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होम भारत

काबुल से अब नहीं दूर दिल्ली

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 22, 2021, 04:08 pm IST
inभारत

अफगान शांति प्रक्रिया में भारत की स्पष्ट भूमिका को लेकर अमेरिकी सरकार के मन में कोई संशय नहीं है। पाकिस्तान कितना भी प्रयास करे, इस प्रक्रिया में भारत की अहम भूमिका रहेगी। अफगान-अमेरिकी राजनयिक खलीलजाद का भारतीय विदेश मंत्री के सामने रखा गया प्रस्ताव इस आशय की पुष्टि करता है

ग्यारह सितम्बर, 2001 की आतंकी घटना के बाद अमेरिका उस अफगानिस्तान में दाखिल हुआ था जहां जाने से कई बड़े ताकतवर देश भी घबराते रहे थे। यह बेवजह ही ‘सम्राटों और साम्राज्यों के कब्रिस्तान’ के रूप में कुख्यात नहीं है। रूसियों को यहीं हारना पड़ा था और अमेरिकी भी अपने दुस्साहस में निहित निरर्थकता का स्वाद चख रहे हैं, अफगानिस्तान उनके लिए वियतनाम बनता जा रहा है। पिछले कम से कम दो राष्ट्रपतियों के कार्यकाल से वे यह जगह ‘जल्दी से जल्दी’ छोड़ने के इच्छुक रहे हैं। तालिबान को ‘अछूत’ घोषित करने वाले ट्रम्प प्रशासन ने बाद में पाकिस्तान और कतर के साथ मिलकर उसी तालिबान के साथ द्विपक्षीय समझौता करके इस प्रक्रिया को तेज किया था।

आखिरकार 1980 के दशक में तालिबान का उदय अफगानिस्तान में पूर्व सोवियत संघ को हराने के लिए अमेरिका, पाकिस्तान और सऊदी मदद से ही तो हुआ था। यह परियोजना आगे चल कर अनिर्वाह्य हो गई और केवल पाकिस्तानी अदृश्य सत्ता ही इनकी संरक्षक रह गई, जबकि अमेरिका लगातार अनैतिक रूप से उसका पोषण करता रहा। फरवरी 2020 में हुए दोहा समझौते से उम्मीद थी कि इससे इस दुर्जेय युद्ध से अमेरिका के थोड़ी इज्जत के साथ निकलने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। अमेरिका के कई सहयोगी पहले ही यहां की विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर कदम पीछे खींच चुके हैं। बाइडेन प्रशासन भी पहले वाले तरीके से काम कर रहा है, लेकिन वह यह ठीक-ठीक नहीं जानता कि तालिबान कैसा आचरण करेगा और दोहा तथा उसके बाद हुई सहमतियों की शर्तों का किस सीमा तक पालन करेगा। वहां उग्र शांति बनी हुई है। अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके अंतिम रूप से यह जगह छोड़ने के पहले वहां किसी हद तक स्थिरता की कुछ झलक मिलने लगे। वह आखिर यहां से जाएगा ही और इसके लिए तय तारीख 1 मई, 2021 हो सकती है।

इस बीच, राष्ट्रपति अशरफ गनी को लिखे अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन के उस पत्र पर विवाद हो गया है जिसमें संयुक्त राष्ट्र से कहा गया है कि एकीकृत दृष्टिकोण विकसित करने के लिए वह अफगानिस्तान, पाकिस्तान, रूस, चीन, ईरान, अमेरिका और भारत के प्रतिनिधियों की एक बैठक बुलाए। बैठक की मेजबानी तुर्की को दी जा सकती है। इससे एक नई ‘इस्तांबुल प्रक्रिया’ पैदा हो सकती है। इस तरह यह वार्ता द्विपक्षीय से त्रिपक्षीय और अब संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में बहुपक्षीय बनती जा रही है। सभी वास्तविक हितधारकों से उम्मीद की जा रही है कि वे उस समूह का हिस्सा होंगे जो अमेरिका के बाहर निकलने के बाद यहां स्थिरता लाने के क्रम में ज्यादा बड़ी जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं, क्योंकि वाशिंगटन तालिबान से और अधिक प्रतिनिधि सरकार बनाने का आग्रह कर रहा है।

अफगान घटनाक्रम में रूसी दशकों से शामिल रहे हैं और अब वे अपने प्रभाव को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस क्रम में उन्होंने अमेरिकी सैनिकों और उपकरणों का पारगमन और सहायता भी प्रदान की थी। हालांकि वे यह चाहते थे कि अमेरिका अफगानिस्तान में कोई स्थायी अड्डा न रखे, तो भी वे कतई नहीं चाहेंगे कि अमेरिका यहां से पूरी तरह से निकल जाए क्योंकि इससे मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य सुरक्षा मुद्दों का मास्को के समीकरणों पर सीधा असर पड़ेगा। उधर, चीन ने चुपचाप अफगानिस्तान में अपना आर्थिक आधार बना लिया है। इसे वह अपने सीपीईसी के लिए भी महत्वपूर्ण मानते हुए पाकिस्तान की मदद से तालिबान से ज्यादा करीबी संबंध रखने की दिशा में सक्रिय है क्योंकि आगे चलकर उसे हर हाल में तालिबान को महत्व देना होगा।

ईरान अफगानिस्तान का एक महत्वपूर्ण पड़ोसी है और अमेरिका तालिबान के ईरानी वार्ताकारों के संपर्क में रहा है। एक भारतीय वैचारिक संस्थान में भाषण देते हुए अमेरिका के विशेष दूत खलीलजाद ने इस बात की पुष्टि की थी कि अफगानिस्तान में स्थिरता लाने में ईरानी सहायता उपयोगी और महत्वपूर्ण है। सीमाओं के आतंकवाद या अस्थिरता से त्रस्त होने की स्थिति में पड़ोसी अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं। ईरान भी इसका अपवाद नहीं है और साथ ही उसके लोगों का अफगान क्षेत्र के लोगों के साथ ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। इसीलिए ईरान का समावेश अफगानिस्तान के साथ-साथ अमेरिका-ईरान संदर्भों में भी महत्वपूर्ण है। ऐसा होने से ईरान को रचनात्मक कारक होने का महत्व पाने के सुखद भाव का अनुभव होगा। वैसे भी, राष्ट्रपति बाइडेन जेसीपीओए को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं।

फरवरी 2021 में अफगानिस्तान और भारत के बीच वेब के जरिए कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे। उस मौके पर एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए राष्ट्रपति अशरफ गनी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

भारत ने अफगानिस्तान में शांति और विकास के लिए भारी निवेश किया है। हमारा दृढ़ विश्वास है कि पिछले दो दशकों के लाभ को संरक्षित किया जाना चाहिए और अल्पसंख्यकों, महिलाओं तथा कमजोर वर्गों का हित सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
— नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री,भारत

भारत की भूमिका
संचार माध्यमों में ऐसे समाचारों की भरमार है कि तालिबान पर वास्तविक नियंत्रण का दावा करने वाले पाकिस्तान के सहयोग से अफगान समस्या का समाधान खोजने के प्रयास में अमेरिका भारत को शामिल करना चाहता है, जबकि रूस उसे अलग रखना चाहता है। रूसियों ने इससे इनकार किया है। पाकिस्तान स्वाभाविक रूप से भारत को कोई महत्व दिए जाने के विरुद्ध है। वास्तव में ऐसा पहली बार हुआ था कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भारत के राजदूत रहे दो पूर्व राजनयिक मास्को में हुई वार्ता में केवल सुनने के अधिकार के साथ अनौपचारिक रूप से शामिल किए गए थे। इस तरह की राजनयिक पहलों के शाब्दिक अर्थ ग्रहण करने की बात दरकिनार कर दी जाए तो वास्तव में जब कोई किसी अंतरराष्ट्रीय समझौता वार्ता में उपस्थित होता है तो उसका मतलब सतह पर दिख रहे मतलब से काफी ज्यादा होता है। दोहा समझौते पर हस्ताक्षर के समय कतर में भारतीय राजदूत मौजूद थे, जबकि भारतीय विदेश सचिव अफगान सरकार को आश्वस्त करने के लिए काबुल में थे कि भारत अफगानिस्तान के लोगों के साथ है। इसमें दो राय नहीं कि भारत ‘अच्छे तालिबान और खराब तालिबान’ जैसी धारणाओं में विश्वास नहीं करता और न ही उनके साथ भारत का कोई प्रत्यक्ष सम्पर्क है, लेकिन उसका अफगान नेतृत्व वाली और अफगान नियंत्रण वाली किसी भी ऐसी प्रक्रिया में विश्वास है जिसमें कुछ निश्चित सीमाओं का उल्लंघन न किया जा रहा हो। तालिबान भी अफगानिस्तान का हिस्सा हैं। हाल के दिनों में उन्होंने यह भी दिखाया है कि वे भारत की स्थितियों को बखूबी समझते हैं, चाहे वह जम्मू-कश्मीर से जुड़ा मसला हो या फिर अनुच्छेद 370 के खात्मे का।

अफगानिस्तान के साथ ऐतिहासिक और सभ्यतामूलक संबंध होने के साथ ही भारत अफगानिस्तान के लोगों से निरंतर सहयोग करता रहा है, विशेष रूप से बुनियादी ढांचे का विकास, शिक्षा, छात्रवृत्ति, प्रशिक्षण और कई तरह के क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में। दोनों देशों के लोगों के आपसी संबंध और सांस्कृतिक सम्पर्क अत्यन्त मजबूत रहे हैं। लोकोक्ति बन चुके ‘काबुलीवाला’ और बॉलीवुड फिल्मों में दिखने वाले हट्टे-कट्टे पठानों की भारतीय मानस में छवि ईमानदारी के सर्वोच्च मानक के रूप में अंकित है। विभिन्न निर्वाचनों और सर्वेक्षणों के अनुसार अफगान लोग समूचे अफगानिस्तान में संभवत: भारत के ही प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्रेम का भाव प्रदर्शित करते हैं। भारत की ओर से गेहूं से लेकर वैक्सीन राजनय तक ने भी भाईचारे और मैत्री के स्नेहिल बंधन को और मजबूत किया है। भारत अफगानिस्तान के लिए सबसे बड़ा गैर-पश्चिमी दाता देश है और लगभग सभी परियोजनाएं अनुदान आधारित हैं। अब तक भारत ने अफगानिस्तान को तीन बिलियन डॉलर से अधिक की सहायता प्रदान की है।

भारत सरकार द्वारा हाल में घोषित एक बिलियन डॉलर की विकास सहायता का उपयोग करते हुए भारत तथा अफगानिस्तान सरकार ने ‘नई विकास साझेदारी’ कार्यक्रम शुरू किया है। इस क्रम में भारत सरकार ने अफगानिस्तान सरकार के साथ मिलकर उन प्राथमिकताओं और परियोजनाओं की पहचान की जहां अफगानिस्तान को भारत की सहायता की आवश्यकता थी। भारत कई महत्वपूर्ण नई परियोजनाओं को लागू करने पर सहमत हुआ है। इनमें लालंदर (शातूत) बांध और काबुल में पेयजल तथा सिंचाई के पानी की सुविधा प्रदान करने की परियोजना; चारीकर शहर में जलापूर्ति; बामियान प्रांत में बांद-ए-अमीर के लिए सड़क संपर्क जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा; नंगरहार प्रांत में वापसी कर रहे अफगान शरणार्थियों के पुनर्वास में सहायता के लिए कम लागत वाले आवास; स्थानीय उद्योग विकास और आयात प्रतिस्थापन के लिए काबुल में एक जिप्सम बोर्ड विनिर्माण संयंत्र की स्थापना; और मजार-ए-शरीफ में एक पॉलीक्लिनिक का निर्माण आदि शामिल हैं। इसके अलावा, भारत ने अफगानिस्तान के 34 प्रांतों में 116 उच्च प्रभाव वाली सामुदायिक विकास परियोजनाएं शुरू करने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की है। ये परियोजनाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, पेयजल, नवीकरणीय ऊर्जा, बाढ़ नियंत्रण, माइक्रो-हाइड्रो पावर, खेल और प्रशासनिक बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में होंगी। भारत ने यह भी घोषणा की है कि शिक्षा, क्षमता निर्माण, कौशल और अफगानिस्तान के मानव संसाधन विकास के लिए सहायता कार्यक्रम 2022 तक जारी रहेंगे। गत 9 फरवरी को अफगानिस्तान में शातूत बांध के निर्माण के लिए समझौते पर हस्ताक्षर समारोह का वर्चुअल आयोजन किया गया था। यह भारत-अफगानिस्तान मैत्री बांध (सलमा बांध) के बाद अफगानिस्तान में भारत द्वारा बनाया जा रहा दूसरा प्रमुख बांध है। अफगानिस्तान के साथ हमारी विकास सहभागिता के एक हिस्से के रूप में भारत ने अफगानिस्तान के सभी 34 प्रांतों में 400 से अधिक परियोजनाएं पूरी की हैं। इनमें वहां के लोकतंत्र के केंद्र, संसद भवन का निर्माण भी शामिल है।

2016 में प्रधानमंत्री मोदी ने चार महीने से कम समय में अफगानिस्तान का दो बार दौरा किया था। प्रधानमंत्री ने अपनी टिप्पणी में भारत और अफगानिस्तान के सांस्कृतिक संबंधों पर प्रकाश डालते हुए शांतिपूर्ण, एकजुट, स्थिर, समृद्ध और समावेशी अफगानिस्तान के लिए भारत के निरंतर समर्थन का आश्वासन दिया था। अमेरिकी दृष्टिकोण से भारत उसका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदार है, जो वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य होने तथा अफगानिस्तान में भारी निवेश करने के कारण इस प्रक्रिया का तार्किक भागीदार है जिसकी चिंताओं का ध्यान रखा जाना चाहिए। खलीलजाद ने हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री को फिर से अपने प्रस्ताव के बारे में जानकारी दी थी। चूंकि बाइडेन प्रशासन अफगान मुद्दे के हल के लिए संयुक्त राष्ट्र का रास्ता अपनाने की योजना बना रहा है, ऐसे में अफगान नेतृत्व और अफगान नियंत्रण वाली तथा व्यापक-आधार वाली समावेशी शांति और सुलह प्रक्रिया तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से अफगानिस्तान के प्रति दीर्घकालिक एवं निरंतर प्रतिबद्धता की जरूरत की पक्षधरता के प्रति भारत का निरंतर आग्रह उसके इस गर्वोन्नत, किंतु युद्ध से त्रस्त पड़ोसी देश में शांति और परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
(लेखक जॉर्डन, लीबिया और माल्टा में भारत के राजदूत रहे हैं)

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