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मेरा… मेरा… और केवल मेरा। अब ये शब्द अधिसंख्य परिवारों में सुनाई देता है। कारण है संयुक्त सोच-संयुक्त रहन-सहन का अभाव। और परिणाम हुआ खण्ड खण्ड होता परिवार। मतलब एक संयुक्त राष्टÑ के लिए जिस ऊर्जा की जरूरत है उसका हृास। इसी विषय पर पं. दीनदयाल उपाध्याय का यह लेख पाञ्चजन्य के 21 मार्च 1993 के अंक में प्रकाशित हुआ था जो आज भी प्रासंगिक है। इसीलिए यहां हम इसे फिर से प्रकाशित कर रहे हैं
दीनदयाल उपाध्याय
जब तक अधोमुखी बनी परिवार व्यवस्था उर्ध्वमुखी एवं राष्ट्रानुकूल नहीं बन जाती तब तक हमारी नाना समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। उल्टे नयी-नयी समस्याएं हमारे सम्मुख मुंहबाएं खड़ी होती जाएंगी। परिवार शब्द में केवल पति-पत्नी और उनकी संतान का ही समावेश नहीं होता। यह परिकल्पना इतनी सीमित नहीं है। पति और पत्नी का एक नाता होता है। किन्तु उनके साथ परिवार में भाई-बहन, माता-पिता, भाभी, चाचा, ताऊ, मामा, दादा-दादी, बहु, दामाद, ससुर आदि बीसियों नाते-रिश्ते भी होते हैं। एक ही मनुष्य को इनमें से अनेक नाते निभाने पड़ते हैं और तद्नुसार व्यवहार करना पड़ता है। ये सब आप्तजन या परिवारजन होते हैं, उनका अपना एक समष्टि जीवन होता है।
इस समष्टि-जीवन में स्नेह, सहयोग, परस्पर पूरकता, दुर्बल घटकों के प्रति आत्मीय सहानुभूति, एक दूसरे के लिए कुछ त्याग करने की प्रवृत्ति, एक दूसरे के सुख-दुखों में सहभागी होने की स्वाभाविक तत्परता, अतिथि सत्कार की भावना आदि नाना गुणों का विकास अपेक्षित होता है। परिवार के लोग इन गुणों से युक्त हों तो परिवार के बाहर के समाज जीवन पर भी उनका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। हमारे यहां परिवार-व्यवस्था को सामाजिक सुरक्षा योजना का ही एक भाग माना जाता है। मनुष्य अपंग हो गया, रोगग्रस्त हो गया, अस्थायी रूप से सही बेकार हो गया अथवा कोई अनपेक्षित विपदा आ गयी तो उस परिवार का प्रमुख आधार रहता है। बुढ़ापे में तो उसे नयी पीढ़ी पर ही निर्भर रहना पड़ता है। आवश्यक संस्कारों एवं गुण संपदा के बिना यह सब नहीं हो सकता।
अत: समष्टि जीवन की सुव्यवस्थित रचना में परिवार-व्यवस्था की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। द्रव्यार्जन, कामतृप्ति, स्नेहाभिव्यक्ति की आंतरिक अभिलाषा, अपनेपन की सुखद भावना, व्यक्ति विकास आदि बातें पारिवारिक जीवन का प्राथमिक आधार होती हैं। इस घटक को नष्ट कर केवल शासन और प्रजा सम्बंध को शेष रखने का एक भी प्रयास आज तक कभी सफल नहीं रहा। ऐसा ही एक लक्षणीय प्रयास रूस में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद किया गया। मनुष्य स्वभाव के सर्वथा विपरीत होने के कारण वह पूर्णत: असफल रहा। कुछ पाश्चात्य देशों में घड़ी का लंबक दूसरे ही दौर तक ले जाने का प्रयास हो रहा है। विचारकों को वह भी समाज की सुख-शांति को ढहा देने वाला दिखाई दे रहा है। और इसलिए चिंताजनक है। कहना न होगा कि व्यक्ति स्वातंत्र्य की अतिरेकी, अव्यवहार्य एक अशास्त्रीय परिकल्पना से उत्पन्न वासना की तृप्ति के पीछे दौड़ते रहने वाली ही यह प्रवृत्ति है। जिस समय जो बात सुखकारी प्रतीत हो, उसे करते जाना इस प्रवृत्ति का मुख्य सूत्र है। संयम, सहिष्णुता, त्याग का वहां कोई मूल्य नहीं होता। व्यक्तिगत स्तर पर वासना- विकारों का ही बोलबाला होता है। सुसंस्करायुक्त बालसंगोपन की अनास्था, परिवार में रुग्ण या अपंग हो गए सदस्यों की निराधार अवस्था, बड़े-बूढ़ों की देखभाल करने में आनाकानी आदि सामाजिक प्रश्न इसी में से उभरे हैैं। हो सकता है कि व्यक्तिगत स्तर पर सम्बद्ध लोगों को जीवन का आनन्द लूटने का संतोष शायद मिलता हो। किन्तु इसे जीवन की सुसंस्कृत या सामाजिक स्थिरता के लिए पोषक कदापि नहीं माना जा सकता। यह बोध जागने तथा मानसिक तनाव के दुष्परिणाम का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर भी पड़ने के कारण पश्चिम के सामाजिक विचारक अब सुखी एवं सुस्थिर परिवार जीवन की पुनर्रचना (रिहेबिलिटेशन आॅफ द फैमिली) की आवश्यकता का प्रतिपादन करने लगे हैं।
सामाजिक दायित्वहीनता
पुराने समय में कृषि व्यवसाय के कारण संयुक्त परिवार प्रणाली भली-भांति चली थी और घर-घर में अनेकों सांस्कृतिक परम्पराएं टिकी रही थीं। अब शिक्षण, व्यवसाय, बढ़ता नगरीकरण, आवास की अपर्याप्तता, आय की विषमता आदि कारणों से अलग घर बनाने की प्रथा अधिक सुविधापूर्ण लगने लगी है। इससे निस्तार का अभी कोई उपाय नहीं है। फिर भी हमारे यहां बाह्य परिस्थिति के प्रभाव से परिवार-व्यवस्था में आए कुछ परिवर्तनों को अपरिहार्य मानना चाहिए। उदाहरण के लिए, पहले जैसी संयुक्त परिवार-व्यवस्था अब संभव नहीं है।
आज हम इस परिणाम को देख रहे हैं। समष्टि की दृष्टि से इससे भी बड़ी कमी यह आने लगी है कि द्रव्यार्जन एवं अपने सीमित परिवार के परे अन्य किसी काम पर ध्यान देने, उसके लिए समय, पैसा और श्रेय देने की भावना गृहस्थों तथा गृहणियों में समाप्त सी होने लगी है। परिणामत: सामाजिक कार्य के लिए लोग नहीं मिल पा रहे हैं। ‘भोग’ ही सांकेतिक शब्द बन गया है। वास्तव में गृहस्थाश्रम-धर्म की यह विडम्बना ही है। इस स्थिति से उबरना हो तो यह भावना जगानी पड़ेगी कि राष्ट्र बड़ा है, उसके कल्याण को वरीयता देनी चाहिए तथा अपने पारिवारिक जीवन में राष्ट्रानुकूल संस्कार होते रहने चाहिए। यह दृष्टि देने के लिए कुछ समय तक संगठित प्रयास करने पड़ेंगे। परिवारों, पाठशालाओं तथा स्वयंसेवी संस्थाओं में यही काम करना पड़ेगा। हिन्दू राष्ट्र के पुनर्निर्माण की इस प्रक्रिया को ठीक से ध्यान में लेना चाहिए।
‘‘वैचारिक विरोधी दुश्मन नहीं होते’’
घटना उस समय की है जब ‘पाञ्चजन्य’ लखनऊ से प्रकाशित होता था और उसके संपादक थे श्री यादवराव देशमुख। संभवत: नवम्बर 1963 के प्रथम सप्ताह में जो पाञ्चजन्य निकला था उसके मुखपृष्ठ पर पं. वचनेश त्रिपाठी की एक कविता छपी थी। कविता तत्कालीन प्रधानामंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू पर केन्द्रित थी जिनका अगले सप्ताह जन्म दिवस था। कविता का शीर्षक था ‘सौ बरस की उमर हो तेरी जवाहर लाल’। व्यंग्य शैली में लिखी गई कविता में प्रधानमंत्री की कटु आलोचना की गई थी। जिस दिन अंक प्रकाशित हुआ था उसी दिन पं. दीनदयाल उपाध्याय लखनऊ आए थे।
हमारे मित्र और वरिष्ठ साथी श्री भानु प्रताप शुक्ल और मैं दीनदयाल जी से जब मिलने गए तो हमारे हाथ में ताजा अंक की प्रति भी थी। दीनदयाल जी ने अंक देखते ही पूछा ‘प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर ऐसी व्यंग्य कविता प्रकाशित करने का विचार मन में क्यों आया? किसी के जन्म दिवस पर अगर कोई अच्छी कविता छापना आपको पसंन्द नहीं था तो बिना कविता प्रकाशित किए भी तो अंक निकल सकता था।’ हम लोगों के पास उनके सवालों का कोई उत्तर नहीं था। बाद में दीनदयाल जी ने कहा— ‘प्रधानमंत्री हमारे विचारों के विरोधी हैं, लेकिन राजनीति में वैचारिक विरोधियों को दुश्मन मानकर व्यवहार करना सहिष्णुता और लोकतंत्र की मर्यादा के विरुद्ध है। हम प्रधानमंत्री नेहरू की नीतियों और आदर्शों से सहमत नहीं हैं। उनके व्यक्तिगत विरोधी नहीं हंै।’ लोकतंत्र में विरोध की मर्यादा का एक नया पाठ लेकर हम लोग लौटे थे।
अच्युतानंद मिश्र (पूर्व कुलपति, मा.च.प.सं. विश्वविद्यालय, भोपाल)










