लाल आतंक पर सेकुलर चुप्पी
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लाल आतंक पर सेकुलर चुप्पी

Written byArchiveArchive
Jan 29, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 29 Jan 2018 13:14:13


केरल में एक और संघ कार्यकर्ता श्यामा प्रसाद की हत्या हो गई। माकपा राज में उसके अपराधी तत्व लगभग हर महीने विरोधियों का खून बहा रहे हैं, लेकिन देश का सेकुलर खेमा चुप रहकर मानो उनका मनोबल बढ़ा रहा  है

आदित्य भारद्वाज  

केरल में हत्या का दौर थम नहीं रहा है। 19 जनवरी को कन्नूर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) के कार्यकर्ता श्यामा प्रसाद की निर्ममता से हत्या कर दी गई। कुछ नकाबधारी लोगों ने उन्हें रास्ते में घेर कर कुल्हाड़ी से काट डाला। इसके विरोध में अभाविप ने केरल में प्रदर्शन भी किया, लेकिन सेकुलर मीडिया ने इसकी खबर छापना या दिखाना ठीक नहीं समझा। यही नहीं, किसी कथित बुद्धिजीवी ने यह भी नहीं कहा कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है। यानी संघ परिवार से जुड़े किसी कार्यकर्ता की हत्या पर ये लोग ऐसे चुप्पी साध लेते हैं कि मानो उन्हें कुछ पता ही न हो।  
बीते कई दशकों से वामपंथियों के गढ़ केरल में भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अन्य आनुषांगिक संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं की निर्ममता से हत्या की जा रही है। शायद ही ऐसा कोई महीना जाता हो जब केरल में इस तरह की घटना न होती हो। ‘प्रज्ञा प्रवाह’ के राष्ट्रीय संयोजक श्री जे. नंद कुमार कहते हैं, ‘‘सेकुलर मीडिया केरल में भाजपा कार्यकर्ता और संघ के स्वयंसेवकों की हत्या की खबरों की अनदेखी करता है। और यदि कभी छापता भी है तो यह साबित करने की कोशिश करता है कि यह आपसी संघर्ष का परिणाम है। संघ कार्यकर्ता वाडिक्कल रामाकृष्णन की 1969 में हुई हत्या से लेकर अब तक यही साबित करने की कोशिश हो रही है, जबकि ऐसा नहीं है।’’  वे कहते हैं, ‘‘ हाल ही में एक बड़े मीडिया समूह के वार्षिक समारोह में मैंने एक सवाल उठाया कि पूरे भारत में ‘लक्षित राजनीतिक हत्याएं’ सबसे ज्यादा कहां होती हैं तो किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर मैंने कहा कि देश के तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में ही ऐसा क्यों होता है, क्योंकि इन तीनों में माकपा के समर्थक हैं।’’ श्री कुमार ने कहा, ‘‘यह संघर्ष माकपा बनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं है, बल्कि सभी राजनीतिक विचारधाराओं और माकपा के बीच है। केरल में सिर्फ स्वयंसेवकों और भाजपा कार्यकर्ताओं की ही हत्या नहीं हो रही है, बल्कि उनके विचार से इतर जाने वाले अन्य लोगों को भी मारा जा रहा है। अभी तक कन्नूर जिले में कांग्रेस के 46 कार्यकर्ताओं की भी हत्या हो चुकी है, लेकिन कांग्रेस इस विषय पर कुछ नहीं बोलती, क्योंकि इससे उसकी राजनीति खराब होती है। मल्लपुरम जिले में माकपा  और मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं के बीच रोजाना सड़कों पर लड़ाई हो रही है, लेकिन इसको लेकर मीडिया कतई तत्परता नहीं दिखाता। एक निश्चित लक्ष्य बनाकर केरल में यह सब हो रहा है, लेकिन कथित बुद्धिजीवी इसके लिए न तो आवाज उठाते हैं और न ही सेकुलर मीडिया इस तरह के लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। समस्या के मूल में जाने की जरूरत है।’’ उन्होंने यह भी कहा, ‘‘त्रिपुरा में पिछले एक साल के दौरान सात भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है, लेकिन इसको लेकर न तो सोशल मीडिया पर कोई लिख रहा है, न ही सेकुलर मीडिया कोई खबर छाप रहा है। सब शांत हैं। इसको क्या कहा जाए?’’
अब एक बार फिर से केरल लौटें। संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं की हत्या के विरोध में पिछले वर्ष अक्तूबर महीने में भाजपा ने केरल सहित देश के अनेक हिस्सों में धरना-प्रदर्शन किया था। पदयात्राएं भी हुई थीं। इसके महीने भर बाद ही नवंबर में त्रिशूर में पी. आनंद नाम के स्वयंसेवक की हत्या कर दी गई थी।
श्री कुमार कहते हैं, ‘‘केरल में विचार अभिव्यक्ति की आजादी की सर्वाधिक वकालत करने वाले तथाकथित वामपंथी लोगों की सरकार है, लेकिन इनके द्वारा शासित देश और प्रांतों को देखें तो स्थिति बिल्कुल उलट दिखाई देती है।
चीन सदैव से वामपंथियों का प्रेरणास्रोत रहा है।  4 जून, 1989 को बीजिंग के थ्येनआनमन चौक पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों लोग चीनी सेना की गोलीबारी में मारे गए थे। इसमें सैकड़ों छात्र और स्थानीय निवासी शामिल थे। छात्रों की अगुआई में ये लोग चीन में लोकतांत्रिक सुधारों की मांग को लेकर धरना दे रहे थे। चीन में सरकार के खिलाफ जाने का मतलब है मारे जाओगे। केरल की वामपंथी सरकार भी इसी तर्ज पर चलती है। वाम राज में पश्चिम बंगाल की क्या स्थिति हुई थी (हालांकि अभी भी यही स्थिति है), इसको सभी जानते हैं।’’
पिछले 50 वर्ष में केरल में संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों के 400 से अधिक कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है। यदि इतिहास पर नजर डालें तो 1948 में संघ के दूसरे सरसंघचालक श्रीगुरुजी के उद्बोधन के तुरंत बाद वहां वामपंथियों ने हंगामा किया था।
1969 में त्रिशूर के एक कॉलेज में स्वामी चिन्मयानंद को वक्ता के तौर पर आमंत्रित किया गया था। माकपा और केरल छात्र संघ ने इसका विरोध किया जिसे आज एसएफआई के नाम से जाना जाता है। वामपंथी गुंडों ने स्वामी जी पर जानलेवा हमला करने की साजिश रची थी, लेकिन अभाविप के कार्यकर्ताओं की सक्रियता के कारण वे ऐसा नहीं कर सके। माकपा नेता पिनराई विजयन ने 1969 में अपने एक भाषण में कहा था, ‘‘जो हमारी बात मानता है, वह हमारा है और जो नहीं मानता है, वह हमारा शत्रु है और हम उसको नहीं छोड़ते।’’ आज वही विजयन केरल के मुख्यमंत्री हैं। विजयन  1969 वाडिक्कल रामाकृष्णन की हत्या के आरोपियों में से भी एक हैं।
माकपा के गुंडे केवल विरोधी विचारधारा वालों की ही हत्या नहीं करते, वे अपने उन साथियों को भी नहीं छोड़ते, जो उन्हें छोड़कर किसी अन्य विचारधारा के साथ हो लेते हैं।  उदाहरण के तौर पी.टी. चंद्रशेखरन को लें। ये माकपा के कार्यकर्ता थे। मई, 2012 में उन्होंने माकपा छोड़ दी तो उनकी हत्या कर दी गई थी। उनकी हत्या करने के लिए जो कार इस्तेमाल की गई थी उस पर एक स्टीकर चिपका हुआ था। उस पर लिखा था-‘माशाअल्लाह।’ ऐसा किसी षड्यंत्र के तहत किया गया था। वह षड्यंत्र आज भी जारी है। इसके विरुद्ध आवाज उठाना आवश्यक है।  
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कन्नूर विभाग की कार्यकारिणी के सदस्य सोहनलाल कहते हैं, ‘‘श्यामा प्रसाद की हत्या साजिश के तहत की गई है। एसडीपीआई यानी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया की एक शाखा पीएफआई यानी पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया है, जो माकपा के साथ आंतरिक तौर पर मिली हुई है। इस घटना को पीएफआई ने अंजाम दिया है। यह कट्टरवादी मुसलमानों का एक समूह है। इसने पहले भी इस तरह की हत्याएं की गई हैं।’’ केरल के अलावा कर्नाटक में पीएफआई के गुंडों ने 15 स्वयंसेवकों की हत्या की है। अब केरल में माकपा की शह पर इन्होंने पैर पसारना शुरू कर दिया है। केरल में पिछले दो साल में 17 स्वयंसेवकों की निर्ममता से हत्या की गई है।  स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है। इसके बावजूद वहां की सरकार खम ठोक कर हत्यारों के पीछे खड़ी है, जो बेहद ही शर्मनाक और लोकतंत्र के लिए खतरा है।     

पांच वर्ष की कुछ घटनाएं
12 नवंबर, 2017 को त्रिशूर में बाइक से आईटीआई कॉलेज से लौटते समय संघ कार्यकर्ता आनंदन की हत्या कथित रूप से माकपा के चार गुंडों ने कर दी।
29 जुलाई, 2017 को संघ कार्यकर्ता ई. राजेश की हत्या कर दी गई थी।
18 जनवरी, 2017 की रात कन्नूर में चाकुओं से गोदकर संतोष की हत्या की गई।
28 दिसंबर, 2016 को कोझिकोड के पलक्कड़ में 44 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता सी. राधाकृष्णन को उनके ही घर में जिंदा जलाने की कोशिश की गई। पहले उनकी बाइक में आग लगाई। फिर घर में आग लगा दी गई। इस आगजनी में सी राधाकृष्णन और उनके दो परिजन और बुरी तरह से झुलस गए। उपचार के दौरान  6 जनवरी, 2017 को सी. राधाकृष्णन की मौत हो गई।
अक्तूबर, 2016 में मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के गांव पिनराई में 26 साल के रेमिथ की निर्ममता से हत्या। 14 वर्ष पहले उनके पिता की भी इसी तरह हत्या कर दी गई थी।
19 फरवरी, 2016 को कन्नूर में  संघ के स्वयंसेवक सुजीत की उनके परिवार वालों के सामने ही गला काटकर हत्या कर दी गई।
3 सितंबर, 2014 को कन्नूर में संघ कार्यकर्ता मनोज की हत्या।  इस मामले में माकपा नेता पी. जयराजन को पुलिस ने हिरासत में लिया था।
1 दिसंबर, 2013 को कन्नूर में संघ कार्यकर्ता विनोद कुमार की हत्या।

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