इतिहास-दृष्टि- चरम पर हिन्दू दमन
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इतिहास-दृष्टि- चरम पर हिन्दू दमन

Written byArchiveArchive
Dec 1, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 01 Dec 2017 13:18:17


वामपंथी इतिहासकारों ने  खिलजी के शासनकाल में हिंदुओं पर किए गए जुल्मों की घटनाओं को छिपाते हुए बड़ी चालाकी से उसके शासनकाल को महिमामंडित किया है। लेकिन वामपंथी ऐतिहासिक तथ्यों को झुठला नहीं सकते

मुकुन्द बिहारी

मध्यकाल में दिल्ली सल्तनत का लगभग 250 वर्ष का काल भारत की जनता, विशेषकर सामान्यजन, महिलाओं और बच्चों के लिए अवर्णनीय क्रूरता, दमन और अत्याचारों की दास्तान रहा है, जिसका विस्तृत वर्णन और घटना-क्रम की विवेचना तत्कालीन अरबी-फारसी लेखकों, भारतीय लेखकों तथा यूरोपीय एवं चीनी यात्रियों के यात्रा विवरण में उपलब्ध है। हाल ही में ‘पद्मावती’ फिल्म से उपजे विवाद ने आइएसआइएस की विचारधारा जैसे ही अरब, तुर्क, मुगल आदि विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किए गए बर्बर अत्याचारों एवं दमन-शोषण के सैकड़ों वर्षों के इतिहास को याद करने का अवसर दिया है। क्योंकि एक जागरूक समाज अतीत के घटनाक्रमों की पड़ताल से वर्तमान हालात में उत्पन्न होने वाले संकटों की पहचान करके उनकी रोकथाम एवं निबटने की प्रभावी योजना बना सकता है। कई वामपंथी इतिहासकार ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर चित्तौड़ दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण तथा दुर्ग में घिरी महिलाओं द्वारा जौहर के घटनाक्रम को कमतर या फिर कपोल-कल्पित बताते हैं। वे इसकी गंभीरता को कम करते हुए अलाउद्दीन खिलजी की सैन्य ‘विजयों’ तथा तथाकथित प्रशासनिक सुधारों का गुणगान करते नहीं थकते। कई ‘वामपंथी’ कुतर्क करते हैं कि अगर वास्तव में हिंदुओं पर इतने अत्याचार हुए होते तो भारत में हिंदू बचते ही नहीं। लेकिन जब हम ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में इनकी विवेचना करते हैं तो ये सब बातें झूठी और साजिशभरी नजर आती हैं। इतिहास को खंगालते समय हम पाते हैं कि अरब व प्रारंभिक तुर्क (सुबुक्तगीन, महमूद गजनवी आदि) आक्रमण भारत के पश्चिम-उत्तरी हिस्से को ही प्रभावित कर सके थे। लेकिन दिल्ली सल्तनत का मुख्यत: 13वीं-14वीं शताब्दी  का कालखंड ऐसा था, जिसमें भारत के पूर्वी छोर बंगाल से आगे तक तथा दक्षिणी छोर तक नृशंस आक्रमणों में लूटपाट, आगजनी, बलात्कार, स्त्रियों को बंदी बनाकर ले जाना तथा यौन गुलाम के रूप में उन्हें बाजारों में बेचना या हरम में रखना, बच्चों-तरुणों एवं युवा पुरुषों को या तो बर्बरतापूर्वक मार डालना या गुलाम बना कर रखना प्रमुख था। दिल्ली सल्तनत काल की उक्त प्रवृत्तियां अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में चरम पर पहुंच गईं, जो सर्वाधिक लोभी, कामुक, निर्दयी, क्रूर तथा महत्वाकांक्षी शासक था।  
अब हम वामपंथियों के इस प्रथम कुतर्क का विश्लेषण करें कि ‘तुर्क आक्रांताओं का उद्देश्य हिंदुओं का मारना नहीं था। वह तो संयोग था कि कि हिंदू राजाओं के विरुद्ध युद्ध होने पर हिंदू मारे जाते थे। अन्यथा सल्तनत के शासक भी सामान्य काल में अन्य हिंदू शासकों की तरह ही थे।’ तत्कालीन लेखक जियाउद्दीन बर्नी तथा डॉ. के.ए. निजामी के हवाले से स्पष्ट है कि दिल्ली सल्तनत की स्थापना के प्रारंभ में ही यह प्रश्न खड़ा हुआ कि इस्लामी राज में मूर्तिपूजक काफिर हिंदुओं के साथ क्या किया जाए?  इस संदर्भ में दिल्ली सल्तनत के प्रथम शासक इल्तुतमिश के काल में हुई मुस्लिम आलिमों की एक परामर्श समिति ‘मुस्तफा अलैहिस्सलाम’ का वर्णन महत्वपूर्ण है, जिससे सुल्तान मार्गदर्शन लेता था। इस समिति द्वारा पैगंबर मुहम्मद के शत्रुओं का वर्णन करते हुए हिंदुओं को सबसे कट्टर शत्रु बताया गया है। समिति ने हिंदुओं का कत्ल करने, उन्हें अपमानित तथा तिरस्कृत कर धन-संपत्ति छीन लेने का आदेश देने को कहा। (जियाउद्दीन बर्नी—सहीफये नाते मुहम्मदी पृ.390-391)
वजीरे निजाम-उल-मुल्क जुनैदी ने आलिमों की उक्त राय पर अपनी सलाह दी कि,‘हिंदू बहुत बड़ी संख्या में हैं। मुसलमान उनके मध्य दाल में नमक के समान हैं। कहीं ऐसा ना हो कि हम उपरोक्त आदेश का अनुसरण करें और वे सुसंगठित होकर चारों ओर से विद्रोह तथा उपद्रव प्रारंभ कर दें। फिर हम बड़े कष्ट में पड़ जाएंगे। इसलिए सलाह ये है कि कुछ वर्ष व्यतीत हो जाएं तब तक राजधानी के भिन्न-भिन्न प्रदेश और कस्बे मुसलमानों से भर जाएंगे तथा बहुत बड़ी सेना एकत्रित हो जाएगी। उस समय हम जो चाहेंगे, वह होगा। तब हमारा आदेश होगा कि हिंदुओं का कत्ल कर दिया जाए या उन्हें इस्लाम स्वीकार करने को विवश किया जाए। (जियाउद्दीन बर्नी, सहीफये नाते मुहम्मदी पृ. 392)
अत: परिस्थितियों से मजबूर होकर वजीर ने अपनी विवशता बतलाई। आलीमों ने वजीर की इस कूटनीतिपूर्ण सलाह पर प्रत्युत्तर में सुल्तान से कहा कि यदि हिंदुओं के कत्ल की आज्ञा नहीं दी जा सकती तो सुल्तान को चाहिए कि उनका अपने दरबार तथा राजभवन में आदर-सम्मान न होने दे, हिंदुओं को मुसलमानों के मध्य बसने ना दे। मुसलमानों की राजधानी, प्रदेशों और कस्बों में मूर्तिपूजा तथा कुफ्र के आदेशों का पालन ना होने दें। (डॉ. के.एम.निजामी-रिलीजन एंड पॉलिटिकल स्टडीज इन मेडियवल इंडियन हिस्ट्री, पृ.315-316 एवं जियाउद्दीन बर्नी, पृ.393)
हसन निजामी का मत है कि यह मार्ग हिंदुओं के विद्रोह से बचने के लिए अपनाया गया था। अन्यथा उपरोक्त समिति की कार्रवाई सल्तनत के शासक वर्ग की हिंदू जनता के प्रति नीति को स्पष्ट करती है, जिससे उनकी कट्टरता, मतान्धता , भारतीय जनता से अलगाव तथा वैमनस्य प्रत्यक्ष रूप से झलकता है। सर वोल्सेले हेग के अनुसार गुलाम वंश के शासन काल में नागरिकता उन्हें ही प्राप्त थी जो इस्लाम के सिद्धांतों पर अपना जीवन व्यतीत करते थे। (द कैंब्रिज हिस्ट्री आॅफ इंडिया,भाग-3,सर वोल्सेले हेग)
खिलजी के शासन में हिंदुओं को जिंदा रहने के एवज में जजिया देना पड़ता था। उन्हें मुसलमानों जैसे समान अधिकार प्राप्त नहीं थे और ना वे उच्च पद और सम्मानित जीवन व्यतीत कर सकते थे। इस्लाम के व्याख्याकारों की चार प्रमुख धाराओं में से सिर्फ हनीफी  विचार में हिंदुओं को जजिया देने की एवज में जिंदा रहने का हक दिया गया था। अत: भारतीय परिस्थितियों में शासक वर्ग ने इसे ही मान लिया। इसी संदर्भ में अलाउद्दीन खिलजी के बयाना के काजी मुगासुद्दीन से विचार-विमर्श का तत्कालीन लेखक जियाउद्दीन बरनी द्वारा प्रस्तुत विवरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। अलाउद्दीन ने काजी मुगीसुद्दीन से पूछा कि हिंदुओं के बारे में क्या करना चाहिए?  इस पर काजी ने उत्तर दिया कि हिंदू  खिराज गुजर (टैक्स)  देने वाले लोग हैं और जब आपके अधिकारी इनसे चांदी मांगते हैं तो ये बिना किसी सोच-विचार के और बड़े आदर-सम्मान तथा नम्रता से सोना अदा करें। लगान वसूलने वाले को लगान न चुकाने वाले के मुंह पर थूक देने तक की छूट थी। इस प्रकार अपमानित करने, कठोरता प्रकट करने तथा थूंकने का मकसद यह था कि जिससे जिम्मी का अत्यधिक आज्ञाकारी होना सिद्ध होता रहे। इस्लाम का सम्मान बढ़ाना आवश्यक है़.़..खुदा उनको अपमानित रखने के विषय में इसी प्रकार कहता है। विशेषकर हिंदू को अपमानित करना दीन के लिए अत्यावश्यक है। कारण है कि वे मुस्तफा के दुश्मनों में सबसे बड़े दुश्मन हंै। मुस्तफा अलैहिस्सलाम ने हिंदुओं के बारे में यह आदेश दिया है कि उनकी हत्या कर दी जाए या तो वह इस्लाम अपनाएं और या फिर हत्या करके उनकी धन संपत्ति छीन ली जाए।
 काजी ने फिर कहा कि ‘इमामे-आजम (इमामे-अबुह हनीफ) के अलावा जिनके हम अनुयायी हैं, किसी ने भी हिंदू से जजिया वसूल करने की आज्ञा नहीं दी है। दूसरे मजहब वालों (शाफई, मालकी, हमवली) ने इस प्रकार की कोई रवायत नहीं लिखी है। उनके आलिम हिंदुओं के विषय में केवल यह आदेश देते हैं कि या तो उनकी हत्या कर दी जाए या उनसे इस्लाम स्वीकार कराया जाए। सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने काजी मुगीस की बातों का मुस्कुराते हुए यह जवाब दिया, ‘‘..़.तू समझ ले कि हिंदू उस समय तक मुसलमान का आज्ञाकारी नहीं होता जब तक कि वह पूर्ण निर्धन तथा दरिद्र नहीं हो जाता। मैंने यह आदेश दे दिया है कि प्रजा के पास केवल इतना ही धन रहने दिया जाए जिससे वह प्रत्येक वर्ष कृषि तथा दूध और छाछ ही जुटा पाए। वे धन-संपत्ति एकत्र न कर सकें।’
उन्हीं दिनों मौलाना शमसुद्दीन तुर्क नामक एक हदीसवेत्ता हदीस की 400 पुस्तकें लेकर भारत पहुंचा। .़.़.उसने इस बात की प्रशंसा की कि अलाउद्दीन ने हिंदुओं को लज्जित, पतित अपमानित तथा दरिद्र बना दिया है। साथ ही यह सुनकर भी वह प्रसन्न था कि हिंदुओं की स्त्रियां तथा बच्चे मुसलमानों के द्वार पर भीख मांगते हैं। अत: हिंदू की दशा इतनी दयनीय हो गई कि है हिंदू महिलाओं को मुसलमानों के घरों में जाकर काम करना पड़ता था। (जियाउद्दीन बर्नी, तारीख-ए-फिरोजशाही, पृ. 290-291)
  साम्राज्य  विस्तार के लिए आवश्यक विशाल सेना के लिए जरूरी अपार धन की आवश्यकता के साथ ही अलाउद्दीन को लगता था कि अमीरों, विशेषकर हिंदुओं के पास अतुल धनराशि होने के कारण समय-समय पर वे विद्रोह करते रहते हैं। अत: उसने राज्य कर तथा राजस्व का ढांचा इस प्रकार से बनाया कि भारतीय जनता अधिक से अधिक गरीब रहे। उनसे समस्त भूमि, जो अमीरों, सरकारी कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के पास थी, छीन ली गई। हिंदुओं पर जितना जुल्म किया जा सकता था, उसने किया। उपरोक्त विवेचन तथा प्रमाणों से स्पष्ट है कि वामपंथी विचारकों का यह कुतर्क आधारहीन है कि सल्तनत के मुस्लिम शासकों की नीति व व्यवहार प्रजा के प्रति उसी प्रकार था, जैसा हिंदू राजाओं का अपनी प्रजा के प्रति था। वस्तुत: सल्तनत काल में शासक वर्ग का चरित्र पूर्णत: विदेशी था, जो स्वयं के हित में संपत्ति अर्जन तथा अपनी कट्टर इस्लामिक सनक-इच्छाओं को पूरा करने के उद्देश्य से राज्य की नीति व व्यवहार तय करता था। भारतीय जनता केप्रति उनमें अलगाव व वैमनस्य की भावना और दमन-शोषण की नीति स्पष्ट थी, जिसे वे इस्लामिक नीति-निर्देशों पर आधारित मानते थे।
इसी संदर्भ में अलाउद्दीन खिलजी के साथ राजपूतों के संघर्ष, जौहर या साका की संकल्पना को समझना आवश्यक है। जौहर स्त्रियों को बेचे जाने या हरम में बंधक रखे जाने जैसी अपमानजनक स्थिति से बचने तथा परिवार के पुरुष सदस्यों को जोश के साथ उन्मुख करने के लिए किया जाता था। स्वाभाविक है कि जौहर व साका अत्यंत उच्च कोटि के मानवीय मूल्यों एवं परोपकार हेतु सर्वस्व समर्पण के प्रतीक हैं। खिलजी के हिन्दुओं पर दमन की एक नहीं, अनेक मिसालें दी जा सकती हैं। आज के संदर्भ में ऐसा आवश्यक भी प्रतीत होता है।
    (लेखक इतिहासविद् एवं लोकनीति विशेषज्ञ हैं।)   

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