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तलाक से निजात पाने की तड़प

Written byArchiveArchive
Apr 17, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 17 Apr 2017 14:50:31

तीन तलाक

मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक से मुक्ति की पाने का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं। वे मौलवियों की परवाह किए बिना प्रधानमंत्री से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गुहार लगा रही हैं। उनका कहना है कि तीन तलाक और बहुविवाह प्रथा पर रोक लगाकर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की जाए

 सुरेंद्र सिंघल

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने गत दिनों तीन तलाक पर एक बड़ा कदम उठाते हुए महिला मंत्रियों से मुस्लिम महिलाओं का पक्ष जानने को कहा हैं। उनके इस कदम के बाद राजधानी लखनऊ सहित सूबे की अधिकांश महिलाओं के मन में राहत की उम्मीद जगी है। मुल्ला-मौलवियों के नाइंसाफी भरे कायदो की जकड़न से वे बाहर आना चाहती हैं। मुस्लिम महिलाओं का गुस्सा तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह की प्रथा के खिलाफ दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। साथ ही उन्हें यह भी भरोसा है कि सर्वोच्च न्यायालय, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस अन्यायकारी और अमानवीय प्रथा से जरूर मुक्ति दिलाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ इसकी वैधता पर 11 मई से सुनवाई करने वाली है। प्रगतिशील मुस्लिम समाज यह भी चाहता है कि भारतीय संसद हिंदू मैरिज एक्ट की तर्ज पर मुस्लिम मैरिज एक्ट बनाए। लेकिन मजहबी शिक्षा की विश्वविख्यात संस्था दारुल उलूम देवबंद इन पेचीदा सवालों को लेकर खामोश है। उसके मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी कहते हैं, ''इस मसले को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड देख रहा है, जिसने सर्वोच्च न्यायालय में अपना हलफनामा दाखिल किया हुआ है।'' दिलचस्प बात यह है कि अधिकतर मुस्लिम महिलाएं पर्सनल लॉ बोर्ड को कोई मोल नहीं देतीं। यह समस्या इतना विकराल रूप धारण किए हुए है कि अकेले सहारनपुर में मुस्लिम महिलाओं के गुजारा भत्ते से जुड़े 2,400 से ज्यादा मुकदमे परिवार न्यायालय में विचाराधीन हैं। इस साल अभी तक 100 से ज्यादा मामले अदालत पहुंच चुके हैं। वकील अनवार अहमद कहते हैं, '' मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन ऑफ राइट ऑन डिवोर्स एक्ट 1986 के तहत मुस्लिम महिला को यह हक है कि वह अपने हितों की रक्षा करे। उसे अपने पति से गुजारा भत्ता मिले। सीआरपीसी की धारा 125 के तहत महिलाएं परिवार न्यायालय में गुजारा भत्ता दिलाने की गुहार लगा सकें। तलाक देने वाले पति की  जिम्मेदारी है कि वह महिला और बच्चों के बालिग होने तक उनका भरण-पोषण करे।'' एक अनुमान के अनुसार     भारत में करीब साढ़े आठ करोड़ मुस्लिम महिलाएं हैं। इनमें से  2,12,000 से ज्यादा तलाकशुदा हैं।

सहारनपुर में हाल ही में तीन तलाक के कई मामले सामने आए हैं। बेहद चर्चित मामला 29 वर्षीया आलिया अंसारी का है। आली तेली वाला चौक की निवासी आलिया दो बच्चियों की मां है। समाजशास्त्र एवं अंग्रेजी में एमए आलिया का 25 मार्च, 2012 को हरिद्वार के जसोधपुर गांव के वाजिद अली (पुत्र सईद अहमद) से निकाह हुआ था। निकाह के दो साल बाद ही तलाक लिखकर डाक से भेज दिया। तभी से आलिया अपने मायके सहारनपुर में है। वह कहती है कि उसका ख्याल भाई रिजवान साबरी रखता है। आलिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर तीन तलाक की कुप्रथा को खत्म करने का उनका चुनावी वायदा पूरा करने को कहा है।  आलिया ने एक पक्षीय तीन तलाक एवं बहुविवाह के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में 23 जनवरी, 2017 को याचिका लगाई है। जहां उसके वकील राजेश पाठक हैं। अपने गुजारा भत्ते के लिए परिवार न्यायालय में भी वाद लगाया हुआ है दिलचस्प यह है कि आलिया ने सर्वोच्च न्यायालय में अपने ससुरालियों के साथ-साथ दारुल उलूम देवबंद, बाल कल्याण एवं विकास मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय और अल्पसंख्यक मंत्रालय के सचिवों को भी पक्षकार बनाया है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद पुलिस भी हरकत में आई और उसने आलिया  की रपट के आधार पर उसके शौहर वाजिद अली और ससुर सईद अहमद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया, जबकि सास मेहराज अंसारी ने 3 अप्रैल, 2017 को सहारनपुर की एसीजेएम में समर्पण कर दिया। कस्बा नानौता के मुहल्ला कानूनगोयाना की शगुफ्ता दो  बेटियों की मां है और तीन महीने से  वह फिर से गर्भवती है। उसके ससुराल वाले गर्भपात कराना चाहते हैं, लेकिन वह इसके लिए    तैयार नहीं है। 

इस कारण 24 मार्च, 2017 को उसके साथ मारपीट की गई और उसके शौहर शमशाद ने तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कह कर घर से निकाल दिया। पेट पर चोट करके गर्भ गिराने की कोशिश भी की। शगुफ्ता ने नानौता थाने में रपट दर्ज करायी है। शगुफ्ता का निकाह पांच साल पहले हुआ था।  दो बेटियां होने से उसके ससुराल वाले बेहद नाराज थे और उन्हें आशंका थी कि शगुफ्ता तीसरी भी बेटी ही जन्मेगी।

सहारनपुर नगर के बेहट मार्ग निवासी रेशमा को उसके शौहर ने सात साल पहले तलाक दे दिया था। उसकी तरफ से भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखा गया है। उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तीन तलाक पर रोक लगाने की मांग की है। बरेली के आला हजरत खानदान की बहू निदा खान ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजे पत्र में कहा है कि शादी के बाद उसके ससुरालियों ने उस पर तरह-तरह के जुल्म ढाए और उसके शौहर ने एक ही मजलिस में तीन बार तलाक कह कर उसे तलाक दे दिया। निदा खान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मांग की है कि सरकार मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने का अपना वायदा पूरा करे। लखनऊ की प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और महिलाओं के हक की आवाज बुलंद करने वाली नाइश हसन कहती हैं कि यह वक्त महिलाओं के अनुकूल है। उनकी गरिमा, स्वतंत्रता एवं स्वाभिमान की रक्षा की जानी चाहिए।

 

 लखीमपुर के महेवागंज की सबरीन को उसके शौहर तुफैल ने फोन पर तलाक दे दिया। सीतापुर के कजियारा चौक निवासी तुफैल बड़ा कारोबारी है। दो साल पहले उसका निकाह हुआ था। उसके 11 माह की बेटी है। तलाक की वजह 22 लाख रुपए की मांग पूरी न किया जाना है। सबरीन ने 3 अप्रैल, 2017 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और उसने उन्हें आपबीती बताई है।

मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की संस्थापक एवं अध्यक्ष और लखनऊ की प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता शाईस्ता अंबर कहती हैं,  ''मुस्लिम महिलाओं को अपनी शर्तों पर अपना जीवन गुजारने का हक मिलना चाहिए।'' वह कहती हैं कि मुस्लिम लड़कियां शादी के बाद अपने पति के साथ पूरा जीवन गुजारने की हसरत रखती हैं। वे सपने देखती हैं, पति के साथ उन सपनों को पूरा करना चाहती हैं। शाईस्ता कहती हैं कि कुरान में तीन तलाक की बात कहीं नहीं कही गई है। इस्लाम में निकाह शादी नहीं, बल्कि एक अनुबंध है। निकाह का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। लड़की की रजामंदी के बिना निकाह नहीं हो सकता। तलाक में भी उसकी सहमति होनी चाहिए और संबंधों में खटास आने की स्थिति में किसी आलिम अथवा मजिस्ट्रेट की मध्यस्थता में दोनों को सुलह-सफाई का मौका मिलना चाहिए। एक मजलिस में तीन तलाक को तलाक नहीं माना जाना चाहिए। शाईस्ता ने बताया कि तीन तलाक एवं बहुविवाह के खिलाफ हजारों महिलाओं ने अपने हस्ताक्षर से युक्त एक ज्ञापन पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को दिया था। शाईस्ता खुद सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले में एक पक्षकार हैं और मई में     होने वाली सुनवाई की वह जोरदार तैयारी कर रही हैं।

इस्लाम के जानकार एवं लेखक बदर काजमी कहते हैं, ''आज के समय में महिलाओं को मुस्लिम पर्सनल लॉ के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है, जो खुद भेदभाव की नीति पर चलता है।'' वे कहते हैं, ''दिसंबर, 2016 में इलाहबाद उच्च न्यायालय ने तीन तलाक को असंवैधानिक बताकर सही फैसला दिया था।''काजमी ने कहा कि कुरान में एक ही मजलिस में तीन तलाक का उल्लेख नहीं है। वे कहते हैं कि हजरत पैगंबर ने कहा था कि उनके रहते यह नहीं होगा। काजमी के अनुसार दूसरे खलीफा हजरत उमर ने सजा के तौर पर तीन तलाक को तलाक माना था, लेकिन तलाक देने वाले शौहर को कोड़े मारने की सजा भी तय की थी।

बदर काजमी ने बताया कि कोई शौहर पत्नी की 'पाकी' की हालत में यानी वह मासिक धर्म से निवृत्त हो चुकी हो और उसके साथ शारीरिक संबंध भी नहीं बनाए गए हों, तब वह उसे एक तलाक दे सकता है और तीन माह की अवधि में वह चाहे तो उसे वापस भी ले सकता है। दोनों पक्ष आपस में बैठकर सुलह-सफाई भी कर सकते हैं। ऐसा नहीं होने पर शौहर एक तलाक और दे सकता है और यदि अगले तीन माह में भी दोनों के बीच अलगाव रहता है तो फिर तलाक हो जाएगा। शौहर को तय मेहर अपनी बीवी को अदा करनी होगी और अपनी हैसियत के मुताबिक पत्नी को और यदि उसके बच्चे हैं तो उनके लिए भी गुजारा भत्ता देना होगा। बदर काजमी चाहते हैं कि केंद्र सरकार तीन तलाक एवं बहुविवाह पर रोक लगाए और निकाह एवं तलाक को संहिताबद्ध करने का काम करे। इसमें इस्लाम कहीं आड़े नहीं आता है। दारुल उलूम के जनसंपर्क अधिकारी एवं उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार अशरफ उस्मानी कहते हैं, ''निकाह शौहर-बीवी के बीच एक अनुबंध भर है। निकाह के वक्त दोनों आपसी शर्ते तय कर सकते हैं। बीवी चाहे तो तलाक का हक खुद भी ले सकती है।''

तलाक से पीडि़त महिलाएं अब जिस तरह मुखर हो रही हैं उससे लगता है कि अब उनकी आवाज की अनेदखी करना आसान नहीं रह गया है। सरकार और अदालत का फर्ज है कि इन महिलाओं को उनका अधिकार दिलाए, ताकि वे भी एक सम्मानजनक जीवन जी सकें। केंद्र सरकार तीन तलाक एवं बहुविवाह पर रोक लगाए और निकाह एवं तलाक को संहिताबद्ध करने का काम करे। इसमें इस्लाम कहीं आड़े नहीं आता है। वैसे भी इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि देश में संविधान का राज चलना चाहिए, न कि मुल्ला-मौलवियों का। क्योंकि भारत में कोई भी भारतीय संविधान से ऊपर नहीं है।

लड़की की रजामंदी के बिना निकाह नहीं हो सकता। इसलिए तलाक में भी लड़की की सहमति होनी चाहिए। संबंधों में खटास आने की स्थिति में किसी आलिम अथवा मजिस्ट्रेट की मध्यस्थता में दोनों को सुलह-सफाई का मौका मिलना चाहिए।

  —शाईस्ता अंबर, अध्यक्ष, मुस्लिम महिला पसर्नल लॉ बोर्ड

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