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होम भारत

बढ़ता साथ, चढ़ती साख

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 22, 2021, 04:12 pm IST
inभारत

संयुक्त अरब अमीरात में 3 से 21 मार्च, 2021 तक अमेरिका, फ्रांस और सऊदी अरब सहित 10 देशों के बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास डेजर्ट फ्लैग-6 में भारतीय वायु सेना के छह एसयू 30 एमके1 लड़ाकू विमानों की भागीदारी से भारत और अरब जगत के बीच बढ़ते संबंधों की स्पष्ट खबर मिलती है। जोधपुर में फ्रांस के साथ हमारे अपने राफेल लड़ाकू विमानों के डेजर्ट नाइट 2021 अभ्यास के तुरंत बाद इस संयुक्त अभ्यास में शामिल होना हमारी पेशेवर कुशलता तथा संबंधों के विकास के साथ ही भारतीय वायु सेना के साथ सम्पर्क विकसित करने की विकसित देशों की इच्छा का संकेत है।

वर्ष 2020 में सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे की संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब की पहली यात्रा सैन्य संबंधों को मजबूत बनाने के अलावा अरब जगत व भारत के बीच मौजूद उत्कृष्ट राजनयिक संबंधों को और सुदृढ़ करने का संकेत देती है। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सशस्त्र बल एक दूसरे की सर्वोत्तम परंपराओं को समझने और उनका अनुकूलन करने के लिए ही इस तरह के सहयोगात्मक जुड़ाव करते हैं। जब पाकिस्तान सऊदी अरब को हटाकर खुद मुस्लिम जगत का नेतृत्व संभालने की इच्छा पालने वाले तुर्की के करीब जाता लग रहा है, ऐसे में यह यात्रा एक खास संदेश देती है। 2018 में भुगतान संतुलन संकट के समय सऊदी अरब से 6.2 बिलियन डॉलर की मदद पाने के बावजूद पाकिस्तान अरब जगत के लिए अविश्वसनीय साथी ही साबित हुआ है।

सहयोग और समन्वय
भारतीय सशस्त्र बल पिछले कई दशकों से 20 से अधिक देशों के साथ विभिन्न द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सैन्य अभ्यासों में भाग लेते रहे हैं। मित्र देशों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास के परिणामस्वरूप परिचालन की दृष्टि से रचनात्मक आदान-प्रदान होता है और विभिन्न देशों के सशस्त्र बलों के साथ संचालन से युद्ध के विभिन्न क्षेत्रों में हमारे सशस्त्र बलों का कौशल बढ़ता है। ये संयुक्त अभ्यास संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत आतंकवाद का मुकाबला करने के संकल्प को सुदृढ़ करने के साथ ही इनमें भाग लेने वाले देशों के बीच बढ़ते सैन्य और राजनयिक संबंधों को गति प्रदान करते हैं। संभवत: संयुक्त सैन्य अभ्यासों का सबसे महत्वपूर्ण लाभ है ‘स्ट्रेटेजिक सिग्नलिंग’। एक या अधिक राष्ट्रों के साथ कोई संयुक्त अभ्यास किसी तीसरे देश को इस क्षेत्र में हमारे प्रभाव का संकेत देने के उद्देश्य की पूर्ति करने के साथ ही हमारे कूटनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के संकल्प का भी प्रदर्शन करता है। ये अभ्यास भाग लेने वाले देशों के बीच संबंध और दोस्ती की एक अनूठी भावना भी पैदा करते हैं।

चीन की हेकड़ी
उधर चीन ने भारत, अमेरिका, जापान और आॅस्ट्रेलिया की भागीदारी वाले पहले वर्चुअल ‘क्वाड’ शिखर सम्मेलन पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। स्वतंत्र और निर्बंध हिंद-प्रशांत क्षेत्र तथा खुले समुद्र में विधि के शासन की इच्छा ने ‘क्वाड’ देशों को दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक, मुखर और विस्तारवादी आचरण का विरोध करने के लिए प्रेरित किया है। ऐसा लगता नहीं कि चीन यह मानता हो कि वह कुछ भी गलत कर रहा है। इसके उलट वह क्वाड देशों पर आरोप लगाता है कि वे दक्षिण चीन सागर क्षेत्र के अन्य देशों को चीन से खतरे का हवाला देते हुए भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। वर्ष 2007 से अपना तुष्टीकरण होते रहने के कारण चीन मानने लगा है कि दक्षिण चीन सागर में वह जो कुछ भी कर रहा है, वह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। चीन कानून के शासन के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता आदेशों का कतई सम्मान नहीं करता, इसके उलट वह लोकतांत्रिक देशों में से प्रत्येक के साथ द्विपक्षीय रूप से व्यवहार करते हुए उन देशों के आपसी मतभेदों का फायदा उठाता है। विभिन्न देशों से बहुपक्षीय आधार पर संबंध रखने को लेकर चीनी बहुत आशंकित रहते हैं। चीनियों का मानना है कि अकेले उनका आचरण ही विश्व में एकजुटता, एकता, क्षेत्रीय शांति और स्थिरता ला सकता है। क्वाड का मानना है कि लोकतांत्रिक देश एकजुट होकर तानाशाही ताकतों का सामना करने में मददगार हो सकते हैं और चीनी चुनौतियों का मुकाबला कर सकते हैं। चीन ने मौजूदा व्यवस्था का फायदा उठाकर अपनी हैसियत बड़ी कर ली है, जिसके लिए विशेषज्ञ अमेरिका को सबसे ज्यादा दोषी मानते हैं।

उदाहरण के लिए चीन भारत-पाकिस्तान के बीच मौजूदा तनाव का भी फायदा उठाने की फिराक में रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर संघर्ष में आंशिक कमी और नियंत्रण रेखा पर सैन्य उपस्थिति घटाने के साथ तनाव कम करने में मदद मिलेगी जिससे विवादित सीमाओं पर शांति आएगी। लेकिन हम आत्मसंतुष्ट नहीं हो सकते। हमारे पास सजग आशावाद के साथ पूर्ण सतर्कता एवं किसी पड़ोसी के एकल अथवा किसी के साथ सहयोग करते हुए हमारे विरुद्ध कार्रवाई की स्थिति में तुरंत सक्षम जवाबी कार्रवाई की क्षमता होनी ही चाहिए। गैर-भरोसेमंद पड़ोसियों के खिलाफ क्षमता निर्माण कार्य चलते रहना चाहिए। पाकिस्तान के खिलाफ दंडात्मक रोक उसे अशांत स्थितियों का लाभ लेने से रोकेगी, जबकि चीन के खिलाफ निरोधात्मक बाधाएं लगाने से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर उसके किसी भी दुस्साहस को रोका जा सकेगा।

मजबूत स्थिति, दमदार उपस्थिति
अगर वुहान वायरस ने पूरी दुनिया पर असर डालते हुए लाखों लोगों को मार डाला है, तो करोड़ों लोगों का जीवन बचा रही भारत की कोविड वैक्सीन पहल ने 150 से अधिक देशों का दिलोदिमाग जीत लिया है। भारत को बदनाम करने के उद्देश्य से लगातार जारी चीन और पाकिस्तान का दुष्प्रचार उलटा पड़ा है। यह समझते हुए कि भारत को धकिया कर किनारे नहीं किया जा सकता, चीन ने भविष्य में भारत पर दबाव बनाने के लिए अपनी क्षमताएं बढ़ाने का समय हासिल कर लिया है, जबकि पाकिस्तान ने भी महसूस किया है कि राज्य नीति के साधन के रूप में आतंकवाद का उपयोग करना उसे केवल एफएटीएफ द्वारा काली सूची में डाले जाने के करीब ही पहुंचा रहा है। इस पृष्ठभूमि में आर्थिक, तकनीकी और सैन्य रूप से मजबूत भारत तथा कूटनीतिक मोर्चा प्रेरित करने में सक्षम भारत को तमाम लोकतांत्रिक देश विस्तारवादी चीन तथा आतंकवाद फैला रहे पाकिस्तान की गतिविधियों पर रोक लगा सकने में सक्षम एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में देखते हैं।

भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, लेकिन स्वीडन और अमेरिका के कुछ ‘थिंक टैंक’ उसे बदनाम करने के अपने एजेंडे पर काम करते हैं और अफसोस कि भारत के राजनीतिक दलों में उन्हें उत्साही समर्थक मिल जाते हैं। भारत को उन ‘थिंक टैंक’ के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, जिनके एजेंडे के मुताबिक हम नहीं चलते।

भारत के पास उसे बदनाम करने के लिए चीन-पाकिस्तान गठजोड़ का मुकाबला करने की रणनीति होनी चाहिए और किस्मत से हमारे पास यह काबिलियत है। चीन पाकिस्तान के परमाणु व मिसाइल कार्यक्रम, लड़ाकू विमान, टैंक और यूएवी तंत्र का समर्थन करता रहा है। इस बूते पाकिस्तान चीन की गोद में जा बैठा है। उसके भारत से बचने के लिए ही चीन के सामने आत्मसमर्पण किया है। उधर, चीन चाहता है कि पाकिस्तान अमेरिका से दूर रहे। चीन को खुश करने के लिए पीछे झुकते हुए पाकिस्तान ने उसे शक्सगाम घाटी, काराकोरम हाईवे, सीपीईसी, ग्वादर और तमाम दूसरे इलाके सौंपे हैं। पर चीन का कभी भी तुष्टीकरण नहीं करना चाहिए, बल्कि उसके साथ मजबूती की स्थिति से ही निपटना चाहिए। जून 2020 में गलवान घाटी में भारत की चीन की तगड़ी पिटाई उसके साथ ताकत की स्थिति से निपटने में सक्षम होने का ही परिणाम है। इसके बाद संघर्ष से दूर रहने तथा सेना की उपस्थिति घटाने के बारे में चीन से होने जा रही वार्ता आसान नहीं होगी।

पाकिस्तान ने 2003 के बाद से केवल सियाचिन सेक्टर में भारत के साथ संघर्षविराम का पालन किया है, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसके आका चीन को भारत की ओर से किसी भी जवाबी गोलीबारी का सामना करना पड़े जिससे पाक-अधिक्रांत कश्मीर में सड़कों, बांधों या संचार टॉवरों जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर प्रभाव पड़े। चीन ने तिब्बत में अपनी क्षमताएं विकसित करने के लिए ही भारत के साथ शांति और गतिविधिशून्यता के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और जैसे ही उन्हें लगा कि वे भारत पर दबाव बना सकते हैं, उन्होंने सभी समझौते हवा में उड़ा दिए।

हमें अपने विरोधियों की ओर से शांति के दिखावे को सहज ही नहीं मान लेना चाहिए। हमारा अनुभव रहा है कि सतर्क आशावाद के साथ काम लेते हुए हमें अपनी तलवार की धार बनाए रखना काम आया है। क्षमता निर्माण में समय लगता है जबकि इरादे रातोरात बदल सकते हैं और इसलिए हमारी तैयारी, गठबंधन और आर्थिक उत्थान ही हमें चीन की धृष्टता और विस्तारवाद का मुकाबला करने में दुनिया के प्रमुख देशों का साथ दिलाने में मदद करेगा।
हमें साइबर और अंतरिक्ष युद्ध क्षमताओं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दृश्य सीमा से आगे की परास वाली मिसाइलों, अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों सहित सुरक्षा क्षमताओं से लैस होना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ हैं)

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