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होम सम्पादकीय

जिहादी गिरफ्त में बंगाल!

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 10, 2021, 10:26 am IST
in सम्पादकीय, पश्चिम बंगाल

क्या महिलाओं के साथ नीचतापूर्ण व्यवहार, भाजपा समर्थकों के साथ बर्बरता, दुकान-व्यावसायिक संस्थानों को आग के हवाले करते हुए विधानसभा चुनाव के बाद बंगाल आगे की यात्रा पर बढ़ चला है? रक्तस्नान के बाद अट्टहास करती राज्यसत्ता ने मानो इस बात की मुनादी कर दी है कि अपमान की आग और आंसुओं का सागर ही बंगाल का भविष्य है।
जन अनिष्ट की यह आहट अकस्मात नहीं है, अंदेशा पहले से था किंतु इसके उपचार के लिए जरूरी कदम उठाने में देरी हुई।

अतीत के सबक, जो बिसरा दिए :
कोई भी कहानी एक क्षण में नहीं पलटती। बंगाल पर घात और राज्य की हिन्दू अस्मिता पर आघात का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है।
बंगाल की दीवानी ब्रिटिश हाथ में जाने के साथ ही भारत की बदहाली की कहानी शुरू हुई थी। ब्रिटिश शासन के दौरान बंगाल ने अत्याचार झेले, क्रांति की भूमि भी तैयार हुई। देश स्वतंत्र हुआ। किन्तु स्वतंत्रता के साथ विभाजन का जो दर्द मिला उसकी झलक बंगाल अगस्त 1946 के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के दौरान पहले ही देख चुका था। मुस्लिम उद्दंडता और हिंदू नरसंहार के उस उदाहरण से बंगाल ने देश के साथ होने वाली अनहोनी की पूर्व चेतावनी दी थी।
क्या इस बार भी ऐसा ही है!
क्या राष्ट्रीय भाव को कुचलने, महिलाओं का
सतीत्व छीनने और हिंदुओं को भयभीत कर राज्य
से बाहर धकेलने का ऐसा ही काम कश्मीर घाटी में नहीं हुआ था?
क्या बंगाल से आज ‘तीन पाकिस्तान’ की आवाजें नहीं उठ रहीं?

वर्गीय लामबन्दी से जिहादी जत्थों तक :
हिन्दू या कहिए देश को, लोकतंत्र को ललकारने-लहूलुहान करने वाली यह कहानी दबे पांव इस मोड़ तक आई है।
1977 में बंगाल ने न्याय और समानता के धोखे में वामपंथी शासन को अंगीकार कर लिया। शुरू में उसे यह सादगी भरी राजनीति का समतापूर्ण प्रयोग लगा। वामपंथियों ने बंटाईदारों के लिए काम करना शुरू किया। यह वोट बैंक काफी बड़ा था। 1962 में भारत पर हमला करने वाले चीन के तलवे चाटने वाले कॉमरेड खेतिहरों के लिए काम करके, नक्सलवाद को धार देकर अपना पाप छुपाते रहे। कॉमरेडों ने बंटाईदारों को एक ओर कर लिया।
एक वर्ग को लामबंद करना, दूसरे को उत्पीड़ित करना और इन सबमें भारत के हित को ताक पर रख देना…मत भूलिए की बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए काम करती ममता भी उसी लीक पर हैं। भारत के खिलाफ एक गहरा षड्यंत्र बंगाल में लम्बे समय से चल रहा है। पहले वामपंथ इसे चला रहा था, आज जिहादियों के सामने नतमस्तक राज्यसत्ता इसे बढ़ा रही है।

‘तंत्र’ पर पकड़ के लिए ‘लोक’ को बदलना :
जनसंख्या, बढ़ने के साथ ही लोकतंत्र को प्रभावित करने के तरीके के तौर पर भू-जनसांख्यिकी को प्रभावित करती है। इस्लाम को शत्रुभाव से नहीं, मगर लोकतंत्र को प्रभावित करने वाले तंत्र के कारक के तौर पर आपको जरूर पहचानना पड़ेगा। बंगाल में यह हुआ है।
दक्षिण अफ्रीका स्थित ईसाई मिशनरी और 40 पुस्तकों के लेखक डॉ. पीटर हैमंड के अनुसार दंगा, अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध और मजहबी कट्टरता के अतिरिक्त राजनीति और कानून हाथ में लेने जैसे कुछ अनचाहे बदलाव जनसंख्या में मुस्लिम प्रवासियों की संख्या में वृद्धि के साथ उभरते हैं।
अपनी पुस्तक ‘स्लेवरी, टेररिज्म एंड इस्लाम,’ (Slavery, Terrorism and Islam ) में उन्होंने जनसांख्यिकी बदलाव से शासन तथा समाज पर पड़ने वाले दबावों की विस्तृत चर्चा की है।

उपचार की जरूरत :
पश्चिम बंगाल में हिंदू-बहुल समाज की दोयम स्थिति, मुस्लिम-बहुल बांग्लादेश की सीमा, सीमा के दोनों ओर बढ़ता कट्टरवाद, मुस्लिम आबादी की गैर मुस्लिम समाज के साथ असहजता और परस्पर ‘उम्मत’ के तौर पर संगठित होकर शेष को ललकारने वाला व्यवहार ऐसा है जिसकी उपेक्षा अपने राजनीतिक लाभ के लिए ममता बनर्जी, वामपंथी या कांग्रेस चाहे करें, यह देश और इसका संविधान इसकी उपेक्षा नहीं कर सकता।
हिंसा का गढ़ बने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को उन्माद की पकड़ से निकालने के लिए उपचार की जरूरत है। असंवेदनशील क्षेत्र के तौर पर इन्हें चिन्हित करना, युवाओं को कठमुल्लों की गिरफ्त से बाहर रखना और घुसपैठियों को भारत की सीमा और इसकी चुनाव प्रक्रिया से निकाल बाहर करना अब अपरिहार्य कार्य हो गया है।

राष्ट्र से बड़ी नहीं हो सकती किसी की राजनीति :
लहूलुहान बंगाल बता रहा है कि अब बात राजनीति से आगे बढ़ चुकी है। यह समर्थकों की सामान्य तू तू-मैं मैं नहीं है। हत्याएं और बलात्कार की घटनाएं बता रही हैं कि मामला समझाने-बुझाने से आगे निकल चुका है और समाज को न्याय की जरूरत है। केरल के बाद बंगाल में राजनैतिक विरोधियों को रौंदने का चलन बता रहा है कि अब समस्या राज्यस्तरीय नहीं, राष्ट्रीय हो गयी है। ऐसे में बंगाल के चुनाव नतीजों की पुनर्समीक्षा की मांग भी उठ रही है। हिंसा का व्याप इस बात का भी संकेत कर रहा है कि चुनाव प्रक्रिया में लगा स्थानीय तंत्र भारी दबाव में था। वैसे भी, जहां गफलत है, गड़बड़ हो, चयन प्रक्रिया दोषी हो, वहां गड़बड़ी करने वालों की सदस्यता समाप्त करने की शक्ति हमारा संविधान देता है।

प्रश्न यह भी है कि क्या बंगाल में सत्ताधारी दल पोषित हिंसा की निष्पक्ष जांच सम्भव है?
निश्चित ही नहीं! वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक लगता है कि किसी पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग इस हिंसा के विविध पक्षों की जांच करे। यह भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की चुनाव पश्चात सबसे बड़ी राजनीतिक हिंसा है, इसलिए सबसे बड़ी न्यायिक जांच की भी आवश्यकता है। दोषियों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि लोकतंत्र को ललकारने और उससे आगे, उसे लहूलुहान करने के लिए जो जिहादी-उन्मादी जत्थे चल पड़े हैं, उनके लिए यह सजा मिसाल हो।
हितेश शंकर @hiteshshankar

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