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पश्चिम बंगाल / रपट
बांग्लोदशी घुसपैठियों और कट्टरवादियों ने पश्चिम बंगाल का बुरा हाल कर रखा है। इनके आतंक के मारे सीमावर्ती क्षेत्र हिंदू-विहीन हो रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार मुस्लिम तुष्टीकरण में इतनी बौरा चुकी है कि उसे हिंदुओं
का दु:ख-दर्द दिखाई नहीं दे रहा
जिष्णु बसु
पश्चिम बंगाल में हिंदुओं के साथ बुरा बर्ताव जारी है, लेकिन वहां की खबरें मीडिया से लगभग गायब रहती हैं। ताजा मामला है 28 अप्रैल का। उस दिन सुंदरवन इलाके के सुंदरीखली बाजार में कुख्यात अपराधी जियाउद्दीन गाजी ने एक 28 वर्षीया हिंदू महिला लतिका नस्कर के साथ छेड़छाड़ की। उस समय उसके साथ उसका भतीजा भी था। बच्चे के सामने हुई छेड़छाड़ से वह तिलमिला गई और उसने जियाउद्दीन को पीट दिया। इसके बाद जियाउद्दीन और उसके साथी गुंडे लतिका पर टूट पड़े। वे लोग उसे तब तक मारते रहे जब तक वह बेहोश होकर जमीन पर गिर नहीं गई। अंत में गुंडे उसकी साड़ी खींचकर ले गए। ये गुंडे कथित तौर पर तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हैं।
अगले दिन सुंदरीखली के ग्रामीणों ने उन गुंडों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। लोगों ने न्याय की मांग के साथ मुख्य सड़क को दो घंटे के लिए बाधित कर दिया। इसके बाद पुलिस प्रशासन की नींद टूटी। पुलिस के दो स्थानीय अधिकारी ग्रामीणों से बात करने पहुंचे ही थे कि जियाउद्दीन के नेतृत्व में कुछ बंदूकधारियों ने ग्रामीणों पर हमला कर दिया। उन्होंने वहां बमबारी की और हवा में गोली चलाई। इससे 17 लोग, जिनमें पुरुष और महिलाएं भी शामिल हैं, घायल हो गए। घायलों को तत्काल स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया, लेकिन कुछ की हालत बहुत खराब होने पर उन्हें कोलकाता भेजा गया। कुछ को एसएसकेएम अस्पताल और कुछ को चित्तरंजन अस्पताल में भर्ती कराया गया। कई प्रयासों के बाद एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती सुब्बल अधिकारी के पेट से और चित्तरंजन अस्पताल में भर्ती इंद्रजीत मंडल के पैर से गोली निकाली गई। द्रौपदी सरकार, ललिता नक्सर जैसी अनेक महिलाएं सात दिन तक अस्पताल में भर्ती रहीं।
ये सभी लोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के हैं। इसके बावजूद पुलिस ने अभी तक एक भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया है। यह मामला संदेशखली पुलिस थाने में दर्ज है, जिसका नंबर है 170 और 176/2017।
सुंदरवन अभयारण्य को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित किया गया है। सुंदरवन का एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश में और शेष हिस्सा पश्चिम बंगाल के दो जिलों में है। ये जिले हैं उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना। देश विभाजन के बाद हिंदू शरणार्थियों ने बड़ी संख्या में सुंदरवन में शरण ली थी। विशेषकर 1971 के युद्ध के बाद हिंदू बड़ी संख्या में यहां आकर रहने लगे थे। इनमें से ज्यादातर अनुसूचित वर्ग के हैं। यहां पहले से जो हिंदू रह रहे थे, वे भी इसी वर्ग से हैं। इन लोगों ने हिंदू शरणार्थियों को बसाने में अहम भूमिका निभाई थी। इसलिए सुंदरवन के अलग-अलग हिस्सों में अनुसूचित वर्ग के लोगों की अच्छी खासी संख्या है।
लेकिन पिछले दो दशक में सुंदरवन की जनसंख्या में बड़ा बदलाव आया है। यहां बांग्लादेशी घुसपैठियों की तादाद बहुत बढ़ गई है। इसके लिए पहले की वाममोर्चा सरकार जिम्मेदार है। उसने केवल वोट के लिए घुसपैठियों को खुलेआम आने दिया। जब यहां घुसपैठिए आए तो बदमाशी भी बढ़ी। बदमाशों को वामपंथियों का समर्थन मिलता रहा। अब तृणमूल कांग्रेस इन बदमाशों को संरक्षण दे रही है। अनेक बदमाश किस्म के लोग तृणमूल के कार्यकर्ता हैं। तृणमूल ने ऐसे अनेक कार्यकर्ताओं को पद देकर सम्मानित भी किया है। 2010 में देगंगा में हुए दंगे के मुख्य अभियुक्त को दो बार सांसद पद से सम्मानित किया गया। कैनिंग नालीखली दंगे के साजिशकर्ता को भी राज्यसभा में भेजा गया था। यह समाचार आनंदबाजार पत्रिका में छप चुका है। 2001 में सोनाखली में संघ के चार स्वयंसेवकों—अनदी नस्कर, सुजीत मंडल, अभिजीत सरदार और पतित पवन नस्कर की बड़ी बर्बरता के साथ हत्या कर दी गई थी। ये लोग भी सुंदरवन में अपनी जमीन, संपत्ति और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे थे। लेकिन इन्हें भी आज तक न्याय नहीं मिला है।
हाल ही में तृणमूल कांगे्रस ने शाहजहां शेख को संदेशखली प्रखंड का अध्यक्ष बनाया है। संदेशखली में शेख की तूती बोलती है। जब वह बाहर निकलता है तो उसके आगे मोटरसाइकिल पर सवार दो बंदूकधारी होते हैं और पीछे चार मोटरसाइकिलें चलती हैं। उसके काफिले में कई कारें होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि संदेशखली में जितनी भी बदमाशी हो रही है, उसके पीछे शेख का दिमाग है।
इस इलाके में तस्करी मुख्य धंधा है, जो बांग्लादेश से होती है। इसमें कई वस्तुएं शामिल हैं। मछली पालन और र्इंट के कारोबार पर अपराधियों का वर्चस्व है। इन लोगों ने कृषि भूमि, जो अभी तक ज्यादातर हिंदुओं के पास है, पर कब्जा करने के लिए दुष्टता भरा एक रास्ता अपनाया है।
उल्लेखनीय है कि यह इलाका समुद्र के किनारे है। आसपास की नदियां भी समुद्र से जुड़ी हुई हैं। इस कारण इन नदियों का पानी खारा होता है। खारा पानी खेतों में न जाए, इसके लिए जगह-जगह मिट्टी के बांध बने हुए हैं। र्इंट के कारोबार में लगे लोग रात में उन बांधों को काट देते हैं। रातभर में सैकड़ों एकड़ खेतों में खारा पानी पहुंच जाता है। इस पानी के कारण चार-पांच वर्ष तक इन खेतों में कोई फसल नहीं हो पाती। जब फसल नहीं होती है तो किसानों को खाने के लाले पड़ जाते हैं। वे लोग शहरों की ओर पलायन करने लगते हैं और उधर उनके खेतों पर मुसलमान कब्जा कर लेते हैं और र्इंट का काम करने लगते हैं।
इस हालत में किसान अपने खेतों को बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। वे औने-पौने दामों में खेत बेचकर कोलकाता आदि शहरों में मजदूरी करते हैं, लेकिन उनके परिवार के लोग वहीं रहते हैं। इनमें ज्यादातर महिलाएं हैं। पुरुषों के नहीं रहने से जिहादी तत्व इन महिलाओं को परेशान करते हैं। यह जगह तेभागा आंदोलन के लिए प्रसिद्ध थी। तेभागा का अर्थ है एक तिहाई। भूमिहीन किसानों को इस आंदोलन के माध्यम से दो तिहाई उपज का अधिकार मिला था। इसे याद रखने के लिए संदेशखली में एक स्मारक बनाया गया था। अब जिहादी तत्वों ने उस स्मारक के शीर्ष हिस्से को तोड़कर उसे चांद-तारा की शक्ल दे दी है।
2015 में जिहादी तत्वों ने पुलिस और शाहजहां शेख की मौजूदगी में खुल्लाहटी गांव के अनूप मंडल की हत्या कर दी थी। उसी घटना में एक और युवक स्थायी रूप से विकलांग हो गया था। 2014 में भी दुलाल सरदार और खोखाने सरदार की हत्या हुई थी। इनमें से किसी को भी अभी तक न्याय नहीं
मिला है। ये सभी अनुसूचित जनजाति वर्ग के हैं। इन्हें न्याय दिलाने के लिए अब तक न तो अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग का कोई प्रतिनिधि आया और न ही इस वर्ग का कोई नेता। 2001 में आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप सिंह भूरिया एक दल के साथ आए थे। उस समय जिहादियों ने चार स्वयंसेवकों की हत्या कर दी थी। इस बार यहां के लोगों ने अत्याचारों के खिलाफ प्रभावी विरोध किया। 17 मई को बशीरहाट उप अनुमंडल कार्यालय के सामने लोगों ने धरना दिया। जिलाधिकारी को दिए ज्ञापन में लोगों ने अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग से आग्रह किया है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे। आयोग उनकी
गुहार कब सुनता है, यह देखना बाकी है।











