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‘‘हमारा लक्ष्य समाज को संगठित करना’’

Written byArchiveArchive
Feb 26, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 26 Feb 2018 11:11:12

‘‘दुनिया में सनातन परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। हमने दुनिया को ज्ञान-विज्ञान, आयुर्वेद, सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कार दिए हैं। इसी कारण आज दुनिया में भारत के प्रति आदर का भाव है। संघ समागम का मतलब भीड़ एकत्र करना नहीं है, बल्कि एक ध्येय के लिए सभी का एकत्रित होना है। यह शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संगठन कार्य है।’’ उक्त उद्बोधन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने दिया। वे गत दिनों काशी  में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के विशाल मैदान में संघ समागम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य समाज को संगठित करना है। इसका मतलब यह नहीं कि हमें भीड़ जुटानी है। संघ का संगठन किसी मजबूरी में नहीं, वरन् कार्यकर्ताओं के त्याग व तपस्या के कारण हुआ है। हमारा लक्ष्य ऐसा भारत बनाने का है, जिससे सर्वत्र भारत की जय-जयकार हो। उन्होंने कहा कि आर्थिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भारत प्रथम शताब्दी तक विश्व का सिरमौर देश था, 9वीं शताब्दी आते-आते निरंतर गिरावट आई, लेकिन गुलामी के दिनों में भी हमारे सामाजिक मूल्य व संस्कार बचे रहे। हमने न किसी देश को गुलाम बनाया, न ही लूटा, बल्कि जब यातायात के साधन नहीं थे, तब भी भारत के लोग मैक्सिको से लेकर साइबेरिया तक गए। वे जहां-जहां गए। वहां-वहां आयुर्वेद, गणित, विज्ञान, सभ्यता व संस्कार दिए। इसी कारण आज भी विश्व में भारत के प्रति आदर का भाव है। दुनिया में भारत की इस श्रेष्ठता के लिए हमारी इस परंपरा की निरंतरता में राम, कृष्ण, बुद्ध,महावीर एवं विवेकानंद जैसे महापुरुषों का योगदान रहा है। भारत में जितने महापुरुष हुए उतने पूरी दुनिया में भी नहीं हुए। भारतीय समाज की चर्चा करते हुए श्री भागवत ने कहा कि विविधता में एकात्मता हमारी सनातन परंपरा है। आज भी भारतीय समाज में यह परंपरा कायम है। हम ‘परहित सरस धरम नहीं भाई’ में विश्वास करते हैं। इसलिए स्वयंसेवक अपना कार्य करते हुए समाज कार्य के लिए समय दें तथा संघ कार्य को प्रत्येक
बस्ती और गांव तक पहुंचाने के लिए निरंतर कार्य करें।
 (विसंकें, वाराणसी )

‘‘भारत ने संपूर्ण विश्व को अपना परिवार माना’’

पिछले दिनों मध्य प्रदेश के श्योपुर में विशाल हिंदू सम्मेलन आयोजित हुआ।  सम्मेलन में सुदूर क्षेत्रों से आए हजारों हिंदुओं ने संदेश दिया कि हिंदू समाज न सिर्फ संगठित है, बल्कि समाज की एकता बरकरार है। सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि हिंदू संस्कृति जड़, चेतन, पशु, पक्षी सबमें ईश्वरत्व को देखती है।   1893 में अमेरिका की धरती पर स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मैं उस धर्म की ओर से उपस्थित  हूं, जिसने इस दुनिया के किसी भी कोने में किसी को भी तकलीफ हुई तो सहारा दिया। उन्होंने उदाहरण दिया कि हजारों साल पहले यहूदियों को उनके देश इस्रायल से उखाड़ दिया गया, तब उन्हें भारत की धरती ने शरण दी। जब ईरान से पारसियों को इस्लाम के अनुयायियों ने खदेड़ा, तब उन्हें भारत ने शरण दी। तो इस नाते से हिंदू का जो तत्वज्ञान है, वह केवल भारत के भले के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए है। सब देश आपस में भाई के रूप में रहें, आत्मीयता से रहें, यह संदेश अगर कोई दे सकता है तो यह हमारा हिंदू धर्म है। श्री सोनी ने कहा कि हम केवल अपने जीवन की छोटी-छोटी बातों को देखें। यह मैं केवल पुराने जमाने की बातें नहीं कह रहा हूं। हिन्दुस्थान के अपने हर गांव के हर घर के अंदर जो परंपराएं थीं, आज आधुनिकता के नाम पर हम उन्हें भूल रहे हैं। इसलिए पशु तो छोड़िए, मनुष्य को भी पानी 15 रुपए में खरीद कर पीना पड़ रहा है। इसलिए जो बातें हम भूल जा रहे हैं, उन्हें याद दिलाने के  लिए  हिंदू सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है।
 (विसंकें, श्योपुर)

भारत-भूटान संबंधों को मजबूत करने का प्रयास  

पिछले दिनों हिंदू हैरिटेज फाउंडेशन एवं वर्ल्ड आॅर्गनाइजेशन फाउंडेशन एंड यूथ ज्वाइंटली के संयुक्त तत्वावधान में भारत-भूटान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंधों की स्थापना की 50वीं वर्षगांठ एवं भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक के 37वें जन्मदिन पर सिक्किम स्थित रानीपूल के एक कॉलेज में विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया गया।  सिक्किम के स्वास्थ्य मंत्री श्री ए.के.
गहानी  कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे।
उन्होंने कहा कि भारत-भूटान के संबंध बहुत पुराने हैं। इन संबंधों को सिर्फ राजनयिक रूप से ही नहीं, बल्कि मित्रवत रूप से भी और अधिक मजबूती देनी होगी। इस अवसर पर फाउंडेशन के समन्वयक श्री प्रशांत हरातलकर ने कहा कि यह कार्यक्रम हमारे बीच संबंध कितने मजबूत और प्रेममय हैं, उसकी याद दिलाता है। हमें आशा है कि भूटान और भारत के संबंध भविष्य में और अधिक प्रगाढ़ होंगे।  इस अवसर पर अनेक लोग उपस्थित थे।                     प्रतिनिधि

ठाकुर रामसिंह की स्मृति पर राज्य स्तरीय कार्यक्रम का आयोजन

हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी तथा ठाकुर जगदेव चंद स्मृति शोध संस्थान, नेरी द्वारा संयुक्त रूप से ठाकुर रामसिंह के जन्मदिन पर हमीरपुर में एक राज्य स्तरीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इसके समापन अवसर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री जयराम ठाकुर उपस्थित थे। इस मौके पर उन्होंने कहा कि कम ही लोग इतिहास लिख पाते हैं और कुछ ऐसे ही विरले लोग होते हैं जो स्वयं इतिहास बन जाते हैं। ठा़ रामसिंह जी उन्हीं हस्तियों में से एक थे। उन्होंने भारतीय इतिहास संकलन योजना का नेतृत्व किया। उनके द्वारा किया गया अनुसंधान देश की प्राचीन कलाकृतियों तथा वास्तविक इतिहास पर आधारित था। उन्होंने कहा कि ठा़ रामसिंह जी ने वैवस्वत मन्वतर में मानव सृजन, सामाजिक प्रणाली, सिकंदर का आक्रमण जैसे विषयों पर चार राष्टÑीय संगोष्ठियों का आयोजन हिमाचल प्रदेश में करवाया था, जिससे उनके क्रांतिकारी अनुसंधान तथा लेखन का प्रमाण मिलता है। कार्यक्रम के शुभारंभ पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व मुख्यमंत्री श्री प्रेम कुमार धूमल ने कहा कि ठाकुर रामसिंह एक प्रख्यात इतिहासविद् तथा पारंपरिक लोक संस्कृति के विद्वान थे। उन्होंने भारतीय इतिहास को वास्तविक रूप से लिखने के लिए लोगों को प्रेरित किया।                                               
     (विसंकें, हमीरपुर)

भारतीय चिंतन
शांति-सुख देता है
‘‘आधुनिक तकनीक ने हमारे जीवन को सुविधापूर्ण बना दिया है, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि मानव जीवन के लिए तकनीक ही सब कुछ नहीं है। वह तो एक साधन मात्र है। तकनीक हमें एक-दूसरे से संपर्क करा सकती है, लेकिन संबंध नहीं बना सकती। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर हजारों लोगों से जुड़े रहने के बावजूद व्यक्ति अपने को अकेला महसूस करता है।’’ उक्त बात राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी ने कही। वे पिछले दिनों पटना में विश्व संवाद केंद्र के नवनिर्मित स्टुडियो के उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग के जीवन से जुड़ी घटनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि कोई तकनीक पर कितना भी आधिपत्य जमा ले, लेकिन अगर उसे मानसिक एवं आध्यात्मिक शांति चाहिए तो उसे भारतीय चिंतन में संभावना नजर आने लगती है। संचार माध्यमों का सदुपयोग सही विमर्श को देश-समाज के बीच पहुंचाने के लिए होना चाहिए। पहले के मुकाबले आज की पत्रकारिता में मूल्यों का अवमूल्यन हुआ है, यह चिंता की बात है।   

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