगे च ललाटे च क्रीडितव्यं पिशाचवत्।।
सिन्दूरे: कुंकुमेश्चैव धूलिभिर्घूसरों भवेत्।
गीतं वाद्यं च नृत्यं च कुर्याद्र्रथ्योपसर्पणम्।।  
                 वर्षकृत्यदीपक (पृ. 301)
ब्राम्हणै: क्षत्रियैवैर्श्य: शूर्द्रश्चान्यैश्च जातिभि:।
एकीभूय प्रकर्तव्या क्रीड़ा या फाल्गुने सदा।
बालकै: सह गन्तव्यं फाल्गुन्यां च युधिष्ठिर।।

अन्य प्रसंग
यह पर्व कामदेव के शिवजी द्वारा दहन व उसके पुनर्जन्म से जुड़ा हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खुशी में गोकुलवासियों ने रासलीला की और रंग खेला था। प्राचीन काल में विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए इस दिन पूर्णिमा के चंद्र की पूजा करने की भी परंपरा थी।

होलिका दहन
होली के पूर्व उसका झंडा व डंडा गाड़ना होता है। यह सेमल की लकड़ी का होता है। इसमें लकड़ियां, उपले, वाडोलिए या भरभोलिए जलाने की परंपरा है। भरभोलिए या बड़ोलिये गाय के गोबर के टुकड़ों में रस्सी डाल कर बनाई गई माला होती है। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घुमा कर उतारा जाता है। होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ यह मान कर जला दी जाती है कि इसके साथ भाइयों पर लगी बुरी नजर भी जल जाए। लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहां भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर भद्रा काल रहित मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूं की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। गांवों में लोग देर रात तक होली के गीत (फाग) गाते हैं तथा नाचते हैं। अपनी फसल में भी सभी को उनका भाग या हिस्सा दिया जाता है।

 
सार्वजनिक होली मिलन
होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है। इस दिन मातृभूमि की धूलि व होलिका भस्म, चन्दन, गुलाल  आदि को बन्दनपूर्वक लगाया जाता है। इस समरसता के पर्व पर ऊंच-नीच व सभी प्रकार के भेदभाव भुलाकर सब एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते, नाचते व गाते हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। प्रीतिभोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते है। होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े, नाना मिठाइयां, नमकीन सामग्री आदि विभिन्न व्यंजन (खाद्य पदार्थ) पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयां बनाई जाती हैं जिनमें गुझिया, बेसन के सेव, कचौड़ी, पकौड़े और दही-बड़े भी परिवारों में बनाए व खिलाए जाते हैं।

 
क्षेत्रगत विविधताएं
होली का उत्सव विविध प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है। ब्रज की होली सारे देश में आकर्षण का बिंदु होती है। बरसाने की लठमार होली काफी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है। कुमाऊं की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां चलती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले शुरू हो जाता है। बंगाल की दोल जात्रा पूतना वध एवं चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में भी मनाई जाती है। महाराष्ट्र में रंग पंचमी तक व मालवा में रंग तेरस तक सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जुलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों की परम्परा है। पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्खों के शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है। मालवा एवं गुजरात में जनजातियों के लिए होली बड़ा पर्व है। छत्तीसगढ़ की होरी के लोक गीतों की उदात्त परंपरा व बिहार का फगुआ उत्साह का पर्व है। नेपाल में होली धार्मिक व सांस्कृतिक पर्व है।

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