ढीली पड़ रहींमहागठबंधन की गांठें
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ढीली पड़ रहींमहागठबंधन की गांठें

Written byArchiveArchive
Jul 10, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 10 Jul 2017 10:56:11

बिहार में महागठबंधन के दोनों दलों-जदयू और राजद में अंतर्विरोध इतना बढ़ चुका है कि बीच की गांठें ढीली हो रही हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नीतीश कुमार सिर से पांव तक भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर चुके लालू परिवार से दूरी दिखा अपनी छवि बचाने की कोशिश कर रहे हैं

 अवधेश कुमार

बिहार में महागठबंधन का क्या होगा? यह सवाल राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा उठाया जा रहा है। यह स्वाभाविक भी है और इस प्रश्न के उठने के ठोस आधार हैं। हालांकि 2 जुलाई को पटना में आयोजित जदयू प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि वे भाजपा के साथ नहीं जा रहे हैं और इस तरह का कयास गलत है। साथ ही उन्होंने अपने साथी नेताओं को भी राजद या गठबंधन के बारे में बयान देते समय संयम बरतने की सलाह दी। जदयू में नीतीश के शब्द अंतिम होते हैं। किंतु क्या इतना कह देने भर से यह मान लिया जाए कि वाकई गठबंधन में सब कुछ ठीकठाक है और यह अपनी आयु पूरी करेगा? इसी कार्यकारिणी की बैठक में नीतीश ने कांग्रेस और गठबंधन को लेकर कुछ और बातें कहीं जो कहीं ज्यादा मायने रखती हैं। उन्होंने कहा कि हम आंख मूंदकर किसी पिछलग्गू नहीं बनेंगे, जो होना होगा, वह होकर रहेगा। हमारा एक सिद्धांत है, हमारा सिद्धांत अटल है। कांग्रेस पर उनका वार कहीं ज्यादा तीखा था। उन्होंने कहा कि हमारे सिद्धांत नहीं बदले, उनके (कांग्रेस के) सिद्धांत बदल गए हैं। लोहिया जी ने कांग्रेस को सरकारी गांधीवादी कहा था जो गांधीवादी नियमों का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए करती है। ध्यान रखिए, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने नीतीश पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि हराना उनका काम है, हमारा नहीं। नीतीश ने अपने राज्य की दलित नेता को हराने की पहले ही घोषणा कर दी। आजाद ने कहा कि जिनका एक सिद्धांत होता है, वे एक सिद्धांत पर रहते हैं जिनके कई सिद्धांत होते हैं, और वे कई सिद्धांतों पर चलते हैं। यानी उनके अनुसार नीतीश कुमार एक विचारधारा वाले नेता नहीं हैं, बल्कि वे कई विचारधाराओं में यकीन रखकर अलग निर्णय लेते हैं। दरअसल, नीतीश द्वारा राष्ट्रपति चुनाव में राजग उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन करने के कारण कांग्रेस, राजद सहित गठबंधन की दोनों पार्टियां बिफरी हुई हैं।
कार्यकारिणी में नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि हमने असम एवं उत्तर प्रदेश में गठबंधन के प्रयास किए, लेकिन ये लोग ही नहीं माने। हमारा प्रयास सफल नहीं रहा। वास्तव में जदयू ने दोनों राज्यों में कांग्रेस के साथ बिहार की तर्ज पर एक गठबंधन की कोशिश की थी लेकिन कांग्रेस ने इसे नकार दिया। उत्तर प्रदेश में तो नीतीश कुमार ने चुनाव के पूर्व काफी सभाएं भी की थीं लेकिन कांग्रेस ने उन्हें भाव नहीं दिया। इसकी खीझ उनके मन में थी जो कांग्रेसियों द्वारा राष्ट्रपति चुनाव में उनके मत की आलोचना करने के बाद बाहर आ गई है। इसका बाहर आना ही यह साबित करता है कि गठबंधन के अंदर अंतर्विरोध काफी पहले से हैं जो राष्ट्रपति चुनाव के समय फूटकर निकल रहे हैं। नीतीश कुमार ने यह भी साफ कर दिया कि जिस दिन रामनाथ कोविंद के नाम का ऐलान हुआ हमने अपने फैसले से राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव एवं कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को अवगत करा दिया था। इसका अर्थ यह हुआ कि राजद और कांग्रेस के नेता नीतीश पर झूठे आरोप लगा रहे हैं। सोनिया और लालू यह साफ करें कि नीतीश ने उन्हें अपना फैसला बताया था या नहीं? अगर बता दिया था तो फिर इन्होंने यह कैसे मान लिया कि अगर ये मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार बना देंगे तो वे अपना फैसला बदल लेंगे। नीतीश अपने रुख को लेकर कितने कठोर हैं, इसका प्रमाण लालू प्रसाद यादव को उनके द्वारा दिए गए जवाब से मिलता है। जब लालू यादव ने कहा कि नीतीश ऐतिहासिक भूल कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि कर लेने दीजिए, ऐतिहासिक भूल। यानी आपके कहने से हम अपना फैसला नहीं बदलने वाले।
तीखा हमला
कम से कम तत्काल इसे स्थिति को किसी गठबंधन के सामान्य होने तथा उसके स्थायी होने का प्रमाण तो नहीं माना जा सकता। आप इस बीच राजद और जदयू नेताओं के अलग-अलग बयानों को देख लीजिए तो ऐसा लगेगा कि यह गठबंधन के साथियों का नहीं, धूर विरोधी दलों के नेताओं का बयान है। राजद के एक विधायक ने तो यहां तक कह दिया        कि ‘ऐसा कोई सगा नहीं जिसे नीतीश ने ठगा नहीं।’ यह बयान मीडिया की सुर्खियां बना। 22 जून को ही राजद के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने नीतीश कुमार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि सबसे पहले नीतीश कुमार ने ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद से मिलकर सेकुलर दलों के संयुक्त फैसले से राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार उतारने की बात कही थी, इसके बाद वे पलट गए। उन्होंने यह भी कहा कि जदयू  अलग निर्णय लेकर विपक्षी एकता को कमजोर करने की कोशिश करता है, जिससे लोगों में गलत संदेश जाता है।’ उन्होंने कहा कि नीतीश देशभर के मालिक हैं क्या? राजद के प्रयास से सेकुलर दल एकजुट होंगे और एक राष्ट्रीय विकल्प तैयार होगा।
 आप सोचिए, राजद का इतना बड़ा नेता अगर नीतीश कुमार पर ऐसी टिप्पणियां कर रहा है तो क्या इसे गठबंधन के सामान्य होने का प्रमाण मान लिया जाए? वे तो यही कह रहे हैं कि जदयू के अलग रहते हुए भी राजद विपक्षी एकता खड़ा करेगा। यही नहीं, राजद के विधायक भाई वीरेंद्र ने तो यहां तक कह दिया कि नीतीश कुमार महागठबंधन को ठेंगा दिखा रहे हैं और उनका यह फैसला राजद और कांग्रेस के साथ धोखा है। उन्होंने कहा, ‘‘नीतीश कुमार को अगर भाजपा से दोस्ती निभानी है तो खुलकर कहें। हमें क्यों धोखा दे रहे हैं?’’
रैली से दूर जदयू
अब जरा दूसरे पक्ष को देखिए। जिस दिन पटना में जदयू की कार्यकारिणी की बैठक थी, उस दिन पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव श्याम रजक ने बयान दे दिया कि 27 अगस्त को राजद जो रैली कर रहा है उसमें उनकी पार्टी हिस्सा नहीं लेगी। अगर जदयू के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को न्योता मिलता है तब वे व्यक्तिगत स्तर पर उसमें उपस्थित होने पर फैसला लेंगे। कोई महासचिव यूं ही ऐसा बयान नहीं देता। श्याम रजक वैसे भी नीतीश कुमार के करीबी हैं। नीतीश ने ही उनको पार्टी में लाए थे। आप देखें, कार्यकारिणी में नीतीश का बयान यही है कि अगर उन्हें रैली में जाने का न्योता मिलता है तो वे जरूर जाएंगे। इस बयान से किसी को गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह नहीं कहा कि अगर न्योता मिलता है तो उनकी पार्टी उसमें शामिल होगी। एक तरह से यह लालू द्वारा आयोजित रैली से किनारा करना ही है। ध्यान रखिए, राजद की रैली का लक्ष्य 2019 में भाजपा नेतृत्व वाले राजग के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करना है। उस रैली का व्यापक प्रचार हो रहा है और राजद के पदाधिकारी अभी से यह कह रहे हैं कि उसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती जैसे नेता हिस्सा लेंगे। पता नहीं, इसमें से कितने नेता हिस्सा लेंगे, लेकिन इस रैली की व्यापक पैमाने पर तैयारी चल रही है।
यहां इसका उल्लेख करने का तात्पर्य यह बताना है कि लालू जिस रैली को 2019 में भाजपा एवं उसके सहयोगियों के खिलाफ एकजुटता के प्रमाण के रूप में पेश करना चाहते हैं, बिहार में उनका साथी जदयू पार्टी के तौर पर उसमें भाग नहीं लेगा। यह बहुत बड़ी बात है। इसके राजनीतिक निहितार्थ तो निकाले ही जाएंगे। क्या जदयू धीरे-धीरे राजद एवं कांग्रेस से किनारा कर रहा है? नीतीश कुमार एवं कोई जदयू का नेता ऐसा नहीं कह सकता। किंतु उनके आचरण, उनके बयान, हाव-भाव तथा निजी बातचीत से तो कुछ साफ संकेत मिलते ही हैं। आप देख लीजिए, 30 जून की आधी रात को संसद के केंद्रीय कक्ष में जीएसटी के शुभारंभ कार्यक्रम में नीतीश ने अपने प्रतिनिधियों को भेजा था, जबकि महागठबंधन के सहयोगियों राजद और कांग्रेस ने इसका बहिष्कार किया था।
नीतीश पर साधा निशाना
29 जून को लालू यादव के बेटे और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर अपने कार्यक्रम ‘दिल की बात’ में बिना नाम लिए नीतीश कुमार को अवसरवादी और स्वार्थी कह दिया। प्रधानमंत्री मोदी के रेडियो संबोधन ‘मन की बात’ की तर्ज पर तेजस्वी ने ‘दिल की बात’ कार्यक्रम शुरू किया है। इसमें तेजस्वी ने कहा कि अपने अवसरवादी रवैये से हम छोटे-मोटे लाभ हासिल कर सकते हैं, सरकारें बना सकते हैं और गिरा सकते हैं लेकिन टीवी ऐंकरों के उलट इतिहास इस बात की गवाही देगा कि जब भी जन-केंद्रित और प्रगतिशील राजनीति की बात आई तो हम मजबूती से इसके लिए खड़े हुए। क्या यह बताने की जरूरत है कि तेजस्वी का इशारा किसकी ओर रहा होगा? हालांकि जब जदयू की ओर से इसकी आलोचना आरंभ हुई तो तेजस्वी ने कहा कि उनका बयान किसी एक के लिए नहीं, पूरे विपक्ष के लिए था। पूरे विपक्ष का मतलब क्या है? इसके जवाब में जदयू के प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा कि हमने चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं। हम भी जवाब दे सकते हैं लेकिन इससे केवल गठबंधन को ही नुकसान पहुंचेगा। जब इस तरह के हमले-प्रतिहमले किसी गठबंधन में आरंभ हो जाएं तो उसके भविष्य के बारे में आप क्या कहेंगे?
त्यागी के तीर
उधर जदयू के महासचिव के. सी. त्यागी ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर किया गया दोषारोपण वह कांग्रेस पार्टी के नेताओं की खीज का नतीजा है। उन्होंने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वह हमें सेकुलरवाद की नसीहत न दे। पूरे देश को मालूम है कि सेकुलरवाद के उच्च आदर्शों को ध्यान में रखते हुए जदयू ने अपने सांसदों और विधायकों की संख्या बल को कुर्बान किया था। हम जब राजग में थे, तो लोकसभा में 22 सांसद थे, आज केवल दो सांसद हैं। राजग में जदयू के 118 विधायक थे, लेकिन आज 71 हैं। वहीं, राजद 22 विधायकों से 81 पर पहुंच गया है। कांग्रेस भी चार से 27 विधायकों तक पहुंच गई है। उनका कहना था कि जदयू ने गंठबंधन व वादों के सिद्धांत की खातिर नुकसान उठाया है और हमारे सहयोगी मित्रों को फायदा मिला है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि हम जब राजग में थे तो भाजपा ने कभी हमारी स्थिति विकट नहीं बनाई। यह कोई साधारण बयान नहीं है। इसे कई नजरिए से ले सकते हैं। इस समय जदयू का कोई जिम्मेदार नेता अचानक गठबंधन तोड़ने की सीमा तक बात नहीं कर सकता। किंतु त्यागी ने जो कुछ कहा, वह जदयू के ज्यादातर नेताओं की पीड़ा है। इसमें एक पश्चाताप का भाव भी है। इसमें यह भाव भी निहित है कि राजग में होते तो आज भी हमारे सांसदों और विधायकों की संख्या ज्यादा होती तथा आप सबकी कम होती। त्यागी ने यह चेतावनी भी दे दी कि कोई महागठबंधन की उम्र घटाने का प्रयास न करे। जब ऐसे बयान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की ओर से आएंगे तो इसे गठबंधन में दरार के तौर पर देखा ही जाएगा। वैसे त्यागी ने तो यह भी खुलासा कर दिया कि मीरा कुमार के नाम पर विपक्षी दलों में सहमति नहीं थी। गोपाल कृष्ण गांधी के नाम पर ज्यादातर दल सहमत थे लेकिन कांग्रेस ने किसी तरह अपने उम्मीदवार को आगे कर दिया। उन्होंने दावा किया कि 22 जून को दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक में राकांपा, तृणमूल कांग्रेस और जनता दल (सेकुलर) कांग्रेस के उम्मीदवार के पक्ष में नहीं थे। इनमें से किसी पार्टी ने त्यागी की बातों का खंडन नहीं किया है।
धर्म संकट
सच कहा जाए तो नीतीश के सामने गठबंधन को लेकर धर्म संकट की स्थिति पैदा हो चुकी है। व्यक्ति जब क्या करें और क्या न करें की स्थिति में पहुंंचता है तो उसकी स्थिति खासी विकट हो जाती है। राष्ट्रपति चुनाव और इसके संदर्भ में तीनों पक्षों के बयान नीतीश के धर्म संकट में लिए गए निर्णय की परिणतियां हैं जो आने वाले समय में और आगे तक जाने की संभावनाएं रखती हैं। वैसे नीतीश कुमार के साथ दो सकारात्मक पहलू जुड़े हैं। एक, उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठा। दूसरे, उन्होंने राजनीति में परिवारवाद को कभी बढ़ावा नहीं दिया। इस समय लालू यादव के परिवार पर कंपनियां बनाकर उसके नाम से बेनामी संपत्तियों की भरमार खड़ी करने के जो आरोप लगे हैं और उनमें से बहुत कुछ सच साबित हो रहा है, उससे नीतीश की चिंता बढ़ी है। इस बेनामी संपत्ति की जद में लालू के दो मंत्री बेटों तेजस्वी यादव एवं तेज प्रताप यादव के नाम भी आ गए हैं। गनीमत इतनी ही है कि अभी तक उनसे किसी विभाग ने पूछताछ नहीं की है। किंतु लालू यादव की बड़ी पुत्री मीसा भारती तथा उनके पति शैलेन्द्र से आयकर विभाग लंबी पूछताछ कर चुका है। यह तय है कि आने वाले समय में उनके परिवार के ज्यादातर सदस्यों से पूछताछ होगी। जांच में दूसरे विभाग भी शामिल होंगे। जब तक लालू के परिवार के अन्य सदस्यों तक जांच की आंच पहुंचती है तब तक नीतीश को बहुत समस्या नहीं हो सकती। किंतु यदि जांच की आंच तेजस्वी और तेजप्रताप तक पहुंचती है तो फिर नीतीश के लिए चुप बैठे रहना संभव नहीं होगा। उन्हें कुछ निर्णय करना ही होगा। विपक्ष से लेकर मीडिया और आम जनता का दबाव भी उन पर बढ़ेगा। वे भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे तेजस्वी और तेजप्रताप को मंत्री बनाए नहीं रख सकते। दूसरी ओर लालू आसानी से उनके त्यागपत्र को तैयार नहीं होंगे। उस स्थिति में क्या होगा, इसकी कल्पना करिए। तो क्या नीतीश कुमार उस निश्चित दिख रही स्थिति से निबटने की भूमिका तैयार कर रहे हैं? क्या वे जनता को यह संदेश दे रहे हैं कि उनका राजद के साथ गठबंधन अवश्य है, पर उनका व्यवहार एक नहीं है, उनकी धारा भी एक नहीं है? लालू भी एक सीमा से आगे इसीलिए नहीं जा रहे हैं क्योंकि इस मामले पर वे बिल्कुल कमजोर आधार पर खड़े हैं। वे स्वयं भ्रष्टाचार के मामले में सजायाफ्ता हैं और दूसरे मामले उन पर चल ही रहे हैं। वे चुनाव लड़ने की स्थिति में अभी नहीं हैं। उन्हें मालूम है कि अगर इस समय गठबंधन टूटा तो भाजपा नीतीश की सरकार को बचा सकती है, पर वे विपक्ष में चले जाएंगे। सत्ता में होने का जो लाभ उन्हें हासिल है, उससे वे वंचित हो जाएंगे। लालू की यह मजबूरी हो सकती है, पर नीतीश इस मजबूरी से उनके साथ चिपके नहीं रह सकते। वैसे भी जदयू के अंदर ऐसे विधायकों की संख्या काफी है जो मानते हैं कि भाजपा से अलग होना उनकी भूल थी। कई तो निजी बातचीत में आपको यह कह देंगे कि अरे, हम लोग तो लालू के चक्कर में फंस गए। वे यह भी कहते हैं कि हमारी पार्टी के कारण ही लालू की मरी हुई पार्टी जिंदा हो गई। तो यह है विधायकों की राय जो नेतृत्व के दबाव के बावजूद कभी-कभी निकल पड़ती है। गठबंधन चाहे राजनीतिक तौर पर जितना समय बना रहे, मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह टूट चुका है।     (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)    

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