| दिंनाक: 22 May 2017 12:54:30 |
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एक सवाल जो मैं कई जगह, कई लोगों से पूछ चुका हूं— किसी वामपंथी की आने वाली पीढ़ी 'दामपंथी' क्यों होती है?
कहीं साम्यवादी मुखौटे का सच पूंजीवादी लुढ़कन ही तो नहीं है?
जिस सवाल पर वामपंथी लड़खड़ाते थे, उसका स्पष्ट जवाब सबसे बड़े कम्युनिस्ट, यानी चीन ने दिया है। 'वन बेल्ट वन रोड' माने ओबीओआर। माने एक पट्टी एक सड़क… माने तीन महाद्वीप और पैंसठ देशों को सड़क, बंदरगाह और रेल के जरिए एक रस्से में लपेटती जकड़बंदी। ऐसी फांस जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका, सबको आर्थिक कारणों से चीन से बांधने का काम करेगी।
अब कोई परदा नहीं। दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी पूंजीवादी योजना ही साम्यवाद का असली चेहरा है। ओबीओआर यानी वैश्विक संसाधनों को निगलते हुए पूंजीवादी तृप्ति से उठने वाली साम्यवादी डकार! चीन द्वारा 14 व 15 मई को अपने सबसे बड़े राजनीतिक-आर्थिक जुटान के जरिए साम्यवाद के विस्तारवादी सपने को दुनिया के सामने रखा गया है। यही है असली चीन!
यह सपना ऐसा है जिसमें विश्व के तीन चौथाई ऊर्जा स्रोत, आधी जनसंख्या और करीब-करीब आधा वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद ड्रैगन के घेरे में आ जाएंगे। सड़क और समुद्र मार्ग से दुनिया पर छा जाने का सपना। ऐसा सपना जिसके लिए पिछले पांच साल में चीन ने बड़ा दांव खेला और अगले पांच साल में सब कुछ झोंकने को तैयार बैठा है।
उत्पादन के ढेर से दबे और माल की खपत के लिए छटपटाते चीन के लिए आज ओबीओआर उसके अस्तित्व से जुड़ा सवाल बन चुका है। लेकिन क्या यह दांव सफल होगा? चीन को उम्मीद थी कि ओबीओआर के मुद्दे पर भारत झुकेगा, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
आधुनिक चीनी अर्थनीति को गढ़ने वाले उसके वर्तमान प्रधानमंत्री ली किकियांग की अतिमहत्वाकांक्षी योजना से भारत का छिटकना निश्चित ही ड्रैगन के लिए बड़ा झटका है। खासकर तब जब इसके लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनके दूतों ने पूरी जान लगा दी थी। 2013 में विश्व की जो सबसे बड़ी परियोजना “Silk Road Economic Belt” (SREB) के नाम से दुनिया के सामने रखी गई (आगे चलकर इसका ही खाका वन बेल्ट वन रोड के नाम से खींचा गया) उसका सबसे महत्वपूर्ण भाग ही गंभीर आपत्तियों से घिर जाए, योजना का सबसे महत्वपूर्ण घटक ही छिटक जाए तो ऐसी योजना का क्या भविष्य है?
जिसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीईपीसी) कहा जा रहा है वह यदि रेशम मार्ग का सबसे अहम हिस्सा है तो वह किस देश का भाग है?
पाकिस्तान का? उसके संविधान तक में इसका जिक्र नहीं है! चीन का? तमाम विस्तारवादी पैंतरों के बावजूद उसका राजनैतिक मानचित्र ऐसा दावा करने में अक्षम है!
भारत का? जी हां, भारत का ऐसा अनमोल रणनीतिक हिस्सा जिसे समाजवाद के लिए पलक-पांवड़े बिछाती राजनीति ने बिसराए रखा और जिस पर भारत के दुश्मन पंजे गड़ाते गए।
गिलगित-बाल्टिस्तान और पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के लोग दुनियाभर में पाकिस्तानी पंजे से मुक्ति के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।
यह भारत का भूक्षेत्र है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ और उसकी प्रभुसत्ता से जुड़ा ऐसा प्रदेश जिस पर अवैध कब्जेदार और उसे शह देने वालों की तरफ से प्रश्न खड़े करने की कोशिश की गई। किन्तु और किसी का दावा बनता कहां है? गिलगित-बाल्टिस्तान की बिसराई कडि़यां भारत से जोड़े बिना ओबीओआर की कडि़यां कैसे जुड़ सकती हैं? ऐसे में भारत की आपत्तियों और अंतत: भारत द्वारा इस परियोजना से दूरी बनाने के बाद 'वन बेल्ट वन रोड' का क्या अर्थ रह जाता है?
हमारे आंगन में से दो पड़ोसी 'आपसी मिलीभगत' से रास्ता निकालेंगे इस पर भी अनुमति, सहभाग और क्षतिपूर्ति की बजाय तर्क देंगे कि इससे आपको लाभ होगा! यह बात किसे-कैसे मंजूर होगी?
हालांकि चीन द्वारा पूरी लामबंदी के बाद दुनिया के 29 देश बीजिंग में बीएआरएफ सम्मेलन में शामिल हुए लेकिन भारत के न आने से इस पूरी कवायद को पलीता लग गया। सम्मेलन की समाप्ति पर चीनी प्रतिक्रिया में उजागर झुंझलाहट को इसी संदर्भ में
देखना चाहिए।
यह ठीक है कि सम्मेलन से भारत के दूरी बनाने के बावजूद चीन अब भी अपने रुख पर अड़ा है। लेकिन ये सब ऊपरी भंगिमाएं हैं। उसके पास और चारा भी क्या है? मोटा आकलन है कि किकियांग और जिनपिंग की अगुआई में चीन अपने इस सपने पर पिछले पांच वर्ष में साठ अरब डॉलर का दांव खेल चुका है। अगले पांच साल में इससे दस गुना से भी ज्यादा (600 से 800 अरब डॉलर) का जुआ वह खेलने जा रहा है।
सवाल यह है कि विकास के हांफते इंजन को चलाए रखने की गरज से चीन ने जिस परियोजना के लिए तमाम संसाधन झोंक दिए, उससे वह कदम कैसे खींचे? चीन का मानना है कि सबसे बड़े रेशम मार्ग के माध्यम से दुनिया में मंदी के कुचक्र को तोड़ा जा सकता है। ठीक, लेकिन इसके लिए किसी देश की संप्रभुता से खिलवाड़ करने, किसी देश को तोड़ने का कुचक्र रचने की छूट उसे किसने दी?
फिलहाल ओबीओआर की सड़क जाम है। माल खराब होने या साम्यवादी लालाओं की पूंजी पानी होने का तर्क देकर यह जाम नहीं खुलवाया जा सकता। क्योंकि माल खराब होता रहे, प्रभुसत्ता और अखंडता का 'हाल' खराब करने की छूट दुनिया न चीन को दे सकती है, न पाकिस्तान को।