फरीदाबाद में मिला भारतीय उपमहाद्वीप का पुरापाषाण स्‍थल, 10 लाख साल पुराना होने की संभावना
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फरीदाबाद में मिला भारतीय उपमहाद्वीप का पुरापाषाण स्‍थल, 10 लाख साल पुराना होने की संभावना

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 19, 2021, 05:51 pm IST
in भारत, हरियाणा

फरीदाबाद के मंगरबनी पहाड़ी जंगल में प्रौगैतिहासिक पाषाण युग पुरापाषाण स्‍थल मिला है। पुरातत्‍वविदों का मानना है कि यह स्‍थान भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा और सबसे पुराना स्‍थल हो सकता है।

हरियाणा के फरीदाबाद जिले के मंगरबनी पहाड़ी जंगल में प्रौगैतिहासिक पाषाण युग का पुरापाषाण स्थल मिला है। संभावना जताई जा रही है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा और सबसे पुराना स्‍थल हो सकता है। यह प्रौतिहासिक पाषाण युग स्‍थल संभवत: दस लाख वर्ष से अधिक पुराना है। हरियाणा पुरातत्व विभाग के शुरुआती जांच से पता चलता है कि यह भारतीय उप-महाद्वीप के सबसे बड़े पुरापाषाण स्थलों में से एक हो सकता है। यहां खुले में और पत्‍थरों के नीचे से पाषाण युग के औजार मिले हैं।

पर्यावरण कार्यकर्ता ने खींचा ध्‍यान

मई 2021 में पर्यावरण कार्यकर्ता सुनील हरसाना ने इस स्‍थान पर मौजूद गुफा चित्रों की ओर पुरातत्‍व विभाग का ध्‍यान आकृष्‍ट किया। सुनील 10 वर्षों से अधिक समय से मंगर गांव में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहे हैं। हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के उप-निदेशक बनानी भट्टाचार्य के अनुसार, विभाग ने जून में गुरुग्राम में शिलाखरी, मंगर, कोट, धौज, रोज का गुर्जर और दमदमा सहित आसपास के क्षेत्रों का अध्‍ययन किया। उन्‍होंने कहा कि इस खोज के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह स्‍थान भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे बड़े पुरापाषाण स्थलों में से एक हो सकता है। यहां से कई स्‍थानों से खुले में और पत्‍थरों के नीचे से पाषाण युग के औजार बरामद किए गए थे। हालांकि पुरापाषाण युग के इन औजारों की पहचान अरावली के हिस्‍से के रूप में की गई है। यह पहला अवसर है, जब हरियाणा में बड़े पैमाने पर गुफा चित्र और पत्‍थर कला पाए गए हैं।"

कई पुरातात्विक स्‍थल अवैध खनन की भेंट चढ़ गए

अरावली क्षेत्र में अब तक कोई शैल चित्र नहीं मिले हैं। चूंकि न तो यह संरक्षित स्‍थल है और न ही इसके बारे में ठीक से लिखा या खोजा गया है। भट्टाचार्य कहते हैं कि यह खोज हरियाणा के इतिहास को लाखों वर्षों पीछे तक ले जाएगी। गुफा चित्रों की तारीख का अभी तक पता नहीं चला है। कुछ पेंटिंग प्रागैतिहासिक हैं और कुछ बाद के चरणों की हैं। उन्‍होंने कहा कि इसका भी उल्‍लेख किया जाना चाहिए कि बीते दो वर्ष से इस क्षेत्र में काम कर रहे पुरात्‍व के छात्र शालीष बैंसला ने भी इस क्षेत्र में सबसे पहले रॉक शेल्‍टर के साथ पाषाण युग के एक स्‍थल की खोज की थी। सुनील हरसाना के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में खनन गतिविधियों से ऐसे कई स्थल नष्ट कर दिए गए। उनका दावा है कि कई ऐसे गुफा चित्र अभी भी मौजूद हैं जहां अभी तक खनन नहीं हुआ है। हालांकि यह पता लगाना मुश्किल है कि पेंटिंग किसकी हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि पेंटिंग इंसानों द्वारा बनाई गई हैं।

सुनील कहते हैं, "पिछले 10 वर्षों से मैं इस मंगर गांव क्षेत्र को बचाने की कोशिश कर रहा हूं। इसके लिए मैंने कई संरक्षण गतिविधियों, दस्‍तावेजों और परियोजनाओं का संचालन किया है। मैंने इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के साथ तस्वीरें साझा की और उन्हें अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा किया। किसी ने पुरातत्व विभाग से संपर्क किया और उन्होंने इस जगह का दौरा किया। जब हमने उन्हें गुफा चित्र दिखाए, तो उन्होंने पुष्टि की कि ये पेंटिंग प्राचीन हैं और जल्द ही वे उन पर काम करेंगे। गुफाओं पर कुछ शैल कला, पेंटिंग और स्क्रैचिंग है। यह बताना मुश्किल है कि ये किस तरह की पेंटिंग हैं, लेकिन कुछ आकृति या बनावट है। जहां ये पेंटिंग मिली हैं, उस जगह तक पहुंचना मुश्किल है। कुछ नकारात्मक तत्व वहां जाते हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई कलाकार वहां जाएगा और चित्रकारी करेगा। जिस शैली में पेंटिंग बनाई गई है वह बहुत अनोखी है। पेंटिंग गुफाओं के अंदर गहरे हैं, जहां केवल चमगादड़ रहते हैं।"

पुरातत्‍व विभाग ने जल्‍द शुरू करेगा उत्‍खनन

पुरातत्व विभाग की आगामी परियोजना का मुख्य उद्देश्य पाषाण युग के सभी स्थानों की पहचान करना और उनके संरक्षण पर विचार करना, विशेष रूप से वह क्षेत्र जो ‘गैर मुमकीन पहाड़’ के अंतर्गत आता है। कुल क्षेत्रफल लगभग 4,800 हेक्टेयर है। इसके लिए इस स्‍थान के संरक्षण एवं प्रबंधन की योजना तैयार की जाएगी। परियोजना का उद्देश्य क्षेत्र में प्राथमिक और द्वितीयक धरोहर के रूप में पुरातात्विक स्‍थानों और इसके क्षेत्रों की संख्‍या तथा स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए पूरे परिदृश्य का गहन अध्ययन करना भी है। साथ ही, खुले स्‍थलों सहित रॉक शेल्‍टरों का दस्‍तावेजीकरण करने के साथ उनके मानचित्र भी बनाए जाएंगे। इस क्षेत्र के गहन अध्‍ययन के लिए दो साल की परियोजना बनाई जाएगी। विभाग द्वारा जल्‍द ही परीक्षण के लिए उत्‍खनन कार्य शुरू किया जाएगा।

लखनऊ स्थित राष्‍ट्रीय सांस्‍कृतिक संपदा संरक्षण अनुसंधानशाला, बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्‍थान तथा अमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के सहयोग से शैल चित्रों का संरक्षण और काल निर्धारण किया जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्‍य स्‍थल को पूर्व-ऐतिहासिक पर्यावरण वन के रूप में परिवर्तित करना भी है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की खनन गतिविधि और निर्माण को रोकना होगा। समूचा क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे महत्वपूर्ण पुरापाषाण स्थल में से एक हो सकता है, विशेष रूप से मानव विकास और संस्कृति का अध्ययन। भट्टाचार्य ने कहा, "पुरापाषाण कालीन का यह स्थल अब निरंतर निगरानी में है। स्थानीय रूप से उपकरणों के विकास को समझने के लिए इस पर और अधिक शोध की आवश्यकता है। विभाग ने पंजाब प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारकों, पुरातात्विक स्थलों और अवशेष अधिनियम-1964 (राज्य अधिनियम) के तहत इस स्‍थल संरक्षण के लिए राज्‍य सरकार के समक्ष प्रस्ताव दिया है।"
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