बाबासाहब पुरंदरे : शिवत्व में विलीन हुआ शिवा-भक्त
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बाबासाहब पुरंदरे : शिवत्व में विलीन हुआ शिवा-भक्त

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 22, 2021, 01:15 pm IST
in भारत, दिल्ली, श्रद्धांजलि
बाबासाहब पुरंदरे

बाबासाहब पुरंदरे

छत्रपति शिवाजी महाराज के चरित्र को महानाट्य जाणता राजा  के जरिए घर-घर पहुंचाने वाले, बलवंत मोरेश्वर उपाख्य बाबासाहब पुरंदरे शतायु होकर शिवलोकवासी हो गए। उन्होंने अपने जीवनकाल में छत्रपति शिवराय के प्रखर इतिहास को विभिन्न तरीकों से भारतीय मानस के समक्ष रख उनके विराट व्यक्तित्व से परिचित कराया

  डॉ. नीरज देव

‘ध्येय लेकर देह आया’- इस पद को अपने जीवन में सच करके दिखाने वाले  बलवंत मोरेश्वर उपाख्य बाबासाहब पुरंदरे का  प्रबोधिनी एकादशी (15 नवम्बर, 2021) को निधन हो गया। उनके जाने से जैसा चलता-फिरता शिवकोश लुप्त हो गया। मानो जीता जागता इतिहास; इतिहास में समा गया। उनका लगभग सौ साल का कार्यमग्न जीवन अनेक  प्रकार से अलौकिक था। इतिहासकार के साथ-साथ आप स्वतंत्रता सेनानी भी थे। पुणे के पास सासवड ग्राम में उनका जन्म सन् 1922 ई. में हुआ था। बाबासाहब को शिवकालीन इतिहास की लगभग 250-300 साल पुरानी पुश्तैनी विरासत मिली थी जिसे उन्होंने बहुत ही कुशलता से तराशा। लेकिन जिस काल में वे जन्मे थे, वह दौर राजकीय ही नहीं बल्कि मानसिक दासता का था।

भारत की परतंत्रता का महत्वपूर्ण कारण था, प्रेरणादायी इतिहास का विस्मरण, प्रताप-शिवाजी-गोविंद जैसे वीरों के इतिहास के प्रति समाज की उपेक्षा व अज्ञान। 19वीं सदी के उत्तरार्ध से 20वीं सदी के पूर्वार्ध तक हिंदू ही शिवाजी की आलोचना कर रहे थे। ‘शिवाजी ने अफजल खान को छल-कपट से मारा, वह अन्यायी था,’ ऐसा कहने वाले बड़े-बड़े कतिपय विद्धान छत्रपति शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र में पनप रहे थे। विडंबना यह कि, उनका यह दु:साहस देख फर्ग्युसन महाविद्यालय में पढ़ा रहे, जन्म से अंग्रेजी प्राध्यापक को कहना पड़ा,‘‘अरे, अपने डेढ़ फिट नाप से शिवाजी को मत तोलो।’’ फिर भी गुलामों की मानसिकता जस की तस रही। ऐसे समय में एक युवा शिवाजी के चरित्र से अभिभूत हो गढ़ों-किलों को देख रहा था। महाराष्ट्र के चप्पे-चप्पे में छिपा शिवाजी का स्पर्श उसे बुला रहा था। छत्रपति शिवराय का उर्जस्वल इतिहास उसे पुकार रहा था। वह कोई और नहीं, बाबासाहब पुरंदरे ही थे।

राष्ट्रजीवन का मूलाधार
मृत्यु के दो सौ साल पश्चात भी छत्रपति शिवराय अंग्रेजी साम्राज्य को खतरा प्रतीत होते थे। शिवाजी आदि क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत से लेकर चाफेकर, सावरकर ही नहीं अपितु सुदूर पंजाब, बंगाल, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु तक अनेक क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत रहे। लेकिन सामान्य भारतीय उनके प्रगाढ़, प्रस्फूर्त, स्वातंत्र्याकांक्षी जीवन-चरित्र से अनभिज्ञ था। इतना कि वह मुगलों को अपना और शिवाजी व उनके मरहट्टों को पराया, लुटेरा समझ रहा था।
लोकमान्य तिलक ने शिवजयंती उत्सव नगर-नगर आरंभ कर सामान्य प्रजा को शिवभक्ति की दीक्षा दी। लेकिन उनकी मृत्यु के पच्चीस-तीस साल बाद भी शिवाजी का यथातथ्य चरित्र मराठी में भी उपलब्ध नहीं था। यह शल्य युवा बाबासाहब की व्यथा का कारण था। बहुचर्चित ‘राजा शिवछत्रपति’ की भूमिका में बाबासाहब लिखते हंै,‘‘शिवाजी के समय यूरोप में जन्मे बहुतेरे विद्धानों ने शिवाजी की तुलना सीजर व सिकंदर से की। इतिहासाचार्य राजवाडे का मानना था कि शिवाजी की तुलना में सीजर, सिकंदर एवं नेपोलियन भी कमजोर दिखाई पड़ते हैं। अकेले नेपोलियन पर 450 अलग-अलग आयामों से लिखे गए 27,000 ग्रंथ उपलब्ध हैं। और छत्रपति शिवाजी पर 27,000 पृष्ठ भी नहीं लिखे गए।’’ इसी व्यथा से उनका ‘राजा शिवछत्रपति’ ग्रंथ जन्मा, नेपोलियन पर लिखे गए 27,000 ग्रंथों पर भारी पड़ने वाला यह अकेला महाग्रंथ था।

राजा शिवछत्रपति: तीन पीढ़ियों का पोषण
छत्रपति शिवाजी का चरित्र लिखने हेतु बाबासाहब पुरंदरे जी ने एकता मासिक के छह अंकों में लेख लिखे। लेकिन छह माह के बाद भी उन लेखों पर पाठकों की एक भी भली-बुरी प्रतिक्रिया नहीं आयी। विस्मय से बाबासाहब ने संपादक से पूछा कि मेरे लेखों पर अभी तक एक भी अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं आयी है। लेकिन आप अपनी प्रतिक्रिया बताइए। तब हंसकर संपादक ने कहा,‘‘तुम्हारे लेख हम भी नहीं पढ़ते। तुम भेजते हो, हम छापते हैं।’’ उनके इस उत्तर से बाबासाहब परेशान हो गये। उन्होंने वासुदेव काका कवि को अपनी परेशानी बतायी। लेख पढ़कर उन्होंने कहा,‘‘तुम्हारी लिखावट में ऐतिहासिक सत्य है, लेकिन सुंदरता, सहजता नहीं। सात सौ साल पहले जिस प्रकार ज्ञानेश्वर ने सीधा-सादा गीताभाष्य लिखा था, बस वैसा लिखो।’’ बाबसाहब को रास्ता मिल गया। फिर साकार होता गया शिवाजी का चिरस्मरणीय शब्दशिल्प ‘राजा शिवछत्रपति’। इस ग्रंथ ने तीन पीढ़ियों को शिवप्रबुद्ध किया ।

राजा शिवछत्रपति इस प्रकार लिखा गया जैसे आरंभ से लेकर अंत तक बिना रुकावट एक सतत धारा बहती हो, जो पाठक को अनवरत अंत तक चुंबक सी खींचती रहती है। वीर सावरकर के 1857 के स्वातंत्र्य समर जैसी ही प्रवाहिता, दृढ़ता, मोहकता व प्रभावशीलता उसमें दिखाई देती है। ग्रंथ को पढ़ने के पश्चात महीनों तक पाठक शिवचरित्र में ही डूबा रहता है। ऐसी इस ग्रंथ की महिमा है। इस ग्रंथ की अभी तक बीस-पच्चीस आवृत्तियां व लगभग पांच लाख से अधिक प्रतियां मराठी में वितरित हो चुकी हैं। इस ग्रंथ में बिखरे मोतियों का बखान करने के लिए एक लेख लिखना होगा। मात्र उदाहरण हेतु केवल दो गिने-चुने हीरों को प्रस्तुत करता हूं।

शिवाजी महाराज का जन्म हिंदुओं के उत्थान का क्षण था। इसका वर्णन करते समय शिवशाहीर लिखते हंै,‘‘मात्र तीन अक्षर, शि-वा-जी! लेकिन उसके एक अक्षर में रामायण समाहित थी। दूसरे में महाभारत समाहित थी!  तीसरे में शिवभारत समाहित था! और तीनों ही अक्षरों में महान भारत निर्माण का चिरंजीवी सामर्थ्य था !’’

बाल शिवाजी के प्रथम सूर्यदर्शन का वर्णन करते समय वे लिखतें हैं,‘‘शिवबा का पहला सूर्य दर्शन! सूरज का पहला शिव दर्शन!’’ ऐसे अनेक  उदाहरण पेश किये जा सकते हैं। और इनके साथ बीच-बीच में कसा व्यंग्य पाठक को हंसाता भी है, व्यथित भी करता है और समाज की पतित अवस्था का बोध भी कराता है। बाबासाहब ने शिवकालीन इतिहास पर लगभग 40 पुस्तकें लिखीं व तानाजी, बाजी आदि शिवदूतों को अमर कर दिया।

जाणता राजा: महानाट्य
शिव चरित्र अधिकतर लोगों तक अत्यधिक प्रभावी ढंग से पहुंचाने हेतु बाबासाहब ने 1984 में जाणता राजा महानाट््य रंगमंच पर प्रस्तुत किया। इस महानाट््य में लगभग 250 रंगकर्मी, हाथी, घोड़े प्रत्यक्ष रूप से रंगमंच पर उतरते हैं। महानाट््य का अंत छत्रपति शिवाजी की मृत्यु से नहीं; राज्याभिषेक से होता है। दर्शक अपने मन में सिंहासनाधीश्वर शिवाजी महाराज का अजर-अमर रूप बसाकर घर लौटते हैं। बाबासाहब की यह दृष्टि शिवजयंती नहीं बल्कि हिंदू साम्राज्य दिन मनाने वाले संघ संस्थापक का ही सहज अनुसरण हैं। इस महानाट््य के लगभग 1250 मंचन हो चुके हैं।

शिवसृष्टि: विज्ञान से शिवकाल तक
1974 में शिवाजी महाराज के राज्यारोहण त्रिशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में बाबासाहब ने मुंबई में एक अस्थायी शिवसृष्टि का निर्माण किया था जिसे देखने लाखों लोग उमड़ पडेÞ थे। उसी से प्रेरणा पाकर पुणे के पास आंबेगाव में 21 एकड़ क्षेत्र में स्थायी शिवसृष्टि का सपना बाबासाहब ने रखा था। उक्त शिवसृष्टि में प्रवेश करते ही प्रवेशक अपने आप 350 साल पीछे पहुंच जाता है। आधुनिक तंत्र का उपयोग कर शिवकालीन अनेक प्रसंग नजरों से गुजरने लगते हैं। यह शिवसृष्टि 20वीं सदी के आरंभ में जन्मे बाबासाहब की भविष्यदर्शिता दिखाती है, जो आने वाली कई पीढ़ियों को शिवाजी के महानायकत्व का जीवंत अनुभव करायेगी।

वक्ता भी, दाता भी
किसी भी विषय पर, कहीं भी व कुछ भी बोलने वाले लाखों मिल जाते हैं। लेकिन सुनने वालों का चित्तहरण करने वाला वक्ता विरल होता है। बाबासाहब के प्रवाही व प्रभावी वक्तव्य का महाराष्ट्र कायल हो गया था। अपने भाषण के लिए पैसा लेने के जमाने में बाबासाहब टिकट लगाकर भाषण करते थे। लोग पैसा देकर बाबासाहब का भाषण सुनने उमड़ पड़ते थे। इन व्याख्यानों से जुटा धन बाबासाहब सामाजिक कामों में दान करते थे। ऐसी सैकड़ों संस्थाएं मिलेंगी जिनको बाबासाहब ने जीवनदान दिया है। कहा जाता है कि वक्ता दस हजार में एक मिलता है, लेकिन दाता नहीं मिलता। बाबासाहब वक्ता भी थे; दाता भी थे।

ये पुरस्कार धन्य हो गये
बाबासाहब को अनेक पुरस्कार मिले। पुण्यभूषण, महाराष्ट्र भूषण, कालिदास व पद्मविभूषण आदि। कहते हंै कि पुरस्कार से मनुष्य धन्य हो जाता है, लेकिन ये पुरस्कार शिवशाहीर के स्पर्श से धन्य हो गए। क्योंकि उन्हें पुरस्कारों की चाह नहीं थी, नाम की परवाह नहीं थी, परवाह मात्र शिवाजी की थी, शिवाजी को घर-घर पहुंचाने की थी। उसी के चलते महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार से प्राप्त राशि में खुद के पंद्रह लाख रु जोड़कर बाबासाहब ने कैंसर अस्पताल को भेंट कर दिए।

ध्येय लेकर देह आया
‘शिवाजी महाराज एक प्रेरक शक्ति’ इसी सूत्र के प्रचार का ध्येय लेकर वे आए थे। सुमित्राराजे ने एक बार कहा था,‘‘अपना कर्तव्य निभाने हेतु शिवाजी महाराज के दरबार का वफादार सरदार बाबासाहब के रूप में फिर से जन्मा, ऐसा मुझे लगता है।’’ उनका वक्तव्य सौ प्रतिशत सच लगता है, क्योंकि शिवकालीन प्रत्येक घटना बाबासाहब को तिथि, मास, वर्ष, दिन के साथ याद थी। एक व्यक्ति ने बाबासाहब से पूछा,‘‘ क्या महाराज के जमाने में खग्रास सूर्यग्रहण का उल्लेख मिलता है?’’ इस प्रश्न पर बाबासाहब आंखें मूंदकर कुछ पल मौन रहे और बोले,‘‘सूर्यग्रहण खग्रास था, यह उल्लेख तो नहीं है, लेकिन दो बार सूर्यग्रहण का जिक्र आता है-23/09/1633 व 06/01/1665 को।’’ पूछने वाले ने नासा की साइट से पता किया, बाबासाहब बिल्कुल सही थे। यह बात जिस प्रकार उनकी अलौकिक याद्दाश्त का आभास देती है, उसी प्रकार शिव इतिहास से उनका एकाकार भी दर्शाती है। इसी ध्येयनिष्ठा के चलते वे स्वयं को इतिहासकार नहीं अपितु शिवशाहीर कहलाते थे। कुछ दिन पूर्व ही उन्होंने कहा था,‘‘शिवाजी महाराज का पदस्पर्श जहां जहां पर हुआ था, वहांं वहां पर मैं अनेक बार गया। अब एक ही जगह बाकी है, महाराज जहां गए वहां पर जाने की।’’ अंतिमत: शिवशाहीर उस शेष कदम पर भी पहुंच गए। ध्येय लेकर उनकी देह आई थी, उसी ध्येय को वे लाखों लोगों में पिरोकर चले गए।  

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