अनूठे सहयात्री
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अनूठे सहयात्री

Written byArchiveArchive
Jan 23, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 23 Jan 2018 15:17:41


गणतंत्र दिवस,वर्षप्रतिपदा,स्वतंत्रता दिवस और दीपावली के अवसर पर पाञ्चजन्य के विशेषांक तो प्रकाशित होते ही हैं,साथ ही कुछ अन्य विशेषांक पाञ्चजन्य के सहयात्री के नाते वर्षों से पाठकों का प्रबोधन कर रहे हैं।

 सतीश पेडणेकर

पाञ्चजन्य वैचारिक पत्र होने के कारण हर हफ्ते समाचारों और लेखों के रूप में अपने पाठकों को दिमागी खुराक देता है। मगर उसके पाठक पाञ्चजन्य के विशेषांकों का भी बेकरारी से इंतजार करते हैं, क्योंकि ये विशेषांक उनके लिए बौद्धिक महाभोज होते हैं। किसी न किसी विषय पर केंद्रित इन विशेषांकों में हर  विचारधारा के लेखकों और विशेषज्ञों के लेखों को जगह दी जाती है। डॉ. राममोहर लोहिया और परिमलकुमार दास जैसे समाजवादी तो अक्सर 50-60 के दशकों में प्रकाशित दशविशेषांकों की शोभा बढ़ाते रहे हैं। कांग्रेस के संपूर्णानंद और पुरुषोत्तम दास टंडन तो पाञ्चजन्य के महत्वपूर्ण लेखकों में से रहे हैं। यह तेवर विशेषांकों को संग्रहणीय बना देता है।
विशेषांकों के विषय में विविधता है। हिंदुत्व भारत का प्राण है इसलिए उसके प्रति पाञ्चजन्य की गहरी प्रतिबद्धता और चिंता है। इसलिए हिंदुत्व और उसके समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर निरंतर विशेषांक निकलते रहे। भारत की विभिन्न चुनौतियां भी विशेषांकों का विषय रहीं। देश के विभाजन की टीस कई विशेषाकों का विषय रही। इसी तरह अखंड भारत या भारतीय महासंघ भी। देश की सुरक्षा तैयारियों पर पाञ्चजन्य की हमेशा पैनी नजर रही है। इसलिए कई बार सुरक्षा के मुद्दे पर विशेषांक निकले। इस्लामी जिहाद या आतंकवाद हमेशा ही देश के लिए खतरा रहा है। उस पर कई विशेषांक हैं, जो उसके हर पहलू को सामने लाते हैं। शुरुआत में पाञ्चजन्य के विशेषांक भी श्वेत-श्याम और टैबलाइड आकार में ही निकलते थे। मगर विशेषांक निकालने की सोच शुरू से ही थी। पाञ्चजन्य के पहले वर्ष में ही  रक्षाबंधन पर ‘राष्ट्र रक्षा अंक’ निकला था।  रंगीन मुखपृष्ठ के साथ विशेषांक काफी बरसों के बाद निकलने शुरू हुए। 1982 में वनवासी विद्रोह पर एक विशेषांक निकला था, जिसके आवरण पर बिरसा मुंडा चित्र था। यह हिंदी पत्रकारिता में एक नई और मौलिक कोशिश थी। इसी तरह पाञ्चजन्य ने पूर्वांचल और असम पर भी केंद्रित विशेषाक निकाले। इसके पीछे यही भाव था कि देश के लोग इस सुदूर क्षेत्र के बारे में विस्तार से जानें। वहां चल रही अलगाववादी और हिंदू विरोधी गतिविधियों के प्रति खबरदार रहें। इसी तरह पंजाब पर निकला विशेषांक भी सामग्री के कारण विशिष्ट था। पाञ्चजन्य की 70 बरस की यात्रा में 250 से ज्यादा विशषांक निकले होंगे। सबके बारे में विस्तार से बताना संभव नहीं है। मगर यहां हम आपको कुछ विशेषांकों की झलक दिखाएंगे। स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों का बलिदान भी पाञ्चजन्य का प्रिय विषय रहा है। इस विषय पर कई विशेषांक निकले।
संविधान समीक्षा अंक  
बहुत सारे लोगों का मानना है कि देश के भटकाव की वजह है हमारा संविधान। उसका एक बार फिर जायजा लेने की जरूरत है। अटल जी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने संविधान समीक्षा आयोग बनाया था जिसे लेकर देश में तीखी बहस हुई थी। तब पाञ्चजन्य ने ‘संविधान समीक्षा अंक’ निकाला था, जो अपनी विचारोत्तेजक सामग्री के कारण काफी चर्चित रहा। पहले ही लेख ‘हम भारत के लोग’ में पूर्व संपादक श्री देवेंद्र स्वरूप ने सवाल उठाया था-पिछले पचास वर्ष की संवैधानिक यात्रा ने राष्टÑीय चेतना को दर्ु्बल बनाया है, राजनीतिक बिखराव और अस्थिरता की स्थिति पैदा की है। राजनीति पर धन, डंडे और सिद्धांतहीनता का वर्चस्व स्थापित किया है। इस परिदृश्य से चिंतित होकर प्रत्येक भारतीय इस संविधान के प्रति शंकालु हो उठा है। उसकी आमूलचूल समीक्षा की आवश्यकता अनुभव कर रहा है। इसी अंक में न्यायमूर्ति रामा जायस के लेख में कहा गया है कि संविधान मूल रूप में सभी को समान अधिकार देता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। मजहबी आधार पर अलग-अलग कानूनों के कारण महिलाओं के अधिकारों का भी हनन होता है। वरिष्ठ पत्रकार बनवारी ने अपने लेख ‘न अपना है न ऊंचा है’ में अपने गहन विश्लेषण के आधार पर टिप्पणी की है,‘‘दरअसल, डॉ. आंबेडकर ने अंग्रेजों द्वारा बनाए गए गवर्नमेंट आॅफ इंडिया एक्ट 1935-को आधार बनाकर 5-7 अन्य देशों के ऐसे संविधानों के ऐसे संदर्भ सामने रखे जो भारतीय समाज के अनुभव के आधार पर नहीं थे। इसके फलस्वरूप हम यूरोप जैसे होते जा रहे हैं। वहां जैसी सामाजिक बुराइयां यहां भी व्याप रही हैं।’’ तब बहुत से लोग संविधान समीक्षा का पुरजोर विरोध कर रहे थे। उनकी दलीलों के जवाब में न्यायमूर्ति गुमानमल लोढ़ा ने लेख लिखा था, संविधान कभी अंतिम नहीं हो सकता। उनकी दलील यह थी कि सामाजिक परिवर्तन, युग स्थितियों के बदलाव के अनुकूल हमें इसे बदलना और संशोधित करना चाहिए। इसे अपरिवर्तनीय कानून नहीं समझना चाहिए।
हिंदुत्व अंक

हिंदू और हिंदुत्व पाञ्चजन्य की आस्था के केंद्र रहे हैं। इसलिए इन मुद्दों पर समय- समय पर विशेषांक निकलते रहे। 1993 का दीवाली अंक हिंदुत्व विशेषांक था। इसमें श्री लालकृष्ण आडवाणी का लेख ‘भारत राष्ट्र की प्राण रेखा है हिंदुत्व’  आकर्षण का केंद्र था। उसमें आडवाणी जी ने  लिखा था, ‘‘भारत यदि भारत है तो उसका कारण यहां की हिंदू संस्कृति है जो भारत की प्राण-रेखा है। आज चारों ओर जो उभार दिख रहा है वह विश्व में चल रहीं सभ्यताओं के संघर्ष का एक हिस्सा है।’’ रा.स्व.संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह श्री कुप्.सी. सुदर्शन का ‘दिग्विजयी हिंदुत्व’ भी अनूठा था। ‘राजस्थान पत्रिका’ के संपादक इस अंक में श्री कर्पूरचंद्र कुलिश का साक्षात्कार हिंदुत्व के मुद्दे पर विस्तार से प्रकाश डालता है। वे एक जगह कहते हैं हिन्दू ही देश है। वह संप्रदाय, मठ, पंथ और धर्म रूप न होकर एक राष्ट्रीय पहचान है। हिंदू राष्टÑवादी बोध से भरा हुआ शब्द है। इस अंक में महामना मालवीय की 1946 में छपी चेतावनी प्रकाशित है। वह आज भी सामयिक है, जिसमें कहा गया है, ‘‘मुसलमानों को यहां रहना है तो हिंदुओं के धर्म का आदर करना पड़ेगा।’’ प्रो. बलराज मधोक का ‘हिंदुत्व की नई चेतना का कारण’ भी उल्लेखनीय है। 2002 का दीपावली अंक ‘हिंदुत्व और राजनीति’ विषय पर केंद्रित है। इसमें ‘ढोंग और हीनभावना से ग्रस्त सेकुलरवादी देश के दुश्मन’ लेख में स्तंभकार श्री शंकर शरण लिखते हैं, ‘‘यह हमारे सेकुलरों, खासकर हिंदू सेकुलरवादियों की वही हीन मानसिकता है जो अपने ही लोगों की झूठी-सच्ची आलोचना करके अपना बड़प्पन, अपनी विचार स्वतंत्रता प्रमाणित करना चाहती है, और वह भी बाहर के लोगों के सामने।’’ श्री देवेंद्र स्वरूप अपने लेख ‘हिंदुत्व प्राण है तो हिंदू समाज उसका शरीर’ में महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते है, ‘‘वामपंथी लिक्खाड़ केवल राजनीतिक कारणों से हिंदुत्व निंदा में जुट गए हैं। हिंदू समाज को वास्तविक खतरा ईसाई या मुस्लिम कट्टरवाद से नहीं, बल्कि हिंदू नामधारक बिकाऊ, आत्मविस्मृत और विद्वेष से भरे वामपंथी बुद्धिजीवियों से है।’’ इस अंक में आयोजित परिचर्चा ‘मैं हिंदू क्यों हूं’ भी कम दिलचस्प नही है। इसमें श्री रामबहादुर राय कहते हैं, ‘‘आज का माहौल हिंदू होने के प्रतिकूल है।’’ तो हरि जयसिंह कहते हैं, ‘‘सभी को जोड़ने वाला धर्म है हिंदू।’’ भाजपा नेता जुएल ओरांव का मानना था, ‘‘पूर्वजन्म के पुण्य कर्मों का फल है कि मैं हिंदू हूं।’’ वसंत साठे ने कहा, ‘‘आज का हिंदू राम का हिंदू हो।’’ वहीं विनोद मेहता की दलील थी,‘‘खतरा हिंदुत्व से है, हिंदू धर्म से नहीं।’’ हिंदुत्व पर प्रकाशित एक और विशेषांक का विषय था, ‘‘भारत हिंदू क्यों रहे?’’ इस अंक के संपादकीय में तत्कालीन संपादक श्री तरुण विजय लिखते हैं, ‘‘भारत हिंदू ही रहे, क्योंकि भारत-तत्व का कोई और ठौर नहीं।’’ आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर का साक्षात्कार इस अंक में प्रकाशित हुआ है। वे कहते हैं, ‘‘हिंदू सभ्यता की खूबी यही है कि यह अविनाशी है, सनातन है। इसीलिए इसका नाम सनातन है, क्योंकि हिंदू सभ्यता जीवन के सत्य के साथ जुड़ी हुई है। बहुत गहरा संबंध है इसका जीवन के सत्य के साथ। यही कारण है कि हिंदू सभ्यता जस की तस रही है, अक्षुण्ण रही है। हिंदुत्व के प्रति इस तरह के आघात हमें बार-बार ध्यान दिलाते हैं कि हिंदू समाज को एक होना चाहिए। हिंदू समाज में एकजुटता हो तो इस तरह के हमले संभव नहीं होंगे।’’
श्री देवेंद्र स्वरूप अपने लेख ‘जन-जन में व्याप्त हिंदुत्व की अदृश्य अजस्रधारा’ में लिखते हैं, ‘‘क्या भारत का हिंदू बने रहना आवश्यक है? क्या हिंदू का हिंदू के रूप में जीवित रहना जरूरी है? उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि पराधीनता की हजार साल लंबी कालावधि से जूझकर भी भारत जीवित रहा है तो इसलिए कि उसके पास विश्व को देने के लिए एक अमृत कुंभ है और उसे दिए बिना वह नहीं मरेगा।’’
वे लिखते हैं, ‘‘स्वाधीनता के 58 वर्ष बाद आज हिंदू समाज जिस स्थिति से गुजर रहा है, उसे देखकर लगता है कि शायद वह अमृत कुंभ हिंदू समाज से छिन चुका है। इस समाज का बड़ा अंग अपने को हिंदू कहने से कतरा रहा है। वोट गणित में हिंदू नामक कोई वोट बैंक न होने के कारण हिंदू शब्द सांप्रदायिकता का पर्याय बन गया है। हिंदू के अलावा बाकी सब सेकुलर हैं। ’’
इसी अंक में प्रकाशित अपने लेख में भाजपा नेता प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा ने हिंदुओं की घटती आबादी का सवाल उठाया है। वे लिखते हैं, ‘‘संपूर्ण भारत की सन् 2001 की जनगणना के पंथ आधारित आंकड़े सन् 2004 के सितंबर मास में प्रकाशित हुए। ये आंकड़े प्रकाशित होते ही हंगामा मच गया। 1951 से लेकर 2001 तक हिंदुओं की जनसंख्या का प्रतिशत निरंतर कम होने और मुसलमानों का प्रतिशत निरंतर बढ़ने पर हिंदुओं, राष्ट्रवादियों का चिन्तित होना स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक भी था। परंतु सेकुलर मंडली का हाहाकार मचाना और भी चिंतनीय तथा स्तब्धकारी था।’’
द सेंटिनल (गुवाहाटी) के पूर्व संपादक धीरेंद्र नाथ बेजबरुआ असम में घटती हिंदुओं की संख्या पर चेतावनी देते हुए लिखते हैं, ‘‘20 साल और हिंदू घटने दीजिए, असम हाथ से निकल जाएगा। असम ही क्या, पूरा उत्तर-पूर्व भारत इस मुख्यभूमि से कट जाएगा।’’
श्री शंकर शरण ने ‘हिंदुत्व से वैर’ लेख में कम्युनिस्टों को पूरी तरह बेनकाब किया है। वे लिखते हैं, ‘‘यह दिलचस्प है कि धर्म, अध्यात्म, मजहब और इससे सम्बंधित समस्याओं से बार-बार उलझते हुए भी दुनियाभर के मार्र्क्सवादियों ने इसका व्यवस्थित अध्ययन करने का साहस नहीं किया। वे हमेशा अंधेरे में तीर चलाते रहे।’’ जिहाद और आतंकवाद

बात तब की है जब देश पर चारों तरफ जिहाद या मुस्लिम आतंकवाद का साया मंडरा रहा था तब पाञ्चजन्य ने इस  मुद्दे पर सालभर में दो विशेषांक निकाले। 28 जनवरी, 2001 को  ‘जिहाद से जूझता गणतंत्र’ और 18 नवंबर को  दीपावली पर ‘हिंदू समाज और जिहाद।’ ये दोनों विशेषांक जिहाद के हर पहलू का जायजा लेते हैं। श्री देवेंद्र स्वरूप का लेख ‘विश्वव्यापी आतंकवाद’ जिहाद के वैश्विक तंत्र को उजागर करता है। जिहादी मानसिकता के संदर्भ में वे  लिखते हैं, ‘‘उन पर एक जुनून सवार है कि किसी बहुत बड़े उद्देश्य के लिए काम कर रहे हैं। वे अल्लाह के हुक्म का पालन कर रहे हैं। दुनिया से कुफ्र के अंधेरे को मिटा रहे हैं। इस्लाम की रोशनी फैला रहे हैं। जिहाद में मरने वालों को जन्नत मिलती है। इस जन्नत को पाने के लिए मुस्लिम युवा उतावले हैं। विश्वभर में फैले मुस्लिम आतंकवाद की जड़ में यही जिहादी मानसिकता है और इस जिहादी मनसिकता की जड़ इस्लाम की मूल विचारधारा में है। इस विचारधारा को पूरी तरह समझे बिना आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई सफल नहीं हो सकती।’’ प्रो. बलराज मधोक का भी एक ऐसा ही दिमाग को झकझोर देने वाला लेख है। विशेषांक में देश के कई हिस्सों में फैले आतंकवाद की परतें उघाड़ी गई हैं। दीपावली पर निकले ‘हिंदू समाज और जिहाद’ विशेषांक में दो दिग्गज, सलमान रश्दी और वी.एस. नॉयपॉल के विचारोत्तेजक लेख हैं। नॉयपॉल अंग्रेजी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में अग्रणी माने जाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व उनकी नई पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक है ‘बियोंड बिलीफ’ यानी आस्था से परे। इसमें उन्होंने इंडोनेशिया, ईरान, पाकिस्तान और मलेशिया के कन्वर्टेड मुसलमानों की मन:स्थिति और उनकी वैचारिक दिशा का ही वर्णन नहीं किया है, बल्कि यह भी सिद्ध किया है कि इस्लाम किस प्रकार उनके और उनकी मातृभूमि के मध्य संबंधों को बदल देता है। नॉयपॉल तो बस नॉयपॉल ही हैं। उनकी शैली मंत्रमुग्ध करने वाली है। नॉयपॉल पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं, ‘‘इस्लाम अपने मूल में एक अरब संप्रदाय है। वह प्रत्येक मुस्लिम, जो अरबी नहीं है, एक कन्वर्टेड  व्यक्ति ही कहा जा सकता है। इस्लाम आत्मा की आवाज या अपनी निजी आस्था मात्र का विषय नहीं है। उसकी मांगें साम्राज्यवादी हैं। कन्वर्टेड व्यक्ति की विश्व दृष्टि ही बदल जाती है। उसकी पवित्र भाषा उसके देश की भाषा नहीं अपितु अरबी हो जाती है। इतिहास के बारे में उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। वह जो कुछ अपना है उसे नकार कर, चाहे-अनचाहे एक अरब कहानी का हिस्सा बन जाता है।’’ सलमान रश्दी का लेख ‘यह इस्लाम नहीं तो क्या है’ बताता है, ‘‘यही उन्मादी इस्लाम आज दुनिया में इस्लाम का तेजी से उभरता स्वरूप है। यह उन्मादी इस्लाम बाहरी तत्वों, काफिरों को मुस्लिम समाजों की बुराइयों का दोषी ठहराता है और एकमात्र उपचार यही बताता है कि मुस्लिम समाजों को आधुनिकता की ओर खुलने वाली तमाम खिड़कियां बंद कर लेनी चाहिए।’’ इस्रायल के प्रधानमंत्री श्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 3 अक्तूबर, 2001 को इस्रायल की गवर्नमेण्ट रिफार्म कमेटी में कहा था, ‘‘हां इच्छाशक्ति हो तो हम खत्म कर सकते हैं आतंकवाद। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद को यदि राज्याश्रय न मिले तो उसका सारा ढांचा चरमरा कर धूल में मिल जाएगा। उसका आधार ही हैं, ईरान, इराक, सीरिया, अफगानिस्तान के तालिबान, फिलीस्तीन एवं सूडान जैसे अनेक अरब देश। यही वे देश हैं जो आतंकवादी गिरोहों को प्रश्रय देते हैं।’’ इसी तरह मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘जिहाद’ मुस्लिम मानसिकता पर सवाल उठाती है। 2009 के गणतंत्र दिवस विशेषांक का विषय ‘आतंकवाद बनाम राष्ट्रवाद’ था। इसमें राष्ट्र-जीवन की दिशा-दशा के गहन चिंतक डॉ. मुरली मनोहर जोशी का साक्षात्कार है। देश के लिए आज एक गंभीर संकट बन गए जिहादी आतंकवाद को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हुए उनका मानना है कि भारत एक राष्ट्र, एक जन  और एक देश है। इस आधार पर राष्ट्रवाद की भावना जितनी बलवती होगी आतंकवाद के फन को उतनी ही दृढ़ता से कुचला जा सकेगा। ‘इण्डोनेशिया से बालकान तक इस्लामी साम्राज्य की तैयारी’ आलेख में राम कुमार ओहरी कहते हैं, ‘‘आतंकवाद और जिहाद में काफी अंतर है। भारत में बहुत बुद्धिजीवी और रक्षा विश्लेषक ऐसे हैं, जिन्हें आतंकवाद और जिहाद में फर्क  मालूम नहीं है। जिहाद एक बड़ी विचारधारा है, जिसका उद्देश्य है एक युद्ध द्वारा सभी काफिरों (गैर मुस्लिमों) को इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर करना। यदि काफिर ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें मारा जाए, खत्म किया जाए। यह इस्लाम का परंपरागत तरीका है काफिरों के प्रति।’’ वरिष्ठ स्तंभकार ए. सूर्यप्रकाश, आतंकवाद की समीक्षा करते हुए कहते हैं, ‘‘भारत में आतंकवाद का दानव कोई हाल के वर्षों में पैदा नहीं हुआ है।  मेरे विचार से भारत में आतंकवाद का विषबीज तो 1930 में उस वक्त बो दिया गया था जब मजहब के आधार पर द्विराष्ट्र का सिद्धांत तैयार किया गया था।’’ ‘इस्लामी आतंकवाद और भारत’ लेख में वरिष्ठ स्तंभकार शाहिद रहीम की दलील है, ‘‘जिहाद शब्द आज न केवल आतंक का पर्याय है, बल्कि प्राचीन अरब सभ्यता की वह खूनी राजनीति है जो हाथों में इस्लाम का परचम लेकर पूरी दुनिया में दनदनाती फिर रही है।’’
इस तरह तीनों विशेषांक इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि जिहाद गैर-मुसलमानों के खिलाफ एक अंतहीन युद्ध है। इस्लाम और जिहाद एक-दूसरे के बगैर नहीं रह सकते। यदि इस्लाम शरीर है तो जिहाद उसकी आत्मा है। जिस दिन इस्लाम से जिहाद निकल जाएगा उसी दिन इस्लाम मर जाएगा। इसलिए इस्लाम को जीवित रखने के लिए मुसलमान किसी न किसी बहाने किसी न किसी मुल्क में जिहाद करते रहते हैं।
संघ शक्ति, लोक शक्ति
देश को परम वैभव के शिखर पर ले जाने के लिए हिंदू समाज को संगठित करने का काम संघ रोजाना कर रहा है। संघ के इस काम के 90 वर्ष पूरे होने पर पाञ्चजन्य ने संग्रहणीय विषेषांक निकाला था, ‘90 बरस राष्ट्रसेवा के।’ संघ को समझने के इच्छुक लोगों के लिए यह एक अद्भुत अंक है। इसमें संघ के बढ़ते कार्यों के साथ-साथ अनेक लेख हैं, जो संघ की विराटता को पाठकों के सामने रखते हैं। विशेषांक के पहले लेख ‘विवेकानंद पथ पर बढ़ते कदम’ में राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सह प्रचार प्रमुख श्री जे. नंदकुमार संघ की इस अनुपम यात्रा का जायजा लेते हैं। वे लिखते हैं, ‘‘किस तरह राष्ट्र को सबल और समर्थ बनाकर नित नई ऊंचाइयों की राह पर ले जाने में जुटा है संघ। 90 साल की यात्रा के बावजूद यह ध्येय धुंधलाया नहीं है।’’ रा.स्व.संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने अपने साक्षात्कार में बताया है कि संघ की वास्तविक शक्ति का रहस्य किस बात में है, क्या है। वे कहते हैं, ‘‘संघ की शक्ति तो अनौपचारिक पद्धतियों में है। उसकी अलग पहचान है तो यही है। इसलिए प्रतिबंध लगे तो शाखाएं बंद हो गर्इं पर मिलना-जुलना बंद नहीं हुआ।’’ वरिष्ठ चिंतक श्री मा.गो. वैद्य बताते हैं, ‘‘दैंनदिन शाखा ने समाज को एक साथ खड़ा कर दिया।’’ रा.स्व.संघ के प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य अपने लेख में इस गलतफहमी को दूर करते हैं कि संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया । वे तथ्यों के साथ बताते हैं कि संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में सहभाग किया, लेकिन श्रेय नहीं लिया। श्री रंगाहरि इतिहास के उन पन्नों से हमें रूबरू कराते हैं, जिनमें व्यक्ति निर्माण के पथ पर अग्रसर संघ के स्वयंसेवक रच रहे हैं असाधारण इतिहास। एक जगह वे बताते हैं नागपुर में एम.एन. घटाटे के घर पर हुई बैठक में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, श्रीगुरुजी, श्री बालासाहब देवरस और श्री भाऊराव देवरस शामिल हुए। गहन मंत्रणा के बाद भारतीय जनसंघ की नींव पड़ी। डॉ. मुखर्जी के साथ नानाजी देशमुख और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे मंजे हुए कार्यकर्ताओं को आगे कर दिया गया। संघ के विस्तार में संघ गीतों की प्रवाहमान संजीवनी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उन पर डॉ. अमिता पत्की का लेख ‘संघ गीतों की प्रवाहमान धारा’ पठनीय है। रा.स्व. संघ के सह संपर्क प्रमुख श्री अरुण कुमार ‘मुश्किल मोर्चों पर यादगार प्रदर्शन’ लेख में इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं कि आज जम्मू-कश्मीर का जो हिस्सा भारत में है उसके लिए सैनिकों के साथ-साथ स्वयंसेवकों ने भी बलिदान दिया है। विशेषांक सचमुच संग्रहणीय बन पड़ा है। इसमें संघ के विभिन्न आनुषांगिक संगठनों के बारे में भी जानकारी है। उनके अधिकारियों के लेख भी    हैं। कुल मिलाकर इसमें संघ के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार कराने की ईमानदार कोशिश      की गई है।
इससे पहले भी लोकशक्ति के बल पर बढ़ती संघ यात्रा का विस्तार से जायजा लिया था पाञ्चजन्य ने  2003 की वर्ष प्रतिपदा के विशेषांक ‘लोकशक्ति जनशक्ति’ में। इस विशेषांक का सबसे बड़ा आकर्षण था वरिष्ठ चिंतक और भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेगड़ी का ‘यूं अंकुरित हुआ संघ वृक्ष का बीज’। इसमें संघ के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारी है कि संघ की स्थापना के बाद इससे धीरे-धीरे विकास होता गया। जिस दिन संघ प्रारंभ हुआ उस दिन की शाखा का स्वरूप आज जैसा नहीं था। वह क्रमश: बनता गया। लंबे समय तक संघ कार्य बिना नाम के भी चलता रहा। फिर नाम की आवश्यकता निर्माण हुई। फिर बाकायदा मतदान के द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम तय हुआ। ऐसे दसियों किस्सों को अपने में समेटे हुए है। जो लोग समझना चाहते हैं किस तरह संघ का विकास हुआ है उन्हें यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए। इसमें रा.स्व.संघ के तत्कालीन अ.भा. प्रचारक प्रमुख श्री हो.वे. शेषाद्रि का लंबा साक्षात्कार है। इसमें वे कहते हैं, ‘‘लोकशक्ति से ही होगा समर्थ भारत का अभ्युदय।’’ श्री देवेंद्र स्वरूप ने अपने लेख    ‘संघ का अंतर्द्वन्द्व-संघ राजनीति करे या लोकशक्ति बने?’ में संघ के संदर्भ में अच्छी जानकारी दी है। वे लिखते हैं, ‘‘श्रीगुरुजी स्वाधीन भारत के राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के महायज्ञ में संघ की भूमिका को सत्ता राजनीति से पूर्णतया अलिप्त रहकर राष्ट्रजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय रचनात्मक लोकशक्ति के रूप में देखते थे। इसी भूमिका का निर्वाह करने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, विद्या भारती, भारतीय मजदूर संघ, किसान संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, विद्यार्थी परिषद् आदि अनेक संस्थाओं का समय-समय पर सृजन हुआ। 1949 के विचार मंथन को अब पचास वर्ष से अधिक हो चुके हैं। राजनीतिक प्रणाली के परिणाम और अनुभव अब हमारे सामने हैं। संघ की संगठन-साधना में से उद्भूत संगठनों के अनुभवों का भी मूल्यांकन करने की स्थिति में हम पहुंच चुके हैं।’’ विशेषांक में ठेंगडी जी का एक लेख है ‘श्रीगुरुजी और बाबासाहब समता और समरसता के महान तपस्वी।’ वे लिखते हैं, ‘‘श्रीगुरुजी ने कहा था अस्पृश्यता, यह अस्पृश्यों का विषय नहीं है। यह सवर्ण हिंदुओं के हृदय का विषय है। सवर्ण हिंदुओं का हृदय-परिवर्तन जब तक नहीं होता, तब तक अस्पृश्यता का प्रश्न हल नहीं हो सकता है। इसी तरह के विचार डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के भी थे।’’
मंगलमय परिवार
परिवार भारतीय समाज की बुनियाद है, लेकिन आज इस परिवार संस्था पर ही तमाम सवाल उठ रहे हैं। संयुक्त परिवार तो टूट की ओर बढ़ रहा है। छोटे परिवार भी कई तरह के दबावों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में परिवार संस्था पर सर्वांगीण विचार करने के उद्देश्य से निकाला गया अंक ‘मंगलमय परिवार’ बहुत ही पठनीय रहा। इस अंक में राम कथाकार श्री विजय कौशल जी महाराज का एक साक्षात्कार छपा है। उन्होंने मंगलमय परिवार रचना के केंद्र में स्वयं को ला खड़ा किया है। इसके लिए संगत और पंगत का मंत्र घर-घर पहुंचा कर उन्होंने देशभर में ऐसे हजारों परिवार खड़े किए हैं, जो अपने आसपास आनंद, उल्लास और ऊर्जा की सुगंध बिखेर रहे हैं। उनका मानना है कि जब परिवार मंगलमय होगा तभी देश, समाज, विश्व और मानव जाति का मंगल होगा, परिवार बचेगा तो मानवता बचेगी। इसी अंक में गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या कहते हैं, ‘‘आज की पश्चिमी नकल के माहौल में हमारे सांस्कृतिक मूल्यों पर चोट पड़ी है, खासकर पिछले 15 वर्ष में, जबसे वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण का दौर चालू हुआ है, तब से यह आघात तीव्रतर होता गया है। सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव डाला है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने। विशेषकर इसने परिवार संस्था को गंभीर हानि पहुंचाई है। मैं समझता हूं कि आज की ऐसी परिस्थिति में हम अध्यात्म को जगाएं, शुद्ध      सोच बनाएं।’’
‘परिवार का विचार-सुख का आधार’ लेख में  महिला समन्वय की अ.भा. संयोजिका गीता गुण्डे कहती हैं, ‘‘हिंदू विचार के अनुसार सृष्टि की हर निर्मिति में प्राणतत्व है। इसलिए हम सभी के आत्मीय संबंध बन जाते हैं। केवल परिवार के 2-4 लोग नहीं, अपितु सभी प्राणी, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, पहाड़, नदियां अपने परिवार में समा जाते हैं, यह एकात्म भाव ही परिवार संकल्पना का आधार है।’’ ‘स्नेह की सुगंध’ लेख में दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में रहने वाले संयुक्त परिवारों का विस्तृत परिचय है जो आज के माहौल में भी खुशी-खुशी साथ रह रहे हैं। इस कारण समाज के लिए पाथेय बन रहे हैं। ‘कानून तथा परिवार व्यवस्था’ शीर्षक से प्रकाशित लेख में डॉ. हरबंश दीक्षित लिखते हैं, ‘‘दरअसल, कानून की आवश्यकता ही तब पड़ती है जब सामाजिक संबंधों का प्रभाव क्षीण हो जाए। अब तक जितने भी कानून बनाए गए वे बेहतर समाज के निर्माण के लिए बनाए गए। ऐसी व्यवस्था को पुष्पित-पल्लवित करने के लिए बनाए गए जिसमें समानता हो, भाईचारा हो और मानवीय संवेदना का उल्लास हो। यदि उनका सही उपयोग नहीं हुआ है तो उसके लिए कानून नहीं, बल्कि समाज दोषी है। इसके लिए सामाजिक सोच बदलने की आवश्यकता है ताकि कानून में अन्तर्निहित उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।’’ संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्रीनाथ कृष्णप्पा ‘परिवार ही है संस्कार का आधार’ में कहते हैं, ‘‘परिवार संकल्पना संपूर्ण विश्व में है, सभी प्राणियों में है। मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षियों में भी है। लेकिन हिंदू समाज में परिवार संकल्पना बहुत गहरे तक विद्यमान है। हिंदू परिवार संकल्पना में चिंतन भी है और व्यवहार की विशेषता भी है। इस आधार पर हम कहते हैं कि हिंदू परिवार एक संस्कार केंद्र है।’’ इस तरह यह विशेषांक वर्र्तमान संदर्भों में परिवार की महत्ता को रेखांकित करता है कि समाज को बचाना है तो कुटुंब को बचाना होगा।
15 अगस्त, 15 मोर्चे
स्वतंत्रता दिवस 2013 का अंक आजादी के 66 साल के बारे में तीखे 15 सवाल उठाता है। रक्षा से लेकर शिक्षा तक, साहित्य से लेकर संविधान तक। यह है कुछ सवालों की बानगी- ‘लोकशाही की हनक बढ़ी चमक घटी’, ‘सच्ची बातें चबा गए, अच्छी बातें दबा गए’, ‘जाना था पूरब राह पकड़ी पश्चिम की’, ‘हड़बड़ी में रह तो नहीं गई कोई गड़बड़ी’, ‘घर का जोगी जोगना आन गांव का सिद्ध’, ‘जज साब सवाल साख का है’, ‘कर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की’, ‘कांपते हाथों से उड़ाते रहे फाख्ता’। इन चुभने वाले सवालों पर लिखे गए लेख भी विचारोत्तेजक हैं और जीवन के हर क्षेत्र के बारे में हैं। और दो टूक लहजे में बुनियादी बात कहते हैं। देवेंद्र स्वरूप, डॉ. सतीशचंद्र मित्तल, ओमप्रकाश कोहली, राम बहादुर राय, दीनानाथ बत्रा, डॉ. बजरंगलाल गुप्त के लेख नए सवाल उठाते हैं, नई दिशा देते हैं। रामबहादुर राय अपने लेख में बुनियादी सवाल उठाते हैं, ‘‘अंग्रेजों ने जो नियम कायदे दिए उन्हीं को हम अभी तक ढो रहे हैं, हमारा कुछ नहीं झलकता।’’ दीनानाथ बत्रा कहते हैं, ‘‘अंग्रेजों ने सपना देखा था भारत को अंग्रेजियत में रंगने का। उनका वह सपना पूरा होता दिख रहा है।’’ देवेंद्र स्वरूप की दलील है, ‘‘भारत की जनता लोकतंत्र से जुड़ाव महसूस नहीं करती क्योंकि हमारा जनतंत्र जनता के सरोकारों से दूर हो रहा है।’’ ओमप्रकाश कोहली का सवाल है, ‘‘जब कोई ईमानदार और साहसी अफसर अपना दायित्व निभाता है तो नेताओं को डर क्यों लगने लगता है। ऐसी राजनीति से भला किसका होगा।’’
अर्थव्यवस्था पर विशेषांक
2007 का गणतंत्र दिवस विशेषांक ‘घायल धरती आहत किसान’ स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) पर केंद्रित था। तरुण विजय अपने संपादकीय में कहते हैं, ‘‘विकास का उत्कर्ष बिंदु दिल्ली और बाहर के लोग गुड़गांव को मानने लगे हैं। विदेशस्थ भारतीय और स्वदेशी पढ़े-लिखे गर्व से कहते हैं, ऐसा नहीं है कि हम तरक्की नहीं कर रहे। गुड़गांव को देखिए, लगता है कि आप केलीफोर्निया में आ गए हैं। गुड़गांव की राष्ट्र भाषा अंग्रेजी है। तो क्या जब सारे देश के शहर गुड़गांव हो जाएंगे तो हमारा स्वाभिमान बढ़ जाएगा और हम दुनिया के सबसे विकसित देश मान लिए जाएंगे? देश का स्वत्व खोकर विकास की ओर बढ़ना कितना उचित है?’’
देवेंद्र स्वरूप अपने विचारोत्तेजक लेख ‘कहां ले जाएगा सभ्यता का यह चक्र आत्मनाश या विकास’ में सवाल करते हैं क्या इस सबके बाद भी कोई कहेगा कि भारत विकसित राष्ट्र नहीं है, विकास की सीढ़ी पर काफी ऊपर नहीं पहुंच गया है? किंतु इस ऊपरी चमक-दमक के पीछे भारत का एक दूसरा चेहरा भी है। एक ओर समृद्धि का निर्लज्ज प्रदर्शन, दूसरी ओर गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या में वृद्धि-विकास के इन दो चेहरों का क्या अर्थ निकालें? यह कैसा विकास है जो विषमता की खाई को कम करने के बजाए उसे और चौड़ा और गहरा करता जा रहा है? विकास का वास्तविक लक्ष्य तो समाज के आखिरी छोर पर खड़ा अकिंचन, अनिकेत व्यक्ति होना चाहिए। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर हर हाथ को काम, हर खेत को पानी का नारा आर्थिक विकास की कसौटी माना गया है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति की रोटी, कपड़ा और मकान की न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति करना विकास का पहला लक्ष्य होना चाहिए।
हिंदुस्थान समाचार के तत्कालीन संपादक डॉ. रवीन्द्र अग्रवाल अपने लेख ‘जमींदारी प्रथा की पुन: वापसी’ में विशेष आर्थिक क्षेत्र को गांव, जमीन और किसान के लिए खतरनाक मानते हैं। जमीन और किसान कैसे बचें, उनके प्रति हमारी क्या नीति हो आदि मुद्दों को उन्होंने अपने लेख में शामिल किया है। वे कहते हैं,  ‘‘समझाया जा रहा है कि खेती का योगदान सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में 20 प्रतिशत से भी कम रहता है और खेती की विकास दर मात्र एक प्रतिशत और कभी-कभी तो वह भी नहीं रहती। यह सब और कुछ नहीं खेती को देश की दस प्रतिशत की विकास दर की लंबी छलांग के मार्ग का बड़ा अवरोध माना जा रहा है। मान लिया गया है कि अगर देश को कोई चमत्कारिक छलांग लगाकर विकास का ओलंपिक जीतना है तो जरूरी है खेती और खेत पर अंकुश लगाया जाए। विकास के ओलंपिक का स्वर्ण जीतने की ललक की देन है एस.ई.जेड अर्थात् विशेष आर्थिक क्षेत्र।’’
डॉ. जितेंद्र बजाज अपने लेख ‘अन्नदाता की उपेक्षा क्यों?’ में देश के नीति नियोजकों द्वारा कृषि की उपेक्षा पर कड़ा प्रहार करते हैं और साथ ही चेतावनी देते हैं कि कृषि की उपेक्षा से कोई देश संपन्न नहीं होता। वे कहते हैं, ‘‘भारत के नीति-निर्माताओं की दृष्टि में खेती का ऐसा गौण स्थान कोई नई बात नहीं है। स्वतंत्रता के उपरांत भारत की समस्त योजनाओं में खेती का ऐसा ही स्थान रहा है। खेती के लिए हमेशा उतना ही धन लगाया गया है, उस पर मात्र उतना ध्यान दिया गया है जितना किसी बड़े सामाजिक संघर्ष की संभावना को रोकने के लिए अनिवार्य रहता है। अब तो हमारे नियोजक यह मानने लगे हैं कि सेवा एवं उद्योग आदि के क्षेत्रों में लगे बड़े नगरों के निवासियों के लिए यदि अनाज की कमी पड़ने लगी तो उतना अनाज विदेश से मंगवा लिया जाएगा, फिर खेती का भार क्यों ढोते चलें।’’
2010 के स्वतंत्रता दिवस विशेषांक का विषय था- ‘अर्थ पर अनर्थ हावी क्यों?’ संपादकीय में बल्देल भाई शर्मा लिखते हैं, ‘‘यह है चित्र हमारी 63वर्ष की आजादी का जो हमारे सामाजिक सरोकारों को लील गई। अर्थव्यवस्था का विनाशकारी रूप जन-जन को झकझोर रहा है। इसे अभिव्यक्ति देने के लिए अर्थ या अनर्थनीति विषय पर केंद्रित यह आयोजन एक सुमंगल पथ को खोजने का विनम्र प्रयास है।’’ ‘विश्व का मार्गदर्शक बने भारत’ लेख में सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी एक सच्चाई की तरफ ध्यान खींचते हैं। वे लिखते हैं, ‘‘यह बहुत स्वाभाविक है कि जो शक्तिशाली होते हैं, वे हमेशा ही पूरी दुनिया को अपने तंत्र के आधार पर चलने के लिए विवश करते हैं। ऐसे में भारत का दायित्व बनता है कि वह दुनिया के छोटे देशों का नेतृत्व करे और स्वावलंबी दिशा में चलने के लिए एक शक्ति के रूप में उन्हें खड़ा करे ताकि भूमंडलीकरण, उदारीकरण, विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्थाओं द्वारा कुछ गिने-चुने देश सारे विश्व के तंत्र को प्रभावित न कर सकें। इसलिए भारत को नेतृत्व करना ही होगा। हमारी मान्यता है कि भारत जनसंख्या की दृष्टि से, प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से, विद्वता की दृष्टि से अपार क्षमताओं से भरा है। लेकिन आज का हमारा राजनीतिक तंत्र शायद अज्ञानतावश इन सबकी उपेक्षा करते हुए पश्चिमी तंत्र पर चल रहा है। हमें देश की अपार क्षमताओं का उपयोग विकास के नये मॉडल स्थापित करने में करना होगा।’’
अपने साक्षात्कार में योग गुरु स्वामी रामदेव  कहते हैं देश में जमा काले धन को बाहर लाकर उसको उपयोग में लाना होगा। उसके लिए छपे हुए बड़े नोटों को चलन से बाहर करने का एक आदेश सरकार को पारित कर देना चाहिए। साथ में जिन लोगों के पास अभी 500 और 1,000 आदि के बड़े नोट हैं, यदि उनके पास 5 से 10 लाख रुपए तक कोई भी एक राशि निर्धारित कर देनी चाहिए, उतनी राशि के उनको छोटे नोट दे देने चाहिए तथा जिन लोगों के पास 5 से 10 लाख रुपए से अधिक काला धन जमा है उनको 5 से 10 प्रतिशत या अन्य कोई भी न्यायसंगत एक निर्धारित कर लगाकर सामने लाना चाहिए। वरिष्ठ अर्थशास्त्री बजरंगलाल गुप्त अपने लेख ‘अनर्थकारी अर्थनीतियों के परिवर्तन से ही होगा भारत का कल्याण ’ में कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाते हुए कहते हैं, ‘‘स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा और स्वप्न यह भी था कि स्वतंत्रता के बाद हम इस देश को फिर सुखी, संपन्न और स्वावलंबी अर्थव्यवस्था वाले राष्ट्र के रूप में खड़ा करेंगे। अब प्रश्न यह खड़ा होता है कि स्वतंत्रता के इन 63 वर्ष में इस स्वप्न को कहां तक पूरा कर पाए।’’
देवेंद्र स्वरूप अपने लेख ‘अर्थ पर अनर्थ हावी क्यों’ में अर्थतंत्र के विरोधाभासों की तरफ ध्यान खींचते हैं।  वे कहते हैं, ‘‘सभ्यता के प्रवाह की गति इतनी तेज है कि हम लाख हाथ-पांव मारने पर भी उसमें बहे जा रहे हैं। गांवों की आज स्थिति क्या है? शहरी जीवन की सुख-सुविधाएं पाने के लिए वे छटपटा रहे हैं। उस नरक को ही स्वर्ग समझकर वे उसकी ओर दौड़े चले जा रहे हैं। वहां नौकरियां खोज रहे हैं, अच्छी नौकरी की प्रतीक्षा में घरेलू मजदूरी कर रहे हैं, झुग्गी झोपड़ पट्टियों में अभावग्रस्त कष्टमय जीवन बिता रहे हैं। समाज सुधारकों द्वारा इन बस्तियों को खत्म करने के प्रयत्नों के बाद भी उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। जो गांवों में रह रहे हैं वे शहरी जीवन की सब नियामतों को गांव में ले आना चाहते हैं।’’
रंग दे बसंती चोला
किसी शायर ने कहा था, ‘‘प्रेरणा शहीदों से अगर हम नहीं लेंगे तो आजादी ढलती हुई सांझ बन जाएगी।’’ ऐसे शहीदों में से एक थे शहीद भगत सिंह। वे विश्व के उन वीर क्रांतिकारियों की परंपरा में से थे जिन्होंने राष्ट्रीय चेतना को जगाया। इसलिए उन्हें क्रांति की आत्मा का प्रतीक कहा जाता है। क्रांति उनके जीवन के रोम-रोम में बसी थी। वे ऐसे क्रांतिकारी थे जिनका मानना था क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। ऐसे क्रांतिकारी पर पाञ्चजन्य ने ‘रंग दे बसंती चोला’ शीर्षक से पूरा विशेषांक निकाला था। यह अंक भगत सिंह के बहुमुखी व्यक्तित्व से हमें रू-ब-रू कराता है। उनके बारे में फैलाई जा रही गलतफहमियों को दूर कर उनके असली व्यक्तित्व को सामने लाता है। ‘सरदार भगत सिंह एक असाधारण योगी क्रांतिकारी’ लेख में डॉ. सतीश चंद्र मित्तल उनके जीवन के विविध पहलुओं से साक्षात्कार कराते हैं, ‘‘वे एक निर्भय क्रांतिकारी के साथ एक प्रबुद्ध विचारक, गहन अध्ययनकर्ता, प्रगतिशील चिंतक तथा अद्वितीय लेखक थे। उनके जीवन में न विराम था, न विश्राम था, बल्कि उनके ध्येयवादी जीवन में था संघर्ष, सतत संघर्ष एक कठोर संघर्ष। जन्म घुट्टी में क्रांति, संस्कारों में क्रांति, विचारों में क्रांति, भविष्य के प्रति क्रांति, अध्ययन का विषय क्रांतिकारी साहित्य था।’’
कुछ तथाकथित वामपंथी विद्वानों ने उन्हें मार्र्क्सवादी विचारधारा का पोषक ही नहीं अपितु एक वास्तविक कम्युनिस्ट भी घोषित किया है। मित्तल अपने लेख में स्पष्ट करते हैं, ‘‘भगत सिंह के जीवन से स्पष्ट है उनकी मित्र मण्डली में शामिल प्रसिद्ध सभी क्रांतिकारियों का भारतीय कम्युनिस्टों से कोई संबंध नहीं था। स्वयं भगत सिंह का किसी चोटी के भारतीय या विदेशी मार्क्सवादी से न संपर्क आया था और न ही कोई पत्र व्यवहार था। कानपुर में कम्युनिस्ट पार्टी का प्रथम अधिवेशन होते हुए भी उन्होंने भाग न लिया था, न ही कोई रुचि दिखाई थी। नौजवान सभा के प्रारंभ में वे सचिव बने थे, राष्ट्रवादी क्रांतिकारी ही प्रमुखत: थे। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कम्युनिस्टों पर जो तीन मुकदमे चलाए, संभवत: भगत सिंह को उनमें जरा भी रुचि न थी। वे अनेक गुणों की खान थे जिनमें देशभक्ति, आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय, एकत्व का भाव कूट-कूटकर भरे थे। अत: भगत सिंह को किसी विशिष्ट विचारधारा से बांधना उनके व्यक्तित्व को कमतर करके देखने जैसा होगा।’’ इस लेख में वे महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार का भगत सिंह से पहले से ही संपर्क था। राजगुरु के लाहौर से भागने पर उनकी नागपुर में भूमिगत व्यवस्था करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। (ना.ह. पालकर, डॉ. हेडगेवार, पृ.901)
देवेंद्र स्वरूप ने ‘भगत सिंह की शहादत का अपहरण’ में कम्युनिस्टों की इस मनोवृत्ति पर प्रहार किया है- ‘‘भारतीय कम्युनिस्ट भगत सिंह की शहादत को पूरे राष्ट्र की धरोहर बनने देना नहीं चाहते। उसका अपहरण कर उस पर अपना एकाधिकार जमाना चाहते हैं। लेकिन इस समय भारत में मार्क्सवाद बिखराव और वैचारिक संकट के जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें प्रत्येक टुकड़ा अपने को ही असली मार्र्क्सवादी और असली कम्युनिस्ट कहकर भगत सिंह पर अपने मार्र्क्सवाद का रंग चढ़ाने की कोशिश में लगा है।’’ इस सवाल का जवाब दैनिक प्रताप के संपादक चंद्रमोहन अपने लेख ‘क्यों शहीद होना चाहते थे भगत सिंह?’ में देते हैं। वे कहते हैं, ‘‘अपनी शहादत के द्वारा वे देश को रोमांचित करना चाहते थे, एक सोई हुई कौम को जागृत करना चाहते थे। …और उनका वह लक्ष्य खूबसूरती से पूरा हुआ।’’ ‘भगत सिंह के जीवन और हौतात्म्य का संदेश’ लेख में- विजय कहते हैं- जुल्म के खिलाफ बागी बनो।
वामपंथ
1996 में गणतंत्र दिवस का विशेषांक भारत के वामपंथ पर केंद्रित था। यह विशेषांक अपनी भाषा और तेवर दोनों के कारण यादगार रहा। कुछ ऐसे निशाना बनाया गया था वामपंथ को। देखिए एक बानगी, ‘पहले वे सठिया जाते थे अब कुर्सिया जाते हैं।’ ‘दोस्त मेरे भारत में वामपंथ सिद्धांत प्रधान आंदोलन नहीं कुर्सी प्रधान आंदोलन है।’ ‘इधर कुछ कम्युनिस्ट हंसिये पर से हथौड़ा हटाकर चमचा रख रहे हैं और सत्ता की खीर का स्वाद चख रहे हैं।’ रा.स्व.संघ के सर कार्यवाह कुप्.सी. सुदर्शन ने अपने बेबाक लेख में तीखा प्रहार करते हुए कहा है, ‘‘कम्युनिस्टों का चरित्र राष्टÑवाद विरोधी रहा है, क्योंकि उनकी दृष्टि में राष्टÑवाद एक बुर्जुआ विचार रहा है। जैसे इस्लाम और ईसाइयत राष्ट्रवाद को नहीं मानते ठीक वैसे ही कम्युनिस्ट भी नहीं मानते। और यही उनके पतन का एक प्रमुख कारण है।’’ पी.परमेश्वरन का कहना था, ‘‘राष्ट्र विरोधी, हिंदू विरोधी और मुस्लिम समर्थक रहा कम्युनिस्ट आंदोलन।’’ जाने-माने दिग्गज पत्रकार अरुण शौरी का कहना था, ‘‘केवल ढांचा बचा है। भीतर से खोखली हो चुकी हैं कम्युनिस्ट पार्टियां। कम्युनिस्ट खत्म तो हो चुके पर जाते-जाते भी ये देश का बहुत नुकसान करके जाएंगे।’’ देवेंद्र स्वरूप ने कम्युनिस्टों के बारे में कहा, ‘‘चाहे महात्मा गांधी हों या सुभाष चंद्र कम्युनिस्ट हर राष्ट्रवादी को गालियां देते रहे। उन्हें साम्राज्यवादी कुत्ता तक कहा।’’
पत्रकार राजनाथ सिंह का लेख ‘बैठूं तेरी गोद में, उखाडंू तेरी दाढ़ी’ खासा दिलचस्प है।  ब.ना. जोग ने इस हकीकत  की तरफ ध्यान दिलाया है- ‘‘कभी अंग्रेजों की तो कभी चीन की दलाली करते रहे कम्युनिस्ट।’’
2008 का गणतंत्र दिवस अंक गणतंत्र के तक्षकों पर केंद्रित था। राष्ट्र रक्षकों एवं सर्पीले तक्षकों के बीच गण-युद्ध लेख में तरुण विजय लिखते हैं, ‘‘यह युद्ध है भारत के रक्षकों और उन सर्पीले तक्षकों के बीच, जिन्होंने राष्ट्रीय विरासत, परंपरा और जनमन के सनातन स्वरूप पर विषघाती हमले किए हुए हैं। कभी वे उन नक्सली-माओवादी-कम्युनिस्ट आतंकवादियों के रूप में सामने आते हैं।’’ देवेंद्र स्वरूप अपने लेख ‘न नक्सली, न माओवादी, ये केवल हत्यावादी’ में कहते हैं, ‘‘हाथों में हथियार, आंखों में बदले की आग और निशाने पर दुश्मन। दुश्मन कोई भी हो सकता है।
समाज में रसूख रखने वाले और सरकार चलाने वाले भी। युवाओं की इस जमात को नफरत का पाठ पढ़ाया जा रहा है। एक ऐसा पाठ जो उन्हें खतरनाक रास्ते पर ले जाएगा और उस सफर की मंजिल होगी किसी की मौत, किसी की तबाही। तबाही की तालीम का ऐसा नजारा झारखण्ड, बिहार, छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश के जंगलों में साफ देखा जा सकता है।’’
वे लिखते हैं, ‘‘अपने आंखों देखे सच के आधार पर एक टेलीविजन पत्रकार का निष्कर्ष है, दरअसल नक्सली आंदोलन में भटकाव साफ दिखता है या यूं कहें कि यह आंदोलन पूरी तरह भटक गया है। न कोई आदर्श है, न कोई कानून। ये रेलवे ट्रैक उड़ाते हैं माओ के नाम पर, थाने और पुलिस लेनिन के नाम पर और लेवी वसूलते हैं मार्क्स के नाम पर। क्या तबाही किसी भी क्रांति की दस्तक हो सकती है? … जो दिखा, उससे तो यही समझ में आता है कि नक्सलवाद के नाम पर आज जो कुछ भी हो रहा है उसमें आंदोलन जैसी कोई चीज नहीं रह गई है।’’ सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रहे प्रकाश सिंह लिखते हैं, ‘‘हाल में प्रधानमंत्री द्वारा नक्सलवाद को एक वायरस बताना और इसे जिहादी आतंकवाद से भी बड़ी चुनौती बताना बहुत हल्के स्तर की बात है। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री को कोई बहका रहा है। इतने ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति के मुंह से इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना बयान आना चिन्ताजनक है। मेरे अनुसार सबसे बड़ा संकट इस्लामी आतंकवाद है। नक्सल समस्या तो हमारी गलत नीतियों, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, सुशासन की अनुपस्थिति का नतीजा है।’’
विशेषांक में आंध्र, बिहार, झारखंड, ओडिशा आदि राज्यों में तेजी से फैलते नक्सलवादी आतंक की चुनौती का जायजा लिया गया है। एक रपट में कहा गया है सरकार के पास नक्सलवाद से मुकाबले के लिए नीति है पर नीयत नहीं। 40 साल में यू बढ़ती गई नक्सल समस्या। लेख काफी चौंकाने वाला है। इसी तरह रवींद्रनाथ का लेख ‘नक्सली चला रहे हैं बंदूक, सरकार चला रही है जुबान’ नई जानकारियां देता है।
डॉ. आंबेडकर पर विशेषांक
डॉ. आंबेडकर की जन्मशताब्दी पर पाञ्चजन्य ने उनके जीवन की समग्रता को सामने रखने के लिए विशेष आयोजन किया था, वह था एक संग्रहणीय विशेषांक। इसके माध्यम से उनके जीवन के विविध आयामों को देखने का प्रयास किया गया था, ताकि उनकी सोच को पूरी तरह समझा जा सके। संपादक हितेश शंकर ने इस बात को रेखांकित किया है, ‘‘कुछ लोग डॉ. आंबेडकर को सिर्फ तत्कालीन अछूत वर्ग का क्रांतिकारी नेता सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। यह बाबा साहेब की विराट और सर्वसमावेशी दृष्टि को संकीर्ण दायरे में बांधने का कुंठित प्रयास है। यह उस व्यक्ति के साथ सरासर अन्याय है जिसने सामाजिक विषमताओं का दंश झेलने के बावजूद इस समाज की सामूहिक शक्ति को पहचाना और सबसे राष्ट्रहित में एक रहने का आह्वान किया। व्यष्टि कैसे समष्टि में अपना जीवन होम कर सकता है। इस बात की तपमय झांकी है डॉ. आंबेडकर का तपमय जीवन।’’
रा.स्व.संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने अपने लेख ‘एक नाम हजार आयाम’ में बाबा साहेब के जीवन के विविध आयामों को रेखांकित किया है। डॉ. नरेंद्र जाधव बाबा साहेब के जीवन का एक अनूठा पहलू सामने लाते हैं। वे कहते हैं, ‘‘हम केवल 150 साल तक गुलाम रहे, नेहरू की यह मान्यता, बाबा साहेब को स्वीकार नहीं थी। वे मानते थे कि भारत शताब्दियों बाद स्वाधीन हुआ है। और इस स्वराज्य की रक्षा हर नागरिक का प्रथम कर्तव्य है। इस राष्ट्रहितकारी सोच के साथ समाज का नेतृत्व करते डॉ. आंबेडकर इस देश के रक्षा कवच प्रतीत होते हैं।’’ ‘मायावी आंबेडकर भक्त’ लेख में रमेश पतंगे कहते हैं, ‘‘मायावी आंबेडकर भक्त अनेक कारणों से खतरनाक होते हैं। उनका सार्वजनिक चेहरा दलित शोषित के उत्थान का होता है। और असली चेहरा हिंदू समाज में आग का बवंडर खड़ा करने वाला होता है।’’ किशोर मकवाणा का लेख ‘जिहादी मानसिकता और डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर’ बहुत विस्तार से बताता है कि पूरे विश्व में फैले इस्लामी कट्टरवाद का सही प्रेक्षण बाबा साहंब ने 75 वर्ष पूर्व कर लिया था। उन्होंने जिस निर्भीकता से हिंदुओं की रुढ़िवादिता और छुआछूत का विरोध किया वैसे ही मुस्लिम समुदाय की मजहबी कट्टरत से प्रेरित राजनीति का भी विरोध किया। मूलचंद राणा के लेख ‘उठाया सौ टके का सवाल’ में इस तथ्य को सामने लाया गया है कि बाबा साहेब का मूल्यांकन करते समय इस तथ्य को अनदेखा कर दिया जाता है कि वे भारत के शुरुआती आर्थिक चिंतकों में से एक थे, जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था के कई पक्षों पर मौलिक और सार्थक चिंतन प्रस्तुत किया। कुल मिलाकर यह अंक संग्रहणीय अंक है।
रा.स्व.संघ के सह-सरकार्यवाह श्री भागैया का लेख ‘अनुपम राष्ट्रभक्त’ अपने आप में अनुपम है। यह लेख बाबा साहेब की प्रखर राष्ट्रवादी सोच को रेखांकित करता है। वे मानते थे कि समता, स्वतंत्रता, बंधुता के आधार पर लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा हो सकती है। इसमें समता और स्वतंत्रता दोनों की रक्षा के लिए बंधुता अत्यंत आधारभूत है। आज बंधुता के आधार पर ही संपूर्ण समाज को संगठित किया जा सकता है और स्वतंत्रता की रक्षा की जा सकती है। स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बंधुता अनिवार्य है। स्वयं अध्यापक रहे बाबा साहेब  ने अपने अनुयायियों को एक ही मूलमंत्र दिया था शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो। इस मूलमंत्र में शिक्षा का प्रथम स्थान है।
विभाजन का विषफल -आंतकवाद
वर्ष 2002 में ‘विभाजन का विषफल आतंकवाद’ विषय पर एक विशेष अंक प्रकाशित हुआ था। यह अंक विभाजन और आतंकवाद पर एक अलग दृष्टि देता है। देवेंद्र स्वरूप अपने लेख ‘मोहम्मद बिन कासिम से मुशर्रफ तक’ में लिखते हैं, ‘‘मुशर्रफ की पूरी सोच उस मजहबी विचारधारा से बंधी हुई है जिसने पाकिस्तान को जन्म दिया, उसी विचारधारा के अगले कदम के रूप में वे कश्मीर की मुस्लिम जनसंख्या के साथ खून का रिश्ता देखते हैं। जवाहरलाल नेहरू जैसे भारतीय नेताओं की सोच थी कि मुस्लिम बहुसंख्या वाले जम्मू-कश्मीर राज्य को हम विश्व के समक्ष भारतीय राष्ट्रवाद के बहुउपासनात्मक पंथनिरपेक्ष चरित्र के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकेंगे। उन्हें विश्वास था कि भारतीय मुसलमान भारतीय राष्ट्रवाद के साथ पूरी तरह समरस हो जाएंगे। किन्तु मुशर्रफ को यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है। वे द्विराष्ट्रवाद की विचारधारा पर अडिग हैं और इसलिए कश्मीर में मुस्लिम पृथकतावाद और आतंकवाद को वे आजादी की लड़ाई के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि यह लड़ाई कश्मीरी मुसलमानों की अपनी लड़ाई है। और उसकी मदद करना पाकिस्तान का मजहबी फर्ज है।’’ विशेषांक में उदार लेखक रफीक जकारिया (हिन्दुस्तान टाइम्स, 13 जनवरी) विभाजन का ठीकरा पूरी तरह मि. जिन्ना की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के सर फोड़ देते हैं। वे यह आभास पैदा करना चाहते हैं कि यदि मि. जिन्ना पैदा न होते तो मानो भारत का विभाजन ही न होता। वे इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देते कि जब तक जिन्ना पृथक मताधिकार का विरोध कर रहे थे, राजनीति में मजहब के हस्तक्षेप को अनुचित मानते थे, राष्ट्रवाद की भाषा बोल रहे थे तब तक मुस्लिम समाज ने उन्हें अपना नेता क्यों नहीं माना? और जब उन्होंने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए मुस्लिम कट्टरतावाद और पृथकतावाद को अपना मंच बनाया तो वे रातोंरात कायदे आजम क्यों बन गए? मुस्लिम समाज ने वेशभूषा, भाषा, विद्वता और दिनचर्या में नमाजी मुसलमान मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को ठुकराकर सुअर का मांस खाने वाले, जीवन शैली में अंग्रेज, कुरान और नमाज से दूर जिन्ना को अपने सर पर क्यों बैठाया? जकारिया जिन्ना को गालियां देते हैं क्योंकि आखिर में उन्होंने इस्लाम का रास्ता पकड़ा जबकि इस्लाम और उसके स्रोतों के प्रति अंधभक्ति का प्रदर्शन करते हैं। ईसाई समाज को यह श्रेय देना चाहिए कि उन्होंने ईसा और बाइबिल की निर्भीक समीक्षा की है। पर इस्लाम में अभी यह संभव नहीं दीखता। क्या इसके बिना इस्लाम शांति का मार्ग बन सकेगा, यही आज का यक्ष प्रश्न है। (16 जनवरी, 2002)
भारत व पाकिस्तान में फिर से दबी जुबान यह चर्चा चल पड़ी है-क्या बंटवारा एक भूल थी? लेख में कुलदीप नैयर विभाजन के बारे में अपने तर्क लेकर आते हैं। वे दलील देते हैं-सच पूछो तो भारत-विभाजन और पाकिस्तान-निर्माण से सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों को हुआ। उन्होंने अपना बहुत कुछ गंवाया। वे मुसलमान जो कभी एक ही देश का हिस्सा थे, तीन देशों में बंट गए। पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश। अगर ये सब एक ही देश में रहते तो एक लोकतंत्र में ये कितनी बड़ी शक्ति बनते। अब मुसलमान इस भूल को स्वीकारने लगे हैं। भारत में खुले रूप में तो पाकिस्तान में दबी जुबान से हैं। कोई बात होती है तो लोग झट से कह देते हैं, ये मुसलमान हैं, इन्होंने ही बंटवारा कराया। पचास वर्ष बीत जाने के बाद भी बंटवारे के जिम्मेदार लोगों और जिनका इसमें कोई हाथ नहीं था उनके बच्चों को यह बात सुननी पड़ती है प्रख्यात सतंभकार प्रकाश भाटिया लिखते हैं, ‘विभाजन का कारण था-कांग्रेस का ढोंग और जिन्ना की जिद।’ दैनिक जंग के संपादक महमूद शाम लिखते हैं, ‘‘पाकिस्तान की तमाम सियासी जमातें मानती हैं कि यह कायदे-आजम का पाकिस्तान नहीं है।’’ इस्लामाबाद से प्रकाशित औसाफ के संपादक हामिद मीर ने कहा, ‘‘हां! झगड़े की जड़ में मजहब ही है!’’ ‘‘विभाजन न होता तो हम विश्व की आर्थिक महाशक्ति होते’’, यह टिप्पणी की है स्वदेशी जागरण मंच के सर्वपल्ली गुरुमूर्ति ने।
समरसता अंक
श्रीगुरुजी जन्मशताब्दी समारोह के अवसर पर 2006 में निकाला गया था-समरसता अंक। संपादकीय ‘आपका व्यवहार और जीवन दृष्टि ही अंतिम प्रमाण है’ में तरुण विजय लिखते हैं, ‘‘हमारे खून में, हमारी रगों में, हमारी मानसिकता में इतने गहरे बैठ गए हैं ये भेद कि सार्वजनिक मंच की आवश्यकता के अनुसार माइक पर हम भले ही समरसता की बात करें या उसके बारे में पुस्तकें लिख दें, लेकिन धरातल पर तो उसका कोई अंश उतरता नहीं। समरसता की पुस्तकें कर्मकांड के नाते सिर्फ उन्हीं वर्गों में लिखीं और पढ़ी जाती हैं जो केवल अपनी ही जाति के अहंकारी दायरों में विचरण करते हैं।’’ इस विशेषांक में डॉ. कृष्णगोपाल का एक लेख है, जिसका शीर्षक है-‘सामाजिक विषमता के विरुद्ध भारतीय संत परंपरा’। इसमें वे कहते हैं, ‘‘विगत 1,000 वर्ष में 1,000 से अधिक जातियों का निर्माण हो गया। अनेक प्रकार के जातिगत भेदभावों ने भी जन्म ले लिया और स्पृश्य-अस्पृश्य भाव ने सामाजिक विकृतियों को वीभत्स स्वरूप दे दिया। यह एक कठिन काल था। एक ओर तो बाहरी आक्रमणकारियों से समाज को बचाना और दूसरी ओर सामाजिक विकृतियों के विरुद्ध संघर्ष करना।
यह वह समय था जब भारत के अंदर धार्मिक महापुरुषों की एक महान परंपरा का उदय संपूर्ण देश में एक साथ हुआ। देश के सभी प्रांतों में ये संत भक्ति-भाव लेकर खड़े हो गए और उन्होंने किसी भी प्रकार के सामाजिक भेदभाव को मानने से इनकार कर दिया। इन आध्यात्मिक महापुरुषों ने संपूर्ण समाज में भक्तिभाव का जागरण कर उसे संगठित किया। मुस्लिम आक्रमणकारियों के विरुद्ध समाज को एकजुट कर स्वराज्य की स्थापना का अति महत्वपूर्ण कार्य इन संतों ने किस प्रकार किया, यह इस देश की अनोखी घटना थी।’’ ‘श्रीगुरुजी का चिंतन-समरस समाज से होगा भारत पुनरोदय’ लेख में मुरलीधर राव कहते हैं, ‘‘एकात्म, समरस समाज की उनकी धारणा गहरी आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण थी। श्री गुरुजी समाज को भगवान का ही एक स्वरूप मानते थे। ईश्वर के समाज स्वरूप को श्री गुरुजी ने ‘विराट समाज पुरुष’ कहा। उनके अनुसार सभी मानवों के अंदर की चेतना एक ही है, हमारा चिरंतन अस्तित्व भी एक ही है। समाज रूपी विराट पुरुष और उसमें व्याप्त चिरंतन अस्तित्व की अनुभूति के भारतीय चिंतन को गहराई से समझ कर ही श्री गुरुजी ने एकात्म, एकरस, समरस हिंदू समाज की पुनस्स्थापना पर जोर दिया था।’’
 देवेंद्र स्वरूप ने  ‘समरसता के दो महारथी- बापू और श्रीगुरुजी ’ लेख में लिखा है, ‘‘वस्तुत: अस्पृश्यता निवारण एवं सामाजिक समरसता के प्रति गांधीजी और संघ की दृष्टि में यदि अंतर था तो मात्र इतना कि गांधी जी ने हरिजनोद्धार की घोषणा की थी, अलग से हरिजन सेवक संघ नामक संस्था का निर्माण किया था और अपने साप्ताहिक पत्र का नाम भी अंग्रेजी में ‘हरिजन’ और हिंदी में ‘हरिजन सेवक’ कर दिया था। जबकि संघ इस समस्या की कोई शाब्दिक चर्चा अथवा घोषणा किए  बिना उसे स्वयंसेवकों के आपसी व्यवहार का सहज  अंग बनाता जा रहा था, ‘भारत माता के प्रति पुत्र भाव ही स्वयंसेवकों को भ्रातृत्व में गूंथने का माध्यम    बन गया था।’ दलित, वंचित और उपेक्षित समुदायों और क्षेत्रों की विशेष चिंता करना और उनकी समस्याओं को देश के सामने लाना पाञ्चजन्य के शंखनाद का अपरिहार्य हिस्सा रहा है। इसके तहत समय-समय पर ऐसे विशेषांक निकलते रहे जो इनकी समस्याओं पर केंद्रित हैं। उपेक्षित पूर्वांचल एक ऐसा ही क्षेत्र है। उसका हर राज्य अपने आप में एक समस्या बनता जा रहा है। 1990 में पाञ्चजन्य का स्वतंत्रता दिवस पर प्रकाशित ‘अपना पूर्वांचल’ विशेषांक  इस अंचल के सात राज्यों की समस्याओं को पुरजोर तरीके से उठाता है। उपेक्षित पूर्वांचल लेख में रा.स्व.संघ के तत्कामीन बौद्धिक प्रमुख श्री कुप््. सी. सुदर्शन लिखते हैं, ‘‘असम सहित पूर्वांचल की समस्या का यदि एक वाक्य में वर्णन करना हो वह वाक्य होगा- उत्तर पूर्वांचल में हिंदू अल्पमत में आ रहा है और इतिहास के पन्ने चिल्लाकर कह रहे हैं कि जिस भाग में हिंदू अल्पमत में आया वह या तो भारत से कट गया या उसके लिए सिरदर्द बन गया।’’ 1990 में चेतावनी अंक में कश्मीर और पूर्वांचल की समस्याओं को उठाया गया है। अंक में कश्मीर के बारे में बहुत सारी जानकारी है।

नव दधीचि अंक

प्राचीन काल में दधीचि ऋषि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियां  वज्र बनाने के लिए दी थीं। आज भी ऐसे दधीचियों की कमी नहीं है। संघ का आज जो देशव्यापी प्रसार है उसमें बहुत बड़ा योगदान उसके प्रचारकों का है। वे देश कार्य के लिए अपना जीवन देने वाले दधीचि ही हैं। यह भारत की तपोनिधि है। जैसा विशेषांक सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है संघ की प्रचारक परंपरा ऋषि जीवन का देश काल परिरस्थितियों के अनुसार किया गया आविष्कार है। ये प्रचारक शरीर का कण-कण संघ के जरिए देश कार्य में लगाए हुए हैं। इन प्रचारकों के प्रेरक जीवन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए     नव दधीचि अंक प्रकाशित किया गया था। पाञ्चजन्य की यह परंपरा    उसके सुधी पाठकों और      विद्वान लेखकों के बल पर अभी भी  जारी है।        ल्ल                

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