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मद्रास उच्च न्यायालय की टिप्पणी को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 27, 2021, 10:59 am IST
inदिल्ली

तय पूर्वाग्रह के तहत बार-बार रैलियों के लिए केवल भाजपा पर आक्रमण किये गए और पांच राज्यों में हो रहे चुनाव में से केवल बंगाल का जिक्र ही किया गया। लेकिन अगर आप अन्य राज्यों की तरफ देखेंगे तो अन्य दलों की भूमिका और वीभत्स दिखेगी।

एक बड़े घटनाक्रम में मद्रास उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग पर कड़ी टिप्पणी की है। मुख्य न्यायाधीश एस. बनर्जी ने सुनवाई के दौरान कहा कि ‘चुनाव आयोग ही कोरोना की दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार है। चुनाव आयोग के अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।’ हालांकि प्रोसीडिंग के दौरान की गयी ऐसी टिप्पणियां न्यायालय के आदेश का हिस्सा नहीं हुआ करते, लेकिन फिर भी विषय की गंभीरता का आकलन ऐसी टिप्पणियां कर ही देती हैं। अभी तक एक तय एजेंडा के तहत देश भर में कोरोना काल की इन रैलियों के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि किसी भी राजनीतिक दल ने कोई भी कसर उठा नहीं रखी है। कोरोना के लक्षण के बाद एक राजनीतिक कदम के तहत कांग्रेस नेता राहुल गांधी के शिगूफे को छोड़ दें तो लगभग हर पार्टी ने अपनी पूरी ताकत चुनाव में झोंक दी, ऐसा स्वाभाविक ही था। लेकिन जिम्मेदार महज़ भाजपा को ठहराये जाने के चलन के विरुद्ध भी कोर्ट की इस टिप्पणी को देखा जाना चाहिए।

निस्संदेह चुनाव के दौरान चुनाव आयोग सर्व शक्तिमान होता है। इतनी अधिक ताकत उसके पास इस दौरान होती है कि अधिसूचना जारी हो जाने के बाद सामान्यतः कोर्ट भी उनके काम में दखल नहीं दे सकता। कोर्ट द्वारा इस मामले में चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराना उचित ही है। कोरोना की दूसरी भीषण लहर के बीच आयोग एक सामान्य कार्यकारी आदेश से सारी बड़ी रैलियों को रोक सकता था। ऐसा करने के लिये आयोग पूरी तरह सक्षम था। आयोग चाहता तो यह आदेश दे सकता था कि किसी भी कीमत पर कहीं भी रैलियों में पांच सौ से अधिक लोग इकट्ठा नहीं होंगे। यह संख्या अधिकतम होगी। हर जगह इस संख्या तथा कोविड प्रोटोकॉल को सुनिश्चित करने के लिये पर्यवेक्षक नियुक्त होते। इस तरह चुनाव अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा के साथ संपन्न होता।

जिस तरह कोरोना काल के अनेक प्रयोगों ने हमें भविष्य की राह दिखाई है, उसी तरह शायद यह प्रयोग भी चुनाव की अनेक विसंगतियों के विरुद्ध आगे हथियार का काम करता। जाहिर है, प्रत्यक्ष रैली की अधिक गुंजाइश ख़त्म होने पर राजनीतिक दल अधिक से अधिक डिजिटल प्लेटफार्म का उपयोग कर जनता से जुड़ने के तरीके खोजते। भाजपा जैसे राजनीतिक दल अपनी आंतरिक गतिविधियों समेत धरना-प्रदर्शन आदि में भी डिजिटल तरीकों का ब्लाक से लेकर केंद्र तक उपयोग करना शुरू कर चुकी है। निस्संदेह वह चुनावों के लिए भी ऐसे नवाचारों को प्रोत्साहन देती। अन्य दल भी इसे अमल में लाने की कोशिश करते और हो सकता है, इस तरह आने वाले समय में बड़ी-बड़ी रैलियां बीते दिनों की बात हो जातीं। आयोग क्या कर सकता था, इसे समझने के लिए ज़रा कल्पना कर लीजिये कि आज इस हालात में अगर टी. एन. शेषन चुनाव आयुक्त होते तो ऐसी रैलियां संभव होतीं ? बिल्कुल नहीं।

आप जिन चुनाव सुधारों की कल्पना कर सकते हैं, बड़ी रैलियों का निषेध उनमें प्रथम होगा। खर्चीली शादी और खर्चीला चुनाव, इसके रहते हुए समाज और राजनीति में कोई भी बड़ा सुधार संभव नहीं, तमाम विसंगतियों की जड़ यही हैं। अगर बड़ी-बड़ी रैलियों आदि का विकल्प नहीं होगा तो ज़ाहिर है चुनाव खर्चों पर वास्तविक लगाम लगना संभव होगा। कार्यवाही के दौरान टिप्पणी करते हुए मुख्य न्यायाधीश निश्चित ही अपने मूल राज्य बंगाल के बारे में भी सोच रहे होंगे, जिसके लिए इकतरफा देश भर में भाजपा को बदनाम करने की कोशिश हुई है। लेकिन आप सोचिये ज़रा, अगर चुनाव आयोग ने वहां रैलियों को नहीं रोका तो क्या आप भाजपा से यह उम्मीद कर रहे थे कि वह घर बैठ जाती ? ऐसा करने पर ममता बनर्जी का आतंक कैसा सिर चढ़ कर बोलता, गांव-गांव में वह कैसा आतंक स्थापित कर लेती, इसकी कल्पना भी है आपको ? भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए वहां का चुनाव भी जीवन-मरण के कम का प्रश्‍न नहीं है। दशक भर से वहां चल रही अंतहीन हिंसा के दौर में सैकड़ों भाजपाजनों ने अपने

प्राणों की आहुति दी है। तो ऐसे निर्णायक समय में उन कार्यकर्ताओं को आतताइयों के रहमो-करम पर छोड़ देना क़ोरोना से भी भीषण आपदा होती। तृणमूल समेत अन्य दल वहां गांव-गांव में रैलियां कर रहे होते, उन्हें इसकी इजाज़त होती और भाजपा अगर घर बैठ जाती तो वहां के लोग भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को कभी माफ़ नहीं कर पाते। भाजपा ने अपना अधिकतम देकर वहां अच्छा किया। इसके अलावा और कोई विकल्प आयोग ने छोड़े नहीं थे।

हालांकि यह तय है कि तय पूर्वाग्रह के तहत बार-बार रैलियों के लिए भाजपा पर आक्रमण किये गए और पांच राज्यों में हो रहे चुनाव में से केवल बंगाल का जिक्र ही किया गया। लेकिन अगर आप अन्य राज्यों की तरफ देखेंगे तो अन्य दलों की भूमिका और वीभत्स दिखेगी। आप असम का उदहारण लें। वहां छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को वहां की जिम्मेदारी दी गयी थी। तमाम वैध-अवैध संसाधनों और सारे अमलों के साथ वे असम में तब जुटे हुए थे जब छत्तीसगढ़ संक्रमण के मामले में सारे देश में प्रथम था। यहां तक की जब प्रदेश के बस्तर में नक्सलियों ने 22 जवानों को बलिदान कर दिया, यहां लाशें गिनी जा रही थीं, तब भी सीएम बस्तर के ही सांसद के साथ वहां होटल में पार्टी मनाते रहे। जब अपना चुनावी दौरा रद्द कर केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह उच्च स्तरीय बैठक भी दिल्ली में कर चुके, तब भी सीएम और स्थानीय सांसद समेत सारा अमला तब तक असम में जुटा रहा, जब तक कि प्रचार का समय समाप्त नहीं हो गया। ऐसे ही कोरोना पर प्रधानमंत्री द्वारा मुख्यमंत्रियों की बुलाई बैठक तक में वर्चुअल माध्यम से भी जुड़ने के बजाय सीएम असम में प्रचार करते रहे थे। तो क्योंकि चुनाव आयोग ने इस भीषण महामारी के दौरान भी हर तरह की चुनावी गतिविधि की इजाज़त दी हुई थी, तो उसका लाभ लेने अन्य दल ख़ास कर अपनी जिम्मेदारियों को भूल कर चुनावी राज्य में डटे रहे और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चुनाव आयोग आंख मूंदें रहा। ऐसे में भाजपा द्वारा इकतरफा ‘संघर्ष विराम’ की घोषणा उसके लिए राजनीतिक रूप से आत्मघाती कदम ही होता।

निस्संदेह जैसा कि कोर्ट ने कहा इस दूसरी लहर के लिए चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता। चुनाव के बाद आयोग की भूमिका का विस्तृत परीक्षण होना ही चाहिए। कोर्ट की टिप्पणी से शायद यह मार्ग प्रशस्त हुआ है। भले कथित हत्याओं के लिये आयोग के अधिकारी व्यक्तिशः ज़िम्मेदार नहीं ठहराएं जायें, पर आयोग की हिमालयी भूल को सामने लाना ही होगा। रैलियों के लिए केवल भाजपा की की जा रही आलोचना प्रायोजित है। एजेंडाबाजों का शिगूफ़ा है।

पंकज झा

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