राज्य/तेलंगाना : राजनीति की बिसात तुष्टीकरण के मोहरे
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राज्य/तेलंगाना : राजनीति की बिसात तुष्टीकरण के मोहरे

Written byArchiveArchive
Dec 18, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 18 Dec 2017 11:11:10


मुसलमानों को तुष्ट करने के मामले में अभी तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का ही नाम आता था, लेकिन तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर तो इस मामले में ‘आदर्श’ बन गए हैं। मुस्लिम वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए वे दोनों हाथों से सरकारी खजाना लुटा रहे

नागराज राव

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव मुसलमानों को खुश करने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ रहे। शिक्षण संस्थानों से लेकर सरकारी नौकरी, सरकार की सभी कल्याणकारी योजनाओं में मुसलमानों को आरक्षण सहित उन्हें हर तरह से फायदा पहुंचाया जा रहा है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री ने राज्य में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की भी घोषणा की है। यानी तेलुगु के बाद उर्दू में भी सरकारी कामकाज होगा। इससे पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि हिंदी को दूसरी आधिकारिक भाषा होने का गौरव प्राप्त होगा, लेकिन राव ने ऐसा नहीं किया। साफ है कि वे राजनीतिक पैंतरेबाजी के तहत मुस्लिम तुष्टीकरण का घातक खेल खेल रहे हैं। उन्हें डर है कि 2019 में होने वाले चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक कहीं कांग्रेस की ओर खिसक गया तो सत्ता पर काबिज रहने के उनके मंसूबे धरे न रह जाएं। इसलिए वे मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं।

मुसलमानों के लिए आईटी गलियारा
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राव सरकार तेलंगाना में मुस्लिम युवाओं के लिए एक अलग आईटी गलियारा और औद्योगिक परिक्षेत्र बनाएगी, जहां केवल मुसलमानों को ही रोजगार मिलेगा। इतना ही नहीं, राज्य सरकार की योजना 6,723 करोड़ रुपये की लागत से 120 तेलंगाना अल्पसंख्यक आवासीय शैक्षिक संस्थान बनाने की भी है जिसमें उर्दू में शिक्षा दी जाएगी। राज्य में सरकारी नौकरी पाने वाले मुसलमानों को शिक्षा देने के लिए तेलंगाना अल्पसंख्यक अध्ययन मंडल का भी गठन किया जाएगा। साथ ही, सरकार ने उच्च शिक्षा के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के लिए मुस्लिम युवकों को 10 लाख रुपये देने का भी प्रावधान किया है। शिक्षा विभाग का दावा है कि सूबे के 1,561 मदरसों में करीब 1.31 लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं।

केसीआर हैदराबाद के आठवें निजाम की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वे एआईएमआईएम एजेंडे के बंधक हैं। मुस्लिम तुष्टीकरण कब तक चलेगा? क्या राज्य सरकार केवल इस्लाम को बढ़ावा नहीं दे रही है? सरकार कार्यालयों में तेलुगु लागू नहीं कर पा रही है। अचानक उर्दू से उसका प्रेम किसी के हित में नहीं है
—कृष्णा सागर, भाजपा प्रवक्ता,तेलंगााना

 

इमामों को मासिक वेतन
इसके अलावा, इस्लामिक कल्चरल सेंटर को शहरी इलाके में दस एकड़ जमीन दी जाएगी और 900 उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी। 66 उर्दू अधिकारियों को विभिन्न विभागों में तैनात किया जाएगा ताकि मुसलमान उर्दू में अपनी शिकायतें दे सकें। इतना ही नहीं, मस्जिदों के इमामों को भी प्रतिमाह 1,000 रुपये दिए जा रहे हैं। इस योजना से प्रदेशभर के 10,000 इमाम लाभान्वित हो रहे हैं। राव सरकार ने जुलाई 2015 में इस योजना की घोषणा की थी, जिसे अप्रैल 2016 में लागू किया गया। इतना ही नहीं, यह भुगतान योजना की घोषित तिथि से किया गया, यानी हर इमाम के खाते में 9,000 रुपये डाले गए। राज्य के उप मुख्यमंत्री मोहम्मद महमूद अली का कहना है, ‘‘इस योजना पर सरकार 12 करोड़ रुपये खर्च कर रही है, जिसे भविष्य में बढ़ाया भी जा सकता है। साथ ही, राज्य सरकार जामिया निजामिया में एक सभागार बनाने के लिए भी धन मुहैया करा रही है। इस सभागार के निर्माण पर 14 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है, लेकिन राज्य सरकार ने फिलहाल 9 करोड़ रुपये ही मुहैया कराए हैं। इस बाबत हम बजट में वृद्धि सुनिश्चित करेंगे।’’ इसके अलावा, रमजान के दिन मस्जिद में मुफ्त खाने की व्यवस्था कराने की भी घोषणा की गई है। अली ने जोर देकर कहा कि सरकार प्रदेशभर के मदरसों का विकास भी सुनिश्चित करेगी।

सौ प्रतिशत सब्सिडी पर कर्ज
दिलचस्प बात यह है कि इसी साल नवंबर में चंद्रशेखर राव दरगाह हजरत जहांगीर में चादर चढ़ाने गए थे। दरगाह में चादर चढ़ाने के बाद उन्होंने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि वे अपने खर्च से 51 बकरों की कुर्बानी देंगे। उन्होंने कहा कि जब वे सांसद थे तब यह मन्नत मांगी थी कि अगर अलग तेलंगाना राज्य बना तो वे दरगाह आकर 51 बकरों की नयाज पेश करेंगे। इसके अलावा, उन्होंने 25 एकड़ में फैली दरगाह को 50 करोड़ रुपये और 70 एकड़ अतिरिक्त जमीन देने की घोषणा भी की। इस राशि से करीब 100 एकड़ में दरगाह का सौंदर्यीकरण किया जाएगा।
हाल ही में राव सरकार ने मुसलमानों के लिए आरक्षण और आसान ऋण सहित कई रियायतों की घोषणा की है। मुसलमानों के विकास एवं कल्याण को लेकर एक समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने मुस्लिम युवाओं और बैंकों से बिना जुड़े स्वरोजगार योजनाओं के लिए शत प्रतिशत सब्सिडी पर 2.50 लाख रुपये तक का ऋण देने की घोषणा की है। इसके अलावा, दो कमरों वाली सरकारी आवास योजना में मुसलमानों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के साथ सभी सरकारी योजनाओं में भी आरक्षण देने की घोषणा की गई है। तुष्टीकरण का आलम यह है कि राज्य सरकार ने सभी प्रवेश एवं भर्ती परीक्षाएं तेलुगु और अंग्रेजी के अलावा उर्दू में भी आयोजित कराने का आश्वासन दिया है। इस समीक्षा बैठक में एमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी और विधानसभा सदस्य अकबरुद्दीन ओवैसी भी मौजूद थे। असदुद्दीन ओवैसी ने प्रदेश में अल्पसंख्यक आवासीय स्कूल खोलने के मुख्यमंत्री के कदम की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि यह एक बड़ा कदम है जो अगले एक दशक में मुसलमानों में सामाजिक क्रांति लाएगा।

12 प्रतिशत तक आरक्षण
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को खासतौर से अल्पसंख्यक विकास निगम, उर्दू अकादमी और वक्फ बोर्ड को मजबूत करने के भी आदेश दिए हैं। उनका कहना है कि राज्य में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की तरह बड़ी तादाद में अल्पसंख्यक भी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। अन्य अल्पसंख्यकों के बीच मुसलमान बहुसंख्यक हैं। अनुसूचित जाति/जनजाति की तरह ही अल्संख्यकों में भी घोर गरीबी है।’’ इसी तरह, पिछले साल अप्रैल में राज्य विधानसभा और विधान परिषद में एक विधेयक पारित किया गया था, जिसमें शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को 4 से 12 प्रतिशत, जबकि अनुसूचित जनजाति को 10  प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई है। इस विधेयक को राज्य सरकार ने केंद्र के पास भेजा है। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया है कि तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण की तर्ज पर राज्य में आरक्षण दिया जाएगा। गौरतलब है कि तेलंगाना में मुसलमानों की आबादी 12.5 प्रतिशत है। अगर यह विधेयक लागू हुआ तो तेलंगाना में आरक्षण की सीमा बढ़कर 62 प्रतिशत हो जाएगी।

केवल भाजपा कर रही विरोध
भाजपा को छोड़कर पूरे विपक्ष ने पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण विधेयक, 2017 का समर्थन किया है। इस विधेयक का विरोध करने पर भाजपा के सभी पांच विधायकों को दिनभर के लिए सदन से निलंबित कर दिया गया था। विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने कहा, ‘‘अगर केंद्र सरकार ने तेलंगाना के आग्रह को स्वीकार करने से इनकार किया तो राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय जाएगी।’’ तमिलनाडु में दो दशकों से भी ज्यादा समय से 69 प्रतिशत आरक्षण लागू है। इसके अलावा, कुछ और राज्य 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण दे रहे हैं। साथ ही, उन्होंने हैदराबाद के सातवें निजाम मीर उस्मान अली खां की जमकर तारीफ करते हुए कहा, ‘‘उनकी गिनती दुनिया के सर्वोच्च शासकों में की जा सकती है। उन्होंने रियासत के विकास के लिए जो अभूतपूर्व कार्य किए, उसका उदाहरण मिलना कठिन है। राज्य सरकार दोबारा इतिहास लिखवाएगी जिसमें उनके योगदानों को समाहित किया जाएगा ताकि निजामशाही की असली तस्वीर को जनता के सामने पेश की जा सके।

आठवें निजाम जैसा व्यवहार
वहीं, तेलंगाना के भाजपा प्रवक्ता कृष्ण सागर राव का कहना है, ‘‘केसीआर हैदराबाद के आठवें निजाम की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वे एआईएमआईएम एजेंडे के बंधक हैं। यह घोषणा और कुछ नहीं, बल्कि तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण है। मुख्यमंत्री केसीआर केवल बोलते हैं और कुछ करते नहीं हैं। पिछली घोषणाओं की तरह यह भी हवाई साबित होगी।’’ इस फैसले का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने मजहब के नाम पर आरक्षण देने का विरोध किया था। उन्होंने आरक्षण बढ़ाने वाले विधेयक को बेमानी करार देते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्यों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की है। इसलिए विधानसभा द्वारा पारित विधेयक कानूनी और संवैधानिक तौर पर मान्य नहीं है, क्योंकि राज्य सरकार ने इस मामले में किसी प्रक्रिया या प्रणाली का पालन नहीं किया है। लिहाजा सरकार के फैसले को संदेह की दृष्टि से देखा जाना स्वाभाविक है।

वोट बैंक की राजनीति
वहीं, विश्लेषकों के मुताबिक, चंद्रशेखर राव केवल वोट बैंक की राजनीति के तहत मुसलमानों के तुष्टीकरण की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें भी यह मालूम है कि यह विधेयक संविधान के विरुद्ध है और इससे पहले दो बार अदालती जांच के सामने टिक नहीं पाया था। मुसलमानों को आरक्षण देने की मांग वाले विधेयक को केंद्र के पाले में डालकर राज्य सरकार की सोच यह है कि अगर संविधान में संशोधन हुआ तो यह उसकी जीत होगी और केंद्र ने इसे ठुकरा दिया तो आरोप उसी पर लगेगा कि वह मुसलमान विरोधी है और मुसलमानों को आरक्षण देने के मुद्दे के प्रति गंभीर नहीं है।  यानी चित भी मेरी और पट भी मेरी।
मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में अब तक सबसे आगे पश्चिम की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही थीं, लेकिन तुष्टीकरण की होड़ में राव तो उनसे भी आगे निकलते दिख रहे हैं! वे अवसरवादी राजनीतिक खिलाड़ी बन गए हैं। ऐसी राजनीति विभाजनकारी, अनैतिक, अविश्वसनीय और आत्मघाती साबित हो सकती है। आरक्षण, मुफ्त भोजन, कपड़ा, विदेश यात्रा, आसान ऋण जैसे असंवैधानिक, असंभव वादों के जरिये मुस्लिम मतदाताओं को लुभाना क्या उचित है? दरअसल, राव सांप्रदायिकता की ऐसी आग के साथ खेल रहे हैं, जिस पर काबू पाना उनके बस में भी नहीं रहेगा। कृष्णा सागर राव का कहना है, ‘‘राव सरकार सरकारी कार्यालयों में ईमानदारी से तेलुगु को तो लागू ही नहीं कर पा रही है और अब अचानक उर्दू के प्रति उपजा उसका प्रेम किसी के हित में नहीं है। मुस्लिम तुष्टीकरण कब तक चलेगा? क्या राज्य सरकार केवल इस्लाम को बढ़ावा नहीं दे रही है? जिस समय अंग्रेज भारत छोड़ रहे थे, उस समय देश के 562 रजवाड़ों में से केवल तीन को छोड़कर सभी ने भारत में विलय का फैसला किया। ये तीन रजवाड़े थे- कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद। हैदराबाद के निजाम ने तो विलय के खिलाफ पाकिस्तान से समर्थन भी मांगा था। उस समय हैदराबाद में 80 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की थी, लेकिन अल्पसंख्यक होने के बावजूद सेना और प्रशासन में मुसलमान ही महत्वपूर्ण पदों पर आसीन थे। हैदराबाद का निजाम भारत में विलय के इतना खिलाफ था कि उसने मोहम्मद अली जिन्ना को संदेश भेजकर यह जानने की कोशिश की थी कि क्या भारत के खिलाफ युद्ध में वे हैदराबाद का समर्थन करेंगे? लिहाजा सरदार वल्लभभाई पटेल को निजाम के खिलाफ दबाव बनाकर हैदराबाद का विलय भारत में करना पड़ा। भाजपा का कहना है कि निजाम के रजाकार हैदराबाद के हिंदुओं पर हमला करते थे। उनकी तानाशाही के खिलाफ पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव और स्वामी परमानंद तीर्थ ने आंदोलन भी किया था। क्या हैदराबाद की मुक्ति के लिए इन बड़े नेताओं और जवानों की प्रेरणा व बलिदान को हम भूल जाएं? मुख्यमंत्री द्वारा निजाम मीर उस्मान अली खां की तारीफ करने पर उनकी सोच पर भी संदेह पैदा होता है। राव अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और  परिवारवादी राजनीति के लिए राज्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। राव के बेटे के.टी. रामाराव राज्यमंत्री, उनकी बेटी के. कविता लोकसभा सांसद और भानजा हरीश राव राज्य सरकार में सिंचाई मंत्री हैं।   

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