कला/संस्कृति - कांचसे बने ढोल-नगाड़े
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कला/संस्कृति – कांचसे बने ढोल-नगाड़े

Written byArchiveArchive
Jun 5, 2017, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 05 Jun 2017 14:30:57

– महेश शर्मा –

उज्जैन नटराज शिव की नगरी है। आखिर नटराज से बेहतर ताल वाद्य का ज्ञान किसे होगी? और फिर उनकी नगरी के संगीत रसिकों की बात करें तो नटराज के आशीर्वाद से यहां न सिर्फ सुधी श्रोता, बल्कि प्रतिभावान कलाकारों की बहुतायत है। उज्जैन   के ऐसे ही एक कलाकार हैं जिन्होंने लुप्तप्राय वाद्ययंत्रों का फिर सृजन करने का बीड़ा उठाया है। मध्य प्रदेश सरकार के सामाजिक न्याय विभाग में बतौर कलाकार नौकरी करने वाले 52 वर्षीय नरेंद्र सिंह कुशवाह कांच का नगाड़ा, कांच का डमरू, नट-बोल्ट से कसा गया मिट्टी का नगाड़ा, एक नट से कसने वाला वाद्य यंत्र, पत्थर पर चमड़ा कस कर पत्थर तरंग नामक यंत्र बनाकर तीन बार 2002, 2010 और 2011 में लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज करा चुके हैं। अब उन्होंने बांस के वाद्य यंत्रों का निर्माण कर गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह बना ली है।
उल्लेखनीय है कि बांस से अब तक बांसुरी ही बनाई जाती थी, लेकिन कुशवाह ने बांस का ढोल, बांस का नगाड़ा, बांस का डमरू, बांस तरंग के साथ ही जहां प्राचीन वाद्य यंत्र गोपीचंद बनाया, वहीं पाश्चात्य वाद्य यंत्र बोंगो भी बांस का इस्तेमाल कर बनाया है। यही नहीं उन्होंने बेंत का प्रयोग कर डफली और बेंत का ढोल भी बनाया है।
 संगीतज्ञों के परिवार में बचपन से ही संगीत में रुचि रखने वाले कुशवाह ने कक्षा 11 तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद संगीत प्रभाकर उपाधि प्राप्त की। 10 साल की अवस्था में जब कुशवाह के बड़े भाई दौलतसिंह कुशवाह, जो सभी वाद्य यंत्र बजा लेते थे, ने  'बोंगो' लाकर दिया तो इस पश्चिमी वाद्य यंत्र ने उन्हें ऐसा आल्हादित किया कि वे संगीत को ही अपना सब कुछ बना लेने की ठान बैठे। परिणाम यह हुआ कि तबले के साथ भारतीय वाद्य यंत्र की ओर मुड़कर आज वे अनेक विलुप्तप्राय वाद्य यंत्रों को नया जीवन दे रहे हैं। पं़ दुर्गाप्रसाद, हीरालाल जौहरी और गोकुलप्रसाद नटराज जैसे नृत्याचायोंर् के मार्गदर्शन में उन्होंने तबले की थाप को परिमार्जित किया और वषार्ें तक नृत्य में तबले पर संगत देते रहे। इसी दौरान स्थानीय प्रयोगधर्मी संगीतज्ञ इंदर सिंह बैस, जिन्होंने एक त्रिमुखी साज बनाया था, से प्रेरणा लेकर कुशवाह ने वाद्य यंत्रों की दुनिया में कुछ नया बनाने का प्रण लिया। भारतीय वाद्य संगीत जगत के लिए यह अच्छी बात थी कि एक दिन पं़ लालमणि मिश्र की 1932 में प्रकाशित पुस्तक कुशवाह के हाथ लग गई जिसमें उन्होंने 17वीं सदी के पंचमुखी वाद्य यंत्र का चित्र देखा और उसे बनाने लगे। जब सफलतापूर्वक उसे बना लिया तो उन्होंने ऐसे लुप्तप्राय वाद्य यंत्रों को दोबारा बनाने और चलन में लाने का बीड़ा ही उठा लिया।
1996-1997 में उन्होंने कांच का नगाड़ा बनाया। फिर उन्होंने कांच का डमरू बनाया और जब उन्होंने मिट्टी में नट-बोल्ट कसकर नगाड़ा बना दिया तो लोग अचंभित हो गए। इसके बाद उन्होंने ऐसा वाद्य यंत्र बनाया जिसमें सिर्फ एक नट ही कसा हुए था।
जब उनका यह प्रयास लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के 2002 संस्करण में दर्ज किया गया तब जाकर लोगों ने उनकी मेहनत को सराहा। जब उन्होंने करीब 19 इंच व्यास का कांच का कटोरा विशेष तौर पर बनवाया और उसको नगाड़े का स्वरूप देकर प्रस्तुति दी तो प्रेक्षकों ने दांतों तले उंगलियां दबा लीं, क्योंकि कांच जैसे भंगुर पदार्थ पर नट-बोल्ट कसना आसान नहीं था और फिर उसको बजाना ज्यादा जटिल। उन्होंने मिट्टी और कांच ही नहीं कांसे का भी नगाड़ा बनाया है। उनकी प्रतिभा को देखते हुए जी टीवी के 'शाबाश इंडिया' कार्यक्रम में उन्हें पुरस्कृत किया गया है। देशभर में विभिन्न संगीत महोत्सवों में अपनी कला का प्रदर्शन कर
चुके हैं।
केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत दक्षिण-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, नागपुर द्वारा कुशवाह को गुरु-शिष्य परंपरा में नगाड़ा गुरु नियुक्त किया गया है।
पिछले कुछ समय से उन्होंने वाद्य यंत्रों के निर्माण में लकड़ी के प्रयोग को कम करने के लिए विकल्प खोजना शुरू किया और बेंत तथा बांस की सैकड़ों किस्मों को देखने के बाद उन्होंने कुछ खास बांस चुने और उन्हें गलाकर, मोड़कर और फिर आपस में चिपकाकर नए वाद्य यंत्र बनाए। वे कहते हैं, 'यह कार्य पर्यावरण बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण
कदम है।' उनकी इस अनूठी कलाकारी की गंूज दूर-दूर तक सुनाई दे रही है।     

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