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सलाफी सोच और घाटी में अलगाववाद

Written byArchiveArchive
Jun 5, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Jun 2017 12:46:23

कश्मीर घाटी में एक दौर था जब हिंदू और मुसलमान मध्य मार्ग पर चलते हुए आपस में सदाचार दिखाते थे। लेकिन मस्जिदों पर वर्चस्व की होड़ शुरू होने के बाद मुसलमानों में जो नेता उभरे वे मत को लेकर कट्टर ही थे। मुसलमानों को पूर्व की संस्कृति से अलग करके ‘सही मुसलमान’ बनाने की गलत मुहिम शुरू की गई

जवाहरलाल कौल
त्राल, कश्मीर के निसार अहमद भट  ने एक पुस्तक लिखी है, नाम है ‘अंजुमन – ए – मदारिस : जम्मू एवं कश्मीर’ जिसमें राज्य में चल रहे मदरसों का विवरण दिया गया है। राज्य में कुल 499 मदरसे हैं। अधिकतर मदरसों का संचालन दारुल उलूम, देवबंद से किया जाता है। कुछ मदरसे नदावतुल उलेमा, लखनऊ से जुडेÞ हैं तो कुछ जमाते इस्लामी और जमाते अल हदीस के नियंत्रण में हैं। मदरसों के संचालक दावा करते हैं कि एक भी आतंकवादी ने इन मदरसों में शिक्षा प्राप्त नहीं की है। यह दावा गलत नहीं होगा, क्योंकि इस तरह के दावों की आसानी से जांच की जा सकती है। लेकिन इसके साथ मेरा कहना है कि 49 मदरसों के संचालकों ने जानकारी देने से इनकार कर दिया। मदरसों के बारे में जानकारी देने से इनकार करने के पीछे क्या है, मालूम नहीं, लेकिन जो भी है, उसे छिपाने की उन मदरसों को सख्त जरूरत रही होगी।  
दुनियाभर में मदरसों पर यह आरोप नहीं है कि वे मुसलमान बच्चों को हथियारों का प्रशिक्षण देते हैं। बाकायदा आतंकवादी प्रशिक्षण के लिए जिन सुविधाओं और जिस तरह के संगठन की आवश्यकता होती है, वे शहरों और कस्बों में चल रहे मदरसों में कभी प्राप्त नहीं हो सकता। और फिर जिन बडेÞ-बडेÞ स्ांस्थानों से ये संचालित होते हैं, वे इस प्रकार का कोई जोखिम नहीं उठा सकते जिसमें कभी भी कानून का हाथ उनकी गर्दन तक पहुंच जाए। हमें आतंकवादी शिविर और इस्लामी शिक्षा देने वाले मदरसे में अंतर करना चाहिए।
आतंकवाद के उदय से पहले कश्मीर में एक दौर ऐसा भी चला था जिसमें  दक्षिण कश्मीर में कुछ मदरसों को मदरसा नहीं, इकबाल स्कूल कहा जाता था। इनमें उर्दू कायदा पढ़ाते हुए यह भी सिखाया जाता था कि ‘काफिर’ कौन होता है और उसके साथ क्या सलूक किया जाना चाहिए। ‘काफ से काफिर’ होता है और पहचान के लिए एक गैर-मुस्लिम व्यक्ति की तस्वीर दिखाई जाती थी। मीरवायज मौलवी मोहम्मद फारुख और अनंतनाग के काजी निसार के बीच मस्जिदोें पर वर्चस्व की जंग में खुद को बेहतर मुसलमान दिखाने की होड़ का वह दौर था। लेकिन आमतौर पर मदरसों में हथियारोें की तालीम नहीं दी जाती है, यह बात सही है।
मदरसों पर आरोप है कि वहां इस्लाम की ऐसी शिक्षा दी जाती है जिससे न केवल नफरत पैदा होती है अपितु अलग-अलग संप्रदायों के साथ रहने की गुंजाइश ही समाप्त होती है। भारत में सदियों से हिंदू और मुसलमान ही नहीं, बौद्ध, ईसाई और पारसी आदि भी शांति से रहते आए हैं। कश्मीर में तो मुस्लिम आक्रमण और शासन के शुरुआती दौर के बाद हिंदू और मुसलमानों ने साथ रहने और जीने का अपना सूत्र बनाया था। वह बुद्ध की तरह का मध्य मार्ग था, जिसमें एक-दूसरे के मान-बिंदुओं का सम्मान करना महत्वपूर्ण था। नुंद ऋषि, जिन्हें मुसलमान ‘शेख नूरुद्दीन’ कहा करते हैं, मुसलमान होते हुए भी अपने आपको ऋषि परंपरा का वारिस मानते थे और वेदांत और शैव मतों की शिक्षा देने वाली लल्लेश्वरी को अपना गुरु मानते थे। कश्मीरी मुसलमान भी कश्मीर को ‘ऋषियों की वाटिका’ कहते थे। और जब लाहौर में दो पंजाबियों,  अहमदिया मुखिया मिर्जा बशीरुद्दीन महमूद और मुस्लिम लीग के मोहम्मद इकबाल ने  कश्मीरियों की लड़ाई लड़ने के लिए जम्मू-कश्मीर समिति बनाई तो कश्मीरी इससे बिल्कुल अनभिज्ञ थे, वे नहीं जानते थे कि लाहौर में उनकी किस लड़ाई की बात हो रही है। जब अहमदिया नेता कश्मीर को अपने मजहब का  स्वर्ग बनाने के सपने देख रहे थे तो उन्हें कश्मीरी मुसलमानों को देखकर अचरज हुआ होगा कि ये मुसलमान तो कुछ अलग ही किस्म के हैं। इकबाल को भी महसूस हुआ होगा कि यहां लीग के पांव जमाना आसान नहीं होगा। दोनों की सहमति से एक रास्ता खोज लिया गया। अहमदिया नेता को जिम्मेदारी दी गई कि वे पहले कश्मीरी मुसलमानों को ‘सही मुसलमान’ बनाने का आंदोलन छेडेÞ।
इस तरह कश्मीर घाटी के देहाती इलाकों में बड़ी संख्या में मदरसे खुले, जिनका उद्देश्य कश्मीरियों को मध्य मार्ग से हटाकर एक धु्रव पर खड़ा करना था, जहां से हर दूसरा मत या वर्ग दुश्मन दिखाई दे। ये मदरसे बहुत समय तक नहीं चले क्योंकि बशीरुद्दीन जल्दी ही समझ गए कि वे लीग के सामने नहीं टिक सकते। कश्मीर समिति से उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा और जो जमीन उन्होंने तैयार की थी, उसी पर अन्य सुन्नी तब्लीगों ने अपने-अपने इदारे खडेÞ कर दिए। फिर भी मुस्लिम लीग, जिसने कश्मीर में अहमदिया दखल को समाप्त किया, वह भी कश्मीर में अपनी तरह के मदरसे नहीं बना पाई।
दरअसल राजनीतिक दल के रूप में लीग कश्मीर घाटी में अपने पांव कभी जमा ही नहीं सकी। लेकिन जमाते इस्लामी सक्रिय रही। मौलाना मौदूदी के पाकिस्तान चले जाने के बाद भारत में जमाते इस्लामी को राजनीति से अलग कर दिया गया था, लेकिन कूटनीतिक समझदारी के तहत जम्मू-कश्मीर को इस फैसले से अलग रखा गया। भारत विभाजन के पश्चात जम्मू-कश्मीर में ही जमात राजनीतिक रूप से भी सक्रिय रही और मजहबी स्तर पर भी। जमात के मदरसे कश्मीर के मिजाज को बदलने में सबसे प्रभावी रहे हैं। मौदूदी जिन्ना को ‘सही मुसलमान’ नहीं मानते थे और मुस्लिम लीग की राजनीति को मुसलमानों के लिए घातक घोषित कर चुके थे। उन्हें लगता था कि इस्लाम में राजनीतिक व्यावहारिकता और खुदगर्जी की मिलावट से इस्लाम को ही नुक्सान होगा।1941 में मौलाना मौदूदी ने पठानकोट में एक सम्मेलन आयोजित किया। इसमें शोपियां क्षेत्र के तीन कश्मीरी विद्वान, कारी सैफुद्दीन, मौलवी गुलाम अहमद और सादुद्दीन तारबली भी शामिल हुए थे। मौदूदी के विचारों से प्रभावित होकर वे जब कश्मीर लौटे तो उन्होंने 1942 में जमाते इस्लामी जम्मू-कश्मीर की स्थापना की। यह तो थी जमाते इस्लामी हिंद की ही शाखा, लेकिन जल्दी ही इसे राष्ट्रीय संगठन से मुक्त कर दिया गया।
मौदूदी ने पाकिस्तान जाने से पहले जमात को केवल मजहबी मामलों तक सीमित कर दिया था। कश्मीर की जमात को राजनीतिक गतिविधियां चालू रखने की छूट मिल गई। तारबली का मानना था कि कश्मीर में इस्लाम को स्थानीय रीति-रिवाजों और मान्यताआें से मुक्त करना चाहिए, क्योंकि पूर्व की इन मान्यताओं और सांस्कृतिक विशेषताओं  से  इस्लाम ‘प्रदूषित’ हो गया है। कश्मीर में सदियों से पीरों, फकीरों और ऋषियों-संतों का सम्मान किया जाता था और इनकी दरगाहों और स्मारकों, जिन्हें कश्मीरी अस्थापन (स्थापना) कहते हैं, पर मुरीदों की भारी संख्या जुटती थी।
‘अल्लाह की जमीन पर अल्लाह का निजाम’(शासन) स्थापित करने के उद्देश्य से बनी जमाते इस्लामी ने शीघ्र ही मदरसों का जाल बिछा दिया। जब शेख अब्दुल्ला की सत्ता को भी खतरा महसूस हुआ तो जमात के स्कूलों पर प्रतिबंध लगाया गया। इसे निरस्त करने के लिए 1988 में ‘फलाह आम ट्रस्ट’ की स्थापना कर दी गई, जिसका काम इन शिक्षण केंद्रों को चालू रखना था। खुफिया एजेंसियों की रपटों के अनुसार इन स्कूलों के बहुत से बच्चे सीमा पार करके आतंकवादी गुटों में शामिल हो जाते थे। ऐसे ही हालात में जमात ने हिज्बुल मुजाहिद्दीन को अपने सशस्त्र बल के रूप में अपना लिया। उसके मुखिया  बदनाम आतंकवादी सलाउद्दीन के अनुसार  हिज्बुल मुजाहिद्दीन ‘जमात की तलवार’ है। जमात का संपर्क पाकिस्तान की आइएसआइ के साथ तो पहले से था लेकिन आतंकवादी संगठन की सरपरस्ती के बाद तो यह संपर्क नियमित हो गया। इस दौर में जमात के सबसे प्रभावी नेता सैयद अली शाह गिलानी थे। स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का जन्म उस अलगाववादी विचारधारा से ही हुआ जिसका प्रचार बडेÞ पैमाने पर मदरसों के माध्यम से होता रहा है। इससे यह नहीं मानना चाहिए कि केवल जमाते इस्लामी ही इसके लिए उत्तरदायी है, जमात ने पहली बार अलगाववाद और आतंकवाद को जोड़ा और और संयुक्त समरनीति के रूप में पेश किया। लेकिन जहां तक वैचारिक स्तर पर अलगाववाद को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सवाल है तो उसमें कुछ गुट जमात से भी आगे निकल चुके हैं।
हाल ही में कश्मीर में ‘खलीफा’ अबूबकर के झंडे फहराने की कुछ घटनाओं से अनुमान लगाया जाना चाहिए कि कश्मीर में इस्लाम  की कथित शुद्धिकरण की लहर को अंतरराष्ट्रीय आयाम देने वाले प्रचारकों की कश्मीर में उपस्थिति कश्मीर के लिए ही नहीं, देश के लिए भी खतरे का संकेत है। सलाफी इस्लाम, जिसका जन्म लगभग 2 शताब्दी पहले सऊदी अरब में  हुआ था, भारत में विभाजन के दौरान भी मुस्लिम जनमानस में स्थान नहीं पा सका था। लेकिन अब वह हमारे दरवाजे पर दस्तक देने लगा है। इस्लाम का सलाफी संस्करण मौदूदी के इस्लाम से एक कदम आगे है।
मौदूदी का दावा है कि ‘इस्लाम राजनीतिक समझौतेबाजी में विश्वास नहीं करता। राजनीतिक शासन में इस्लामी नियम-कायदों में किसी प्रकार का संशोधन नहीं होना चाहिए’। लेकिन सलाफी इस्लाम में गैर मुस्लिम को स्वीकार करना, उसके साथ रहना ही गलत है। वह किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं है। लगता है, ‘पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र मुसलमानों के लिए कफन जैसा है जिनमें उनका दम घुट जाएगा’, ऐसा कहने  वाले इकबाल के भूत को पुनर्जीवित किया जा रहा है।  

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