राज्यवर्धन सिंह राठौड़ : युवा शक्ति को मिला बढ़ावा
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राज्यवर्धन सिंह राठौड़ : युवा शक्ति को मिला बढ़ावा

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 18, 2021, 10:30 am IST
inसाक्षात्कार, दिल्ली

एक समय था जब ओलंपिक खेलों में भारत की पहचान हॉकी टीम से थी। लंबे समय बाद अन्य खेलों ने भारतीय खेल जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू  की। अब स्थिति बहुत बदल चुकी है। निशानेबाजी में भारत एक महाशक्ति का रूप ले चुका है। निशानेबाजी में भारत के लिए सबसे पहला ओलंपिक पदक 2004 एथेंस ओलंपिक खेलों में पूर्व खेल मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने जीता था। इसके बाद रियो ओलंपिक को छोड़ भारतीय निशानेबाज हर ओलंपिक खेल में पदक जीतते चले आ रहे हैं। अब टोक्यो ओलंपिक में अद्भुत प्रतिभा, दमखम और ऊर्जा से भरपूर भारतीय दल एक नई पहचान बनाने के लिए कृतसंकल्प नजर आ रहा है। ओलंपिक खेलों में भारत की दावेदारी और एक नए युवा भारत की छवि पर राज्यवर्धन सिंह राठौड़ से प्रवीण सिन्हा ने विशेष बातचीत की –

टोक्यो ओलंपिक खेलों में भारत की दावेदारी पर आपकी क्या राय है?
कोरोना महामारी के बाद पूरी दुनिया के खेल के क्षेत्र पर बहुत बुरा असर पड़ा। अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबले कम हुए जिससे खिलाड़ियों को प्रतिद्वंद्विता व मैच प्रैक्टिस के ज्यादा मौके नहीं मिले। भारतीय खिलाड़ियों को अपनी ताकत और क्षमताओं को आंकने के मौके बहुत कम मिले, इसलिए पदकों की संख्या के बारे में अभी से अनुमान लगाना आसान नहीं है। यह स्थिति सिर्फ भारत के साथ ही नहीं, हर देश की है। दुनिया भर के खिलाड़ी बिना ज्यादा मैच प्रैक्टिस के टोक्यो ओलंपिक में उतरेंगे और अपनी प्रतिभा व प्रशिक्षण सहित मानसिक दृढ़ता के बल पर टोक्यो में पदक की दावेदारी पेश करेंगे। इस आधार पर मेरा अनुमान है कि इस बार टोक्यो ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों में पदकों की संख्या दोहरे अंकों तक पहुंचाने की क्षमता है जो ओलंपिक खेलों में भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन होगा।
भारतीय दल में इस बार युवा प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की एक लंबी सूची है। भारत के जितने भी पदकों के प्रबल दावेदार खिलाड़ी हैं, वे 17 से 22 साल तक के औसत आयु वर्ग के हैं। भारत के पास अब कम आयु वर्ग के ज्यादा अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं। निशानेबाज मनु भाकर व सौरभ चौधरी हों या कुश्ती में बजरंग पूनिया व विनेश फोगट या फिर अभिषेक वर्मा (निशानेबाजी), अमित पंघल (मुक्केबाजी), पी वी सिंधू (बैडमिंटन) और दीपिक कुमारी (तीरंदाज), ये सभी युवा वर्ग खिलाड़ी हैं। यही नहीं, इनमें से ज्यादातर खिलाड़ी विश्व वरीयता क्रम में पहले स्थान पर हैं जिससे उनका मनोबल वैसे ही बढ़ा रहेगा। विश्व का नंबर एक खिलाड़ी होने के नाते खिलाड़ी में एक विश्वास होता है कि वह किसी को भी मात देने में सक्षम है। इस बार टोक्यो ओलंपिक खेलों में विश्व में अव्वल नंबर के खिलाड़ी के तौर पर दावेदारी पेश करना भारतीय दल के लिए मनोबल बढ़ाने वाला साबित होगा।

ओलंपिक खेलों में युवा शक्ति से लैस भारतीय दल की सशक्त दावेदारी महज एक संयोग है या फिर एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम?
विश्व के शीर्षस्थ खिलाड़ियों के रूप में उभरना महज एक संयोग नहीं होता। इसके लिए हमें लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का एक विजन था – देश को फिट रखने और युवाओं को भरपूर प्रोत्साहन देने का। 2014 में सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री जी ने सबसे पहले ओलंपिक टास्क फोर्स का गठन किया जिसमें शामिल विशेषज्ञों व अनुभवी लोगों को इस बात की पड़ताल करने की जिम्मेदारी दी गई कि एकाध मौकों को छोड़ आखिर क्यों भारतीय खिलाड़ी चीन व अमेरिका जैसी खेल महाशक्तियों को चुनौती नहीं दे पाते, भारत में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी पैदा करने के लिए किन-किन पहलुओं पर बल देने की जरूरत है। इसके बाद उन्होंने जमीनी स्तर पर प्रतिभा तलाशने व तराशने के लिए खेलो इंडिया व फिट इंडिया जैसे अभियानों को शुरू किया। यही नहीं, देश के विश्व स्तरीय खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टॉप्स) की शुरुआत की गई। इसके तहत खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं सहित देश-विदेश में प्रशिक्षण व प्रशिक्षकों की नियुक्ति की खुली छूट दी गई और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों में भाग लेने के लिए या मूलभूत सुविधाएं देने के लिए भरपूर सरकारी मदद की गई। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने युवा खिलाड़ियों को बिना किसी दबाव में आए शत-प्रतिशत प्रदर्शन करने के लिए न केवल उन्हें प्रोत्साहित किया, बल्कि आर्थिक मदद करने की भी घोषणा की। टॉप्स में शामिल खिलाड़ियों को तमाम सुविधाएं देने के अलावा प्रति माह 50,000 रुपये का पॉकेट खर्च दिया जाता है, जबकि खेलो इंडिया अभियान के तहत प्रतिवर्ष 1000 बच्चों का चयन किया जाता है जिन्हें सरकार अगले आठ वर्षों के लिए 5 लाख रुपये प्रतिवर्ष देती है। यह सरकार की ओर से खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने का कारगर तरीका साबित हुआ है जिसकी वजह से आज तमाम युवा खेल को अपना करिअर बनाने को तत्पर दिख रहे हैं।

टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने जा रहे ज्यादातर युवा छोटे-छोटे शहरों या गांवों से आते हैं। पिछले 6-7 वर्ष में उन्हें  सरकार की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं व उपकरणों से लैस स्टेडियमों में प्रशिक्षण दिलाया गया, देश-विदेश के बेहतरीन प्रशिक्षकों की निगरानी में ओलंपिक के लिए तैयार किया गया और जरूरत पड़ने पर उन्हें विदेशों में भी प्रशिक्षण दिलाया गया। यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिद्वंद्विता का अनुभव दिलाने के लिए युवा खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए भेजा गया। ये सारी बातें सरकार के खेलों के प्रति सकारात्मक रवैये को दर्शाती हैं। और तो और, भारत में ऐसा पहली बार हुआ है जब देश के प्रधानमंत्री ने ओलंपिक दल की टोक्यो रवानगी से पहले सभी खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया और उन्हें शुभकामनाएं दीं। देश के सबसे ऊंचे स्तर से खिलाड़ियों को जिस तरह से प्रोत्साहन और समर्थन दिया गया है, मैं समझता हूं निश्चित तौर पर हमारे खिलाड़ियों का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहेगा।

टोक्यो जा रहे भारतीय दल को क्या संदेश देंगे।
ये यंग इंडिया की युवा शक्ति है।  युवा खिलाड़ियों से मैं यही कहना चाहूंगा कि वे सभी कड़ी मेहनत से की गई ट्रेनिंग को न भूलें। मुझे विश्वास है कि उनका शत-प्रतिशत प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रदर्शन से बेहतर साबित होगा।  टोक्यो जा रहे सभी खिलाड़ियों को देशवासियों की ओर से और अपनी ओर से तमाम शुभकामनाएं। 

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