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होम भारत

भारत राष्ट्र नहीं तो क्या है राहुल जी !

Written byडॉ. अजय खेमरियाडॉ. अजय खेमरिया
Feb 4, 2022, 11:12 pm IST
inभारत, दिल्ली
लोकसभा में राहुल गांधी

लोकसभा में राहुल गांधी

राहुल अगर भारत को राष्ट्र नहीं मानते हैं तो उन्हें बताना चाहिये कि आखिर इन शब्दों का क्या अर्थ है? भारत अगर राष्ट्र नहीं है तो उन्हें यह भी बताना चाहिये कि महात्मा गांधी को वे राष्ट्रपिता कैसे स्वीकार करते हैं?

 

डॉ. अजय खेमरिया

'भारत एक राष्ट्र नहीं है'- लोकसभा में राहुल गांधी का यह बयान उनकी भारत के प्रति समझ को लेकर उठने वाले सवालों और संदेह को फिर प्रमाणित कर गया। जिस संविधान के हवाले से राहुल ने राष्ट्र के रूप में भारत को खारिज किया है वही संविधान राष्ट्रीय एकता और अखंडता के तमाम प्रावधानों एवं आह्वानों से भरा पड़ा है लेकिन राहुल गांधी को शायद इसकी समझ ही नही है।

उनका राजनीतिक दुराग्रह राष्ट्र शब्द को लेकर इतना कलुषित हो चुका है कि वे अब राष्ट्र की अवधारणा को ही मानने के लिए तैयार नहीं है। संविधान के भाग एक में लिखा है- भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा। राहुल गांधी इस विषय को अमेरिकी संघीय व्यवस्था के साथ जोड़कर राष्ट्र अवधारणा को खारिज करने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि अमेरिका में फेडरेशन ऑफ स्टेट के तहत राज्यों ने एक अनुबंध कर संयुक्त राज अमेरिका को बनाया है। वहाँ सभी राज्य सम्प्रभु हैं लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। डॉ. बीआर अंबेडकर ने भारत को 'फेडरेशन ऑफ स्टेटस' के स्थान पर 'यूनियन ऑफ स्टेटस' रखने के दो कारण बताए थे, पहला भारत अमेरिकी राज्यों के आपसी एग्रीमेंट का कोई फेडरेशन या संघ नहीं है। दूसरा, भारत के किसी राज्य देश से अलग होने का अमेरिका की तरह अधिकार नहीं है।

संविधान के जिस भाग का उल्लेख राहुल गांधी कर रहे हैं, उसी संविधान की प्रस्तावना में लिखा है कि "राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए …."। प्रस्तावना संविधान की आत्मा है और यहां राष्ट्र शब्द साफ -साफ लिखा हुआ है इसलिए राहुल अगर भारत को राष्ट्र नहीं मानते हैं तो उन्हें बताना चाहिये कि आखिर इन शब्दों का क्या अर्थ है? भारत अगर राष्ट्र नहीं है तो उन्हें यह भी बताना चाहिये कि महात्मा गांधी को वे राष्ट्रपिता कैसे स्वीकार करते हैं?

सच्चाई यह है कि भारत राष्ट्र के रूप में एक कालजयी अवधारणा है। अटल जी ने कहा था कि भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं है, यह एक जीवित राष्ट्र है, हजारों वर्षों से भारत एक राष्ट्र के रूप में सभ्यता की चेतना का स्थाई तत्व रहा है, इतिहास के किसी भी कालखंड में भारत की राष्ट्रीय अवधारणा तिरोहित नहीं की जा सकी है।

जिस संवैधानिक शब्दावली का सहारा लेकर राहुल भारत को राष्ट्र के तौर पर नकार रहे है उसी संविधान को उनकी दादी ने बंधक बनाकर आपातकाल और प्रस्तावना को बदलने के अक्षम्य पाप किये। इंदिरा गांधी के तानाशाह आचरण ने संविधान में जिस सेक्युलरिज्म को स्थापित किया है, उसकी दूषित उपज आज संसदीय राजनीति में खरपतवार की तरह खड़ी है। सेक्युलरिज्म की इस राजनीति ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद के विरुद्ध एक सशक्त वातावरण खड़ा किया जो राष्ट्र की उस एकता और अखंडता को चोट करता रहा है, जिसे संविधान ने सबसे पवित्र माना है।

संसदीय राजनीति में राष्ट्र की स्वीकार्यता के बढ़ते फलक ने राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से विपन्न कर दिया है। ताजा बयान यह भी प्रमाणित करता है कि राहुल की पार्टी को उन सभी शब्दों और आग्रहों से नफरत हो चुकी है जो भाजपा और मोदी से किसी भी तरह से संयुक्त है। राष्ट्र की कालजयी और मृत्युंजयी संस्कृति को नकारने के पीछे राहुल की मानसिकता को राजनीतिक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता भी है।

असल में राष्ट्र शब्द के साथ भारत की संस्कृति का अकाट्य संबंध है और राहुल की पूरी राजनीति संस्कृति के उलट रही है। वे हिन्दू, हिंदुत्व और हिन्दूवादी को लेकर जिस प्रतिक्रियावादी मानसिकता से बातें करते हैं, उसके मूल को समझने का प्रयास करें तो स्पष्ट होता है कि वे उस राष्ट्र तत्व की मार से पीड़ित हैं जो पिछले कुछ दशकों में भारत की चुनावी राजनीति में राष्ट्रीयता के तौर पर उभरकर आई है। वस्तुतः राष्ट्र और भारत एक ही है, जिसे सेक्युलरिज्म औऱ तुष्टीकरण की राजनीति ने लंबे समय तक अलग-अलग बनाये रखा है। कांग्रेस और राहुल दोनों इस राष्ट्रभाव के आगे लगातार राजनीतिक रूप में पिट रहे है। वे राजनीतिक लाभ के लिए भारत के राष्ट्र स्वरूप को खारिज कर प्रांतवाद और अल्पसंख्यकवाद को जिंदा करना चाह रहे हैं।

लोकसभा में तमिलनाडु, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर का जिस भाव के साथ उन्होंने जिक्र किया है, उसके बहुत ही खतरनाक निहितार्थ हैं। वे यह सन्देश देने की कोशिश कर रहे हैं कि राज्यों को केंद्र के प्रति एक अलगाव का रुख अपनाना चाहिए! यह संवैधानिक रूप से भी एक खतरनाक आह्वान है क्योंकि भारत का यूनियन होने का मतलब यह नहीं है कि कोई राज्य भारत से अलग हो सकता है। जिस भाव से इस बात को उठाया गया है अगर यह प्रांतवाद और अलगाव नहीं है तो क्या है? कभी देश की स्वाभाविक शासक रही कांग्रेस की यह वैचारिक कृपणता भारत के संसदीय लोकतंत्र के लिये भी बड़ा खतरा है।

बेहतर हो राजस्थान में हिन्दू होने का दावा करने वाले राहुल अपने दत्तात्रेय ब्राह्मण गोत्र पर अमल करते हुए संस्कृति और भारत को भी समझने की कोशिश करें। वस्तुतः राष्ट्र ही वह अमूर्त चेतना है जो हजारों सालों से भारत की विविधवर्णी संस्कृति को एक इकाई के रूप में जीवित रखती है। अपनी अगली विदेश यात्रा में राहुल गांधी किसी अंग्रेजी उपन्यास की जगह"जम्बूदीपे भारतवर्ष …को पढ़ने की कोशिश करेंगे तो उन्हें राष्ट्र और भारत शायद समझ आ जाये।

 

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