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कहा जाता है कि कड़ी मेहनत भाग्य का द्वार खोल देती है। यह बात वल्लभभाई झड़पिया पर पूरी तरह लागृू होती है। 1969 में केवल 14 साल की उम्र में भावनगर जिले के एक गांव प्रह्लादगढ़ से झड़पिया रोजी-रोटी के लिए सूरत आए। उनके बड़े भाई सूरत के एक हीरा कारखाने में मजदूरी करते थे। इसलिए उन्हें भी एक कारखाने में आसानी से काम मिल गया। दोनों भाई कई वर्ष तक मजदूरी करते रहे। इससे परिवार का गुजारा नहीं हो पा रहा था। 1975 में दोनों ने तय किया कि अपना ही काम करेंगे, लेकिन हाथ में अठन्नी तक नहीं थी। इसके बावजूद दोनों ने जोखिम उठाने का निश्चय किया और उधारी में हीरे लाकर तराशने लगे। देखते ही देखते काम चल निकला और दोनों भाइयों ने जे.जे. एक्सपोटर््स नाम से एक कंपनी शुरू कर दी। आज इस कंपनी का कारोबार 500 करोड़ रुपए का है। मुबंई के अलावा बेल्जियम और हांगकांग में दफ्तर हैं। सूरत के कारखाने में निम्नतम 10,000 और अधिकतम 50,000 वेतन पाने वाले करीब 2,000 लोग काम करते हैं।
गुजराती माध्यम से केवल आठवीं तक पढ़ाई करने वाले झड़पिया व्यापार में इतने कुशल हैं कि उनके सामने कारोबार के नए खिलाड़ी टिक नहीं पाते। अपने कारखाने के एक कमरे में बैठकर वे पूरी दुनिया की खबर लेते रहते हैं और फिर उसके अनुसार निर्यात की नीति अपनाते हैं। झड़पिया कहते हैं, ‘‘सूरत में तराशे गए हीरों का 92 प्रतिशत निर्यात होता है और शेष घरेलू बाजार में बिकता है। इसलिए दुनिया में जब भी कोई उथल-पुथल होती है तो हीरों का कारोबार सबसे अधिक प्रभावित होता है।’’ वे अपनी सफलता के पीछे अपनी मजबूरी को कारक मानते हैं। वे कहते हैं, ‘‘यदि गांव में ही रोजगार मिल जाता तो सूरत नहीं आता। सूरत आना मेरी मजबूरी थी। उसी मजबूरी ने कड़ी मेहनत के लिए प्रेरित किया और आज जो कुछ भी हूं, उसी मेहनत की बदौलत हूं।’’
नई पीढ़ी के कारोबारियों के लिए उनका कहना है कि अगर लंबी पारी खेलनी है तो मेहनत और ईमानदारी की राह को कभी मत छोड़ना।











