‘यव द्वीप‘ अर्थात् जावा की प्राचीन हिन्दू संस्कृति
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होम भारत

‘यव द्वीप‘ अर्थात् जावा की प्राचीन हिन्दू संस्कृति

Written byप्रो. भगवती प्रकाशप्रो. भगवती प्रकाश
Dec 3, 2021, 08:57 am IST
in भारत, दिल्ली
जावा स्थित 8वीं सदी का भव्य प्रम्बनन (परब्रह्मन) मन्दिर संकुल

जावा स्थित 8वीं सदी का भव्य प्रम्बनन (परब्रह्मन) मन्दिर संकुल

इंडोनेशियाई द्वीप जावा यानी पौराणिक यव द्वीप प्राचीनतम मानव सभ्यता स्थली रहा है। यह ईसा पूर्व काल से ही हिंदू सभ्यता का केंद्र था। वाल्मीकि रामायण में भी इस द्वीप का उल्लेख है। वहां स्थित हिंदू मंदिरों के संकुल और संस्कृत पाण्डुलिपियां व ग्रंथ हिंदू संस्कृति की गवाही आज भी दे रहे हैं।

 

रामायण में वर्णित ‘यव द्वीप’ अर्थात् इण्डोनेशियाई द्वीप ‘जावा’ यूनेस्को की प्राचीनतम मानव सभ्यता स्थली के रूप में विश्व विरासत में सूचीबद्घ है। विश्व की इस प्राचीनतम मानव सभ्यता स्थली पर खड़े होने वाले मानव प्रजाति ‘होमो इरेक्टस‘ के सांस्कृतिक पुरावशेष मिले हैं। ईसा पूर्व काल से ही हिन्दू सभ्यता के केन्द्र रहे जावा द्वीप पर 5वीं सदी से 15वीं सदी के हिन्दू मन्दिरों व संस्कृत पाण्डुलिपियां, रामायण, महाभारत, विविध पुराण, पतंजलि योगशास्त्र एवं शैवागम के संस्कृत मिश्रित जावानी भाषा की अनेक प्राचीन व नवीन पाण्डुलिपियां व ग्रन्थ आज भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इस्लामी आक्रमणों के पूर्व शैलेन्द्र, मजपहित व माताराम हिन्दू राजवंशों की वहां अति प्रचीन परम्परा रही है।
 
जौ अर्थात् यव के दाने के आकार का यव द्वीप अर्थात् जावा द्वीप

वाल्मीकि रामायण में जावा के सन्दर्भ
वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा काण्ड के सर्ग 40 व श्लोक 29-31 में सुग्रीव दूतों को भेजते समय किष्किन्धा (हम्पी) से 12,0000 किमी दूरस्थ जावा एवं सुमात्रा की भौगोलिक, भू-राजनीतिक, संस्थान स्थिति एवं भूगोल के बारे में कहते हैं कि – जिन द्वीपों पर समुद्र में तैरकर या जलयान से पहुंच सकते हैं, वहां सीता जी को ढूंढो। सात राज्यों से सुशोभित यव द्वीप (जावा) और सोने की खानों से सुशोभित ‘सुवर्ण द्वीप‘ (सुमात्रा) सहित रुप्यक द्वीप में भी सीता जी को ढूंढने का प्रयत्न करो।
गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेने प्लवन च॥29॥
यत्रवन्तो यवद्वीप सप्तराज्योपशोभितम्।
सुवर्णरूप्यकद्वीप सुवर्णाकरमण्डितम्॥30॥
यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वत:।
दिवं स्पृशति श्रृडेंण देवदानसेवित:॥31॥

(वाल्मिकी की रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग 40)
 
रामायण में ‘जावा’ को यवद्वीप कहा गया है। उसकी ‘यव’ अर्थात जौ के दाने (चित्र 1) जैसी ही है, जिसका विहंगम चित्रण न्यूनतम 1000 किमी की ऊंचाई से ही संभव है। सुग्रीव ने जिस ‘सुमात्रा‘ को ‘सुवर्ण द्वीप‘ कह सोने की खानों से मण्डित क्षेत्र बतलाया है, वह सुमात्रा विश्व के सात प्रमुख स्वर्ण उत्पादक क्षेत्रों में है। इण्डोनेशियाई द्वीपों में चान्दी (रोप्य) की भी खदानें होने से सुग्रीव ने रोप्यद्वीपों का भी सन्दर्भ दिया है।
मूल प्राचीन प्रम्बनन मन्दिर का विहंगावलोकन

लाखों वर्ष प्राचीन सभ्यता

जावा अर्थात् यव द्वीप पर ‘संगीरन‘ नामक स्थान को प्राचीन मानव अवशेष स्थली अर्थात् अर्लीमेन साइट या आदिमानव स्थली भी कहते हैं। वहां प्लीस्टोसीन युगीन (24 लाख वर्ष प्राचीन) मानव सभ्यता, अन्य जीवों व सांस्कृतिक जनजीवन के अवशेष व पत्थर की अति प्राचीन कलातियां प्रचुरता में हैं। वहां बड़ी मात्रा में मिल रहे पुरावशेषों व जीवाश्मों को स्थानीय ग्रामीण व अन्तरराष्टÑीय तस्कर भी बेचते रहे हैं। वहां के संग्रहालय में विगत 10 लाख वर्षों के प्राचीनतम गिने जाने वाले ‘जावा मानव‘ सहित इतिहास व सांस्कृतिक विकास की चित्रमय प्रदर्शनी भी है।
 

भव्य मन्दिरों की शृंखला

मय ‘जावा‘ क्षेत्र एवं ‘योग्यकर्ता‘ में 8वीं व नौवीं सदी के अनेक भव्य प्राचीन हिन्दू मन्दिर हैं। ‘डिएंग के पठार‘ में ही 400 प्राचीन मन्दिरों के अवशेष फैले हैं। इनमें 8 मन्दिर अच्छी स्थिति में हैं। जावा के मन्दिरों में आठवीं सदी का प्रम्बनन अर्थात् परब्रह्मन मन्दिर ब्रह्मा, विष्णु व महेश सहित अनेक मन्दिरों का समूह है। इनमें से शिव मन्दिर ईसा पूर्व का है। शेष मन्दिरों का निर्माण भी आठवीं सदी में संजय राजवंश के राजा राकाई पिकतम ने प्रारम्भ किया, जिसका लोकार्पण राजा लोकपाल ने किया। पन्द्रहवीं सदी से प्रारम्भ हुए इस्लामीकरण के बाद अब आज इण्डोनेशिया में 2 प्रतिशत ही हिन्दू जनसंख्या बची है।
 
प्रम्बनन मन्दिर संकुल: जावा का यह विशाल हिन्दू मन्दिर संकुल परिसर 850 ईस्वी में बना था। यह यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल और लोकप्रिय पर्यटन और तीर्थस्थान है। इसमें तीन प्रमुख मन्दिर शिव, विष्णु और ब्रह्मा के हैं। शिव मन्दिर में तीन और मूर्तियां – दुर्गा, गणेश और अगस्त्य की हैं। शिव, ब्रह्मा, विष्णु के वाहन नन्दी, हंस और गरुड़ के भी पृथक मन्दिर हैं। मंदिर की दीवारों पर रामायण की पूरी चित्र शृंखला उत्कीर्णित हैं उदाहरणार्थ (चित्र क्रमांक 4 – जटायु रावण युद्घ)।
 
सीतामाता के हरण का विरोध करते गिद्घराज जटायु (जटायु चित्र में पीछे बाईं ओर)

 

दुर्गा की मूर्ति को लोरो जोंगरंग (पतली इकहरी कुमारिका) भी कहते हैं। पिछले वर्षों में 240 मन्दिरों का यह संकुल (मडल चित्र 3 में) खण्डहर हो गया था। मुख्य मन्दिरों के जीर्णाेद्घार के पश्चात यहां जावा के कई परिवार वापस हिन्दू धर्म में भी लौटे हैं।
 
इस मंदिर की 12 नवंबर 856 ई. को पुनर्प्रतिष्ठा हुई थी। पन्द्रहवीं सदी में मुस्लिम आक्रमणों के बाद कई शताब्दी बाद दो वर्ष पूर्व 12 नवम्बर 2019 को इस मंदिर की अभिषेकपूर्वक पूजा हुई है। बोरोबुदूर बौद्घ विहाररू इंडोनेशिया के मय जावा प्रान्त में स्थित नौवीं सदी का यह विश्व का विशालतम महायान बौद्घ विहार है।
 
छह वर्गाकार चबूतरों पर बना 504 बुद्घ प्रतिमाओं से सुसज्जित इसके केन्द्र में प्रमुख गुंबद के चारों और स्तूप वाली 72 बुद्घ प्रतिमाएं हैं। बोरोबुदूर का निर्माण कार्य 9वीं सदी में आरम्भ हुआ और 15वीं सदी में जावा में हिन्दू राजवंश के पतन और जावाई लोगों द्वारा इस्लाम अपनाने के बाद इसका निर्माण कार्य बन्द हुआ। यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्घ करने के बाद 1975 से 1982 के मय इंडोनेशिया सरकार और यूनेस्को द्वारा इसकी मरम्मत की गई।
 
बोरोबुदूर – बौद्घ विहार

हिन्दू इतिहास

प्राचीन काल में जावा भी निकटवर्ती सम्पूर्ण इंडोनेशियाई क्षेत्रों की तरह ही हिंदू राजाओं के आीन था। इसलिए यहां बहुत से हिंदू एवं बौद्घ मंदिर तथा उनके अवशेष विद्यमान हैं। 14वीं-15वीं सदी में ही यहां मुस्लिम संस्कृति फैली और मुसलमानों का आधिपत्य हुआ। तदनंतर पुर्तगाली, डच एवं अंग्रेज व्यापारी आए किंतु 1619 ई़ से डचों ने राज्य करना प्रारंभ किया। 27 दिसंबर 1949 को इंडोनेशिया गणराज्य बना जिसमें जावा प्रमुख द्वीप है। इस द्वीप के प्राचीन पुरावशेषों, पाण्डुलिपियों व सांस्कृतिक परम्पराओं का संवर्धन आज अत्यावश्यक है।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति रहे हैं)

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