नक्शों में समाया दिल्ली का जीवंत इतिहास
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नक्शों में समाया दिल्ली का जीवंत इतिहास

Written byArchiveArchive
May 29, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 29 May 2017 14:38:54

 

इतावली लेखिका मारिया ने अपनी पुस्तक में दिल्ली के पुराने नक्शे प्रकाशित किए हैं। उन नक्शों के जरिए वे बताती हैं कि दिल्ली कैसी थी और अब कैसी हो गई

नलिन चौहान

दिल्ली और उसका इतिहास इतनी परतों में सिमटा हुआ है कि किसी एक विशिष्ट क्षेत्र का चयन संभव नहीं है। पूरी दिल्ली में पसरे हुए प्राचीन स्मारकों में से हर किसी की अपनी एक अलग मगर दिलचस्प कहानी है। सो, ऐसे में एक खोजी की दृष्टि से उसे तलाशने की आवश्यकता है। अंतरराष्टÑीय और राष्टÑीय स्तर के अनेक अभिलेखागारों में दिल्ली के विभिन्न मानचित्र संग्रहित हैं। इनमें से सबसे पुराने नक्शे को खोजकर निकालना, रुई के ढेर में से एक सुई को खोजने के समान है। ऐसे समय में इतालवी लेखिका पिलर मारिया ग्युरेरिइरी ने अपनी पुस्तक ‘मैप्स आॅफ डेल्ही’ (रोली बुक्स से प्रकाशित) में 19 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से लेकर 2021 के मास्टर प्लान तक के नक्शों को अपने अध्ययन का आधार बनाते हुए न केवल राजधानी के पुराने गुम हो चुके रास्तों को खोजा है, बल्कि उनके माध्यम से इतिहास को देखने का एक दृष्टिकोण दिया है।
मारिया ने इन नक्शों का केवल दिखावटी इस्तेमाल न करते हुए उनके माध्यम से शहर के विकास का विश्लेषण किया है। उन्होंने ठीक एक इतिहासकार, जो कि ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्या को समझने के लिए लिखित अभिलेखीय रिकॉर्ड का प्रयोग करता है, की तरह नक्शों काइस्तेमाल करते हुए शहर के विकास को समझने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए वे अपने विश्लेषण के आधार पर मजबूती से इस बात को दर्शाती हैं कि दिल्ली अनेक एकल इकाइयों वाला एक संपूर्ण शहर है। कई जटिल संरचनाओं वाली ये इकाइयां एक बड़ी सामूहिक पहचान का निर्माण करती हैं और वह है शहरों का शहर दिल्ली।

हर नक्शा कहता एक कहानी
नक्शा बनाने के कई उद्देश्य होते हैं। कुछ नक्शे सैनिक उद्देश्यों के लिए, तो कुछ यात्रा-पर्यटन की सुविधा के लिए बनाए जाते हैं, जबकि अधिकांश नक्शे सर्वव्यापक प्रयोजनों के लिए बनते हैं। शहर का नक्शा तैयार करने वाले वास्तुकार, शहर के नियोजित विकास के लिए आवासीय जमीनों और दूसरे उपयोग की जमीनों के सीमांकन और रिकॉर्ड के लिए नक्शे तैयार करते हैं।
‘मैप्स आॅफ डेल्ही’ पुस्तक में, भिन्न उद्देश्यों से अलग-अलग समय में बनाए गए ये नक्शे एक साथ संकलित होकर बहुमूल्य ऐतिहासिक जानकारी का स्रोत बन गए हैं। इनकी मदद से दिल्ली के शहरी स्वरूप के विकास की यात्रा के साथ बीते दौर में शहर की बसावट के स्वरूप में आए विशिष्ट बदलावों को भी समझा जा सकता है।
इस पुस्तक में पहला नक्शा 19 वीं शताब्दी की शुरुआत का है। यह वही समय है जब अंग्रेज दिल्ली पहुंचे थे और दिल्ली पर आधिपत्य के लिए अंग्रेजों-सिंधिया की मराठा सेना के बीच पटपड़गंज में एक युद्ध (1803) हुआ था। भारत में मानचित्र बनाने की विधा का आरंभ उपनिवेशवाद के साथ होने के कारण इनका गहरा जुड़ाव रहा है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि मानचित्र निर्माण, उसकी सूचना से उपजने वाला ज्ञान और इन दोनों से मिलने वाली शक्ति का हमेशा से आपस में अटूट संबंध रहा है।
मारिया के अनुसार, ‘‘इस किताब को लिखते समय मुझे नक्शों में छिपे अनेक छोटी पर आकर्षक ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में जानकारी मिली। उदाहरण के लिए, जैसे दिल्ली 1857, शहर की योजना और उससे सटे हुए इलाकों वाले नक्शे में, ‘जहां निकल्सन गिरा’ का वाक्य लिखा होना, रिज पर ब्रितानी कैम्प में क्वार्टर मास्टर जनरल के आॅफिस का बना होना या दिल्ली का युद्ध अंग्रेज जनरल लॉर्ड लेक का मराठों के विरुद्ध सैनिक अभियानों वाले नक्शे में आपस में खींची हुई दो छोटी तलावारों से मराठा-अंग्रेज युद्ध के स्थान को चिन्हित करता है।’’ उल्लेखनीय है कि 21 सितम्बर, 1857 को दिल्ली पर अंग्रेजों ने दोबारा अधिकार कर लिया, परंतु भारतीयों के साथ लड़ाई में जन निकल्सन मारा गया था।
इसी तरह, दिल्ली की घेराबंदी, 1857 का नक्शा, अंग्रेज छावनी की पहली स्थिति और बसावट को प्रदर्शित करता है। शाहजहांबाद की उत्तर दिशा में स्थित छावनी को रिज की ओर से सुरक्षा मिली हुई थी, जिसकी विशेषता छावनी का एक बहुत सरल और कामकाजी ग्रिड पैटर्न का होना था।
अंग्रेजों की सैन्य घेराबंदी को गहराई से समझने के लिए 8 जून से 14 सितंबर, 1857 की अवधि में दिल्ली में ब्रितानी सेना की तैनाती योजना को देखना उपयुक्त है। जहां, 1857 के गदर की सैन्य घटना का वास्तव में अधिक विस्तार में वर्णन किया गया है। नक्शे पर सैन्य युद्धाभ्यास साफ दिखते हैं, फिर चाहे वह दुश्मन की खाई हो, विशिष्ट तोपखानों की तैनाती की स्थिति या बाएं ओर से घुसने की संभावना हो अथवा दाएं ओर से घुसने की संभावना का संकेत। यहां अलग-अलग तोपखानों को चिह्नित करते हुए उनके कमांडिंग ब्रिगेडियर के नाम के साथ नामित किया हुआ है, जिसमें पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का दृश्य साफ दिखाई देता है।
किसी भी शहर के समकालीन विकास के मूल को समझने के लिए इतिहास और पुराने नक्शों से बेहतर कोई माध्यम नहीं हो सकता है। उनमें झांकने से यह पता चलता है कि मौजूदा महानगर की अनेक समस्याओं का कारण स्थानीय संदर्भ में पश्चिम के गलत मॉडल (प्रारूप) को अपनाया जाना या सीधा कहें तो नकल करना है।
लेखिका ने शहर की वास्तुकला और योजना बनाते समय देसी संदर्भ, उसका भूविज्ञान, जलवायु और संस्कृति की अनदेखी को रेखांकित किया है। उसने वास्तुकारों के इन मूलभूत कारकों पर ध्यान देने की अपेक्षा केंद्रीयकृत योजना यानी ऊपर से थोपने की प्रवृत्ति की कमी को उजागर किया है।
मारिया के अनुसार, गुड़गांव और नोएडा में अपनी स्थानीय आवश्यकताओं से हटकर बनी नई, चमकदार, कांच और लोहे वाली वास्तुकला की इमारतें इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं। उनका मानना है कि भारतीय युवा वास्तुकारों में अभी भी भवन निर्माण के लिए विदेशी मॉडलों के प्रति एक ललक है। इसके लिए वह वास्तुकला के पाठ्यक्रम में भारतीय इतिहास और विरासत के न होने की बात को दोषी मानती हैं। कहीं से प्रेरित होकर नकल करना तभी कारगर होता है जब युवा वास्तुकारों को इस बात का ज्ञान होता है कि उनकी नकल स्थानीय जनता की आवश्यकताओं को पूरा करने में सफल होगी। पर दुर्भाग्य से वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट है, क्योंकि अधिकतर युवा वास्तुकारों में इस दृष्टि का अभाव है। हैरानी की बात यह है कि मारिया को अपने अध्ययन में हाथ से बने नक्शे सबसे अधिक पसंद आए। उसमें भी विशेष रूप से 1807 का एक पुराना नक्शा, जो उन्हें उस दौर के गांव, जलमार्गों, नहरों और खेतों वाली विलक्षण दिल्ली में ले गया। मानो समय का पहिया उल्टा घूम गया हो।
इस पुराने नक्शे से इस बात का पता चलता है कि तब शहरी नियोजन में भूगोल और स्थलाकृति का विशेष ध्यान रखा जाता था। और कैसे दिल्ली जैसा प्राचीन शहर वास्तव में प्रकृति के समरूप बसा था न कि उसके विरुद्ध। उदाहरण के लिए अगर शाहजहांनाबाद के स्थान के चयन पर विचार करें तो पता चलेगा कि यह एक पहाड़ी पर बना शहर था जो कि प्राकृतिक रूप से बाढ़ से बचाव की स्थिति में था।  लेखिका का मानना है कि वास्तुकारों और योजनाकारों को पुरानी राजधानी की प्रकृति के साथ सहयोग की भूमिका के संबंध से प्रेरित होकर एक बेहतर और पर्यावरण-अनुकूल शहर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। दिल्ली के शानदार अतीत के नक्शों को देखना-बूझना एक अच्छा अनुभव हो सकता है।  

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