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दिल्ली में ‘जमीन जिहाद’

चायनीज वायरस की आड़ में दिल्ली वक्फ बोर्ड ‘जमीन जिहाद’ पर उतर आया है। आज तक जहां कभी कोई शव नहीं दफनाया गया है, वहां वायरस के कारण मरने वाले मुसलमानों को दफनाने की बात कर रहा है। इससे आसपास के लोगों में गुस्सा है और वे इसके विरोध में उतर आए हैं

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
May 3, 2020, 12:58 pm IST
in विश्लेषण, दिल्ली
दिल्ली वक्फ बोर्ड द्वारा दिल्ली सरकार के सचिव (स्वास्थ्य) को लिखा गया पत्र और साथ में ‘रेजीडेंट्स वेल्फेयर काउंसिल नंगली रजापुर’ द्वारा दिल्ली के उपराज्यपाल को लिखी गई चिट्ठी।

दिल्ली वक्फ बोर्ड द्वारा दिल्ली सरकार के सचिव (स्वास्थ्य) को लिखा गया पत्र और साथ में ‘रेजीडेंट्स वेल्फेयर काउंसिल नंगली रजापुर’ द्वारा दिल्ली के उपराज्यपाल को लिखी गई चिट्ठी।

विश्व चायनीज वायरस से जूझ रहा है। इस बुरे वक्त में भी कुछ लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। वे कभी पुलिस पर हमला करते हैं, कभी अस्पताल-कर्मियों के साथ मार-पीट करते हैं, तो कभी जमीन हड़पने की कुटिल चाल चलते हैं।

इन दिनों भारत सहित पूरा विश्व चायनीज वायरस से जूझ रहा है। इस बुरे वक्त में भी कुछ लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। वे कभी पुलिस पर हमला करते हैं, कभी अस्पताल-कर्मियों के साथ मार-पीट करते हैं, तो कभी जमीन हड़पने की कुटिल चाल चलते हैं। उल्लेखनीय है कि 9 अप्रैल को दिल्ली वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एस.एम. अली ने दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सचिव को एक पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने रिंग रोड के किनारे स्थित इंद्रप्रस्थ मिलेनियम पार्क के पास कथित ‘जदीद कब्रिस्तान’ में चायनीज वायरस के कारण मरने वाले मुसलमानों को दफनाने की बात कही है। उन्होंने यह भी लिखा है कि स्वास्थ्य विभाग अपने सभी अस्पतालों को सूचित करे कि यदि चायनीज वायरस के कारण किसी (मुसलमान) की मौत होती है, तो वे ‘जदीद कब्रिस्तान’ में उसके शव को दफना दें। पत्र में यह भी लिखा गया है कि जानकारी के अभाव में लोग ऐसे शवों को दूसरे कब्रिस्तानों (यानी जहां मुसलमानों की आबादी है) में दफनाने नहीं दे रहे हैं। इसके साथ यह भी लिखा है कि अन्य कब्रिस्तानों में वायरस से मरने वालों के शवों को दफनाया जाएगा, तो उस क्षेत्र में महामारी फैलने का खतरा हो सकता है।

इस पत्र से ही उनकी असली मंशा झलकती है। वे चाहते हैं कि वायरस से मरने वाले किसी भी मुसलमान के शव को आबादी के आसपास वाले किसी कब्रिस्तान में न दफनाया जाए। लेकिन क्या उन्हें यह नहीं पता है कि जहां वे ऐसे शवों को दफनाना चाहते हैं, वहां भी एक बहुत ही पुराना और सघन आबादी वाला गांव नंगली रजापुर है। इस गांव के बारे में उन्हें पता नहीं होगा, यह तो कोई भी नहीं मानेगा। उल्लेखनीय है कि नंगली गांव हिंदू-बहुल है। गांव के लोग दिल्ली वक्फ बोर्ड की इस हरकत का विरोध कर रहे हैं। ‘रेजीडेंट्स वेल्फेयर काउंसिल नंगली रजापुर’ ने दिल्ली के उपराज्यपाल को एक पत्र लिखकर उनसे आग्रह किया है कि इस मामले को लेकर उचित कदम उठाया जाए, ताकि कोई अनहोनी न हो। ‘रेजीडेंट्स वेल्फेयर काउंसिल नंगली रजापुर’ का कहना है, ‘‘दिल्ली वक्फ बोर्ड को दिल्ली के कब्रिस्तानों के आसपास रहने वाले मुसलमानों की तो चिंता है, पर उसे हिंदुओं की चिंता बिल्कुल नहीं है। तभी तो वह दिल्ली में वायरस से मरने वाले सभी मुसलमानों को उस कब्रिस्तान में दफनाना चाहता है, जहां आज तक कोई मुर्दा नहीं दफनाया गया है और जिसके पास हिंदू आबादी है।’’

बोर्ड की इस मंशा का विश्व हिंदू परिषद् (विहिप) ने भी विरोध किया है। विहिप के प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा, ‘‘दिल्ली वक्फ बोर्ड की मंशा ठीक नहीं है, वह मिलेनियम पार्क पर कब्जा करना चाहता है। यह जमीन जिहाद है।’’ उन्होंने दिल्ली सरकार से कहा है कि वह जल्दबाजी में कोई निर्णय न ले, अन्यथा इस मामले को लेकर विश्व हिंदू परिषद् आंदोलन करेगी। बोर्ड के इस कदम का विरोध पार्क के आसपास की कॉलोनियों की लगभग 40 रेजीडेंट्स वेल्फेयर एसोसिएशन (आर.डब्ल्यू.ए.) ने भी किया है। विरोध को असरदार बनाने के लिए 40 आर.डब्ल्यू.ए. को मिलाकर ‘फेडरेशन आफ आर.डब्ल्यू. ए.’ का गठन किया गया है।

नंगली रजापुर में जितने भी लोगों से बात हुई, उन सभी ने एक स्वर में कहा कि पिछले आठ दशक में यहां एक भी मुर्दा नहीं दफनाया गया है। अनेक लोगों ने यह भी बताया कि कुछ साल पहले अचानक पार्क के एक हिस्से में वक्फ बोर्ड ने ‘जदीद कब्रिस्तान’ के नाम से एक बोर्ड लगा दिया था। और कुछ वर्ष पहले जब नजीब जंग उपराज्यपाल थे, तब कुछ लोगों ने इस कब्रिस्तान के लिए और जगह की मांग की थी, लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध से उन्हें सफलता नहीं मिली।

क्या है वक्फ बोर्ड

मुसलमानों की मजहबी संपत्तियों की देखरेख के लिए पहली बार 1923 में वक्फ कानून बना था। उस कानून में ऐसी कोई बात नहीं थी, जिससे किसी को कोई आपत्ति हो। लेकिन वोट बैंक के लालच में 1956 में कांग्रेस ने इस कानून मेें कुछ बदलाव करके इसे कुछ मजबूत कर दिया। फिर 1995 में भी इसे कुछ शक्तियां दी गईं। 2013 में सोनिया-मनमोहन की संप्रग सरकार ने तो वक्फ बोर्ड को निरंकुश बना दिया। अब इसके पास अपार ताकत है। इसी ताकत का दुरुपयोग दिल्ली वक्फ बोर्ड कर रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर जैन बताते हैं कि वक्फ कानून की धारा 4, 5 और 36 के अनुसार वक्फ बोर्ड किसी भी संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित कर सकता है, चाहे वह अवैध ही क्यों न हो। यही कारण है कि किसी भी अवैध मजार या मस्जिद को वैध बनाने में दिक्कत नहीं होती है। वक्फ एक्ट-1995 की धारा 40 के अनुसार कोई भी व्यक्ति वक्फ बोर्ड में एक अर्जी लगाकर अपनी संपत्ति वक्फ बोर्ड को दे सकता है। यदि किसी कारण से वह संपत्ति बोर्ड में पंजीकृत नहीं होती है तो भी 50 साल बाद वह संपत्ति वक्फ संपत्ति हो जाती है। इस कारण सैकड़ों अवैध मजारें और मस्जिदें वक्फ संपत्ति हो चुकी हैं। अवैध होने के कारण इन मस्जिदों/ मजारों के पास जमीन से संबंधित कागज नहीं होते हैं। इसलिए इसके संचालक वक्फ बोर्ड में अर्जी लगाकर छोड़ देते हैं।

यही कारण है कि आज वक्फ बोर्ड के पास सेना और रेलवे के बाद सबसे अधिक संपत्तियां हैं। एक अनुमान के अनुसार आज पूरे देश में 3,00000 वक्फ संपत्तियां हैं। इन संपत्तियों के पास करीब 4,00000 एकड़ जमीन है।

नंगली रजापुर गांव के निवासी और ‘फेडरेशन आफ आर.डब्ल्यू.ए.’ के संयुक्त सचिव जयप्रकाश चौहान कहते हैं, ‘‘मैं इसी गांव में जन्मा, पला और बढ़ा। अब 80 वर्ष का होे चुका हूं। आज तक यहां किसी शव को दफनाने की बात न तो सुनी है और न देखी है। अब वक्फ बोर्ड यहां शव दफनाने की बात करता है तो उस पर संदेह पैदा होता है। उसकी मंशा ठीक नहीं लग रही है। वह इस सुंदर पार्क को बदरंग करके इस पर कब्जा करना चाहता है। इसे गांव वाले बर्दाश्त नहीं करेंगे।’’

उल्लेखनीय है कि इंद्रप्रस्थ मिलेनियम पार्क की लंबाई लगभग 1.5 किलोमीटर है। 2000 के आसपास तक यहां कूड़ों का ढेर रहता था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय इसके जीर्णोद्धार की योजना बनी और 2004 में यहां एक बहुत ही सुंदर पार्क बना। दक्षिण में सराय काले खां और उत्तर में प्रगति मैदान के पास तक इसकी सीमा है। पूरब में रिंग रोड और पश्चिम में रेलवे की पटरी है। 2007 में यहां पूज्य दलाई लामा के सान्निध्य में विश्व शांति स्तूप की स्थापना हुई। यहां प्रतिदिन हजारों लोग घूमने आते हैं। ऐसे सुन्दर पार्क के पास दिल्ली वक्फ बोर्ड अब कब्रिस्तान बनाकर लाखों लोगों के जीवन को खतरे में डालने का प्रयास कर रहा है। दिल्ली दंगों के दौरान भी दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के रवैये से भी लोगों में नाराजगी दिखी थी।

उम्मीद है कि स्थानीय लोगों की मांग पर सरकार ध्यान देगी और दिल्ली वक्फ बोर्ड को कोई ऐसा काम नहीं करने देगी, जिससे कि समाज में मनमुटाव बढ़े।

(3 मई, 2020 के पांचजन्य के अंक से)

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अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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