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इस्रायल में ‘भारत’ है तो भारत में भी है एक ‘इस्रायल’

Written byArchiveArchive
Jul 10, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 10 Jul 2017 10:56:11

चारों तरफ से मुस्लिम शत्रु अरब देशों से घिरा इस्रायल आज ज्ञान, विज्ञान, तकनीकी, साइबर विज्ञान, सुरक्षा तथा सॉफ्टवेयर में विश्व में प्रथम श्रेणी का देश बन गया है। कई झंझावातों को सहते हुए इस्रायलियों ने आज विश्व में जो अलग पहचान बनाई है, वह न केवल काबिलेतारीफ है बल्कि गौरवपूर्ण है
तरुण विजय

श्री नरेन्द्र मोदी की समस्त विदेश यात्राएं एक तरफ, केवल इस्रायल की यात्रा उन सब पर भारी… यह कहना उपयुक्त ही होगा। इस्रायल के प्रधानमंत्री श्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भावुक हृदय से कहा कि इस यात्रा के लिए इस्रायल 70 वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा था। मुझे लगता है कि इस यात्रा के लिए इस्रायल 2000 वर्ष से प्रतीक्षा कर रहा था, जब उनका पहला बेड़ा अलीबाग (मुंबई) तथा नौगांव (कोंकण सागर तट) उतरा था। तब से भारत में बसे यहूदी भारतीय भाषा, भूषा, त्योहार, यहां तक कि जातिगत नाम जैसे अष्टेकर, भाष्टेकर, करदीकर अपना कर भारतीयों के साथ रच बस गये। और उसी समय से उनके मन में इच्छा थी कि एक दिन वे पुन: अपने देश जाएंगे और तब भारतीयों को भी वहां सम्मान से आमंत्रित करेंगे। 1948 में स्वतंत्र हुए इस्रायल के साथ सेकुलर दूरियां इतनी बनीं कि सर्वाधिक निकट देश के साथ आत्मीय संबंधों का प्रकटीकरण होने में 70 साल लग गये। यह केवल और केवल राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ तथा भारतीय जनता पार्टी के तपोनिष्ठ कार्यकर्ताओं, वैचारिक दिशा देने वाले अधिकारियों एवं नेताओं को श्रेय जाता है कि उन्होंने लगातार इस्रायल से संबंध बनाये रखने और उसे सफल परिणति तक पहुंचाने के सतत् प्रयासों में कभी कमी नहीं आने दी। अंतत: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एवं पं. दीनदयाल उपाध्याय के प्रखर शिष्य श्री नरेन्द्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हुए जिन्होंने इस्रायल की आत्मीयता को भारत के बंधुभाव से जोड़ते हुए तेल अवीव की यात्रा की। यह यात्रा सदियों पुराने संबंधों का वसंत राग बन गई जो रक्षा, कृषि, विज्ञान के क्षेत्र में हुए समझौतों से भी प्रबलतर है।
एक अत्यंत आत्मीय एवं सदैव भरोसे योग्य इस्रायल के साथ संबंध उपर्युक्त स्तर तक लाने में सात दशकों का समय लगा। इसका एकमात्र कारण भारत का छद्म सेकुलरवाद और आत्मघाती मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति ही रही। भारत सभी अरब देशों के साथ अच्छे रिश्ते चाहता है— फिलीस्तीन के प्रति भारत की नीति बदली नहीं है। अभी मई में फिलीस्तीन के राष्टÑपति महमूद अब्बास भारत की सफल यात्रा करके गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी की सऊदी अरब यात्रा बहुत सफल रही है और ईरान सहित खाड़ी के मुस्लिम देशों से भारत के रिश्ते बेहतर हुए हैं। इस्रायल से संबंधों की प्रगाढ़ता के अर्थ को किसी अन्य देश से संबंध कम करने में नहीं देखना है। भारत अपनी राष्टÑीय सुरक्षा और कृषि व्यवस्था के लिए संप्रभु राष्टÑ के नाते पहली बार  स्वतंत्र नीति अपनाने का कदम उठा रहा है। इसके लिए मोदी सरकार को साधुवाद।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वागत में सारा इस्रायल सजा दिया गया। इस्रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू मोदी की यात्रा के हर पड़ाव में हवाई अड्डे पर स्वागत करने से लेकर तीसरे दिन हवाई अड्डे पर विदाई देने तक उनके साथ रहे। वहां के टैक्सी और परिवहन चालक संगठनों ने श्री मोदी के स्वागत में आने वाले इस्रायलियों के लिए मुफ्त सेवा की घोषणा की। भारत से बहुत बड़ी संख्या में मुम्बई व अन्य प्रांतों से यहूदी मोदी के स्वागत हेतु तेल अवीव पहुंचे। दुनिया के किसी देश में एक विदेशी अतिथि के आगमन पर इतना रोमांच भरा स्वागत शायद किसी भी नेता का न हुआ होगा।
यहूदियों पर दुनिया भर में जो भयानक अत्याचार हुए, उनमें हिन्दुओं को विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा हिंदू नरसंहार, मंदिरों का ध्वंस, कन्वर्जन तथा यातनाओं की छवि दिखती है। इस्रायल 14 मई, 1948 को स्वतंत्र हुआ, लेकिन सिर्फ चौबीस घंटे के भीतर ही उस पर मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और ईराक की फौजों ने संयुक्त आक्रमण कर दिया। यह युद्ध पन्द्रह महीने चला, अंतत: इस्रायल  जीता। वहां के राष्टÑपति बेन गुरियन ने दो हजार वर्ष से प्रयुक्त न हो रही हिब्रू भाषा को राष्टÑभाषा बनाने का साहस दिखाया। दुनियाभर में बिखरे यहूदी इस्रायल आए। चारों तरफ से मुस्लिम शत्रु अरब देशों से घिरा इस्रायल आज ज्ञान, विज्ञान, तकनीकी, साइबर विज्ञान, सुरक्षा तथा सॉफ्टवेयर में विश्व में प्रथम श्रेणी का देश बन गया है। केवल 80 लाख की जनसंख्या और 20,770 वर्ग किमी के क्षेत्रफल वाला इस्रायल रक्षा, गुप्तचर यंत्रों, राडार, प्रक्षेपास्त्र निर्माण ही नहीं बल्कि कृषि, डेयरी उत्पादन के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व कर रहा है। आतंकवाद के विरुद्ध गुप्तचर सूचनाएं आदि महत्वपूर्ण सामरिक मदद इस्रायल से ही मिल रही है। राजस्थान में रेगिस्तानी क्षेत्रों को हरा-भरा कर वहां खेती और फलों के उत्पादन में इस्रायल ने भारत को बहुत बड़ा योगदान दिया है।
1992 में राजनयिक संबंध स्थापित होने के बावजूद कांग्रेस सरकारें मुस्लिम वोट बैंक तथा अरब देशों की नाराजगी के भय से इस्रायल से संबंध बढ़ाने में हिचकिचाती रहीं। जबकि इस्रायल बिना संकोच लगातार भारत की सहायता करता रहा। केवल नरेन्द्र मोदी सरकार आने के बाद ही इस्रायल से संबंध प्रगाढ़ हुए। भारत के राष्टÑपति श्री प्रणब मुखर्जी 2015 में इस्रायल यात्रा पर गए और यह किसी भी भारतीय राष्टÑपति की प्रथम इस्रायल यात्रा थी। इस्रायल के राष्टÑपति श्री रूवेन रिवलिन नवंबर, 2016 में भारत यात्रा पर आए।
मोदी सरकार ने इस्रायल के साथ सर्वाधिक सामरिक समझौते भी किए ताकि प्रौद्योगिकी स्थानांतरण की नीति के तहत भारत के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को इस्रायल का सहयोग मिले। इसमें विनाशकारी मारक क्षमता वाला बराक-1 प्रक्षेपास्त्र प्रतिरोधक सिस्टम है तो 8358 एन्टी टैंक गाइडेड प्रक्षेपास्त्र स्पाइक और 321 प्रक्षेपास्त्र लांचर खरीदे गए, दोनों का मूल्य 6,690 लाख अमेरिकी डॉलर है। इसके अलावा 3 अरब डॉलर मूल्य के अवाक्स राडार सिस्टम, जमीन से हवा में मार करने वाला भयानक स्पायडर प्रक्षेपास्त्र लेने और डीआरडीओ के साथ अनेक स्तरों पर रक्षा उत्पादन के महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं।
ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी में (740-722 ई.पू.) असीरिया ने इस्रायल पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया था। तब से यहूदियों का इतिहास विस्थापन, यातनाओं, बंदी शिविरों, नस्लीय नरसंहार, भेदभाव और हिटलर के गैस चैंबरों में तड़प-तड़प कर मरने का रहा है। भारत का हिन्दू समाज और यहां के हिन्दू राजा ही ऐसे थे जिन्होंने यहूदियों को बराबरी का दर्जा, सम्मान और वास्तविक अपनापन दिया। यहां तक कि प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की साम्राज्य के शिकंजे से इस्रायल भूमि के हाइफा नगर को मुक्त कराने में भारतीय सैनिकों ने निर्णायक भूमिका निभाई और 23 सितंबर, 1918 को हाइफा मुक्त करा दिया। यह खबर सुनते ही दुनिया भर के यहूदी खुशी से झूम उठे। नई दिल्ली का महत्वपूर्ण ‘तीन मूर्ति चौक’ उसी विजय की याद में बना है- जिसे मोदी शासन ने अब हाइफा चौक नाम दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने हाइफा में भारतीय सैनिकों के स्मारक पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। इस्रायल में 60,000 से ज्यादा भारतीय मूल के यहूदी हैं जो वहां के जनजीवन में ‘भारत’ को जीते हैं। उसी तरह दो हजार साल से भारत में भी एक ‘इस्रायल’ है, जो हर दिन, हर पल अपनी ‘धर्मभूमि’ इस्रायल को जीवित रखता है।
पिछले दिनों भारत-इस्रायल संबंधों पर अपनी पुस्तक के संदर्भ में मैं उन यहूदियों से मिला तो अनेक ऐसे तथ्य सामने आए जो प्राय: हमारी जानकारी में नहीं आते। पहला यहूदी बेड़ा नौगांव (मुंबई से समुद्री मार्ग से दो घंटे की दूरी पर) उतरा था। उसमें सौ के लगभग यहूदी थे, जो बगदाद से आ रहे थे। दुर्भाग्य से तट से कुछ दूरी पर जहाज चट्टान से टकरा गया- मात्र ग्यारह लोग बचे। उनकी संतानें आज भी बगदादी यहूदी कहलाती हैं। प्रारंभ में उन्होंने घानी के तेल का काम किया, सो उन्हें ‘शनिवार तेली’ कहा जाने लगा। मुंबई सिनेगॉग (यहूदी प्रार्थनालय) के अध्यक्ष श्री राल्फी झिराड (उनके पूर्वज नौगांव के पास झिराड गांव में बसे, सो उनकी ‘जाति’ झिराड हो गयी) बताते हैं कि यहूदी समाज के लोग सदा सबसे मिल-जुल कर रहे। वे मुझे नौगांव में यहूदी स्मारक भी दिखाने ले गए जहां विश्व प्रसिद्ध अलीबाग सिनेगॉग के अध्यक्ष श्री लेवी अशर भोनकर मिले और उस क्षेत्र की गाथा सुनाई। दो हजार साल कैसे बीत गए।
मुंबई के तिफेरथ इस्रायल सिनेगॉग में अनेक यहूदी गणमान्य लोगों से भेंट हुई। उस प्रार्थना घर के अध्यक्ष श्री एरॉन बेंजामिन कन्दलेकर ने अपने युवा साथियों को भी बुला लिया। वे बोले-भारत हमारी मातृभूमि है- इस्रायल हमारी धर्मभूमि। हालांकि पचास हजार यहूदी इस्रायल चले गए हैं, फिर भी हमारा जाने का मन नहीं होता। उन्होंने मुंबई तथा महाराष्टÑ के श्रेष्ठ अस्पताल, पुस्तकालय, विद्यालय और चिड़ियाघर जैसे स्थान बनाए। जैसा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भी तेल अवीव के सार्वजनिक समारोह में जिक्र किया। 1971 में नब्बे हजार पाकिस्तानियों से आत्मसमर्पण कराने के मुख्य रणनीतिकार ले.जन. जैकब भी यहूदी थे।
2015 से श्री मोदी की इस्रायल यात्रा के लिए वातावरण बनाया गया। उस वर्ष आजादी के बाद पहला अन्तरराष्टÑीय यहूदी प्रतिनिधिमंडल जब संसद आया तो उसके स्वागत और विश्व के विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधियों को संसद दिखाने का दायित्व मुझे मिला था।  संसद में इस वर्ष विभिन्न राष्टÑीय दलों के प्रमुख नेताओं व सांसदों ने इस्रायल से मैत्री का अनौपचारिक संसदीय समूह भी बनाया और भारत में इस्रायल के वर्तमान राजूदत श्री डेनियल कारमॉन ने उनसे चर्चा की तथा प्रश्नों के भी उत्तर दिए।
इस्रायल मन का मीत है- दिखाने या कूटनीतिक स्वार्थ साधने का साधन नहीं। विश्व में इस्रायल ही शायद ऐसा देश होगा जिसे हम दो सौ प्रतिशत विश्वसनीय कह सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री नेतन्याहू विश्व में आतंकवाद और युद्ध की विभीषिका समाप्त करने के आशा स्तंभ और विश्वास के प्रतीक बन गए हैं।

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