संथाल हूल: बलिदान की पराकाष्ठा
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संथाल हूल: बलिदान की पराकाष्ठा

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 30, 2021, 03:03 pm IST
inदिल्ली

संथाल हूल यानि विद्रोह 1855-56 में चार संथाली भाइयों सिदो, कान्हू, चॉंद और भैरव के नेतृत्व में हजारों संथाली वनवासियों के परम शौर्य की गाथा है। स्वाधीनता और स्वाभिमान के लिए संथालों की इस आहूति को मुख्यधारा के इतिहास में इसके यथोचित स्थान से लम्बे समय तक वंचित रखा गया। जैसे-जैसे स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ती जा रही है, पुरखों के इस त्याग और बलिदान को महत्त्व मिल रहा है।

संथाल हूल यानि विद्रोह 1855-56 में चार संथाली भाइयों सिदो, कान्हू, चॉंद और भैरव के नेतृत्व में हजारों संथाली वनवासियों के परम शौर्य की गाथा है। स्वाधीनता और स्वाभिमान के लिए संथालों की इस आहूति को मुख्यधारा के इतिहास में इसके यथोचित स्थान से लम्बे समय तक वंचित रखा गया। जैसे-जैसे स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ती जा रही है, पुरखों के इस त्याग और बलिदान को महत्त्व मिल रहा है। आज 30 जून के दिन 1855 में इस हूल का आह्वान किया गया था। चारों भाइयों में सबसे बड़े सिदो मुर्मू ने अपने लोगों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया। साथ ही अंग्रेजों को ‘हमारी माटी छोड़ो’ की चेतावनी दी।

नागपुरी साहित्यकार और इतिहास के जानकार बी. पी. केसरी बताते हैं कि यह विद्रोह भले ही ‘संथाल हूल’ था लेकिन इसका दायरा बहुत बड़ा था। यह तत्कालीन संथाल परगना के समस्त ग़रीबों और शोषितों का सामूहिक वेदना थी जो सशस्त्र विरोध के स्वरूप में फूटा। तब का संथाल परगना आज के झारखण्ड तक ही सीमित नहीं था। उसमें बंगाल, बिहार और बंगलादेश के भी हिस्से भी शामिल थे।

यह संगठित आंदोलन कोई एक दिन में या जल्दबाज़ी हो गई गतिविधि नहीं थी। इसकी बुनियाद गहरी थी। 1757 वह साल था जब अंग्रेजों ने प्लासी की लड़ाई जीती और भारत भूमि पर उनकी सत्ता की मज़बूत बुनियाद पड़ी। अंग्रेज़ी ताक़त में आने वाले समय में निरंतर बढ़ोतरी हो रही थी लेकिन तब से लेकर संथाल हूल तक संथाल परगना और उसके आसपास के इलाक़े में शासन अंग्रेजों के लिए कभी भी आसान नहीं रहा। यह पूरा क्षेत्र अंग्रेजों के रिकार्ड में अशांत और उपद्रवग्रस्त के रूप में ही दर्ज है।

इस अशांत क्षेत्र को क़ाबू में करने के लिए अंग्रेज साम, दाम, दंड, भेद का हर हथकंडा अपनाते रहे। यहॉं के वनवासियों की स्वाधीन प्रवृति ने अंग्रेजों को हमेशा परेशान किया। संथाल हूल से पहले इस क्षेत्र के पहाड़िया वनवासियों ने भी काफ़ी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। 1783 से 1783 के बीच इस क्षेत्र में पहाड़िया विद्रोह का समय था। तब के इस विद्रोह को अंग्रेजों ने अपने छल बल ये क़ाबू किया था। बाद के वर्षों में इसी भूमि पर संथालों का हूल हुआ।

वनवासियों में संथाल जनजाति कृषि कार्यों में बेहद कुशल मानी जाती है। इनकी इस क्षमता का उपयोग अंग्रेज और इनके पिट्ठू ज़मींदारों ने खूब किया था। जंगलों को काटकर उसे कृषि भूमि बनाने में जहॉं पहले यहॉं के पहाड़िया जनजाति ने अरुचि दिखाई थी वहीं संथालों ने यह बीड़ा सहर्ष उठाया। इसके द्वारा तैयार कृषि भूमि पर पहले कोई लगान का प्रावधान नहीं था। बाद के वर्षों में इन ज़मीनों पर अंग्रेजों ने लगान वसूली शुरू कर दी। विरोध करने पर अंग्रेजों ने अपने स्वभाव के अनुरूप दमन का रास्ता अपनाया। संथालों की स्थानीय सामुदायिक संरचना पर यह गहरा आघात था। अंग्रेज़ी कारकूनों और उनके पिट्ठू ज़मींदारों व साहूकारों के शोषण से संथालों ने बग़ावती तेवर अपना लिये।

हालात इतने बुरे हो गये कि इनके पास करो या मरो  का विकल्प ही शेष रह गया। सिदो, कान्हू, चॉंद और भैरव मुर्मू बंधुओं ने अपने आंदोलन को ईश्वरीय प्रेरणा बताया। अपने लोगों को संगठित करना शुरू किया। विद्रोह की शुरुआत इनके गॉंव भोगनाडीह से हुई। 30 जून 1855 की रात पूर्णिमा की रात थी। उस रात भोगनाडीह में करीब दस हज़ार से ज़्यादा संथाल जमा हुए। इस विशाल जन सभा में हूल की शुरुआत हुई। जनसभा में संथालों ने सिदो और कान्हू को अपना प्रशासक नियुक्त किया। इनके नेतृत्व में पूरी तरह से स्वतंत्र एक व्यवस्था बनी जिसमें विद्रोहियों में अपने क्षेत्र का सीमांकन किया। यह क्षेत्र पश्चिमी में कहलगाँव से पूर्व में राजमहल तक, उत्तर में गंगा से दक्षिण में रानीगंज और सैंथिया तक विस्तृत था। यहॉं प्रशासन के लिए सिदो और कान्हू ने अपने नायब, दरोग़ा और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की।

संथालों के इस उभार अंग्रेजों में घबराहट पैदा कर दिया। खुद अंग्रेजों के दस्तावेज में सशस्त्र संथालों की संख्या तीस हज़ार से ऊपर बताई जाती है। इतना महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र हाथ से जाते देख अंग्रेजों का शीर्ष नेतृत्व हरकत में आती है। संथालों के दमन के लिए बड़े स्तर तक अंग्रेज़ी सैन्य अभियान की शुरुआत होती है। अंग्रेजों का अभियान 10 नवम्बर 1855 में शुरू होता है। शक्तिशाली अंग्रेजों को भी बाग़ी संथालों पर क़ाबू पाने में तक़रीबन साल भर लग जाता है। इस क्रम में क़रीब हज़ार संथाल लड़ाके वीरगति को प्राप्त करते हैं। सिदो और कान्हू को छल से पकड़ा जाता है। 26 जुलाई 1856 को इन्हें भगनाडीह में सरेआम एक पेड़ पर लटकाकर इस वीरों को फाँसी दे दी जाती है।

संथाल हार जाते हैं मगर इन्होंने हार कर भी अंग्रेज़ी शासन की जड़ें हिलाकर रख दी थी। इस विद्रोह का प्रभाव इतना ज़्यादा था कि दूर यूरोप में बैठकर साम्यवाद का सिद्धांत गढ़ने वाले कार्ल मार्क्स ने इस विद्रोह को ‘भारत की प्रथम जनक्रांति’ की संज्ञा दी।

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