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पाठकों के पत्र : ज्ञान का अनूठा उत्सव

Written byArchiveArchive
Feb 20, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 20 Feb 2017 12:59:37

आवरण कथा 'बढ़ता प्यार' ने उन लोगों की धारणाओं और भ्रमों को दूर कर दिया है जो ये मानते हैं कि इंटरनेट के बढ़ते चलन के कारण पुस्तकों की बिक्री और उनके पाठक कम हो गए हैं। विश्व पुस्तक मेले में उमड़ा पाठकों का हुजूम जहां पुस्तक प्रेमियों के लिए राहत लेकर आया वहीं यह भी संदेश देकर गया कि पुस्तकें हर समय समाज को मार्ग दर्शन देती रही हैं और देती रहेंगी।

—अनुराधा नौटियाल, विकासपुरी (नई दिल्ली)

पढ़ने के शौकीनों के लिए वैसे भी विश्व पुस्तक मेला किसी कुंभ से कम नहीं होता, क्योंकि उन्हें हर तरह की मनचाही पुस्तक यहां बड़ी ही आसानी के साथ मिल जाती है। समाज में कला और संस्कृति का अपना महत्व है और पुस्तकें हमें उसके बारे में बतातीं और सजग करती हैं। अगर पुस्तकें न हों तो न हम अतीत को जान पाएं और न ही वर्तमान के तमाम घटनाक्रम। क्योंकि उन्हीं से हमें वह सब जानकारी एक जगह मिल जाती है जो हम कभी नहीं पा सकते।

—दिनेश कुमार, लखनऊ (उ.प्र.)

 

इनके दु:ख का साथी कौन?

'दर्द अनदेखा' (15 जनवरी, 2017) रपट ममता सरकार के प्रशासन की हकीकत खोलने के लिए काफी है। सैकड़ों की तादाद में हथियारबंद मुसलमानों ने जिस तरह हिन्दू परिवारों पर अत्याचार किया, उनके घरों को आग लगाई, बलात्कार किया और रोजगार के संसाधनों को तहस-नहस कर दिया, यह सब घटनाक्रम बताता है कि बंगाल में सरकार पूरी तरह से पंगु हो गई है। जिस प्रशासन की जिम्मेदारी समाज के हर अंग को सुरक्षा देना है वह अपने काम को न करके उन्मादियों का साथ देता नजर आया।

 —आशीष रंजन, पटना (बिहार)

 

दंगे के बाद तृणमूल सरकार ने जिस तरह से धूलागढ़ की हिंसा को नकारा, वह बेहद गैर जिम्मेदाराना और शर्मनाक करने वाली स्थिति है। ममता बनर्जी ने मीडिया से कहा कि धूलागढ़ में कोई हिंसा हुई ही नहीं। ममता ये बताएं कि कुछ समय पहले कलियाचक, मालदा, बर्धमान में क्या हुआ था? क्या वहां भी दंगा नहीं हुआ था? अरे ममता जी! बेबुनियाद बयानबाजी करने से अच्छा है कि एक बार घटना स्थल पर तो जाएं, आपको हकीकत पता चलते देर

नहीं लगेगी।

—सुषमा, सिहोर (म.प्र.)

 

आखिर बंगाल में कब तक हिन्दू ऐसे ही लुटते-पिटते रहेंगे? कब तक उन पर अत्याचार होंगे? इतनी बड़ी हिंसा हो गई और राज्य सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। क्या इसे बंगाल में फलते-फूलते मजहबी उन्माद का दबाव कहें? ऐसे में जरूरी है कि केन्द्र सरकार इस मामले में कड़ी कार्रवाई करे एवं दंगे से प्रभावित हिन्दू परिवारों के पुनर्वास के लिए तत्काल ठोस कदम उठाए। साथ ही उपद्रव में शामिल प्रत्येक उपद्रवियों की पहचान कर उन पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए ताकि समाज में यह संदेश जाए कि ऐसी हरकत करने वालों का अंजाम अच्छा नहीं होता।

—कृष्ण वोहरा, सिरसा (हरियाणा)

 

दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल जिस प्रकार से फासीवादी मानसिकता का परिचय दे रहा है, उससे सिद्ध होता है कि ममता सरकार 'ममता' विहीन हो चुकी है। धूलागढ़ हिंसा के बाद सरकार के दबाव में अधिकतर मीडिया संस्थानों ने इस बड़ी खबर को छापना तक उचित नहीं समझा लेकिन एक -दो समाचार चैनलों ने इस खबर को दिखाया तो राज्य प्रशासन ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी।  आखिर यह तानाशाही नहीं तो क्या है? उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के मकर संक्रान्ति पर होने वाले कार्यक्रम पर रोक लगाकर उसने अपने पूर्वाग्रह का परिचय दिया। लेकिन न्यायालय का धन्यवाद जिसने कड़ी फटकार के साथ कार्यक्रम की अनुमति दी। शर्म की बात यह है कि बंगाल में ये सब खुलेआम हो रहा है लेकिन तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवियों को यह सब नहीं दिख रहा?

—रंजना सेठाना, बड़वाह (म.प्र.)

 

ममता सरकार मदरसों और अवैध बंगलादेशियों को जानते-बूझते सरंक्षण दे रही है, जिसके कारण राज्य में मुस्लिमों के हौंसले बुलंद हैं। मालदा, कलियाचक, बर्धमान और धूलागढ़ इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। हिन्दुओं के घर जलाए जाएं, उन्हें डर से अपनी जन्मभूमि से भागने के लिए प्रशासन द्वारा कहा जाए, आखिर यह घटनाक्रम क्या संदेश देता है। यही न कि राज्य की पुलिस पंगु हो चुकी है। लगता है, बंगाल के हिन्दुओं ने अपने शौर्य पूर्ण इतिहास को भुला दिया है? क्या वे घटना का प्रतिकार नहीं कर सकते? आखिर कब तक डर कर जिएंगे?

— कृष्ण मोहन नागर, समस्तीपुर (बिहार)

 

आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तुष्टीकरण के नाम पर देश को बांटने की साजिश चल रही है। कुछ राजनीतिक दल तो तुष्टीकरण की राजनीति में ऐसे डूबे हैं कि उन्हें इसके सिवाय कुछ दिखाई ही नहीं देता। अपनी राजनीति चमकाने और स्वार्थ के लिए वे किसी की भी जान ले सकते हैं। बंगाल इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। तुष्टीकरण की राजनीति के चलते मुस्लिम खुश रहें, इसलिए ममता हिन्दुओं की पीड़ा और अत्याचार पर ध्यान नहीं दे रहीं, रोकना तो दूर की बात है। क्या यही राजनीति का असली चेहरा है?

—मनोहर मंजुल, मेल से

 

ङ्म   देश के अंदर छद्म युद्ध चल रहा है। उन्मादियों द्वारा हिन्दू मारे जा रहे हैं। देश के खिलाफ खुलेआम आवाजें लगाई जा रही हैं लेकिन वहां की सरकारें मूक दर्शक बनी हुई हैं जैसे कुछ हो ही नहीं रहा। भारत में इस माहौल को रोकना होगा क्योंकि यह बढ़ते मुस्लिम कट्टरवाद की भनक दे रहा है। आज पूरा विश्व इस्लामी आतंक से त्रस्त है। आए दिन खूनखराबा होता है। इसलिए भारत में यह सब न होने पाए, सो केन्द्र सरकार को सख्ती के साथ कट्टरवादियों पर लगाम लगानी होगी।

—अनिल मजूमदार, बर्धमान (प.बंगाल)

 

ठोस कदम की जरूरत

रपट 'पहचान और पीड़ा' (8 जनवरी, 2017) से जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्र में बसे हिन्दुओं की दुर्दशा की जानकारी मिली। केन्द्र सरकार से फरियाद है कि वह इस दिशा में व्यक्तिगत रुचि दिखाते हुए ठोस कदम उठाए। इन स्थानों पर रहने वाले लोगों को केन्द्र व राज्य सरकार की सभी योजनाओं का लाभ मिले, उन्हें पंचायत और विधानसभा में मतदान करने का अधिकार दिया जाए, क्योंकि ऐसा यह उपयुक्त समय है जब हम अपने लोगों के दु:खों को दूर कर सकते हैं।

—सियाराम शरण, रोहतक (हरियाणा)

ठीक नहीं रवैया

'कृष्ण की कमला को दफनाया' लेख अत्यंत वेदनापूर्ण है। जो लोग समाज को जोड़ने और राष्ट्र की गरिमा को बढ़ाने का काम करते हैं, उनके प्रति यह रवैया ठीक नहीं है। अधिकतर स्थानों पर ऐसे लोग होते हैं और उनके द्वारा एक वर्ग का शोषण होता रहता है लेकिन मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाली यें सरकारें अपने स्वार्थ के लिए ऐसे कट्टरपंथियों पर कार्रवाई न करके उल्टे उन्हें संरक्षण देती हैं। देश में लाखों हिन्दू युवतियां ऐसे ही कट्टरपंथियों के चंगुल में फंसी हैं। आज देश को फिर से जनजागरण की आवश्यकता है, क्योंकि अगर समय रहते ऐसा नहीं हुआ तो ये कट्टरपंथी ताकतें हमारे समाज और देश को विकृत कर देंगी।

—हरीश चन्द्र धानुक, बशीरतगंज, लखनऊ (उ. प्र.)

 

जनता सब जानती हैं

'उलटा पड़ा पहलवान का दांव' (22 जनवरी, 2016) रपट समाजवादी पार्टी के प्रमुख परिवार की कलह और उसके राजनीतिक भविष्य को दर्शाती है। उत्तर प्रदेश चुनाव की घोषणा के कुछ दिन पहले से ही पार्टी और उसके नेताओं ने समाज को भ्रमित करने के लिए भरपूर ड्रामा किया, विकास की झूठी बातें करके बरगलाया। लेकिन अगर उन्होंने विकास कार्य दिए हैं तो फिर उन्हें कांग्रेस के सहारे की जरूरत क्यों पड़ी। इस सवाल पर पूरी पार्टी गश खाकर गिर जाती है? अरे अखिलेश जी, जनता मूर्ख नहीं है, वह सब जानती है। अब आपके चक्कर में कोई नहीं फंसने वाला।

—रमण लाल वर्मा, सरगुजा (छत्त्तीसगढ़)

 

ङ्म   सपा ने पूरे पांच साल में जो भी विकास किया, वह कुछ चुनिंदा स्थान पर किया है और सरकार उसे ही विकास-विकास चिल्ला रही है। उसके कार्यकाल में हुए सैकड़ों दंगों ने राज्य में हिन्दुओं का रहना मुश्किल कर दिया। अब वह फिर विकास का लॉलीपाप दिखाकर वोट हथियाने की जुगत में है। वह पहले की तरह जनता को फिर से ठगना चाहती है। लेकिन गेंद अब राज्य की जनता के पाले में है। वही इसका माकूल जवाब देगी।

—विकास कश्यप, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)

पुरस्कृत पत्र

कब जाग्रत होंगे मुसलमान

आजादी के 70 साल बाद भी यह सवाल उठ रहा है कि सिर्फ मुस्लिम ही क्यों समाज को तोड़ने की बात करते हैं। जो लोग इस पर सवाल उठाते हैं उन्हें रपट 'दर्द अनदेखा (15 जनवरी, 2016)' पढ़नी चाहिए। सवाल उठता है कि आखिर मुस्लिम समाज अपने मूल तत्व को क्यों नहीं पहचानता? आज जब हरेक मत-पंथ का व्यक्ति अपनी तरक्की की बात कर रहा है तो यह समुदाय अपने पुराने दकियानूसी रिवाजों का कंबल ओढ़े है जिनका कोई सिर पैर नहीं है। वह उसी कट्टरता के साथ समाज में भी रहना चाहता है।  आजकल तारेक फतेह जब उन रिवाजों और गलत प्रथाओं की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हैं तो कट्टरपंथी मुल्ला-मौलवियों को बुरा लगता है। वे शुरू से कहते आ रहे हैं कि मेरे पूर्वज हिन्दू थे और मैं हिन्दुस्थानी हूं। अब वे इसमें क्या गलत बात बोलते हैं। अगर भारत का मुस्लिम समुदाय यही बात मानने लगे तो फिर लड़ाई का कोई दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं होगा। आज भी अनेक ऐसे राज्य हैं जहां की महिलाएं मुस्लिम हैं लेकिन उनका खान-पान, रहन-सहन, बोली भाषा और पहनावा समाज के अधिसंख्य लोगों जैसा है। उसमें कोई भिन्नता नहीं है। वे बुर्का नहीं पहनती। वे हिन्दू महिलाओं की तरह घूंघट भी करती हैं। रही पहनावे की बात तो जो पहनावा मुसलमान पहनतीं हैं, वह भारत के वातावरण के बिलकुल भी अनुकूल नहीं है। वह तो अरब की आबोहवा से जुड़ा है। जो आक्रमणकारी बाहर से आए वे अपनी सभ्यता भी ले कर आए और आज हम उसका यह रूप देख रहे हैं। लेकिन इसके बीच में यह बात छिपी है कि हम मूलत: क्या हैं? हमारा मूल स्वरूप और रूप क्या है? कभी हम इस पर नहीं सोचते। लेकिन जब कोई दूसरा इस समुदाय को उसके मूल स्वरूप के बारे में बताने लगता है तो ये उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं।

    — डॉ. लज्जा देवी  मोहन,325, मॉडन टाउन, सरकुलर रोड, अंबाला (हरियाणा)

 

 

 

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