| दिंनाक: 27 Feb 2017 15:09:18 |
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हाल में दीपेन्द्र सिंह सेंगर का एक वक्तव्य सुनने को मिला। वे बता रहे थे कि उन दिनों विशेष बल में शामिल होने का उनका इरादा एक तरह का दंभ था और यदि इस दंभ की वजह से सीमा पर दुश्मनों से लड़ते हुए मेरी जान चली जाती तो यह एक तरह से एक सपने के पूरा होने जैसा होता। यह एक ऐसे सैनिक की कहानी है जिसका शरीर एक बार गोलियों से छलनी हो गया था। डॉक्टर नहीं जानते थे कि वह उन्हें बचा पाएंगे कि या नहीं, लेेकिन दीपेन्द्र जानते थे कि उन्हें बचना है। हालत ऐसी थी कि वे शरीर को कहीं से मोड़ भी नहीं पा रहे थे। उन्हें इतना ही याद था कि पिछली बार तमाम चोट के बावजूद वे उठ कर बैठ गए थे, इस बार भी उठ बैठेंगे। इस हालत में दीपेन्द्र के पास अस्पताल के बिस्तर पर जो पहला फोन आया वह था उनके कमांडिंग ऑफिसर का। दीपेन्द्र ने उनसे कहा कि कोई नया टीम कमांडर मेरी जगह पर न रखिए, क्योंकि मैं वापस लौट कर आऊंगा। यही वह दंभ था, जिसका जिक्र दीपेन्द्र ने ऊपर किया है।
5'.6'' की लंबाई और 52 किलो वजन के सेंगर को कोई भी गुवाहाटी विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर का छात्र आसानी से कह सकता था। लेकिन वे सैनिक थे। 15 फरवरी, 1998 को उनकी यूनिट ने गुवाहाटी हवाई अड्डे पर सेंगर का स्वागत किया। सेंगर अपनी यूनिट के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में किए जा रहे सक्रिय अभियान में पुन: शामिल हो रहे थे, वह भी कमांडिंग ऑफिसर कर्नल ईवां क्रेस्टो के आदेश के खिलाफ। इसके लिए उन्होंने हफ्तों तक गुजारिश की और संघर्ष किया। सिर्फ इसलिए कि वे हिमाचल प्रदेश के एक छोटे और सुस्ताए नगर में स्थापित यूनिट की प्रशासनिक टोली के अंतिम भाग की पहरेदारी कर सकें। ऐसे जिद्दी हैं दीपेन्द्र सेंगर।
उन्होंने सेना के रेडियो सेट पर सुना 15 मिनट का जो पहला संदेश वह विकृत था। सूचना के आधुनिक उपकरणों से लैस और पूरी तरह से हथियारबंद पांच-छह आतंकवादी एक घर से जल्दी ही बाहर निकलने वालेे थे। क्विक रिएक्शन टीम यूनिट की ओर से जाने के लिए तैयार थी, मगर वह गंतव्य पर एक घंटे में ही पहुंच सकती थी। सेंगर ने तुरंत यह सोचा कि एक छोटा चक्कर लगाकर वेे गंतव्य पर 20 मिनट के भीतर पहुंच सकते हैं। 40 मिनट का फासला जीत और हार के बीच का फासला बन सकता था। कुछ संदेशांे के आदान-प्रदान के बाद सेंगर ने बटालियन के मुख्यालय को इस बात के लिए मनाया कि वे अपनी टीम के साथ आतंकवादियांे से मुठभेड़ के लिए सबसे उपयुक्त स्थान पर हैं। उनकी टीम हर टीम से अलग थी, क्योंकि उसमें किसी को भी शामिल किया जा सकता था, अगर वह उपलब्ध हो। टीम पूरी तरह से हथियारबंद और वायरलेस आदि की सारी सुविधाओं से लैस थी। इसके बावजूद युद्ध में जाने के लिए यह सेंगर की पहली पसंदीदा टीम नहीं थीं। मगर इस बात का सेंगर पर कोई प्रभाव नही पड़ा। योजना के अनुसार उन्होंने 20 मिनट के अंदर जबरदस्त मुठभेड़ में उन आतंकवादियांे पर अपना निशाना साधा और दो को मार गिराया, जबकि तीन भाग निकले। तब कहीं सेंगर को आभास हुआ कि उन्हें गोली लगी है। दो गोलियां उनके पेट को चीरते उनकी पीठ से बाहर निकल गई थीं। मेडिकल टर्म में इसे 'क्लीन शट' कहते हैं। उसके बाद उनके लिए सब धुंधला हो गया। वहां से बाहर निकलने की प्रक्रिया की आपा-धापी, पहले हाथ से उठा कर उन्हें ले जाया गया, फिर हेलिकॉप्टर द्वारा नजदीकी अस्पताल में इलाज और अंत में गुवाहाटी के बेस अस्पताल में लंबी सर्जरी का दौर चला। इस 15 दिन के इलाज के उपरांत चिकित्सकों ने आंशिक सुधार की उम्मीद जताई, परंतु 18 से 24 महीने के आराम की सलाह के साथ। डॉक्टरों ने सेंगर में हो रहे सुधार को चमत्कार कहा मगर अभी उन्होंने चमत्कार देखा कहां था? भले ही सेंगर शारीरिक रूप से चल नहीं पा रहे थे, लेकिन मानसिक रूप से उन्होंने कभी चलना नहीं छोड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि वे 45 दिन के भीतर बिस्तर से उठ बैठे और अपनी स्थिति का जायजा लेने के लिए किताबें पढ़ने लगे। उन्होंने जाना कि उन्हें शारीरिक सुधार के साथ ही मनोवैज्ञानिक सुधार की भी जरूरत है। इसलिए वे सेना अस्पताल के नियमों की परवाह न करते हुए वह सब कुछ करने लगे जो वे कर सकते थे। वे सिनेमा हॉल में लगी हुई हर फिल्म देखने से लेकर अपनी यूनिट के एक साथी की शादी में भी गए। वह भी लुंगी और कुर्ते में, क्योंकि वे कुछ और नहीं पहन सकते थे, घाव अभी भरे नहीं थे। उनके शरीर पर कई तरह के ट्यूब और बैग (कोलोस्टोमि बैग और एक बैग जिसे मूत्राशय से सीधे जोड़ा जाता है) अब भी मौजूद थे। फिर भी वे एक कार किराए पर लेकर 5 घंटे की लंबी ड्राइव के बाद देहरादून पहुंचे और अपने साथी की शादी का लुत्फ उठाया। आप सोचते होंगे, इतना कुछ केवल एक शादी के लिए? पर सेंगर उनमंे से नहीं थे जो 25 ग्राम के एक लेड के टुकड़े, जो उनके शरीर के आर-पार हो गया था, की वजह से अपने दोस्त की शादी छोड़ दें। गोली की परवाह न करने से अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि सेंगर को अस्पताल से नफरत थी। वे अस्पताल से बाहर आना चाहते थे। रोज-रोज की गुजारिश कि उनको अस्पताल से छुट्टी दे दी जाए, से तंग आकर 1998 में चिकित्सकों ने अस्पताल से उन्हें छुट्टी दे दी, पर इस वादे के साथ कि वे यूनिट में वापस जाकर खुद पर ज्यादा बोझ नही डालेंगे और अपने को मुख्यालय तक ही सीमित रखेंगे। जब अस्पताल से उनकी छुट्टी हुई, तो वहां के कर्मचारी और नर्स दु:खी थे।
सेंगर, जिन्हें रॉकेट कहा जाता था और जो कमांडो में 'डैगर' (तलवार) नाम से नवाजे जा चुके थे, के लिए एक जगह टिके रहना मुश्किल था। इसी समय पूर्वी क्षेत्र में ट्रेनिंग एक्सरसाइज का दौर चल रहा था और सेंगर को एक मौका मिला अपनी फिटनेस साबित करने का। उन्होंने चिकित्सकों को उसके लिए भी राजी किया कि वे उन्हें 'सक्रिय ड्यूटी' के लिए स्वस्थ करार कर दें। सेंगर ने बहुत ही फुर्ती से अपनी सेहत में सुधार किया और अपने जैसे पुराने मामलों में पूर्व के सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए सबसे जल्दी सुधार करने वाले व्यक्ति बन गए। पूर्वी क्षेत्र में नियुक्त होने के लिए सेंगर ने विनती की, संघर्ष किया, भीख मांगी और भावनात्मक बातों का भी सहारा लिया।
इसी बीच कारगिल युद्ध की खबर आई और यूनिट को एक टीम तैयार करनी थी। सेंगर को फिर मौका मिला। वही काम करने का जो उन्हें सबसे अधिक पसंद था—युद्ध में अपनी टीम की अगुआई करना।
कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने अपनी टीम के साथ नीलम पोस्ट पर कब्जा किया, जो उस पूरे युद्ध के दौरान भारतीय थल सेना की सबसे ऊंची पोस्ट थी। 1999 में कारगिल युद्ध तो खत्म हो गया मगर सीमा पर अब भी तनाव होने की वजह से यूनिट को वहीं रुकना पड़ा और सेंगर एक बार फिर मैदान-ए-जंग में थे।
सितंबर, 2001 की बात है। आतंकवादियों से हुई मुठभेड़ के दौरान ए़ के. 47 की गोलियों की बौछार हुई और गोली उनकी ऊपरी जांघ और नितंभ को चीरते हुए निकल गई। खून से लथपथ और टूटी हुई हड्डी देखकर उनके मित्र समझ गए कि अगर अभी उन्हें युद्ध से बाहर नहीं किया तो वे उनको हमेशा के लिए खो देंगे। बिना किसी कागजी खानापूर्ति के उन्हें 45 मिनट के अंदर अस्पताल पहुंचाया गया। चंद लम्हांे की देरी भी सेंगर को इतिहास में दर्ज करवा देती। फिर वही सर्जरी का दौर चला। बस इस बार बात ज्यादा गंभीर थी। उन्हें दिल्ली में सेना अस्पताल में भर्ती कराया गया। दो महीने बाद उनके माता-पिता उन्हें घर ले आए और तब पता चला कि सेंगर अब कभी चल नहीं सकेंगे।
इससे पहले हर कोई उन्हें यही कहता रहा कि वे बिल्कुल ठीक हो जाएंगे और मैदान में लौट आएंगे। यह समझने में उन्हें एक महीना और लगा कि वे अब कभी चल नहीं पाएंगे। यह सेंगर के लिए भी एक गहरा सदमा था। उन्होंने सेना छोड़ने का निर्णय लिया। गहरे हरे रंग से ढकी उन फाइलों को खंगालने में सेंगर को कोई दिलचस्पी नहीं थी। भावनाओं के उस समंदर से जूझते हुए सेंगर ने अपनी किस्मत की डोर अपने हाथ में लेने का फैसला किया। उन्होंने अपने लिए कॅरियर का विकल्प तलाशना शुरू किया। 30 वर्ष की आयु, अविवाहित और ऊर्जा का पहाड़ थे सेंगर। उन्हें यह जानने में ज्यादा कठिनाई नही हुई कि इस पहाड़-सी जिंदगी के बीच से उन्हें 'कैट' (कॉमन एडमिशन टेस्ट) नाम का रास्ता बनाना है।
कैट के जरिए वे सबसे बड़े बिजनेस स्कूल में दाखिला पा सकते थे। उन्होंने खुद को टटोला और पाया कि उनकी विश्लेषक क्षमताओं में कमी आई है। इसलिए उन्होंने अपने एक सबसे बड़े डर पर जीत हासिल करने की ठान ली। उनका यह डर था अंकों का। उन्होंने कक्षा चौथी से लेकर बारहवीं तक की गणित की किताबों से सवाल हल किए। वे अब पूरी तरह कैट की तैयारी में लग गए। सेंगर ने दिसंबर, 2000 में कैट की परीक्षा दी। उसका परिणाम कमाल का रहा। उनको 15 संस्थानों से बुलावा आया, जहां उन्होंने आवेदन दिया था – आईआईएम (ए), आईआईएम (बी),़.़.़.़. आदि। सेना को अलविदा कहने के चार दिन बाद उन्होंने शादी कर ली और आठ दिन बाद भारतीय प्रबंधन संस्थान, अमदाबाद में प्रवेश ले लिया। दो साल तक अंकों के साथ जंग लड़ने के बाद उन्होंने बैसाखियों पर चलकर विशिष्टता के साथ अपनी उपाधि प्राप्त की। आज सेंगर माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनी के साथ जुड़े हुए हैं। उनके दो प्यारे बच्चे हैं। इसके बाद अगर आप सोचते हैं कि यही उनकी जिंदगी के खूबसूरत संघर्ष का अंत है तो आप गलत हैं। 10 साल तक बैसाखियों का सहारा लेने के बाद सेंगर से नहीं रहा गया। उन्होंने अपनी बैसाखियों को छोड़ दिया और बेहद दृढ़ता के साथ एक साल के भीतर चलने-फिरने लगे।
सितंबर, 2013 में जब वे भारत के दौरे पर आए तो उन्होंने अपनी पुरानी यूनिट के साथियों से मिलने का निर्णय लिया। वे वहां कमांडिंग अफसर के संपर्क में आए, जिन्होंने उन्हें यूनिट के साथ स्टैंडर्ड बैटल फिजिकल एफ्फिसियंसी टेस्ट पर होने वाली एक दौड़ के लिए आमंत्रित किया। इसमें बैग और हथियार लेकर दौड़ना होता है, लेकिन सेंगर ने दौड़ने का अभ्यास न रहते हुए भी उसमें भाग लिया।
लाख तकलीफों के बावजूद संेगर ने कभी जीने की आशा नहीं छोड़ी। चिकित्सकों ने कहा था कि उनके पैर इतने खराब हो चुके हैं कि अब वे जिंदगी में कभी चल नहीं पाएंगे। वे बैसाखी के गुलाम हो गए थे। लेकिन गोलियों और बमों का डर न मानने वाले संेगर बैसाखी के गुलाम बनकर कैसे रह सकते थे? उन्होंने एक दिन तय किया कि जिंदगी बैसाखी के भरोसे नहीं चलाएंगे। इसके बाद वे अपने पैरों को ठीक करने के लिए कड़ी मेहनत करने लगे। आज वे चल ही नहीं सकते, बल्कि अच्छी तरह दौड़ सकते हैं। उनका जीवन लाखों लोगों के लिए प्रेरणादायक है। -आशीष कुमार 'अंशु'