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चीन के श्रमिकों की भीषण दुर्दशा

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 12, 2021, 01:16 pm IST
inदिल्ली

श्रमिकों के कल्याण के नारे पर चलने वाली कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शासित देश चीन के श्रमिक, खासकर विदेश में जा कर काम करने वाले काफी बेहाल हैं। चीन का अपने इन नागरिकों के प्रति नितांत निर्मम और असंवेदनशील रवैया सामने आया है। आज चीन विकृत मानसिकता वाले कम्युनिस्ट पार्टी के मुट्ठीभर युवराजों के कुत्सित षड्यंत्रों का अड्डा बना हुआ है। मजदूरों के साथ जो व्यवहार किया जा रहा है, वह साम्यवाद के मूल विचार की पोल खोलता है।

कोविड-19 एक ऐसी गंभीर विपदा के रूप में विश्व के सम्मुख उपस्थित हुई जिसने लगभग समस्त राष्ट्रों के समक्ष राजनैतिक, आर्थिक और मानवीय संकट उत्पन्न कर दिया है। राष्ट्र एक ओर जहां अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए चिंतित हैं, वहीं एक बार फिर चीन का, अपने ही नागरिकों के प्रति नितांत निर्मम और संवेदनशील रवैया देखने में आया है। मार्च 2020 में इस महामारी के गंभीर रूप धारण करने बाद जहां राष्ट्रों ने अपने नागरिकों को विदेशों से निकालने और सुरक्षित घर लाने के लिए उच्च स्तर पर प्रयास किये, वहीं चीन ने हजारों की संख्या में अपने ही साधनहीन मजदूरों को भाग्य के भरोसे मरने के लिए छोड़ दिया। विदेशों में फंसे इन हजारों चीनी प्रवासी मजदूरों की घर लौटने में असमर्थता की स्थिति का आकलन और अनुसंधान चाइना लेबर वॉच द्वारा जुलाई 2020 में प्रारंभ किया गया, जिसकी रिपोर्ट अप्रैल 2021 के अंत में प्रस्तुत की गई। चाइना लेबर वॉच की रिपोर्ट के खुलासे चौंकाने वाले हैं। यह चीनी सरकार पर, दूसरे देशों में काम कर रहे चीनी मजदूरों के वैध मानव अधिकारों के उल्लंघन और मानव तस्करी का आरोप भी लगाती है। आज मानव तस्करी आधुनिक गुलामी का एक रूप है जो मानव अधिकारों का एक गंभीर उल्लंघन है। मानव तस्करी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत परिभाषा महिलाओं, बच्चों और पुरुषों का शोषण करने और उन्हें इस व्यवस्था में बनाये रखने की प्रक्रिया को संदर्भित करती है।

बीआरआई और उत्पीड़न की पृष्ठभूमि
यद्यपि चीनी मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ता लंबे समय से चीनी प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के बारे में चिंता व्यक्त करते आये हैं। पिछले वर्षों में विदेशी जमीन पर, चीनी श्रमिकों ने चीनी नियोक्ताओं की ओर से लगातार समस्याओं का सामना किया है, जैसे पासपोर्ट जब्त करना, ऋण बंधन, आने-जाने की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और मजदूरी के भुगतान से इनकार इत्यादि प्रमुख हैं। ये सभी बंधुआ मजदूरी के स्पष्ट संकेतक हैं। परन्तु चीनी सरकार इस मामले में वास्तविक षड्यंत्रकर्ता की भूमिका में है। इन पीड़ित श्रमिकों ने जब इन देशों में स्थित चीनी दूतावास और वाणिज्य दूतावासों से संपर्क किया तो उल्टा उन्हें ही सेवा शर्तों के उल्लंघन का दोषी ठराया गया।

शी जिनपिंग ने सत्ता में आते ही वैश्विक परिदृश्य में चीन की महती भूमिका का स्थापित करने के लिए, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) को एक भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक पुनरावर्तन के रूप में प्रस्तावित किया। यहाँ बेल्ट एक भूमि गलियारे को संदर्भित करता है जो चीन से मध्य एशिया से होकर पूर्वी यूरोप तक फैला हुआ है। यह सडक मार्ग चीन के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व में बंदरगाहों के बीच एक समुद्री नेटवर्क भी बनाता है। अपनी शक्ति के वैश्विक विकास के लिए चीन द्वारा प्रस्तावित इस योजना में दुनिया के दो-तिहाई से अधिक देशों को मुख्य रूप से विकासशील देशों और उनके भू-संवेदनशील क्षेत्रों को शामिल किये जाने की योजना है। इनमें चीन द्वारा बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे के विकास के माध्यम से, जिसमे निर्माण, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन विकास, परिवहन, औद्योगिक निर्माण, निवेश और अन्य व्यापार गतिविधियाँ शामिल हैं, बीजिंग के वैश्विक प्रभाव को मजबूत करने का विचार केंद्र में है।

बीआरआई और मजदूरों की दुर्दशा?
और जब विश्वभर में इतने व्यापक पैमाने पर निर्माण कार्य की बात आती है तो इसके अग्रगामी चीनी मजदूर ही होते हैं परन्तु इनकी दशा उन देशों की तरह ही दयनीय होती है जहां चीनी दीमक अपना विस्तार करना चाहती है। चीनी कंपनियों के लिए नए बाजार बनाने के लिए इन देशों को चीन के धन और प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए, बीआरआई के द्वारा समाज के निचले हिस्से यानी अपने स्वयं के श्रमिकों का शोषण करने के लिए चीन के आर्थिक विकास मॉडल का भी निर्यात किया है। बीआरआई परियोजनाओं पर काम करने वाले कई चीनी श्रमिकों के साथ उनके नियोक्ता द्वारा बंधक बनाये जाने, पासपोर्ट छीन लिये जाने जैसी घटनाएं आम बात हैं। इसके साथ ही साथ उन्हें कर्ज और निर्वासन जैसी चीजों से लगातार धमकाया जाता है। एक विदेशी जमीन पर इन साधनहीन श्रमिकों के पास कानूनी वर्क परमिट, परिवहन, या चिकित्सा सुविधाओं का सख्त अभाव है। भले ही वे इस बात से परिचित हों कि वे मानव तस्करी और बंधुआ श्रम के शिकार हो चुके हैं, लेकिन उनके लिए इस दुर्दशा से बाहर निकलना संभव नहीं हो पाता। विशेष रूप से, दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीका के कई देशों, जहां बीआरआई की कई उभरती परियोजनाएं चल रही हैं, में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और औपनिवेशिक कारकों के कारण व्यापक तस्करी विरोधी कानून और नीतियां नहीं हैं। इन मेजबान देशों में अक्सर मानव तस्करी और श्रम अपराधों को रोकने के लिए एक प्रभावी आपराधिक न्याय प्रणाली का अभाव होता है। पीड़ितों को व्यक्तिगत सुरक्षा संरक्षण, कानूनी सहायता, अस्थायी आश्रय और चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने के लिए संसाधन अपर्याप्त हैं। इस समय, चीन के पास विदेशों में चीनी मजदूरों की सुरक्षा के लिए विशिष्ट कानून का अभाव है।

चीन के मनमाने कानून
असंवेदनशीलता की हद ये है कि चीन के पास विशेष रूप से विदेशी भूमि पर चीनी श्रमिकों की सुरक्षा के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक सरकारी एजेंसी तक नहीं है, और चीनी दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों ने विशेष रूप से विदेशी श्रम मामलों के लिए जिम्मेदार एक एजेंसी की स्थापना तक नहीं की है। चीन के पास मानव तस्करी पर पर्याप्त और प्रभावी डेटा का अभाव है। इसके अलावा, 1997 के आपराधिक कानून के अनुसार, केवल महिलाओं और बच्चों को ही कानूनी रूप से तस्करी पीड़ितों के रूप में मान्यता दी जा सकती है। चीन में वयस्क पुरुषों का अपहरण और उनका शोषण मानव तस्करी के तहत अपराध नहीं है। नतीजतन, चीन का आपराधिक कानून केवल उन लोगों को दोषी ठहराता है और उन लोगों को दंडित करता है, जो पीड़ितों को जानबूझकर चोट पहुंचाने के साथ अवैध हिरासत में रखते हैं। हालांकि, चीन और उस देश में, जहां ये श्रमिक स्थित हैं, आपराधिक कानून प्रवर्तन अधिकारियों के हस्तक्षेप के बिना, चीनी विदेशी श्रमिकों के पक्ष में साक्ष्य एकत्र करना और मुकदमे दायर करना लगभग असंभव है।

चीन के जनवादी गणराज्य के वाणिज्य मंत्रालय द्वारा प्रकाशित ‘चाइना इंटरनेशनल लेबर कोआॅपरेशन पर वार्षिक रिपोर्ट’ के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2018 के अंत तक, चीन की विदेशी श्रम सहयोग कंपनियों ने कुल 95,14,000 चीनी श्रमिकों को विदेशों में भेजा था और उस वर्ष के अंत में विदेश में चीनी श्रमिकों की संख्या 9,97,000 थी। प्रवासी श्रमिक आम तौर पर अपनी मजदूरी का एक बड़ा हिस्सा अपने देश में वापस भेजते हैं। वर्तमान में विदेशों में रह रहे चीनी श्रमिकों की संख्या पर कोई सटीक डेटा नहीं है परन्तु चीन को भेजे गए धन और प्रेषण की राशि विदेशों में चीनी श्रमिकों की बड़ी संख्या का संकेत देती है। हाल के वर्षोें में, चीन, भारत (1.7 करोड़ प्रवासी) के बाद वित्तीय प्रेषण के क्षेत्र में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता रहा है।

उल्लेखनीय है कि चाइना लेबर वॉच के इस सर्वेक्षण में चीनी श्रमिकों ने कहा कि वे गुलामी, दुर्व्यवहार और शोषण, अनुबंध के उल्लंघन, मजदूरी की रोक, कम वेतन, निराशाजनक कार्य स्थितियों, भेदभाव, सांस्कृतिक संघर्ष, कानूनी संरक्षण की कमी, सामाजिक और राजनीतिक बहिष्कार सहित कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। पिछले वर्ष कोविड-19 महामारी के वैश्विक प्रकोप के बाद से, कई देशों ने तेजी से बड़े पैमाने पर अपने नागरिकों की निकासी और प्रत्यावर्तन के कार्यों को अंजाम दिया है ताकि उनके नागरिकों को उनके देश में वापस लौटने में मदद मिल सके। उदाहरण के लिए, बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार (जिसे भारत के प्रति किसी भी प्रकार से पक्षपाती नहीं कहा जा सकता), भारत ने संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब, बहरीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, सिंगापुर, मलेशिया में लगभग 2,00,000 भारतीय प्रवासी श्रमिकों को स्वदेश लाने के लिए 7 मई से चार्टर उड़ानें उपलब्ध कराईं। परन्तु कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से, चीनी सरकार द्वारा लागू यात्रा प्रतिबंधों के कारण बड़ी संख्या में चीनी प्रवासी घर लौटने में असमर्थ रहे। विदेशों में फंसे चीनियों में, विदेशी चीनी कामगार सबसे कमजोर और खुद के लिए आवाज उठाने में असमर्थ थे। और इस भीषण विभीषिका के समय चीन ने अपने ही नागरिकों के साथ विश्वासघात किया।

मजदूरों के कल्याण हेतु कार्य करने वाला संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुषंगी अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ऐसे 11 मानदंडों की व्यवस्था देता है, जो यह संकेत देते हैं कि बलपूर्वक कार्य कराना किसी संगठन के संचालन का हिस्सा हो सकता है। ये 11 संकेतक हैं- दुर्व्यवहार, भेद्यता, धोखा, आवागमन पर प्रतिबन्ध, अलगाव, शारीरिक और यौन हिंसा, संत्रास और धमकी, पहचान दस्तावेजों का प्रतिधारण, मजदूरी रोकना, ऋण बंधन, अपमानजनक कार्य और रहने की स्थिति, और अत्यधिक समय तक कार्य कराना। और, यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि बीआरआई परियोजनाओं पर काम करने वाले चीनी मजदूरों के मामलों में, यहां सभी 11 मानदंडों का उल्लंघन किया जा रहा है। यहाँ अत्यधिक खतरनाक काम और उसकी स्थितियां मौजूद हैं जिनके घातक परिणाम अत्यंत आम बात हैं। वर्क परमिट प्राप्त करने में विफलता, दलालों और उनके अधीनस्थ एजेंट्स द्वारा इन श्रमिकों की खरीद-बिक्री, महामारी के दौरान चिकित्सा सुविधाओं की सख्त कमी और घर लौटने और कार्यस्थलों को छोड़ने की असमर्थता इन श्रमिकों के लिए भयानक स्थितियां पैदा करती हैं।

श्रमिकों और कृषकों का हिमायती होने का झूठा दम भरकर सत्ता में आई चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का अपने देश के श्रमजीवियों के साथ अत्याचारपूर्ण व्यवहार करने का लंबा और घिनौना इतिहास रहा है। कल्चरल रेवोल्यूशन और थाउजेंड फ्लावर ब्लूम जैसी नरसंहारपूर्ण योजनाओं ने लाखों चीनियों को असमय काल के गाल में धकेल दिया। आज चीन विकृत मानसिकता वाले कम्युनिस्ट पार्टी के मुट्ठीभर युवराजों के कुत्सित षड्यंत्रों का अड्डा बना हुआ है। मजदूरों के साथ जो व्यवहार किया जा रहा है, वह साम्यवाद के मूल विचार की पोल खोलता है। प्रतिष्ठित पत्रिका फोर्ब्स का अप्रैल का अंक बताता है कि दुनियाभर में 70 देशों में 2755 अरबपति मौजूद हैं जिनमे से लगभग एक चौथाई यानी 626 चीन के नागरिक हैं। यह चीन की प्राथमिकताओं को दशार्ता है कि कैसे साम्यवादी आवरण के पीछे एक क्रूर और रक्तपिपासु शोषक छिपा हुआ है और यह उस कथित पूंजीवादी खतरे से कहीं अधिक भयानक है जिसका भय दिखाकर चीन और दुनियाभर के साम्यवादी दल सत्ता पाने हेतु लालायित रहते हैं।
एस. वर्मा

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