कृष्ण की कमला को दफनाया
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कृष्ण की कमला को दफनाया

Written byArchiveArchive
Jan 24, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 24 Jan 2017 12:32:40

उनकी नजरों में हमें जीने का कोई हक नहीं है। हम यहूदी नहीं हैं, हम ईसाई नहीं हैं, हम मुस्लिम नहीं हैं और हमारे पास कोई ऐसी किताब नहीं है, जो हमें हमारे पंथ के बारे में बताती है। वे सोचते हैं कि हमारा खात्मा हो जाना चाहिए या हमें मत परिवर्तन कर लेना चाहिए। वे हमारे मत को ऐसे देखते हैं जैसे कि हमारा मत सच्चा मत नहीं है। वे हमें इस्लाम में बदल देना चाहते हैं।                                              

                         —जूली, प्रवक्ता, एक यजीदी शिक्षिका

मलयालम कवयित्री कमला दास पर एक फिल्म 'आमी' बन रही है। फिल्म में विद्या बालन को कमला की भूमिका निभानी थी। पर विद्या ने कुछ मतभेदों की वजह से मना कर दिया है। कमला ने 65 की उम्र में इस्लाम कबूल कर लिया था। कृष्णभक्त कमला जीवनभर पछताती रहीं। वे हिंदू बनना चाहती थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मरने पर उन्हें दफनाया गया

 

सतीश पेडणेकर

 

बॉलीवुड में अपने संजीदा अभिनय के लिए मशहूर अभिनेत्री विद्या बालन ने पिछले दिनों केरल की विवादास्पद लेखिका कमला दास के जीवन पर बनने वाली फिल्म 'आमी' में काम करने से मना कर दिया। कमला दास एक कवयित्री और प्रमुख मलयालम लेखिका थीं। विद्या बालन इस फिल्म में कमला दास की भूमिका निभाने वाली थीं। बताया जा रहा है कि विद्या और फिल्म के निर्देशक के विचार नहीं मिल रहे थे। इस कारण विद्या ने यह फैसला किया। चर्चा है कि विद्या ने फिल्म में यह किरदार निभाने की तैयारी तो कर ली थी, लेकिन फिल्म बनाने की प्रक्रिया को लेकर उनके निर्देशक कमलुद्दीन मोहम्मद माजीद के साथ कुछ मतभेद थे।

 

हम तुम्हारे रोम को जीतेंगे, तुम्हारे सलीब तोड़ंेगे, तुम्हारी महिलाओं को गुलाम बनाएंगे। अगर हम नहीं कर सके तो हमारे बेटे-पोते यह करके दिखाएंगे। वे तुम्हारे बेटों को गुलाम बनाकर गुलाम बाजार में बेचेंगे।

                       —अदनानी, प्रवक्ता, इस्लामिक राज्य

 

कुछ जानकार बताते हैं कि कमला दास के जीवन के कई पहलू हैं। यदि उनका संतुलित रूप से चित्रण नहीं किया गया तो फिल्म विवाद की वजह बन सकती है। माधवी कुट्टी उनकी नानी का नाम था। वे इस नाम से मलयालम में लिखती थीं। अंग्रेजी में उन्होंने कमला दास के नाम से लिखा। लेखन और पेंटिंग से भी जीवन का सूनापन न भर पाईं तो 1984 में उन्होंने एक राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव भी लड़ा, पर जमानत जब्त हो गई। इसके बाद वे राजनीति से हट गईं, और क्रमश: सार्वजनिक जीवन से भी। 1999 में अचानक उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया तो सुरैया नाम उनसे जुड़ गया। बाद में परदा प्रथा के विरोध तथा अभिव्यक्ति की आजादी की मांग को लेकर कट्टर मुल्लाओं से भी उनकी ठनी। ऐसे तमाम लंबे और टकराव से भरे दौरों से गुजरतीं कमला ने लगातार तीन दशक तक कविता, कहानी, उपन्यास और आत्मवृत्त लिखे।

दरअसल, कमला दास का इस्लाम में कंवर्जन केरल में लव जिहाद की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। कमला दास ने 65 साल की उम्र में इस्लाम स्वीकारने के अपने फैसले की घोषणा की थी तो लोगों को आश्चर्य हुआ था। तब कहा गया था कि मुस्लिम लीग के एक नेता द्वारा शादी के झूठे वादे में पड़कर कमला ने यह कदम उठाया। हालांकि उस समय उस मुस्लिम नेता ने इस तरह के किसी भी वादे से इनकार किया था। कुछ मुसलमानों ने यह भी कहा था कि कमला ने इस्लामी संस्कृति की 'महानता' को समझने के बाद इस्लाम अपनाने का फैसला लिया था। पर किसी के गले से यह बात नीचे नहीं उतरी थी कि पढ़ी-लिखी और इस्लाम को जानने वाली कमला दास क्या यह नहीं जानती थीं कि वहां महिलाओं के साथ दूसरे दर्जे का व्यवहार किया जाता है।

लेकिन बाद में यह बात सामने आने लगी कि मुस्लिम लीग के 36 वर्षीय नेता सादिक अली सामदानी ने कमला दास को बहला-फुसलाकर अपने घर बुलाया, उन्हें प्यार के झूठे मोहजाल में फंसाकर उनका यौन शोषण भी किया, फिर उन्हें धोखा दिया। उसकी पहले ही दो बीवियां थीं। लेकिन उसने कमला दास को आश्वासन दिया था कि वह उनसे शादी करेगा यदि वह इस्लाम कबूल करती हैं। इसके बाद ही उन्होंने इस्लाम को अपनाया।

बाद में सामदानी ने शादी से इनकार कर दिया। इस धोखे से कमला दास भीतर ही भीतर बहुत टूट चुकी थीं। जब उन्होंने सामदानी पर शादी के लिए दबाव डाला तो उसने कहा कि वह उनके लेखिका होने के कारण सिर्फ उनका प्रशंसक है, प्रेमी नहीं।

कमला ने एक साक्षात्कार में कहा था, ''इस्लाम प्रेम का मजहब है। हिंदुओं ने मेरे साथ गलत बर्ताव किया और मुझे चोट पहुंचाई। उन्होंने हमेशा मुझे बदनाम करने की कोशिश की। मैं प्रेम करना और प्रेम पाना चाहती हूं।''

मुस्लिम बनने के बावजूद कमला कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। उन्होंने एक बार कहा था, ''वे कृष्ण को गुरुवायुर मंदिर से ले जा रही हैं और उनका नाम मोहम्मद रख दिया है। और उन्हें पैगंबर बना दिया है। अगर आप गुरुवायुर मंदिर जाएं तो आप उन्हें वहां नहीं पाएंगे, वे मेरे साथ हैं।''

एक पत्रकार ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, ''आपको तो कृष्ण बहुत प्रिय हैं, आपने उन्हें कैसे छोड़ दिया?''

जवाब मिला, ''मैंने उन्हें नहीं छोड़ा है। वे अब भी मेरे साथ हैं, मेरे घर में हैं।''

पत्रकार ने फिर सवाल पूछा, ''वह मुस्लिम घर में कैसे हो सकते हैं?''

कमला दास ने कहा, ''मैंने उनका नाम बदल कर मोहम्मद रख दिया है। कृष्ण की आत्मा मुझमें रहती है, केवल उनका नाम बदल गया है।''

वे मुसलमान बन गईं और उन्होंने परदा अपना लिया। इस्लाम के प्रमुख सिद्धांत मान लिए। वे मध्य-पूर्व के देशों में जाने लगीं। वे इस्लामी सम्मेलनों में प्रमुख वक्ता होती थीं। जहां हजारों लोग आते थे और वे वहां मोहम्मद का संदेश सुनाती थीं। एक बार वे कतर में भाषण देकर लौटीं। प्रशंसा के पंखों पर सवार थीं। उन्होंने सादिक अली को फोन किया। उसने फोन उठाया और अपनी पहली बीवी को दे दिया, जिसने बहुत बेरुखी से बात की। कमला ने फोन रख दिया। वे सातवें आसमान से जमीन पर आ गिरी थीं। सादिक उनकी जिंदगी से जा चुका था।

लेकिन बाद में कमला ने महसूस किया कि अपना धर्म बदलना सार्थक नहीं था। उन्होंने लिखा, ''पति की मृत्यु के बाद मुझे एक मुस्लिम से प्यार हो गया। वह शुरुआत में बहुत दयालु और उदार था। लेकिन अब मुझे लगता है कि मुझे धर्म नहीं बदलना चाहिए था। ''

अब उस रहस्य से परदा उठ चुका है। साथ ही वह आशंका सच साबित हो गई है कि कमला ने सोच-समझकर इस्लाम नहीं कबूल किया था, बल्कि मुस्लिम लीग के नेता सामदानी के बहकावे में आकर ऐसा किया था। जल्दी ही उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और वे उलटे पैर वापस आना चाहती थीं, पर उनके बेटे ने कट्टरवादी इस्लाम का डर दिखाकर और वापसी पर होने वाली हिंसक प्रतिक्रिया के भय से उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। कमला दास ने अपने अंतिम दिनों में 'मेरे कान्हा- मेरे श्याम' कहते-कहते प्राण त्यागे। उनकी मृत्यु के चार साल बाद इस सच को सामने लाने का साहस किया था पत्रकार और लेखिका लीला मेनन ने, जो कि कमला की अभिन्न मित्र थीं। लीला मेनन ने साफ-साफ लिखा है कि कमला वापस हिन्दू धर्म में आने के लिए व्याकुल थीं, छटपटा रही थीं, लेकिन उनके पुत्र मोनू (माधव दास नलपत) नेउन्हें ऐसा करने से रोक दिया। मोनू को डर था कि उनकी मां ने ऐसा किया तो कट्टरवादी इस्लामी तत्व उन्हें और उनके बच्चों (कमला के पोतों) को निशाना बना सकते हैं ।

 

कमला वापस हिन्दू धर्म में आने के लिए व्याकुल थीं, छटपटा रही थीं, लेकिन उनके पुत्र मोनू (माधव दास नलपत) नेउन्हें ऐसा करने से रोक दिया। मोनू को डर था कि उनकी मां ने ऐसा किया तो कट्टरवादी इस्लामी तत्व उन्हें और उनके बच्चों (कमला के पोतों) को निशाना बना सकते हैं ।

-लीला मेनन, पत्रकार और कमला की सहेली

 

लीला मेनन ने यह भी रहस्योद्घाटन किया है कि कमला हमेशा अपने श्याम के लिए राधा ही बनी रहीं। कमला की भगवान श्रीकृष्ण में अटूट और अगाध श्रद्घा थी और वह उनके अंतिम दिनों तक जस की तस बनी रही। जब लीला अपनी सखी शारदा के साथ पुणे में उनसे मिलने गईं तो कमला ने शारदा से 'कारमुकिल वरनानते चुन्दिल' गीत गाने को कहा, जो कि श्रीकृष्ण को समर्पित भक्ति गीत है। ऐसे ही कमला अपनी सेवा में लगी अम्मू से भी 'नारायण नारायण' गवाती रहती थीं, तब तक जब तक कि वे सो नहीं जातीं। कमला दास की इस दुर्दशा के लिए मोनू को पूरी तौर पर जिम्मेदार ठहराती हुईं लीला मेनन लिखती हैं, ''कमला अपने श्याम के लिए राधा की तरह जीती रहीं, फिर भी उन्हें कब्रिस्तान में क्यों दफनाया गया? यह बहुत दुखद है कि उनका अंतिम संस्कार भी उनकी इच्छा के अनुसार नहीं किया गया।'' लीला मेनन ने अपने एक आलेख में बताया है कि जब कमला कुछ दिनों के लिए पुणे आई थीं तो उन्होंने मुझे फोन किया, वे बहुत खुश थीं, चहक रहीं थीं। उन्होंने मुझसे कहा, ''मैंने परदा छोड़ दिया है, अब मैं वापस मुंडू-वेष्टि (मलयाली परिधान) पहन सकती हूं। अब मैं अपने बाल भी खुले रख सकती हूं।'' पर उनकी यह खुशी दो दिन तक ही रह सकी। दो दिन बाद ही उनका फिर से फोन आया, अब उनकी आवाज से वो चहक गायब थी। उन्होंने बताया कि मोनू और बाकी सबने मिलकर मुझे फिर पर्दे से बांध दिया है। मोनू पुणे के बाजार से परदे खरीद लाया है, उसका कहना है कि बाहर जाते समय इसे जरूर पहनूं।

तस्लीमा नसरीन ने एक बार कमला दास से कोच्चि में भेंट की थी। उन्होंने बाद में कहा कि सुरैया को अब यह समझ में आने लगा है कि इस्लाम महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं देता। तस्लीमा ने इस्लाम कबूलने के संदर्भ में सुरैया से पूछा कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया तो वे खामोश रहीं। उन्होंने फिर पूछा कि क्या अपने फैसलेे पर वे पछता रही हैं? सुरैया ने कहा, 'हां'।

 

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