‘‘फिल्मों में अनुशासन होना बेहद जरूरी’’
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‘‘फिल्मों में अनुशासन होना बेहद जरूरी’’

Written byArchiveArchive
Feb 26, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 26 Feb 2018 11:11:12

भारतीय सिनेमा में भारत का दर्शन होना जरूरी है। सिनेमा समाज की मानसिकता और सोच—दोनों को विकसित करने का काम करता है, बशर्ते सिनेमा में उस देश की वास्तविक संस्कृति का बोध हो। इसी उद्देश्य को लेकर भारतीय चित्र साधना के बैनर तले 19-21 फरवरी के बीच नई दिल्ली के सीरीफोर्ट सभागार में चित्र भारती फिल्म महोत्सव संपन्न हुआ। महोत्सव के शुभारंभ पर मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी उपस्थित रहीं।
इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ऐसे महोत्सव का अपना महत्व है। लघु फिल्म निर्माताओं को भारतीय साहित्य, भारतीय संस्कृति के बारे में जानना बेहद जरूरी है। भारत की आत्मा साहित्य में बसती है। फिल्मकार यदि भारतीय साहित्य से परिचित होंगे तो फिल्मों में भारतीयता का भाव लाना उनके लिए आसान होगा। इसके अलावा आज फिल्मों में अनुशासन का होना बेहद जरूरी है। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल ने कहा कि उपभोक्तावाद का असर फिल्मों पर भी पड़ा है। इस कारण धीरे-धीरे भारतीय फिल्मों से भारतीयता गायब होती गई। भारतीयता को पुनर्स्थापित करने का जो बीड़ा भारतीय चित्र साधना ने उठाया है, वह सराहनीय है।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उपस्थित भारतीय चित्र साधना के चेयरमैन श्री आलोक कुमार ने कहा कि भारतीय मूल्यों और सामाजिक सरोकार से जुड़ी फिल्में बनाने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए इस फिल्मोत्सव का आयोजन किया गया है। जो फिल्में वैचारिक विमर्श के साथ सांस्कृतिक मूल्यों के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, उन्हें प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भारतीय चित्र साधना की स्थापना की गई है।
प्रज्ञा प्रवाह के राष्टÑीय संयोजक श्री जे़ नंद कुमार ने कहा कि सिनेमा में ‘ब्रेक इंडिया’ की मानसिकता रखने वाले लोगों के प्रभाव को कम करने के लिए इस महोत्सव की शुरुआत की गई। फिल्में ऐसी हों जो मनोरंजन के साथ समाज में एक विचार भी सृजित करें। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सुदीप्तो सेन ने फिल्मों के संबंध में छात्रों को पटकथा लेखन और फिल्म बनाने के गुर बताए। इस मौके पर दक्षिण कोरिया और ईरान की दो लघु फिल्में भी दिखाई गर्इं। समारोह में उपस्थित फिल्म अभिनेत्री एवं भाजपा सांसद हेमामालिनी ने कहा कि जब हम विदेश जाते हैं तो लोग हमसे हिंदी में बात करते हैं। हिंदी और भारतीय संस्कृति को विश्व पटल पर अवगत कराने में हिंदी सिनेमा एक सशक्त माध्यम बन सकता है।
फिल्म अभिनेता अर्जुन रामपाल ने कहा कि भारत में सबसे ज्यादा फिल्में बनती हैं। लेकिन आॅस्कर की दौड़ में हम पिछड़ जाते हैं क्योंकि हम विदेशों की नकल करते हैं। जो लोग अपने देश की संस्कृति और समाज को मौलिक रूप से प्रस्तुत करते हैं, उनकी फिल्में अंतरराष्ट्रीय जगत में सराही जाती हैं और पुरस्कृत होती हैं।
    (इंविसंकें, नई दिल्ली)

हर्षोल्लास से मनी स्वामी रामकृष्ण परमहंस की जयंती  
स्वामी विवेकानंद के आध्यात्मिक गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की 150वीं जयंती लॉस एजेंल्स के हॉलीवुड वेदांत मंदिर में ‘मानवता दिवस’ के रूप में मनाई गई। समारोह में अमेरिका में पली-बढ़ी 10 वर्षीया प्रोमा मजूमदार ने गुरु वंदना के बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर का सुप्रसिद्ध गीत ‘आनंद लोक, मंगल लोक’ गाया। वहीं उनके पिता और अमेरिकी सेना में सिविल इंजीनियर प्रियदर्शी मजूमदार ने सरोद वादन करके सबको भाव-विभोर कर दिया।
इस समारोह की एक खास बात यह रही कि डॉ. जार्ज फ्यूरिसटीन का योग पर आधारित एक लघु वृत्तचित्र दिखाया गया। इसमें भारत के प्राचीन संतों और मनीषियों की सचित्र योग क्रियाओं के माध्यम से भक्ति योग, कर्म योग, ज्ञान योग, राज योग, तंत्र योग तथा अष्टांग योग का विस्तृत वर्णन किया गया। डॉ. फ्यूरिसटीन ने प्रत्येक आसन के साथ भारत की वैदिक संस्कृति की महत्ता और पश्चिमी देशों की स्वीकारोक्ति की झलक का भी सुंदर प्रदर्शन किया।
एक औपचारिक रस्म के बाद स्वामी सर्वदेवानंद ने कहा कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी की यह विशेषता थी कि वे पढ़े-लिखे नहीं थे। वे समाधि में रहते थे। इसके बावजूद कोलकाता के विचारक और बुद्धिजीवी उनके अध्यात्म के कायल थे। सच कहें तो उनके अनुयायी उन्हें आज भी भगवान मानते हैं और उनके अवतरण को एक बड़े उत्सव के रूप में मनाते हैं।
 ललित मोहन बंसल, अमेरिका, लॉस एंजेल्स से  

‘‘पाश्चात्य चिंतकों ने भारतीय
विचारों को खंडित किया’’
गत दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के एक सभागार में अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ के तत्वावधान में ‘भारतीय एवं पाश्चात्य राष्टÑÑ दृष्टि’ विषय पर एक राष्टÑÑीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। संगोष्ठी की भूमिका रखते हुए अनुसंधान पीठ के संयोजक डॉ. चन्द्र प्रकाश सिंह ने कहा कि राष्ट्रीयता, राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रप्रेम या राष्ट्रप्रथम को समझने से पूर्व यह समझना आवश्यक है कि राष्ट्र क्या है। राष्ट्र विषयक अवधारणा के भ्रमित होने से स्वतंत्रता के 70 वर्ष पश्चात् भी हमारा राष्ट्र उस वैभव को नहीं प्राप्त कर सका जिसे प्राप्त करना चाहिए था।
उन्होंने भारतीय राष्टÑÑ की अवधारणा के विरुद्ध पाश्चात्य चिंतकों की रणनीति और षड्यंत्र को रेखांकित किया जिसमें यह गलत धारणा प्रसारित की गई कि भारत ‘एक राष्टÑÑ’ नहीं है। उन्होंने ब्राइट की उस धारणा को निरस्त किया जिसमें वह भारत को एक राष्टÑÑ नहीं, बल्कि 20 अलग-अलग राष्टÑÑ मानता है। उन्होंने कहा कि आज हमें यह जानने की आवश्यकता है कि वह कौन-सा राष्ट्र था जिसका वैदिक ऋषियों ने ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता’ रूप में उल्लेख किया है, वह कौन-सा राष्ट्र था जहां पैदा होकर ऋषि कीर्ति-समृद्धता प्राप्त करने की इच्छा करते थे। नि:संदेह वह यह भारत राष्ट्र ही था, जिसकी संकल्पना को अंग्रेजों द्वारा भ्रमित कर दिया गया। डॉ़ महेश चंद्र शर्मा ने विषय की प्रस्तावना रखी। अनुसंधान पीठ के अध्यक्ष डॉ़ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अंग्रेजों की उपनिवेशवादी नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रिटिश शासन ने रणनीति के तहत भारतीय राज्यों को यह कहते हुए स्वतंत्र किया कि वे अलग-अलग राष्टÑÑ हैं। ऐसा भारत नामक एक राष्टÑÑ की संकल्पना को तोड़ने के लिए किया गया। उन्होंने बताया कि भारतीय संविधान में हिंदू राष्टÑÑ शब्द नहीं जोड़ा गया, बाद में सेकुलर शब्द जोड़ा गया। यह भी  पाश्चात्य षड्यंत्र का ही प्रभाव था। उन्होंने सबसे पहले इतिहास की पुस्तकों को बदलने पर बल दिया, क्योंकि उसके बाद ही राष्टÑÑ की भारतीय अवधारणा सामने आ सकती है। द्वितीय सत्र में ‘राष्टÑÑ की चिति एवं विराट’ पर वरिष्ठ नेता डॉ़ मुरली मनोहर जोशी ने अपने विचार रखे।    

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