अमर शहीद बिस्मिल, अशफाक और रोशन सिंह की स्मृति में विशेषसरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है ...
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अमर शहीद बिस्मिल, अशफाक और रोशन सिंह की स्मृति में विशेषसरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है …

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Dec 25, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 25 Dec 2017 11:11:10

काकोरी कांड के लिए अंग्रेजों ने 19 दिसंबर, 1927 को क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान और रोशन सिंह को फांसी पर लटका दिया था। देश की आजादी की खातिर इन क्रांतिकारियों के बलिदान को सदियों तक याद किया जाएगा और लोग उनसे प्रेरणा लेते रहेंगे

अमित त्यागी  

ऊमर शहीद अशफाक उल्लाह खान और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती ऐसा विलक्षण उदाहरण है जिसकी इतिहास में कहीं और मिसाल मिलनी मुश्किल है। बिस्मिल आर्य समाजी थे। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले का आर्य समाज मंदिर उनकी बौद्धिक कर्मभूमि थी। दूसरी तरफ अशफाक पक्के मुसलमान थे। अशफाक बिस्मिल के साथ आर्य समाज मंदिर जाते थे और बिस्मिल को जीवनपर्यंत उन्होंने ‘राम भैया’ ही कहा। बिस्मिल भी अशफाक को अपना छोटा भाई मानते थे। ये दोनों शाहजहांपुर के थे। आज भी दोनों की दोस्ती शाहजहांपुर के लोगों को आपसी सद्भाव प्रेरित करती है।

काकोरी कांड का ऐतिहासिक महत्व
असहयोग आंदोलन की असफलता के कारण देश में हताशा का माहौल था। युवा चाहते थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध कुछ सक्रियता दिखाई जाए। ऐसे समय में बिस्मिल ने ‘हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संगठन’ नाम से एक क्रांतिकारी संगठन बनाया। इसके साथ चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्लाह खान, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, मन्मथनाथ गुप्त व शचीन्द्र नाथ सन्याल जैसे क्रांतिकारी जुड़े।  
गांधी जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस तब तक पूर्ण स्वतंत्रता की मांग के विचार से दूर थी। इन क्रांतिकारियों ने अपने संगठन के संविधान  में  ‘स्वतंत्र भारत में प्रजातंत्र की अवधारणा’ का स्पष्ट विचार प्रस्तुत करके अंग्रेजों को खुली चुनौती दी। अपने क्रांतिकारी कार्यों को अंजाम देने के लिए इन्हें धन की आवश्यकता पड़ी । इस धन को एकत्रित करने के लिए भी इन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। क्रांतिकारियों ने सत्ता को खुली चुनौती देते हुए ट्रेन में जा रहे सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई। योजनाबद्ध तरीके से 9 अगस्त, 1925 को काकोरी और आलमनगर (लखनऊ) के मध्य ट्रेन को रोका गया और 10 मिनट में ही पूरा खजाना लूट लिया गया।
इसके जरिए क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सत्ता को सीधी चुनौती दी थी। लूटे गए धन से क्रांतिकारियों ने संगठन का पुराना कर्ज निबटा दिया। हथियारों की खरीद के लिए 1,000 रुपए भेज दिए गए। बम आदि बनाने का प्रबंध कर लिया गया। क्रांतिकारियों के हौंसले पस्त करने के लिए 26 दिसंबर, 1925 की रात में कई जगह छापे मारे गए। शाहजहांपुर, बनारस, इलाहाबाद, कानपुर आदि स्थानों से क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी हुई। इन पर मुकदमा चलाया गया।  फांसी की सजा पाने वालों मे बिस्मिल, अशफाक, रोशन और राजेंद्र लाहिड़ी थे। शचीन्द्र नाथ सान्याल को आजीवन काला पानी और मन्मथनाथ गुप्त को 15 साल की सजा सुनाई गई। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य लोगों को भी सजा दी गई। बिस्मिल का सभी सम्मान करते थे और उनका अनुकरण भी करना चाहते थे। रोशन सिंह को अंग्रेजी कम आती थी और जैसे ही उन्हें ज्ञात हुआ कि बिस्मिल के साथ उन्हें भी फांसी हुई है तो वे खुशी से उछल पड़े और चिल्लाए, ‘‘ओ जज के बच्चे, देख बिस्मिल के साथ मुझे भी फांसी हुई है।’’ और फिर बिस्मिल से बोले, ‘‘पंडित जी अकेले ही जाना चाहते हो, ये ठाकुर पीछा छोड़ने वाला नहीं है। हर जगह तुम्हारे साथ रहेगा।’’

 अटूट प्यार  
अशफाक और बिस्मिल की दोस्ती के किस्से बहुत मशहूर हैं। दोनों में देशभक्ति का इतना जबरदस्त जज्बा था कि उनमें आपस में होड़-सी लगी रहती थी। दोनों ही बेहतरीन शायरी करते थे। एक दिन की घटना है। अशफाक आर्य समाज मंदिर, शाहजहांपुर में बिस्मिल के पास किसी काम से गए। बिस्मिल तो अक्सर आर्य समाज मंदिर में जाया ही करते थे। अपनी ही धुन में मगन अशफाक जिगर मुरादाबादी की एक गजल गुनगुना रहे थे जो कुछ यूं थी- ‘‘कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंजिल में है। जो तमन्ना दिल से निकली, फिर जो देखा दिल में है।’’ बिस्मिल ने जब यह गजल सुनी तो हौले से मुस्करा दिए। सकपकाए अशफाक ने पूछा, ‘‘राम भाई! मैंने मिसरा कुछ गलत कह दिया है क्या?’’ इस पर बिस्मिल ने जवाब दिया, ‘‘नहीं मेरे कृष्ण कन्हैया! यह बात नहीं है। मैं जिगर साहब की बहुत इज्जत करता हूँ, मगर उन्होंने मिर्जा गालिब की पुरानी जमीन पर शेर कहकर कौन-सा बड़ा तीर मार लिया। कोई नई रंगत देते तो मैं भी इरशाद कहता।’’ अशफाक को बिस्मिल की यह बात थोड़ी अजीब लगी और उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा, ‘‘तो राम भाई! अब आप ही इसमें गिरह लगाइए। मैं भी मान जाऊंगा कि आपकी सोच जिगर और मिर्जा गालिब से अलग कुछ नई तरह की है।’’ उसी वक्त बिस्मिल ने कहा, ‘‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है?’’ इसी शेर को गाते-गाते आजादी के ये मतवाले फांसी के फंदे पर झूल गए। इसी दिन क्रांतिकारी रोशन सिंह को भी काकोरी कांड के लिए फांसी दी गई थी। ठाकुर साहब के नाम से अपने मित्रों में पुकारे जाने वाले रोशन सिंह एक दक्ष एवं अचूक निशानेबाज भी थे। 6 दिसंबर, 1927  को इलाहाबाद स्थित नैनी जेल से उन्होंने अपने एक मित्र को भावपूर्ण पत्र लिखा जिसका सार कुछ यूं था- ‘‘इस सप्ताह के भीतर ही फांसी होगी। आप मेरे लिए रंज हरगिज न करें। दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी नहीं रही। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों की होती है।’’ और फिर अपने पत्र की समाप्ति वे इस शेर के साथ करते हैं- ‘‘जिंदगी जिंदादिली को जान ए रोशन, वरना कितने मरे और पैदा हुए जाते हैं।’’   

शहीदों की धरती शाहजहांपुर
उत्तर प्रदेश का छोटा-सा जिला है शाहजहांपुर। इस जिले के तीन लाल अशफाक, बिस्मिल और रोशन ने देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर अपनी मातृभूमि का कर्ज अदा दिया । बिस्मिल को सात वर्ष की अवस्था में पिता के द्वारा घर पर हिंदी का ज्ञान दिया गया एवं उर्दू सीखने के लिए एक मौलवी के पास भेजा जाने लगा। वे पढ़ाई में गंभीर थे, लेकिन कुछ उद्दंड भी थे। आर्य समाज से जुड़ने के कारण उनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल गया। उस समय की राजनीतिक घटनाओं से प्रभावित होकर वे मातृवेदी नामक संगठन से जुड़ गए। इस दौरान बिस्मिल ने एक किताब भी लिखी जिसका नाम था ‘अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली’। सरकार द्वारा इसे जब्त कर लिया गया। मातृवेदी संगठन की गतिविधियों के कारण पुलिस उनके पीछे लग गई और वे अपनी पैतृक भूमि पर खेती करने लगे। किंतु एक राष्ट्रभक्त में देशभक्ति का जज्बा हिलोरें मार रहा था। असहयोग आंदोलन की विफलता ने उन्हें प्रेरित किया कि अब कुछ नए तरीके से काम करना होगा।
गद्दारों ने पकड़वाया
ये क्रांतिकारी गद्दारों के कारण अंग्रेजों की गिरफ्त में आए थे। बनवारी लाल एवं इंदुभूषण मित्र नाम के  दो गद्दारों ने धन के लालच में इनकी मुखबिरी की थी। बनवारी लाल लालच में आकर पुलिस का मुखबिर बना और दस्तावेजों के अनुसार उस समय वह शाहजहांपुर नगर कांग्रेस कमेटी का निर्वाचित मंत्री था। पुलिस ने उसे सरकारी गवाह बनाया। दोनों को बाद में पांच-पांच साल की सजा हुई। इंदुभूषण को बाद में अपनी मुखबिरी पर पश्चाताप था, किंतु बनवारी लाल के साथ ऐसा नहीं था।

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