राज्य/उत्तर प्रदेश: नकल पर सख्त सरकार
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राज्य/उत्तर प्रदेश: नकल पर सख्त सरकार

Written byArchiveArchive
Mar 5, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Mar 2018 11:00:40


उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा सरकारों ने शिक्षा को मजाक बना दिया था। परीक्षाओं में नकलचियों की तूती बोलती थी। लेकिन इस साल से योगी सरकार ने परीक्षा तंत्र की ऐसी चूलें कसी हैं कि नकलची और उनके हिमायती परीक्षा केन्द्रों से दूर जा दुबके हैं,ऐसों की  बड़ी तादाद में धरपकड़ हुई

सुनील राय

लगभग तीन दशक पूर्व उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् के  परीक्षा तंत्र में एक बड़ा बदलाव लाते हुए नकल विहीन परीक्षा की व्यवस्था की गयी थी। मगर उसके तुरंत बाद समाजवादी पार्टी सरकार ने नकल करने वालों को राहत देते हुए बेखटके नकल करने के रास्ते  बना दिए। लिहाजा तभी से यूपी बोर्ड दिशाहीन तरीके से काम कर रहा था। लेकिन योगी आदित्यनाथ की सरकार ने हाल में एक बार फिर नकल विहीन परीक्षा कराने के आदेश दिए। नकल विहीन परीक्षा सुनिश्चित कराने के लिए परीक्षा केंद्र्रों पर सीसीटीवी कैमरे लगवाए गए। नकल माफियाओं पर शिकंजा कसने के लिए एसटीएफ को सक्रिय किया। नकल माफिया गिरफ्तार किए गए। हैरानी की बात है कि सरकार के नकल पर नकेल कसते ही ऐसे 15.73 प्रतिशत (10,61,383 से अधिक) परीक्षार्थियों ने परीक्षा ही नहीं दी, जो  सिर्फ नकल के बूते पर परीक्षा पास करना चाहते थे।
इस बार  एसटीएफ ने सक्रियता दिखाते हुए गत 13  फरवरी को बलिया के रसड़ा में सामूहिक नकल का मामला पकड़ा। कालेज के प्रधानाचार्य और प्रबंधक के भाई को गिरफ्तार किया गया, भारी मात्रा में नकल सामग्री बरामद की गयी। इलाहाबाद में परीक्षा की शुरुआत में ही  बाल भारती इंटर कॉलेज में सामूहिक नकल का मामला पकड़ा गया। हिंदी के प्रश्न पत्र में सामूहिक नकल कराई जा रही थी। अपराधी शिव शंकर को पकड़ा गया तो उसने  खुलासा किया कि नकल सामग्री उसे प्रधानाचार्य  शिव प्रसाद सिंह ने दी थी।

वर्ष    हाईस्कूल    इंटरमीडिएट
2017    81.18    82.62
2016    87.66    87.99
2015    83.74    88.83
2014    86.71    92.21
2013    86.63    92.68
2012    83.75    89.40
2011    70.83    80.14
2010    70.79    80.54
2009    56.67    79.52
2008    40.07    65.05
2007    74.41    89.34

नकल विहीन परीक्षा हो, परीक्षा में शुचिता हो और छात्र-छात्राओं को यह मालूम रहे कि अध्ययन के अलावा परीक्षा पास करने का कोई रास्ता नहीं है, भाजपा सरकार ने इस तरह की व्यवस्था और वातावरण देने की कोशिश हमेशा की है। हां, हर बार विपक्षी दलों, खासकर समाजवादी पार्टी ने इस सकारात्मक प्रयास पर भी राजनीति की। 
उल्लेखनीय है कि भाजपा की पूर्ववर्ती कल्याण सिंह सरकार ने अध्यादेश लाकर नकल को  संज्ञेय अपराध घोषित किया था। परीक्षा केन्द्रों पर पुलिस को अन्दर जाकर नकलचियों को गिरफ्तार करने के आदेश थे। नकलचियों को जेल भेजा गया था। इससे हाई स्कूल परीक्षाफल का प्रतिशत गिरकर 14 पर आ गया था। उस समय विपक्षियों द्वारा हंगामा खड़ा किया गया कि नकलची छात्रों के साथ अपराधी सरीखा व्यवहार नहीं किया जा सकता। मुलायम सिंह यादव ने अपनी जनसभाओं में कहा, ‘‘जैसे ही मेरी सरकार आयेगी, छात्रों पर लगाये गए नकल संबंधी मुकदमे वापस ले लिए जायेंगे, फेल-पास की चिंता छोड़कर युवा मेरी सरकार बनवायें।’’ मुलायम सिंह यादव 1993 में मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपना वादा  निभाया और नकल संबंधी मुकदमे वापस ले लिये गए। उस समय जम कर नकल हुई। उस समय की सामूहिक नकल की तस्वीरें  अखबारों की सुर्खियां बना करती थीं। तब खेतों में बैठकर प्रश्नपत्र हल करने और खिड़कियों से नकल सामग्री भेजने की तस्वीरें छपी थीं। अधिकारी नकल तो नहीं रोक पाए, पर नकलची संबंधी सूचना पर ही रोक लगा दी गई।  
 सितम्बर 1997 में जब कल्याण सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने पुन: नकल रोधी अध्यादेश लागू किया, इस बार उन्होंने नकल को जमानती अपराध की श्रेणी में रखा। यह सख्ती 2002 तक रही मगर जैसे ही अगस्त 2003 में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने, परीक्षा नकल माफियाओं के हवाले हो गयी। कौशाम्बी आदि जनपदों में बाकायदा ऐसे स्कूलों को परीक्षा केंद्र बनाया  गया जहां वर्ष भर भूसा आदि रखा रहता था। ये स्कूल सिर्फ परीक्षा कराने के लिए ही खुलते थे। छात्रों को टाट पर बैठाकर इन स्कूलों में परीक्षा कराई जाती थी।
 इलाहाबाद नगर निगम के पूर्व सभासद आनंद अग्रवाल कहते हैं, ‘‘इस बार, यूपी बोर्ड की परीक्षा शुरू होते ही 10 लाख 61 हजार से ज्यादा परीक्षार्थियों का परीक्षा न देना सरकार के कड़े कदमों को दर्शाता है। नकलचियों ने जान लिया था कि इस बार नकल से परीक्षा पास करना असंभव  है। सामूहिक नकल कराने वाले नकल माफिया  मैदान छोड़ कर भाग गए हैं। अब लगभग सभी परीक्षा केन्द्रों पर पारदर्शिता के साथ परीक्षा हो रही है।’’ इसके पहले भी परीक्षा केंद्र्रों पर नकल रोकने के लिए सचल दस्ता कार्रवाई  करता था। सामूहिक नकल पकडेÞ जाने पर उस परीक्षा केंद्र की परीक्षा निरस्त करने के साथ प्राचार्य के खिलाफ कारवाई की संस्तुति होती थी। पर होता सब नाम के लिए था। यूपी बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार 2017 में 5,35,494 परीक्षार्थियों ने परीक्षा छोड़ी तो 2016 में 6,45,0024 और 2015 में 6,75,701 परीक्षार्थियों ने परीक्षा छोड़ी थी। बोर्ड के अपर सचिव शिवलाल बताते हैं कि परीक्षा छोड़ने वालों की संख्या अब कम हो गयी है। पहले जो एकदम नकल के भरोसे परीक्षा देने आये थे, वे सभी परीक्षा छोड़ चुके हैं।  उत्तर प्रदेश में 2016 में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और 2017 की परीक्षा के वक्त तक भाजपा की सरकार बन गयी थी मगर उसकी सभी तैयारी सपा सरकार के समय में  की गयी थी इसलिए जो परीक्षा हुई वह पुरानी पद्धति से ही हुई थी। इस बार की परीक्षा में माध्यमिक शिक्षा परिषद ने परीक्षा को नकल विहीन बनाने के लिए कार्य किया। 2016 की बोर्ड परीक्षा में तो कई प्रधानाचार्य ही नकल करा रहे थे। सचल दस्ते ने प्रदेश भर में  प्रधानाचार्यों  को इस बात का दोषी पाया था कि वे परीक्षा केंद्रों पर नकल का समर्थन कर रहे थे या फिर नकल रोक पाने में अक्षम थे। सचल दस्ते की संस्तुति पर ऐसे1,277 प्रधानाचार्यों को प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया था।  उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश महामंत्री लालमणि द्विवेदी कहते हैं, ‘‘भाजपा की सरकार में नकल पर शिकंजा कसने के कारण कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री काल में हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने वालों का प्रतिशत 14 फीसदी तक गिर गया था और उसके बाद 1993 और 2003 में  समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तो यह प्रतिशत काफी तेजी से ऊपर आया। 2007 में हाई स्कूल में 74.41 प्रतिशत परीक्षार्थी उतीर्ण हुए तो इंटर में 89.34 फीसदी परीक्षार्थी उत्तीर्ण हुए थे।’’
वे बताते हंै कि 2007 में जब बसपा की सरकार बनी तो परीक्षा परिणाम प्रतिशत कुछ नीचे आया था, 2008 में हाई स्कूल का परिणाम 40.07 प्रतिशत पर जा टिका और इंटर का परिणाम 65.05 प्रतिशत रहा। लेकिन जैसे ही प्रदेश में सपा की सरकार बनी तो फिर परिणाम प्रतिशत में तेजी से उछाल आने लगी। उधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि प्रदेश में पठन-पाठन का वातारवण बनाया जायेगा।
बहरहाल, इस बार नकलची और नकल माफिया मैदान छोड़ कर भाग चुके हैं। पारदर्शी शासन को समर्पित योगी सरकार के सकारात्मक प्रयास रंग दिखा रहे हैं।    

साक्षात्कार :
‘10 हजार करोड़ का नकल व्यवसाय ध्वस्त किया’
नकल रोधी अभियान के संदर्भ में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और माध्यमिक शिक्षा के प्रभारी मंत्री डॉ. दिनेश शर्मा के  साथ हुई पाञ्चजन्य संवाददाता की बातचीत के प्रमुख अंश- 
ल्ल    कल्याण सिंह जब मुख्यमंत्री थे तब नकल को अपराध घोषित किया गया था। नकलचियों को जेल भेजा गया था। अब आपकी सरकार ने पुन: इस ओर सख्ती की है। क्या कहेंगे?

हम इस बार परीक्षा पूरी शुचिता के साथ करा रहे हैं। इस बात पर न्यूयॉर्क टाइम्स समेत तमाम विदेशी मीडिया भी हमारी तारीफ कर रहा है।
ल्ल    10 लाख 44 हजार से ज्यादा परीक्षार्थियों का परीक्षा न देना क्या दर्शाता है?
इसकी वजह यह है कि जिन 10,61,383 परीक्षार्थियों ने परीक्षा छोड़ी है, इनमें 70 फीसदी से ज्यादा उत्तर प्रदेश से बाहर के हंै। ये वे लोग हैं जो फार्म भर देते थे और उत्तर प्रदेश में नकल के भरोसे इम्तिहान देने आते थे। जब इन लोगों को पता लग गया  कि इस बार दाल नहीं गलने वाली तो ये लोग यहां पर आये ही नहीं। उत्तर प्रदेश में नकल का 10 हजार करोड़ रुपए का व्यवसाय था, जिसे हमने ध्वस्त कर दिया है। इस नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए हमने कई महीने तक लगातार काम किया है। परीक्षा के समय रात 12 बजे तक मैं स्वयं निरीक्षण करता रहा हूं।  नियम बनाया गया कि पहचान पत्र के बगैर प्रवेश नहीं मिलेगा। प्रश्न पत्रों के तीन सेट बनवाये। इस बार हम लोगों ने प्रश्न पत्रों  को जारी और प्राप्त करने का पुख्ता इंतजाम किया। प्रश्न पत्रों का एक बण्डल  गायब हुआ और तुरंत पकड़ में आ गया, एसटीएफ की मदद से अपराधी पकड़ लिए गए। 6 लोग जेल गए। साथ ही, उत्तर पुस्तिका की ‘डीकोडिंग’ कराई गई। सामूहिक नकल को रोकने के लिए वीडियो रिकार्डिंग की मदद ली, मोबाइल पर प्रतिबंध लगा दिया।
  अभी तक तो एसटीएफ को विशेष किस्म के बंदोबस्त में ही लगाया जाता था?
हमने एसटीएफ को नकल माफिया के खिलाफ लगाया। प्रश्न पत्र लीक कराने वालों, प्रिंटिंग मशीन से उत्तर पुस्तिका छापने वालों के खिलाफ एसटीएफ और पुलिस को लगाया गया है। एसटीएफ की मदद से हमने 6 जिलों को चिन्हित किया था जिसमें जौनपुर में वे लोग गिरफ्तार हुए हैं जहां पर उत्तर पुस्तिकाओं के पन्ने छापे जाते थे जो किसी मेधावी परीक्षार्थी की कापी से बदल दिये जाते थे।

  पठन-पाठन का वातावरण बने, इस दिशा  में क्या प्रयास किये गए है?
उत्तर प्रदेश में पहले केवल परीक्षा प्रणाली थी। पठन-पाठन पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। ढाई महीने तक परीक्षा चलती थी। 15 दिन महापुरुषों के नाम पर अवकाश, दो महीना गर्मी की छुट्टी, 20 दिन दीपावली, दशहरा, वर्ष भर में 52 रविवार और कुछ दूसरे शनिवार की छुट्टियां निकालकर 5 महीने की पढ़ाई बचती थी। शिक्षक15 दिन में ही कोर्स पूरा करा देते थे। इस बार से सब कुछ बदला हुआ मिलेगा। अप्रैल से नया सत्र शुरू हो रहा है। इस बार समय रहते ही पठन-पाठन की तैयारी हो चुकी है। आजादी के बाद अभी तक यह विषमता चली आ रही थी कि अलग-अलग जनपदों में अलग-अलग लेखकों की किताबें चलती थीं, उसे बंद करा दिया गया है। अगले सत्र से हम लोग एनसीईआरटी की पद्धति से शिक्षा देने जा रहे हैं, क्योंकि यूपी बोर्ड के विद्यार्थी कई मामलों में पिछड़ रहे हैं। जरूरी है कि इन्हें एनसीईआरटी पद्धति से शिक्षा     दिया जाय।
हमारे सामने सबसे बड़ा लक्ष्य था उस 10 हजार करोड़ रुपए के नकल माफिया के नेटवर्क को ध्वस्त करना, और उसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है। बाहर के प्रदेशों से जो परीक्षार्थी नकल माफिया के माध्यम से यहां सिर्फ इम्तिहान देने आते थे, उनका काम अब नकल के भरोसे नहीं चलने वाला।  

 शिक्षकों की कमी कब दूर करेंगे?
उसकी प्रक्रिया चल रही है। जब तक भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक के लिए अवकाश प्राप्त शिक्षकों को मानदेय के आधार पर शिक्षण कार्य के लिए बुला रहे हैं। स्कूलों में वाई-फाई सुविधा देंगे। हम लोग डिजिटल बोर्ड, कंप्यूटर लैब और स्मार्ट क्लास की तरफ अग्रसर हैं।
ल्ल    नकल के लिए बदनाम स्कूल ‘ब्लैक लिस्टिड’ होते हैं जिन्हें घूम-फिर कर उस सूची से बाहर कर दिया जाता है। क्या इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है?
ऐसे स्कूलों को हम लोग नोटिस देने जा रहे हैं, जहां पर वर्ष भर गोदाम बना रहता था, कहीं भूसा रखा जाता था और सिर्फ इम्तिहान के समय में उसको परीक्षा केंद्र बना दिया जाता था, टाट बिछाकर परीक्षा कराई जाती थी।

ल्ल    इस बार करीब 11 लाख परीक्षार्थी बढ़े थे, मगर परीक्षा केन्द्रों की  संख्या बढ़ाने के बजाय घटाई गई। इसके बावजूद परीक्षा सुचारु रूप  से चल रही है, यह प्रबंध आपने कैसे किया?
 इसमें भी कई सौ करोड़ रुपए का घपला था। पहले परीक्षा को जान-बूझकर ढाई महीने तक चलाते थे, उसका खर्च ज्यादा आता था। हमने इस बार परीक्षा को एक महीने में ही समेट दिया। पिछली बार 55 लाख परीक्षार्थी थे, इस बार 66 लाख 37 हजार परीक्षार्थी पंजीकृत हुए। इसलिए परीक्षा केंद्र्र और बढ़ाने चाहिए थे। लेकिन इस बार हमने 2,866 केंद्र कम कर दिये।  जी. पी. एस. तंत्र से एक परीक्षा केंद्र्र से दूसरे परीक्षा केंद्र तक की दूरी निकाली गर्इं। परीक्षा केंद्र वहीं बनाया गया, जहां चारदीवारी थी। उसमें सीसीटीवी कैमरे लगे थे। इनवर्टर या फिर जनरेटर था ताकि सीसीटीवी कैमरे बंद ना होने पाएं।     हमने परीक्षा की स्वकेंद्र्र प्रणाली को समाप्त कर दिया है।   

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