एजेंडाधारी मीडिया-हत्या को देखने का चश्मा अलग-अलग क्यों?
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एजेंडाधारी मीडिया-हत्या को देखने का चश्मा अलग-अलग क्यों?

Written byArchiveArchive
Feb 12, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 12 Feb 2018 11:11:19


मुसलमान लड़की से मित्रता के चलते दिल्ली में अंकित सक्सेना की निर्मम हत्या को लेकर मीडिया ने जिस तरह रिपोर्टिंग की, उसे देखकर मीडिया का पक्षपातपूर्ण रवैया स्पष्ट नजर आता है। एक ही  घटना को अलग-अलग नजरिए से देखने वाले मीडिया के कथित सेकुलर चेहरे इस विषय पर बात करने को भी तैयार नहीं हैं

आदित्य भारद्वाज

किसी की हत्या सबसे बड़ा अपराध है। वजह कोई भी हो, लेकिन उस वजह से हत्या की पैरवी नहीं की जा सकती। पिछले  साल 22 जून को बल्लभगढ़ जाते हुए ट्रेन में सीट के विवाद में हुई जुनैद की हत्या को याद करें। इसके बाद मुख्यधारा मीडिया में सुर्खियां क्या थीं?
मीडिया इसे एकतरफा ‘हेट क्राइम’ बता रहा था। मीडिया ने लोगों के बीच यह धारणा स्थापित करने की कोशिश की कि ‘नफरत के कारण भीड़ ने एक मुसलमान युवक की हत्या कर दी’। अखलाक और पहलू खान की हत्या के मामले में भी ऐसा ही हुआ। मुख्यधारा मीडिया ने इसे भी पूरी तरह हिंदू बनाम मुस्लिम बना दिया। यह धारणा गढ़ी गई कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है। कथित सेकुलर लोगों ने तो इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी थी।  
अब हाल ही में दिल्ली के रघुवीरनगर इलाके में 22 वर्षीय अंकित सक्सेना की निर्मम हत्या की घटना पर नजर डालें। उसकी गला रेत कर हत्या कर दी गई। वजह? उसकी पड़ोस में रहने वाली एक मुस्लिम लड़की सलीमा से मित्रता थी। दोनों बाकायदा शादी करना चाहते थे। लेकिन सलीमा के परिवार को जब इस बात का पता चला कि लड़का हिंदू है तो उन्होंने अंकित के परिवार के सामने गला रेत कर उसे जान से मार दिया। लेकिन अखलाक, जुनैद और पहलू खान मामले में ‘सक्रिय भूमिका’ निभाने वाले मुख्यधारा मीडिया की प्रतिक्रिया इस मामले में ठंडी रही। मीडिया ने खबर चलाई- ‘‘दिल्ली में प्रेम प्रसंग में लड़की के परिजनों ने की फोटोग्राफर की हत्या।’’  
हत्या के मामलों में रिपोर्टिंग को लेकर मीडिया के इस दोहरे मापदंड पर हमने कई वरिष्ठ पत्रकारों से बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई भी बात करने को तैयार नहीं हुआ। एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने तो फोन ही नहीं उठाया। हालांकि वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी से बात तो हुई, लेकिन तबियत खराब होने की बात कह कर वे मामले को टाल गए। इसी तरह वरिष्ठ पत्रकार एम.के. वेणु, जो ‘द वायर’ वेबसाइट के संस्थापकों में से एक हैं, ने भी मामले की पूरी जानकारी न होने की बात कह बाद में बात करने को कहा। जब उनसे दोबारा संपर्क किया गया तो उन्होंने फोन ही नहीं उठाया। वहीं वरिष्ठ पत्रकार अजित अंजुम ने अपने फेसबुक पेज पर सलीमा का वीडियो शेयर करते हुए लिखा— ‘‘ये सलीमा है। अंकित की दोस्त। सलीमा के घरवालों को ये मंजूर नहीं था। वो अंकित से मिलने वाली थी, तभी अंकित का कत्ल कर दिया गया। इसको सिर्फ हिंदू-मुस्लिम के नजरिए से देखने की बजाए आॅनर किलिंग की तरह देखिए। हर धर्म और जाति के युवा जोड़े ऐसे ही मारे जाते रहे हैं।’’
मीडिया के रवैये पर वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी कहते हैं, ‘‘गजानन मुक्तिबोध की एक कविता है— पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? कथित सेकुलर मीडिया और कथित सेकुलर पत्रकार इसी सिद्धांत के तहत काम करते हैं। मीडिया में पहले भी ऐसा होता था, लेकिन तब पत्रकार खबर में सिर्फ विचार का छौंक लगाते थे। लेकिन पिछले तीन सालों में स्थिति ऐसी हो गई है कि कथित सेकुलर मीडिया एकतरफा रिपोर्टिंग करता है। यदि कोई मुसलमान मारा जाता है तो वह सीधे तौर पर सरकार और अन्य हिंदूवादी संगठनों को कठघरे में खड़ा कर देने में पूरी ताकत झोंक देता है।’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘मीडिया खबरों के माध्यम से ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश करता है कि देश में माहौल खराब होता जा रहा है। कानून-व्यवस्था राज्य का विषय होती है, लेकिन अखलाक, जुनैद और पहलू खान के मामले में मीडिया ने केंद्र पर निशाना साधने और यह दर्शाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि देश में असहिष्णुता लगातार बढ़ती जा रही है। कथित सेकुलर पत्रकार और बुद्धिजीवी इस तरह के मामलों को इसलिए नहीं उठाते, क्योंकि इससे उनकी राजनीति पर फर्क पड़Þता है।’’
वरिष्ठ अधिवक्ता आर.पी. लूथरा कहते हैं, ‘‘उत्तर प्रदेश के कासगंज में चंदन गुप्ता की हत्या हो या दिल्ली में अंकित सक्सेना की हत्या, दोनों ही मामलों में मीडिया का पक्षपातपूर्ण रवैया नजर आता है। अंकित की हत्या को आॅनर किलिंग बताने वाला मीडिया इस बात को क्यों नहीं उठा रहा कि यह किसी भी सूरत में आॅनर किलिंग नहीं है। किसी भी हत्या को आॅनर कीलिंग कहना ही गलत है। यदि अंकित हिंदू नहीं, मुसलमान होता तब भी क्या सलीमा के परिवार के लोग ऐसा करते? नहीं करते। शायद दोनों का निकाह भी हो गया होता। बात केवल इन दोनों मामलों की ही नहीं है, अन्य मामलों में भी सेकुलर मीडिया जिस तरह की रिपोर्टिंग करता है, वह समाज को तोड़ने वाली होती है न कि समाज को दिशा देने वाली।’’
हालांकि बीबीसी के एक वरिष्ठ पत्रकार ने इस विषय पर बात की, लेकिन उन्होंने कंपनी पॉलिसी का हवाला देते हुए कहा कि उनका नाम न लिखा जाए। उन्होंने कहा, ‘‘हत्या कोई भी हो, उसे किसी पंथ या मजहब से जोड़ना गलत है, फिर चाहे हत्या जुनैद या अखलाक या अंकित सक्सेना की हो। मीडिया को सभी मामलों को एक ही दृष्टि से देखना चाहिए।’’
भारतीय जनसंचार संस्थान (आई आईएमसी) में शिक्षक तथा प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर चुके नदीम एस. अख्तर कहते हैं, ‘‘2014 के बाद से मीडिया दो धड़ों में बंट गया है। एक पत्रकार के तौर पर मैने यही सीखा है कि मीडिया का काम रिपोर्ट करना है। हर मामले को समान दृष्टि से देखना ही मीडिया का काम है, लेकिन मीडिया में खेमेबंदी है। जुनैद की हत्या हो, अखलाक या अंकित की, मीडिया की भूमिका एक जैसी होनी चाहिए, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। मीडिया को अपने इस पक्ष पर गौर करना चाहिए।’’
वे कहते हैं, ‘देश में संघीय व्यवस्था है, लेकिन कहीं पर भी होने वाली घटना के लिए सीधे केंद्र पर उंगली उठाना गलत है। घटना क्यों हुई, यह समाज को तय करने देना चाहिए।  इस समय मीडिया में जो चल रहा है, वह न तो देशहित में है और न ही मीडिया जगत  के हित में।’’
वरिष्ठ पत्रकार रवि पाराशर का कहना है, ‘‘मीडिया का यह दोहरा मापदंड है। जुनैद, अखलाक के मामले में जो मीडिया घराने और कथित सेकुलर पत्रकार देश में असहिष्णुता का राग अलापते हैं, वास्तव में देखा जाए तो सबसे ज्यादा असहिष्णु और सांप्रदायिक वही हैं। मीडिया आज जिस तरह से खबरों को तोड़-मरोड़कर उसमें अपने विचार डाल रहा है, यह पत्रकार धर्म तो कतई नहीं है।’’
हत्या जैसे जघन्य अपराध की पैरवी नहीं की जा सकती, लेकिन कथित सेकुलर मीडिया जिस तरह से हिंदू और मुसलमान की हत्या को निष्पक्ष नजर से नहीं देखकर पक्षपातपूर्ण तरीके से रिपोर्टिंग करता है, वह खतरनाक है। सेकुलरिज्म के नाम पर पत्रकार अपनी दिशा और दशा दोनों से भटक गए हैं।     

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