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एजेंडा आधारित पत्रकारिता करके मीडिया संस्थान समाज में अपनी विश्वसनीयता और दायित्व खोते जा रहे
ऊक्सर यह माहौल बनाने की कोशिश की जाती है कि ज्यादातर ‘चैनल और अखबार भाजपा सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं’। यह बात सरासर गलत है। वास्तविकता यह है कि आज भी कई समाचार समूहों की गर्भनाल कांग्रेस पार्टी से जुड़ी हुई है। आपातकाल के दौरान प्रेस को कुचलने के बाद दोबारा सत्ता में आने पर इंदिरा गांधी ने कुछ समाचार समूहों को सरकारी संरक्षण में पाला-पोसा था। खुद को निष्पक्ष दिखाने का नाटक करने वाले इन समूहों का असली चेहरा तब सामने आता है, जब कांग्रेस पार्टी किसी मुश्किल में हो या उसे किसी बड़ी मदद की जरूरत हो। यही कारण है कि खुद को सबसे तेज बताने वाले चैनल ने राहुल गांधी की ‘ताजपोशी’ की खुशी में कांग्रेस दफ्तर के लॉन में जश्ननुमा कार्यक्रम का आयोजन किया। जिस कथित चुनाव का नतीजा सबको पता था, उसकी समीक्षा के लिए एक दर्जन से ज्यादा कांग्रेसी नेता और उनके आगे लगभग रिरियाते हुए पत्रकार सचमुच में ऐसा आभास दे रहे थे, मानो किसी राजवंश में उत्तराधिकार का हस्तांतरण हो रहा है। जब इतने से काम नहीं चला तो चैनल के मालिक खुद गुजरात पहुंच गए और वहां एक जाति की राजनीति करने वाले को आने वाले कल का नेता घोषित कर दिया।
राहुल गांधी के कांग्रेस का अध्यक्ष बनने में कोई रुकावट पैदा न हो, इसके लिए पार्टी की अंदरूनी चुनावी प्रक्रिया तक में धांधली हुई। यह बात खुद कांग्रेस पार्टी के नेता और गांधी परिवार के रिश्तेदार शहजाद पूनावाला ने टाइम्स नाऊ चैनल पर बताई। लेकिन यह खबर टाइम्स नाऊ के अलावा किसी चैनल या अखबार तक नहीं पहुंची। दूसरी पार्टियों के नेताओं की पूरी समीक्षा करने वाले किसी चैनल या अखबार ने ‘ताजपोशी’ पर यह जिक्र तक नहीं किया कि कांग्रेस पार्टी के नए अध्यक्ष हजारों करोड़ रुपये के घोटाले में जमानत पर रिहा हैं।
यह तय है कि मीडिया अपना काम कर रहा है और जनता अपना काम। तमाम दुष्प्रचार और नकारात्मक रिपोर्टिंग के बावजूद लोगों ने उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में भाजपा पर भरोसा जताया। लेकिन दिल्ली के कथित निष्पक्ष मीडिया ने चुनावी नतीजों को भाजपा की हार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हद तो तब हो गई जब व्हाट्सएप पर फैलाए गए झूठे आंकड़ों को दैनिक भास्कर अखबार ने अपनी पहली खबर बना लिया। उसने यह साबित करने की कोशिश की कि जहां पर मशीन से मतदान हुआ, भाजपा सिर्फ वहीं पर जीती है। बाकी सारी जगहों पर उसका प्रदर्शन बहुत बुरा रहा।
सहारनपुर के एक वार्ड से चुनाव लड़ रही एक महिला ने टीवी कैमरों के आगे आकर दावा किया कि उसे एक भी वोट नहीं मिला है। बिना जांचे-परखे लगभग सभी चैनलों और अखबारों ने उसे खूब प्रमुखता से दिखाया। ऐसा इसलिए ताकि वे यह साबित कर सकें कि चुनाव में धांधली हुई है। अगर चुनाव आयोग खुद सफाई देने के लिए आगे नहीं आता तो इन चैनलों और अखबारों ने इस झूठी खबर से लोगों के मन में शक के बीज बोने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। क्या यह मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है कि वह ऐसे संवेदनशील मामले में थोड़ी ज्यादा सतर्कता बरते? या फिर कहीं वह मतदान मशीनों को लेकर भ्रम फैलाने की
विपक्ष की रणनीति का हिस्सा तो नहीं बन चुका है? ऐसा कोई महीना नहीं जाता जब देश के किसी मिशनरी स्कूल में बच्चों के यौन शोषण की खबर न आए। झारखंड के कोडरमा में 67 साल के पादरी ने 7 साल की बच्ची के साथ दरिदंगी करने की कोशिश की। लेकिन पूरी सामूहिक जिम्मेदारी के साथ ज्यादातर चैनलों और अखबारों ने उस आरोपी पादरी की पहचान तक छिपा ली।
देश भर में फैले चर्च और मिशनरी स्कूल छोटे-छोटे बच्चों के यौन शोषण का अड्डा बन चुके हैं और मीडिया उनके अपराधों पर परदा डालने में जुटा है। खुद सोचिए कि किसी हिंदू साधु-संत पर बिना सबूत कोई आरोप भी लगा दे तो मीडिया का बर्ताव उसे लेकर कैसा होता है। यह शोध का विषय है कि देश का मुख्यधारा मीडिया चर्च और मदरसों में होने वाली यौन शोषण की घटनाओं पर आंदोलित क्यों नहीं होता?











