|
देश की तमाम विधानसभाओं और संसद के चुनाव एक साथ कराने को लेकर चले विमर्श में हमें इससे होने वाले लाभ के साथ ही नकारात्मक पक्षों पर भी विचार करना होगा। बेतहाशा खर्च के साथ ही एक साथ चुनाव कराना मतदाताओं के लिए भी हितकारी होगा
प्रो. श्रीप्रकाश सिंह
राष्ट्र के लोकतांत्रिक जीवन में राजनीतिक दल, वयस्क मताधिकार और चुनाव का महत्वपूर्ण स्थान है। वर्तमान में उपरोक्त के बगैर लोकतंत्र संभव नहीं है। सौभाग्य से भारतीय लोकतंत्र समय के साथ परिपक्व हुआ है और यह विश्व का सफलतम लोकतंत्र है। आपातकाल (1975-1977) की कालिमा को छोड़ दें तो भारतीय लोकतंत्र ने अनेक अनुकरणीय लक्ष्य प्राप्त किए हैं। भारत का चुनावी इतिहास अत्यंत रोचक और सुधारों से युक्त है। एक और प्रमुख चुनाव सुधार की दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश को ले जाना चाहते हैं। उन्होंने पूरे देश में लोकसभा और विधानसभाओं के साथ-साथ निकायों के चुनाव कराए जाने का विचार सामने रखा है, जिससे राजनीतिक गलियारों में एक विमर्श आरंभ हुआ है। अनेकानेक विद्वान, राजनीतिक दल, विचारक, जहां एक देश-एक चुनाव के पक्ष में हैं वही कुछ दल, नेता और शोध संस्थान इस विचार से असहमत हैं। यहां हम सहमति और असहमति के बिन्दुओं के उल्लेख के साथ-साथ एक राष्ट्र-एक चुनाव की उपयोगिता, दूरगामी लाभ और व्यावहारिक पक्ष का विवेचन करेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रदत्त इस विचार को पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखजी और वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी समर्थन दिया है। जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस विचार को राष्ट्र के लिए उपयोगी माना और अपना समर्थन दिया। चुनाव आयोग ने भी अपनी सहमति इस विचार और सिद्धांत के साथ दिखाई है, परन्तु यह महान चुनाव सुधार बगैर आम सहमति के संभव नहीं है, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया में सभी राजनीतिक दल सहभागी होते हैं।
दरअसल, यह कोई नया विचार नहीं है। 1952 से 1967 तक पूरे राष्ट्र में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ होते थे। कांग्रेस की सत्ता केन्द्र और अनेक राज्यों में थी, लेकिन किसी दल या नेता ने कभी भी एक साथ होने वाले चुनावों का विरोध नहीं किया था। कभी किसी नेता या दल ने इन चुनावों को संघीय ढांचे के लिए चुनौती नहीं बताया था। लेकिन वर्तमान समय में इस विचार को एक प्रकार से इन सबके लिए खतरा बताया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि अभी तक मात्र सात लोकसभाओें (पहली, दूसरी, तीसरी, आठवीं, दसवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं) ने ही अपना कार्यकाल पूरा किया है। इनके अलावा कालावधि पूरी होने से पहले ही चुनाव हुए या करवाने पड़े थे। राज्य विधान पालिकाओं की स्थिति अत्यंत खराब रही है। अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग की पराकाष्ठा ने भी बार-बार राज्यों को चुनावों में धकेला है। परिणामत: 1967 तक आते-आते एक साथ चुनाव सम्पन्न कराने में अवरोध आया। वह अवरोध, उठापटक पूरी तरह राजनीतिक थी और कांग्रेस की सत्ता लोलुपता का नतीजा था।
1999 में विधि आयोग ने अपनी 107वीं रपट में चुनाव कानून के विशेष संदर्भ में कहा है,‘ चुनाव पांच वर्ष में एक बार एक साथ होने चाहिए’। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चुनाव आयोग के स्वर्ण जयंती समारोह में 17 जनवरी, 2001 को कहा था,‘चुनाव हमारे लोकतंत्र का महाकुंभ है। परन्तु किसी भी स्थिति में, किसी भी हद तक जाकर ‘‘चुनाव जीतने की लालसा ने अनेक कमियों को जन्म दिया है। साथ ही शासन की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। इसलिए मेरा दृढ़ विश्वास है कि संसद और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल निश्चित पांच वर्ष का होना चाहिए। यह हमारे लोकतंत्र और सुशासन दोनों के लिए अति आवश्यक है।’’ श्री वाजपेयी ने 2001 तक के सभी 13 लोकसभा चुनावों में भागीदारी की थी। उनका अनुभव और विमर्श हमें एक राष्ट्र-एक चुनाव की तरफ प्रेरित कर रहा था, क्योंकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का निश्चित कामकाज एक राष्ट्र-एक चुनाव की पहली शर्त है। श्री वाजपेयी ने अपने उद्बोधन में विधि आयोग की संस्तुतियों का भी उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘हमें शीघ्र्रता से समग्रता से विचार करते हुए जल्दी ही चुनाव सुधारों को स्वीकृत और क्रियान्वित करना चाहिए।’’
17 दिसम्बर, 2015 को कांग्रेस के सांसद डॉ. ई.एम. सुदर्शन नचियप्पन ने संसदीय समिति की अध्यक्षता करते हुए संस्तुति की थी कि ‘‘बार-बार चुनावों से सरकार के तंत्र को मुक्ति दिलाने के लिए तथा अन्य वैश्विक राष्ट्रों से भारत प्रतिस्पर्धा कर सके और समयबद्ध रूप में विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर सके इसलिए लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों। संसदीय समिति का यह भी मानना है कि एक साथ चुनाव करवाने से सरकारी खर्च बचेगा, शासन सुचार रूप से चलेगा। आचार संहिता से शासन-प्रशासन और नीति निर्माण में होने वाली समस्याओं से भी बचा जा सकेगा।’’
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि लगातार चुनावी प्रक्रिया के चलते रहने से चुनावी खर्च में अविश्वसनीय वृद्धि हुई है। 1951 के प्रथम लोकसभा और विधानसभा चुनावों, जो एक साथ पूरे देश में हुए थे, को मिलाकर चुनावों में प्रति व्यक्ति मात्र 60 पैसे खर्च हुआ था, वही खर्च 2009 में बढ़कर 12 रुपए हो गया। यानी खर्च में 1952 की तुलना में 450 गुना बढ़ोत्तरी हुई है।
यह भी उल्लेखनीय है कि 1952 के भारत और वर्तमान भारत में बहुत अन्तर है। प्रारम्भ में चुनाव कराना बहुत ही दुष्कर कार्य था, परन्तु शासन ने दूरदराज के क्षेत्रों में सीमित संसाधनों के बावजूद मतपेटियों, मतपत्रों को भेजने का महत्वपूर्ण कार्य किया। आज मतपेटी के स्थान पर मशीनों का उपयोग हो रहा है। आवागमन के संसाधन बढ़े हैं। सूचना का आदान-प्रदान आसानी से सम्भव है। व्यवस्थापन आसानी से संभव है, परन्तु इससे खर्च में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। 2009 के चुनावों में1,483 करोड़ रुपए खर्च हुए तो 2014 के चुनावों में 3,426 करोड़ रुपए खर्च हुए। सेन्टर फॉर मीडिया स्टडीज के अनुसार, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा अघोषित तौर पर लगभग 30,000 करोड़ रुपए खर्च किये गये। सरकारी कर्मचारी महीनों तक चुनाव कार्यों में लगे रहते हैं। यदि सभी कुछ चुनाव खर्च में जोड़ दिया जाए तो यह खर्च लगभग 50,000 करोड़ से भी अधिक हो जाएगा। चुनाव आयोग का मानना है कि लोकसभा के साथ ही अगर सभी विधानसभाओं के चुनाव करा दिए जाएं तो 500 करोड़ रुपए की और आवश्यकता पड़ेगी, क्योंकि चुनाव पार्टी की सुरक्षा आदि पर होने वाला खर्च एक स्थान पर एक ही बार करना पड़ेगा, बार-बार नहीं। चुनाव आयोग द्वारा आदर्श आचार संहिता लागू कर देने के बाद सरकारें कोई विकासात्मक कार्य नहीं कर पाती हैं। नीतिगत पंगुता देखने को मिलती है। नि:संदेह पुराने कार्य चलते रहते हैं तो और भी नुकसान होता है। पुरानी सरकार की नीतियों की समीक्षा और नएपन के नाम पर गतिरोध ही गतिरोध पैदा होने लगते हैं। भारतीय लोकतंत्र में प्रत्येक वर्ष लगभग 5-7 राज्यों में चुनाव होते हैं और पांच वर्षों का अनुपात लगाया जाए तो लगभग एक तिहाई समय चुनाव में चला जाता है। प्रशासन और सरकार की दृष्टि से इतने समय कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हो पाता, बार-बार कर्मचारियों का उपयोग चुनाव में होने से विभागीय गुणवत्ता भी प्रभावित होती है, खर्च बढ़ता है। इसलिए आवश्यकता है कि भारत की वर्तमान चुनावी संस्कृति को बदला जाए और पूरे देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव कराए जाएं।
नीति आयोग की तरफ से विवेक देबराय और किशोर देसाई ने चुनाव के संदर्भ में एक विस्तृत रपट तैयार की है। उन्होंने बिन्दुवार विषयों को उठाया है। क्या होना चाहिए और क्या नहीं आदि का विस्तार से अध्ययन किया है और अंत में संस्तुति की है कि राष्ट्र के हित में एक साथ चुनाव कराये जाने चाहिए।
सेंटर फॉर द स्टडी आॅफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के संजय कुमार की भी एक रपट है जो एक साथ चुनाव कराए जाने के पक्ष में नहीं है। उनके अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि जब साथ-साथ चुनाव होते हैं तो लगभग 77 प्रतिशत संभावना रहती है कि मतदाता एक ही दल को मत दे, लेकिन उनका तर्क ओडिशा और तेलंगाना में सत्य साबित नहीं होता है। इसके अलावा एक और अध्ययन रपट है जो कॉनकोर्डिया विश्वविद्यालय, मान्ट्रियल के प्रो. सीसावा निकोलाई ने तैयार की है। यह अध्ययन रपट 2010 की है जिसे ‘पोलिटिकल स्टडीज एसोसियशन’ ने प्रकाशित किया है। निकोलाई भारत के चुनावों का वर्षों से अध्ययन करते रहे हैं। इसे रिकर आर्डेशुक पद्धति के रूप में जाना जाता है। इस रपट की एक विशिष्टता यह है कि यह राजनीतिक सहभागिता को बहुत महत्व देती है। आकलन है कि जब-जब चुनाव एक साथ हुए हैं तब-तब मत प्रतिशत बढ़ा है। निकोलाई ने 1971 से 2004 तक के चुनावों को अपने अध्ययन में शामिल किया है।उपरोक्त बिन्दुओं के आधार कहा जा सकता है कि चुनाव पूरे देश में एक साथ कराए जा सकते हैं। यह किसी एक राजनीतिक दल का विचार नहीं है, यह देश को बदलने वाला, देश की राजनीति को बदलने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण विचार है।











