रपट/ झारखंड - बंदिशों से निकली तरक्की की राह
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रपट/ झारखंड – बंदिशों से निकली तरक्की की राह

Written byArchiveArchive
Nov 6, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 06 Nov 2017 10:11:56

इस देश के युवा यदि ठान लें तो असंभव काम भी संभव हो सकता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है रांची के पास स्थित एक गांव के युवाओं ने। इन युवाओं ने गांव के विकास के लिए कुछ ऐसे नियम तय किए हैं, जिनकी चर्चा दूर-दूर तक हो रही है। गांव का कोई व्यक्ति शराब नहीं पी सकता, जंगल नहीं काट सकता, अपने पशुओं को खुला नहीं छोड़ सकता, कोई खुले में शौच नहीं कर सकता और ज्यादा गहराई वाली बोरिंग नहीं कर सकता। यानी गांव में क्रमश: शराबबंदी, कुल्हाड़ीबंदी, चराईबंदी, लोटाबंदी और डीप बोरिंगबंदी लागू है। इस गांव का नाम है आरा केरम, जो टुंडा टोली पंचायत में है। आरा और केरम एक ही गांव के दो टोले हैं, जो बिल्कुल आसपास हैं। गांव के लगभग सभी लोग खेतीबाड़ी और मजदूरी करके गुजारा करते हैं। अधिकांश मकान मिट्टी के हैं। कुछ युवाओं ने अपने गांव को बदलने का सपना देखा और लग गए उस सपने को पूरा करने में। गांव की सबसे बड़ी समस्या थी शराब। प्राय: हर घर में शराब बनती थी और क्या महिला, क्या पुरुष, सभी शराब के आदी थे। मजदूरी और खेतीबाड़ी से जो भी कमाई होती थी, उसका एक बड़ा हिस्सा शराब में खर्च हो जाता था। इस कारण गांव के बच्चे न तो पढ़ पा रहा थे और न ही किसी तरह का विकास हो पाता था। इसलिए युवाओं ने सबसे पहले शराब को बंद करने का निर्णय लिया। लेकिन यह काम उतना आसान नहीं था। गांव वालों ने जमकर विरोध किया, पर युवा नहीं माने और वे अपनी मुहिम में लगे रहे। युवकों को मुहिम चलाने की प्रेरणा कहां से मिली? इस पर एक ग्रामीण गोपालराम वेदिया ने कहा है, ''2014 में नरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी गांव में आए थे। उन्होंने गांव की दयनीय स्थिति देखकर युवाओं से कहा कि आप लोग जब तक शराब नहीं छोड़ेंगे, तब तक गांव की स्थिति नहीं सुधरेगी। उनकी बातों का असर हुआ और शुरू में 30 युवाओं ने शराब छोड़ने का प्रण लिया।''
 इन युवाओं ने अपने प्रति ही सख्ती की। कुछ समय बाद इन लोगों ने अनुभव किया कि अब बिना शराब के भी जीवन जिया जा सकता है। इसके बाद इन लोगों ने 2016 में 'नवजागृति समिति' बनाई। इस समिति को ही गांव की 'सरकार' माना गया है। इस सरकार के प्रधानमंत्री हैं बाबूराम गोप। उपप्रधानमंत्री का दायित्व गोपालराम वेदिया संभाल रहे हैं। इसी तरह शिक्षा मंत्री, वन मंत्री, बिजली मंत्री, कृषि मंत्री, नशामुक्ति मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, मीडिया मंत्री, सफाई मंत्री और व्यवस्था मंत्री भी हैं। इसी 'सरकार' के मंत्री गांव के अन्य लोगों को भी शराब छोड़ने के लिए प्रेरित करने लगे। शुरू में तो लोग शराब छोड़ने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। इसलिए लोगों ने इसका जमकर विरोध किया, लेकिन 'सरकार' उनके सामने झुकी नहीं। लोगों से साफ-साफ कहा गया कि किसी भी सूरत में शराब बनाने और पीने की इजाजत नहीं दी जाएगी। इसके बाद भी कोई शराब बनाते या पीते पकड़ा जाएगा तो उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि इस गांव के कुछ परिवार शराब निर्माण से अपना गुजारा करते थे। इन लोगों ने 'सरकार' के सामने सवाल उठाया कि उनका गुजारा कैसे होगा? उनका यह सवाल वाजिब था। इसलिए 'सरकार' ने ग्रामीणों के रोजगार के लिए सरकारी योजनाओं का सहारा लिया। डोभा निर्माण, वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रमों को तेजी से चलाया गया। इससे लोगों को रोजगार मिलने लगा और वे शराब बेचने और पीने से दूर होने लगे।
अब गांव का कोई भी व्यक्ति शराब नहीं पीता। यही नहीं, अतिथियों को भी शराब नहीं पिलाई जाती, जबकि पहले अतिथियों को शराब पिलाना जरूरी था। ऐसा नहीं होने पर उसे अतिथि का अपमान माना जाता था। अब कोई अतिथि शराब की मांग न करे, इसके लिए गांव की दीवारों पर साफ-साफ शब्दों में लिखा गया है- 'मेहमान नशा के लिए शर्मिंदा न करें।'
शराबबंदी के बाद गांव से अनेक बुराइयां समाप्त हो गई हैं। लोग अपने बच्चों को पढ़ाने लगे हैं, दारू नहीं पीने से पैसा बच रहा है और उस पैसे का इस्तेमाल अन्य जरूरतों को पूरा करने में हो रहा है। नशामुक्ति मंत्री विजय वेदिया कहते हैं, ''पहले गांव का हर व्यक्ति सालाना लगभग 18,000 रुपए की दारू पी जाता था। इसलिए लोग कभी आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हो पाते थे, लेकिन अब गांव का माहौल बदल गया है। लोग तरक्की की राह पर बढ़ चुके हैं।'' केवल तरक्की ही नहीं, धार्मिक मामले में भी लोग कभी जागरूक हो चुके हैं। गांव में कोई मंदिर नहीं था। अब एक शिव मंदिर बन रहा है। इस मंदिर के निर्माण में सभी सहयोग कर रहे हैं।
जो लोग पहले दारू बनाते थे, उन लोगों का सहयोग प्रेरित करने वाला है। जिन बर्तनों में वे लोग दारू बनाते थे, उन्हें बेच दिया गया और उससे जो पैसे मिले, उसे मंदिर के लिए दान कर दिया गया।
ग्रामीण पहले अपने बच्चों को मवेशी चराने भेजते थे और गांव का प्राथमिक विद्यालय सूना पड़ा रहता था। पर अब वही ग्रामीण अपने बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजने लगे हैं। शिक्षा मंत्री दुवेश्वर वेदिया कहते हैं, ''स्कूल के बाद गांव के बच्चों को दो युवा (सुनील महतो और खुद दुवेश्वर वेदिया) पढ़ाते हैं। कक्षा एक से पांचवीं तक के छात्रों से हर महीने 50 रु. और कक्षा छह से आठवीं तक के बच्चों से 100 रु. शुल्क लिया जाता है। यह शुल्क भी इसलिए लिया जाता है कि बच्चे नियमित रूप से कक्षा में आएं।''
गांव के लोग स्वच्छता के प्रति भी बहुत जागरूक हो गए हैं। सफाई मंत्री सुमन देवी कहती हैं, ''प्रतिदिन सुबह पांच बजे गांव में घोषणा होती है और इसके बाद सभी लोग गलियों और सड़कों की सफाई करने के लिए निकल जाते हैं। इसके बाद ही वे अपने-अपने काम पर जाते हैं।'' गांव में श्रमदान की भी अनूठी परंपरा शुरू की गई है। मीडिया मंत्री आदित्य महतो ने बताया, ''हर महीने की पहली और 14 तारीख को गांव के लोग श्रमदान करते हैं। इसके तहत सड़कों के किनारे, सरना स्थल (पूजा स्थल) और निजी जमीन पर पेड़ लगाए जा रहे हैं।'' अब तक पपीता के 5,000, बबूल और बेर के 3,000-3,000 और नीम, गुलमोहर, सागवान आदि के 550 पौधे लगाए गए हैं। निजी जमीन पर पौधे लगाने के
बाद उसके मालिक से प्रति पौधा दो रु. वसूला जाता है।
गांव के पास ही 300 एकड़ में फैला एक जंगल है, जहां पेड़-पौधों की लगभग 300 प्रजातियां हैं। पहले लोग जलावन के लिए बेरोकटोक कच्ची-पक्की लकड़ी काट लेते थे और जंगल में मवेशी भी छोड़ देते थे। मवेशियों के खुरों से जमीन हल्की हो जाती है। इससे बारिश के समय पेड़ गिरते हैं। वन मंत्री रमेश वेदिया कहते हैं, ''गांव वालों ने जंगल बचाने के लिए कुल्हाड़ीबंदी और चराईबंदी को सख्ती से लागू किया। किसी को भी पेड़ काटने की अनुमति नहीं है।
जलावन के लिए गिरी हुई सूखी लकड़ी लाई जा सकती है, वह भी जंगल के कुछ हिस्से से। जंगल के एक भाग, जिसका क्षेत्रफल 70 एकड़ है, में किसी को जाने की भी अनुमति नहीं है। वहां से कोई सूखी लकड़ी या पत्ते भी नहीं ला सकता।'' ऐसा क्यों? इसका जवाब सामाजिक कार्यकर्ता गुणानंद महतो ने दिया। वे कहते हैं, ''सूखी लकड़ी हों, या पत्ते, ये सब जंगल को बढ़ाने में मदद करते हैं। बारिश में ये सड़ जाते हैं और बाद में यही खाद की भूमिका निभाते हैं। इसी खाद से जंगल का फैलाव होता है।'' ग्रामीणों के इस कार्य के बारे में जो भी सुनता है, तारीफ किए बिना नहीं रहता।
गांव आधारित सरकारी योजनाओं की देखरेख करने वाले अरविंद कुमार कहते हैं, ''ग्रामीणों का यह बदलाव दिखाता है कि अब वे जाग चुके हैं। यह देश के लिए शुभ संकेत है।'' काश! देश के अन्य गांवों के लोग भी कुछ ऐसा ही सोचते।      -अरुण कुमार सिंह, रांची से लौटकर 

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