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प्रपंच का अंत जरूरी

Written byArchiveArchive
May 1, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 01 May 2017 12:10:33

सब द्वेष करने वालों का नाश करो। — सामवेद (855)

 

कुनमुनाहट तो पहले से थी लेकिन हाल की दो घटनाओं ने बता दिया कि स्थितियां एक बार फिर मनहूस करवट ले चुकी हैं।

छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सली, वामपंथी आतंकियों द्वारा 26 जवानों की जान लेना और दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में पीडीपी नेता अब्दुल गनी डार की आतंकियों द्वारा हत्या किसी भी भारत प्रेमी को आक्रोश से भर देने वाली घटनाएं हैं।

कुछ लोगों को घाटी के पत्थरबाजों और सुकमा के बर्बर नक्सलियों का संबंध-समीकरण पहली बार में चौंका सकता है लेकिन चौंकने से बात नहीं बनेगी। यह ऐसी बात है जिसे समझना और लोगों के सामने खोलकर रखा जाना जरूरी है।  याद कीजिए, दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में कुछ रोज पहले का हंगामा! कॉलेज में एक सेमिनार में कुछ वक्ताओं का आमंत्रण निरस्त हुआ तो क्या नारे लगे थे?

– बस्तर की आजादी तक जंग रहेगी जारी़.

– कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी जारी़.

नार्थ कैम्पस में इन नारों का क्या मतलब है? हमारी भविष्य की अति ऊर्जावान पीढ़ी के बीच बस्तर से कश्मीर तक इस आक्रोश को बोने का क्या मतलब है? ये कौन लोग हैं? कौन लोग हैं जो अबूझमाड़ से लेकर अनंतनाग तक भोले लोगों को ढाल बनाकर जवानों के सिर और भारत विरोधी आक्रोश की फसल काटने को तैयार 'हंसिया' या 'चांद-तारा' लेकर तैयार बैठे हैं? दरअसल, भारतद्वेषी लामबंदियों के तालमेल की गुत्थियां ऐसी हैं जो अपने-अपने व्याप और प्रभाव क्षेत्र में तो देश की प्रभुसत्ता और व्यवस्था को चुनौती देती ही हैं, आपस में गठजोड़ से दोहरी ताकत भी पाती रहती हैं। इस तरह देश के भीतर एक बड़े भूगोल में अदृश्य गठजोड़ों का ऐसा तगड़ा ताना-बाना रचा जाने लगता है कि इनसे पार पाना सरल नहीं रहता। भारत और भारतीयता को निशाना बनाने की मंशा ही इन लामबंदियों का फेवीकोल है। भारत विरोध की यह ऐसी भूलभुलैया है जहां एक साजिशी दस्ते की सुरंग दूसरे के अहाते से जुड़ी है और सब मिलकर भारत की अखंडता और राष्ट्रभाव पर आघात का मोर्चा खोले बैठे हैं।

अपने छोटे-छोटे अलग-अलग लक्ष्यों को सामने रखकर भी ये अघोषित गठजोड़ एक दूसरे के साथ समन्वय और सहानुभूति की छतरियां ताने रहते हैं। शहरों में उदारवादी और वन कंदराओं में उग्र आवाजों का यह घालमेल ऐसा कुहासा रचता है कि इस धुंधलेपन में लोकतंत्र और मानवता के हत्यारे भी आराम से छिप जाते हैं। उदारवादी तर्कों की ढाल तले मानवता के हत्यारे इतने सुरक्षित हैं कि शस्त्र तो छोडि़ए, उन पर कड़े शब्दों की मार-फटकार भी नहीं हो सकती।

नक्सली को आतंकी कहते ही दिल्ली जैसे महानगरों की पंचसितारा वातानुकूलित मांदों से पहले 'लिबरल' दर्दमंदों की हुआं-हुआं निकलती है, फिर धीरे-धीरे पूरा माहौल धूर्त बुद्घिजीवी गुर्राहटों से भर जाता है। इसी तरह कश्मीर के पत्थरबाजों के लिए एक सख्त शब्द उठाकर तो देखिए, सोशल मीडिया से लेकर टीवी बहसों और सेमिनारों तक में आपकी बोटियां नोंची जाने लगेंगी।

उपरोक्त दोनों ही स्थितियों में आप हिंसक-लिबरल चोगे का सच उघाड़ने की जरा कोशिश करें़..़ नाम, संस्था, चंदा, मित्रसूची़. हल्की-सी छान-फटक से पता चल जाएगा कि गुर्राने-बोटियां नोचने वाले उसी एक भूलभुलैया के तो वासी हैं! एक ही जमात!  क्या यह सिर्फ संयोग है? यह सिर्फ संयोग कैसे हो सकता है कि …

– बीएसएफ की पतली दाल के मुद्दे पर खाकी के नाम पर देश को उकसाने वाले लोग उन्हीं जवानों द्वारा (और वह भी अपनी जान बचाने की जुगत में) एक पत्थरबाज को जीप के आगे बांधते ही मानवाधिकारों की बर्छियों उठा लेते हैं?

सुकमा हमले के मौके पर चुप्पी ओढ़ने वालों में फिर वही चेहरे सामने आते हैं जो चंद रोज पहले छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों द्वारा बेला भाटिया को बस्तर से खदेड़ने पर दिल्ली तक हल्ला काट रहे थे! बेला पर स्थानीय लोगों का आरोप था कि वे और उनके जैसे लोग बस्तर के भोले-भाले लोगों को सरकार के विरुद्घ भड़काते हैं और नक्सलियों के पक्ष में माहौल बनाते हैं। दिल्ली और राष्ट्रीय मीडिया के दिलो-दिमाग पर छाई वामपंथ की हिंसक-बौद्घिकता… (जी हां, क्योंकि उनके पास अपने बेहूदा तकार्ें के जवाब सुनने लायक सहनशीलता भी नहीं है) कहीं कन्वर्जन में लगी मिश्नरियों, कहीं जिहाद के लिए दांत किटकिटाते सिरफिरों और कहीं माओ की हिंसक लीक पर चलते झूमते इन जत्थों में कोई साझापन दिखा?

इनमें आपस में कोई विरोध-टकराव कभी दिखा?

दरअसल इनका टकराव सिर्फ भारत से, उसकी अखंडता से और उसके उदार, सहृदय, निश्छल हिन्दू भाव से है। इस देश की संस्कृति से है। बहरहाल, बात फिर उसी मोड़ और प्रश्न पर— दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज के सेमिनार से उमर खालिद जैसे वक्ताओं का आमंत्रण निरस्त करना गलत कैसे था? क्या बस्तर का वामपंथी आतंक और कश्मीर का 'इस्लामी आजादी आन्दोलन' विरोधियों को किसी बहस की आजादी देते हैं? यह सवाल इसलिए भी क्योंकि उस सेमिनार का विषय ही था-विरोध की संस्कृति। जहां विरोध और विमर्श की रत्ती भर गुंजाइश नहीं, उन लोगों ने उदारता के नाम पर भारी गुंडागर्दी मचाई है। यह छद्म, यह भूलभुलैया अब टूटनी ही चाहिए।

 

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