महामारी के इस दौर में सबसे अधिक जरूरत है अस्पतालों की। पर भारत की लगभग 135 करोड़ की आबादी के लिए केवल 69,264 अस्पताल हैं। अब समय आ गया है कि देश में स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने पर ज्यादा से ज्यादा जोर दिया जाए, नहीं तो आने वाला समय और कठिन होगा
इन दिनों पूरा भारत कोरोना महामारी की चपेट में है। प्रतिदिन लगभग 4,00,000 लोग संक्रमित हो रहे हैं। मरीजों को अस्पतालों में जगह नहीं मिल पा रही है। ऐसे में देश की स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में हर कोई जानना चाहता है। उल्लेखनीय है कि लगभग 65 प्रतिशत भारतीय जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और 35 प्रतिशत शहरों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरों में स्वास्थ्य सुविधाएं अच्छी हैं।
एक आंकड़े के अनुसार भारत में सरकारी और निजी अस्पतालों की संख्या 69,264 है। निजी क्षेत्र में 43,486 अस्पताल और सरकारी क्षेत्र में 25,778 अस्पताल हैं। 135 करोड़ की आबादी को देखते हुए कह सकते हैं कि देश में अस्पतालों की पर्याप्त संख्या नहीं है। यही कारण है कि इन दिनों पूरे देश में अस्पतालों के बाहर भीड़ लगी हुई है। इस समय मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया (एमसीआई) में पंजीकृत योग्य चिकित्सकों की संख्या 12,50,000 है। इनमें से विभिन्न रोगों के 3,71,000 विशेषज्ञ हैं। यह संख्या केवल एलोपैथ के चिकित्सकों की है। इनमें से 80 प्रतिशत चिकित्सक शहरी क्षेत्रों में और 20 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते हैं। यही वजह है कि गांव के लोग किसी तरह की बीमारी के इलाज के लिए शहरों की ओर भागते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं हों, इसके लिए काम करने की जरूरत है। भारत में 1,500 नागरिकों के लिए एक एलोपैथी डॉक्टर है। एलोपैथ के चिकित्सकों के अलावा देश में आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी और प्राकृतिक चिकित्सा जैसी अन्य पद्धतियों के डॉक्टर भी सेवा करते हैं।
वर्तमान में भारत में 15 अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) काम कर रहे हैं। 2025 तक आठ और एम्स काम करने लगेंगे। ये अस्पताल रोगियों को कम दाम पर अत्याधुनिक उपचार प्रदान करते हैं। वर्तमान में कार्यरत सभी एम्स में हर वर्ष 1,200 से अधिक छात्र एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए दाखिला लेते हैं।
एक रपट के अनुसार भारत के अस्पतालों में 19,00,000 बिस्तर, 95,000आई.सी.यू बेड्स और 48,000 वेंटिलेटर हैं। शहरी अस्पतालों में ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों की तुलना में बिस्तरों की संख्या दोगुनी है। वर्तमान में भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 1.6 प्रतिशत ही स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च कर रहा है। आने वाले समय में इसे तीन प्रतिशत करने की बात चल रही है। जबकि ब्रिटेन तथा जर्मनी जैसे उन्नत देश अपने लोगों के स्वास्थ्य पर अपने जीडीपी का क्रमश: 9.63 प्रतिशत और 11.25 प्रतिशत खर्च कर रहे हैं। भारत की जनसंख्या को देखते हुए स्वास्थ्य क्षेत्र में विशेष ध्यान देने की जरूरत है। ऐसा नहीं करने के कारण ही देश में इस समय अफरातफरी का माहौल है।
‘भोरे समिति’ के सुझाव
1948 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए ‘भोरे समिति’ बनी थी। इस समिति ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों के निर्माण के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ाने का सुझाव दिया था, ताकि टीकाकरण, मातृ और बाल मृत्यु की रोकथाम पर विशेष ध्यान दिया जाए। किंतु दुर्भाग्यवश उस सुझाव पर उतना ध्यान नहीं दिया गया, जितना कि देना चाहिए। इस कारण भारत की बहुसंख्यक ग्रामीण जनता स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है।
सरकारी अस्पतालों में जबर्दस्त भीड़ होती है। आप कभी भी और किसी भी सरकारी अस्पताल में चले जाएं, घंटों इंतजार करने के बाद ही इलाज करा सकते हैं। इस कारण एक वर्ग इन अस्पतालों में नहीं जाना चाहता है। वह निजी अस्पतालों में महंगा इलाज करा लेता है, लेकिन सरकारी अस्पताल नहीं जाना चाहता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि निजी अस्पतालों में सरकारी से अच्छी सुविधाएं होती हैं, पर इनमें हर कोई जा नहीं सकता। इनका लाखों रुपए का बिल भरना हर किसी के बस की बात नहीं है। बीमा आश्रित मरीज निजी अस्पतालों में मुफ्त में ही इलाज कराते हैं। ये अस्पताल विदेशियों को भी अपनी ओर खींचने में सफल हुए हैं। निजी अस्पतालों की गुणवत्ता और प्रदर्शन के परिणामस्वरूप इलाज कराने के लिए विदेशी भी भारत आते हैं। इससे भारत को सालाना 6.68 खरब रु. की बड़ी राशि मिलती है। भारत में स्वास्थ्य सेवाएं बड़े शहरों में टेलीमेडिसिन और चिकित्सा पर्यटन के युग में बीमारियों के निदान और उपचार में ऊंची उड़ान तक पहुंच गई हैं।
राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन
राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन को 2013 में शहरी आबादी, विशेष रूप से गरीब और झुग्गी में रहने वाले लोगों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए मंजूरी दी गई थी। इस पर उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ है।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन
2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन शुरू होने के बाद ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि हुई है। मैदानी इलाकों में 5,000 लोगों और पहाड़ी और कठिन दूरदराज के क्षेत्रों में 3,000 लोगों के लिए उप स्वास्थ्य केंद्र हैं, जो मातृ और शिशु देख-भाल सेवाएं प्रदान करते हैं। इन केंद्रों में स्वास्थ्य देखभाल, परिवार कल्याण देखभाल, पोषण संबंधी देखभाल, टीकाकरण, दस्त नियंत्रण और संचारी रोगों की रोकथाम के लिए पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित किया जाता है। इन केंद्रों को एक महिला ए.एन.एम. और एक पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा संचालित किया जाता है।
मैदानी क्षेत्रों में 30,000 लोगों पर और कठिन दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में 20,000 लोगों पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है। ये केंद्र प्राथमिक उपचार प्रदान करते हैं और इनमें तीन से चार बिस्तर होते हैं। ये गंभीर रूप से बीमार रोगी को बड़े अस्पतालों में बेहतर चिकित्सा के लिए भेजते हैं।
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए 14 एम्स
प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय 1956 में नई दिल्ली में पहले एम्स की स्थापना हुई। इसके बाद बरसों तक और कोई दूसरा एम्स नहीं शुरू किया गया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय छह एम्स पर कार्य शुरू हुआ। डॉ. मनमोहन सिंह के समय एक एम्स की स्थापना हुई। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 एम्स बनाने की घोषणा की है। इनमें से कई काम भी करने लगे हैं।
खोज और शोध पर जोर
पिछली शताब्दी में बीमारी और भूख मिटाने के लिए विश्व स्तर पर जबरदस्त प्रयास किए गए थे। बीमारी के कारणों की खोज और उपचार के लिए शोध व निवारण में नई तकनीक के उपयोग ने लाखों लोगों को अच्छे स्वास्थ्य का आनंद लेने में सहायता की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की समर्पित अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय शाखाओं ने चेचक और पोलियो जैसी बीमारियों को पूरी तरह से समाप्त करने में सरकारों को सहयोग दिया है और एचआईवी, एड्स, टीबी, हैजा, खसरा, कण्ठमाला, जलजनित और वायुजनित रोगों की काफी सीमा तक रोकथाम की है। अब कोरोना के लिए भी कुछ स्थाई इलाज खोजना होगा।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में चार विशेषज्ञ नियुक्त होते हैं। इनमें प्रसूति और स्त्री रोग विशेषज्ञ, शल्य चिकित्सक, मेडिकल विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ होते हैं। इस केंद्र में 30 बिस्तर, एक्स-रे यूनिट, ओ.टी, लैब सुविधाएं और लेबर रूम भी होते हैं।
सरकारों के स्वास्थ्य मंत्रालय
हमारे यहां स्वास्थ्य क्षेत्र को केंद्र सरकार और राज्य सरकारें दोनों देखती हैं। केंद्र सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय है, तो राज्यों में भी स्वास्थ्य मंत्री होते हैं। परिवार कल्याण कार्यक्रम, बड़ी बीमारियों की रोकथाम, महामारी का प्रकोप, रोग नियंत्रण कार्यक्रम आदि केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं। राज्य सरकारें अस्पतालों को सुचारू रूप से चलाने, स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ावा देने, बीमारियों की रोकथाम, स्वच्छता और विभिन्न राष्ट्रीय कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार हैं।
आयुष्मान योजना
भारत सरकार ने गरीब लोगों को ध्यान में रखते हुए आयुष्मान प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना है की शुरुआत 23 सितंबर, 2018 को की है। इसका बजट 6,400 करोड़ रु. का है। इस योजना से निर्धन लोगों को अच्छी चिकित्सा मिल रही है। योजना प्रति परिवार प्रतिवर्ष 5 लाख रुपए का बीमा कवर देती है। कोई भी पात्र परिवार अस्पताल में इस बीमा के तहत इलाज करवा सकता है। यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में 100 मिलियन और शहरी क्षेत्रों में 23 मिलियन लोगों के लिए है, जो कमजोर और गरीब परिवारों से संबंधित हैं।
कर्मचारियों के लिए सुविधाएं
अमीर लोग निजी अस्पतालों में बीमा आधारित उपचार प्राप्त कर सकते हैं। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी, कर्मचारी स्वास्थ्य बीमा योजना के माध्यम से अस्पतालों में उपचार का लाभ उठा सकते हैं। सशस्त्र सेनाओं के अधिकारियों, जवानों तथा उन्के आश्रितों का सैनिक अस्पतालों मे मुफ्त इलाज किया जाता है। सेवानिवृत्त सेनानियों को सैनिक अस्पतालों के अतिरिक्त सूचीबद्ध निजी अस्पतालो में बिना किसी खर्च के नि:शुल्क उपचार मिलता है। इसी तरह सेवानिवृत्त केंद्रीय शासकीय कर्मचारियों को उनके लिए समर्पित अस्पतालों में मुफ्त इलाज मिलता है।
चिकित्सा शिक्षा में सुधार
चिकित्सा स्नातकों को प्रशिक्षित करने के लिए साहसिक कदम उठाने होंगे। हमें पाठ्यक्रम तथा प्रशिक्षण की क्रिया प्रणाली में सुधार तथा योगदान देना होगा और पाठ्यक्रम पर पुन: विचार-विमर्श करना होगा। एमबीबीएस डॉक्टर को तैयार करने की प्रक्रिया प्रणाली पुरानी पड़ गई है। हमें एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जो एक नव स्नातक को अतिरिक्त विषयों के उपचार के लिए प्रशिक्षण देकर और क्रियाशील तथा दक्ष बना सके। ऐसे पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण द्वारा एक चिकित्सक विभिन्न रोगों की चिकित्सा के लिए अधिक लाभदायक सिद्ध होगा।
इसके लिए पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण को पांच वर्ष से सात वर्ष तक किया जाए।
ट्रामा सेंटर की उपयोगिता
वर्तमान में सड़क दुर्घटना के कारण चोट और आघात के कारण भारत में प्रतिवर्ष कम से कम 1,50,000 लोग मृत्यु का शिकार बन रहे हैं। गंभीर रूप से आहत रोगियों को आमतौर पर अस्पतालों में तत्काल सर्जरी की आवश्यकता होती है। लेकिन जैसा कि हमारे अस्पताल सामान्य मामलों या अन्य आपातकालीन मामलों के इलाज में व्यस्त रहते हैं, इसलिए दुर्घटना रोगियों पर उचित ध्यान नहीं दे पाते हैं। इसीलिए अस्पतालों में इन लोगों की चिकित्सा को समर्पित अलग-अलग आघात केंद्र या ट्रामा सेंटर की आवश्यकता होती है।
निष्कर्ष
समय आ गया है कि चिकित्सकों को सभी विषयों में विशेष और अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया जाए। सभी अस्पतालों में हर प्रकार के विशेषज्ञ और विशिष्ट विशेषज्ञ प्रदान करना कठिन है। ऐसे डॉक्टर, जिन्हें विशेष रोगों के इलाज में अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया जाता है, वे मानव सेवा में महान योगदान करते हैं। यह देखा गया है कि विविध प्रकृति की कई प्रक्रियाओं को करने के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर उन लोगों की तुलना में अधिक कुशल होते हैं जो एकल विशेषता पर ही केंद्रित होते हैं।
अब वह समय आ गया है कि हमें अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने पर पूरी ताकत लगानी होगी। इसमें अस्पतालों के निर्माण के साथ-साथ चिकित्सकों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को तैयार करना शामिल है। इसके बाद ही हम किसी महामारी को परास्त कर सकते हैं।
ब्रिगेडियर (डॉ.) सुरेंद्र मोहन शर्मा (सेनि.) (लेखक भारतीय सेना में सर्जन रहे हैं)











