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तलाक पर राजनीति में उलझे

Written byArchiveArchive
Jan 9, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 09 Jan 2017 17:43:49

गौर करने की बात है कि तीन तलाक के पक्ष में मुल्ला-मौलवी और उनकी 'शरीयत' से दबे-झुके कट्टरवादी मुसलमान ही हैं। इस देश के समझदार नागरिक, यहां के न्यायालय और राष्ट्रहित की बात करने वाले  दल इस अमानवीय परंपरा को तुरंत खत्म करने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं। अब तो मुस्लिम महिलाओं ने ही शरीयत के नाम पर ठगी करने वाले मौलवियों और पर्सनल लॉ बोर्ड के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारत के मुस्लिम जगत में इन दिनों बवाल मचा हुआ है। मुस्लिम महिलाएं और मुल्ला-मौलवी मुट्ठियां ताने आमने-सामने हैं। मौलवियों की सत्ता को भारत में इतनी कड़ी चुनौती शायद इससे पहले कभी नहीं मिली। कोढ़ में खाज यह कि चुनौती भी महिलाओं से मिल रही है। मुस्लिम महिलाएं गुस्से में हैं। उनके गुस्से का कारण मुसलमानों में अपनी पत्नी को तलाक देने के तरीके को लेकर है। मुसलमानों का विश्वास है कि यदि पति अपनी पत्नी को तीन बार कह दे-'तलाक तलाक तलाक' तो तलाक की प्रक्रिया पूरी हो जाती है और पत्नी तलाकशुदा घोषित कर दी जाती है।
मुसलमान ऐसा भी मानते हैं कि 'अल्लाह भी तलाक के इसी तरीके को मान्यता देते हैं।' अब जब दुनियावी तलाक की प्रक्रिया को 'ऊपर वाले' से जोड़ दिया गया है तो यकीनन मामला पचीदा हो जाता है। इधर हिन्दुस्थान में तलाक को कचहरी का मामला माना जाता है, लेकिन यहां के मुसलमान इस जिद पर अड़े हुए हैं कि 'यह मामला सीधा अल्लाह से जुड़ा हुआ है।' इसलिए यदि इसमें दुनियावी ताकतों ने दखलंदाजी की तो मजहब खतरे में पड़ सकता है। हिन्दुओं में विवाह को जन्म-जन्मांतर का रिश्ता माना जाता है। लेकिन इसके बावजूद तलाक के मामले में हिन्दूकचहरी के निर्णय को ही स्वीकारते हैं। वहीं मुसलमानों में विवाह को जन्म-जन्मांतर का रिश्ता नहीं माना जाता बल्कि इसी जन्म में हुआ 'कांन्ट्रैक्ट' माना जाता है। लेेकिन इसके बावजूद मौलवी इस मामले में कचहरी के दखल को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। बहुत से लोग यह मानते हैं कि हिन्दुस्थान का मुस्लिम समाज अभी भी पिछड़ा हुआ है, इसलिए वह अभी तलाक को लेकर इन पुरानी दकियानूसी बातों से ऊपर नहीं उठ पाता। लेकिन ऐसा नहीं है। तलाक के मामले में मुसलमान पुरुष आधुनिक तकनीक का भी प्रयोग करते हैं। माना जा रहा है कि यदि कोई पुरुष ई-मेल से अपनी पत्नी को तीन बार तलाक लिख कर भेज दे तब भी तलाक स्वीकार हो जाएगा। सिर्फ एसएमएस से भी तलाक दिया जा सकता है। किसी नाटक में, नाटक की जरूरत के अनुसार यदि किसी पुरुष पात्र ने किसी महिला पात्र को तीन बार तलाक कह दिया और दुर्भाग्य से वह महिला पात्र सचमुच पुरुष पात्र की पत्नी है तो नाटक में बोले गए संवाद ही तलाक पूरा कर देंगे।
लेकिन मुस्लिम महिलाएं इस प्रक्रिया के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि या तो तलाक परस्पर सहमति से हो या फिर गुण-दोष के आधार पर देश के कानून की प्रक्रिया के अनुसार हो। मुल्ला-मौलवियों ने इस मामले में अपना मोर्चा पूरी मजबूती से संभाल रखा है। वे तीन तलाक को 'अल्लाह का फरमान' मान कर उसकी रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। मुल्ला-मौलवियों की सहायता के लिए मुसलमानों ने कई तंजीमें अलग-अलग नामों से बना रखी हैं। कई तंजीमों को सरकारी मान्यता भी होगी। कोई मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है और कोई मुसलमानों के इत्तिहाद की तंजीमें। कोई ओवैसी है, कोई सैयद है। इत्तिहाद की ये तमाम तंजीमें औरत के खिलाफ लामबंद हैं। पर्सनल लॉ बोर्ड का तर्क तो लाजवाब है। उसका कहना है कि ''यदि मुसलमान पुरुषों को तीन तलाक के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है तो पुरुष तो अपनी पत्नी से छुटकारा पाने के लिए उनका कत्ल तक कर देंगे या फिर जिंदा जला देंगे।'' पर्सनल बोर्ड में बैठे आलिम लोगों का दिमाग किस प्रकार काम करता है, इससे ही सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। इन विद्वानों की नजर में तो मुसलमान औरतों को तीन तलाक के सिद्धांत का शुक्रगुजार होना चाहिए कि पुरुष उन्हें सस्ते में ही निबटा रहे हैं, उन्हें जिन्दा जला नहीं रहे। यानी मुसलमान औरतों को तो अपनी रक्षा के लिए तीन तलाक के कवच के पक्ष में आंदोलन चलाना चाहिए। खुदा पर्सनल लॉ बोर्ड के बंद कमरों में बैठे दानिशमंदों को नई रोशनी दे।

ये सब लोग मुल्ला-मौलवियों को पीछे से कुतकार्ें का बारूद मुहैया करवा रहे हैं। मुल्ला-मौलवियों का दावा है कि तलाक की किस पद्धति से भगवान खुश होते हैं, इसकी व्याख्या करने का अधिकार उन्हें ही है। वे अपने इस अधिकार को किसी भी सूरत में छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। मुसलमान को क्या खाना, पीना, पहनना, ओढ़ना, बिछाना चाहिए, इसका निर्णय करने पर मौलवी अपना एकाधिकार छोड़ना नहीं चाहते। पिछलेे दिनों भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य मोहम्मद शमी ने अपने साथ अपनी पत्नी की फोटो भी फेसबुक पर डाल दी। मौलवियों के सैकड़ों पहरुओं ने मोहम्मद शमी से पूछना शुरू कर दिया कि क्या उसे नहीं पता कि एक मुसलमान को अपनी औरत को किस प्रकार रखना चाहिए?
   ऐसा नहीं कि मुस्लिम महिलाएं मुल्ला-मौलवियों की इस दादागीरी के खिलाफ पहली बार लड़ रही हों। वे पहले भी लड़ती रही हैं। लेेकिन लगता है कि हर बार ताकतवर संस्थाएं मौलवियों का ही पक्ष लेती रही हैं। शाहबानो नामक गरीब मुस्लिम महिला केवल अपने दृढ़ संकल्प के बलबूते ही अन्याय के खिलाफ अपनी लड़ाई को उच्चतम न्यायालय तक ले गई थीं। तलाक तक का दुख तो वह झेल गई थी। वह देश के कानून के अनुसार तलाक के बाद अपने शौहर से केवल गुजारा भत्ते की गुहार लगा रही थी। मुल्ला-मौलवियों ने अन्त तक उसका विरोध किया। लेेकिन देश के कानून ने उसका साथ दिया और वह उच्चतम न्यायालय में लड़ाई जीत गई। लेेकिन उसकी यह विजय क्षणिक ही रही। इस देश की तथाकथित पंथनिरपेक्ष सरकार ने उनकी पीठ में छुरा घोंपने का काम किया जो परोक्ष रूप से मौलवियों की कतार में शामिल हो गई थी। शाहबानो के दुख का तब अंत न रहा जब उसने देखा कि मुल्क की सरकार भी मौलवियों से मिल गई और उसने देश का कानून ही बदल दिया। शाहबानो जीत कर भी हार गई। एक बार फिर मुल्ला-मौलवियों ने जश्न मनाया। केवल रिकार्ड के लिए बता दें कि उस वक्त सरकार राजीव गांधी की थी।
लेेकिन ये मुस्लिम महिलाएं ही हैं कि मौलवियों से अपनी इस लड़ाई में बार-बार हार कर फिर उठ खड़ी होती हैं। यह उनके स्वाभिमान और आत्मसम्मान की लड़ाई है। मौलवियों का कहना है कि मुसलमान पुरुष शादियां तो चार कर सकता है लेेकिन यदि चाहे तो तीन बार तलाक कह कर किसी पत्नी से इच्छानुसार छुटकारा प्राप्त कर सकता है। इतना ही नहीं, मौलवी इसको मजहब का हिस्सा भी बता रहे हैं। मुसलमान औरतें मौलवियों की इसी मनमानी के खिलाफ बार-बार मोर्चा संभाल कर खड़ी हो गई हैं। लेेकिन इस बार की लड़ाई में एक बुनियादी अन्तर है। इस बार संघर्ष कर रही इन महिलाओं के साथ देश की सरकार खड़ी है। पिछली बार की तरह सरकार उनकी पीठ में छुरा नहीं घोंप रही। उच्चतम न्यायालय ने सरकार से पूछा है कि बहुपत्नी विवाह और तीन तलाक की प्रक्रिया के बारे में आपका क्या कहना है? केन्द्र सरकार ने इस बार उच्चतम न्यायालय में शपथ पत्र देकर कहा है कि इन दोनों रवायतों का मजहब से कुछ लेेना-देना नहीं है। इसके विपरीत ये रवायतें औरतों की अवमानना ही नहीं हैं बल्कि उनके आत्मविश्वास व गरिमा को भी ठेस पहुंचाती हैं। इतना ही नहीं, जो देश अपने आप को इस्लामी मजहबी देश घोषित करते हैं, उन्होंने भी तलाक व बहुविवाह के मामले में सुधार किए हैं। केन्द्र सरकार का कहना है कि मजहब की आड़ में औरतों से अन्याय की अनुमति नहीं दी जा सकती। सरकार ने उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया है कि वह वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इन रवायतों पर विचार करे। सरकार का कहना है कि प्रश्न यह नहीं है कि कितने पुरुष बहुविवाह करते हैं और कितने तीन तलाक का इस्तेमाल करते हैं। यह तो एक निरन्तर चलने वाला तनाव है। औरत निरन्तर इस भय में रहती है कि पता नहीं, पति कब तलाक, तलाक, तलाक बोल दे और उसके लिए फिर सब कुछ खत्म हो जाए। सरकार ने स्पष्ट किया कि इस देश के लोगों की नजर में यह प्रक्रिया अमानवीय है।
इस से मिलती-जलती बात इस बार इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कही है। न्यायालय के अनुसार तीन तलाक का समर्थन कुरान में नहीं मिलता। तीन तलाक एक प्रकार का रिवाज है। इस प्रकार के निर्दयी और अमानवीय रिवाजों की अनुमति किसी भी सभ्य समाज में नहीं दी जा सकती। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इससे भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज के युग में कोई इस बात का समर्थन कैसे कर सकता है? तलाक को खिलौने की तरह कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या मुस्लिम औरतों को अनन्त काल तक इस अत्याचार में पिसने दिया जा सकता है? इस दानवी व्यवहार से न्यायिक आत्मा आहत होती है। हिन्दुस्थान में मुस्लिम कानून हजरत मोहम्मद की भावना के विपरीत प्रयुक्त किया जा रहा है। दरअसल मुल्ला-मौलवी मुस्लिम कानून के नाम पर हिन्दुस्तान में अपनी दादागीरी दिखा रहे हैं।
दरअसल इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बुलन्दशहर की किसी हिना और उसके पति ने याचिका दायर की थी कि पुलिस और हिना की मां से उन्हें खतरा है, इसलिए उन्हें सुरक्षा मुहैया करवाई जाए। हिना ने अपनी उम्र से तीस साल बड़े पुरुष से शादी करने के लिए अपना घर छोड़ दिया और मियां ने हिना से शादी करने के लिए अपनी पहली पत्नी को तीन बार तलाक का फरमान पकड़ा दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवाह और तलाक की वैधता पर तो कोई टिप्पणी नहीं की, क्योंकि मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन औरतों की इस नारकीय स्थिति पर न्यायालय का दर्द जरूर छलक उठा।

उच्च न्यायालय के निर्णय की  स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि, आठ दिन बाद ही तीन तलाक पर इसी प्रकार की टिप्पणी केरल उच्च न्यायालय ने की। न्यायाधीश मोहम्मद मुश्ताक के अनुसार मजहब के नाम पर मुस्लिम औरतों पर जो अत्याचार हो रहा है, उस पर सरकार मूकदर्शक बनी नहीं रह सकती। उनको न्याय प्रदान करना उसका संवैधानिक दायित्व है।
   लेकिन मौलवियों को देश के कानून और कचहरियों की यह दखलंदाजी कतई पसन्द नहीं है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उलेमा आग उगल रहे हैं। वे इसे शरीयत पर हमला मान रहे हैं। उनका कहना है कि कचहरियों की यह दखलंदाजी इस्लाम पर हमला है। उनका कहना है कि तलाक जैसे मामलों पर फैसला मजहबी जानकार ही दे सकते हैं, कचहरियों के लिए इस इलाके में आना गैरवाजिब है। उनसे पूछा गया, कि जो इस दुनिया में असली इस्लामी देश होने का दावा करते हैं, मसलन सऊदी अरब जैसे मुल्क, वहां तलाक की इस परंपरा को लेेकर क्या स्थिति है? सब जानते हैं, वहां ये मध्ययुगीन परम्पराएं खत्म ही नहीं हुई बल्कि राज्य सरकार ने भी इसे मानने से इंकार कर दिया है। लेकिन हिन्दुस्थान के मौलवियों और उलेेमाओं को लगता है कि इस्लाम की रक्षा का सारा भार उन्हीं पर आ पड़ा है, जिसे वे बहादुरी से उठाए हुए हैं। लेेकिन गौर करने वाली हकीकत यह है कि औरत के खिलाफ इस प्रकार के फतवे जारी करने वाले तमाम मुल्ला-मौलवी और तथाकथित उलेेमा मर्द ही हैं। शायद वे अपने इस इलाके में किसी औरत का अधिकार भी स्वीकार नहीं करते।
मुसलमान औरतों के लिए तीन तलाक वाला यह मसला जहन्नुम बन गया है। बात केवल तलाक पर आकर ही समाप्त हो जाती तब भी गनीमत थी। ऐसी बेचारी महिलाएं अपनी मर्जी से फिर विवाह कर सकती थी। लेकिन मुसलमान औरतों के लिए यह रास्ता भी इतना आसान नहीं है। उसके बीच में हलाला का नरक पड़ता है, जिसे पार किए बिना दूसरे किनारे पर नहीं पहुंचा जा सकता। हर मोड़ पर मुल्ला-मौलवी हाथों में अपनी-अपनी व्याख्याओं के तीर लेकर मुस्तैद हैं। ये सारी व्याख्याएं औरत के खिलाफ ही जाती हैं। मौलवी अपने आप को मजहब के पाबन्द कहते हैं और मजहबी परम्पराओं के हथियार लेकर शिकार करने के लिए मुस्तैद हैं। पर औरतों की हिम्मत को दाद देनी होगी कि वे फिर भी अपने हकों के लिए लड़ने के लिए लामबन्द हो रही हैं।
 लेकिन लगता है, केवल वोटों के लिए मुसलमानों को बटोरने की जुगत में लगे राजनैतिक दल इस लड़ाई में मौलवियों के साथ उन्हीं की कतारों में खड़े हैं। वे अपने-अपने तरीकों से इन्हीं ठेकेदारों के हाथ मजबूत कर रहे हैं। मौके को पहचान कर और शिकार की गंध पाकर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हरीश रावत कहीं से नमूदार होते हैं। वे प्रदेश के सभी मुसलमान कर्मचारियों से आग्रह करते हैं कि शुक्रवार को वे डेढ़ घंटे के लिए दफ्तर से बाहर आकर नमाज पढ़ें। इसके लिए उन्हें सरकार की तरफ से बाकायदा छुट्टी दी जाएगी। उधर समाजवादी पार्टी के अबू आजमी महाराष्ट्र सरकार से मांग कर रहे हैं कि महाराष्ट्र में भी मुस्लिम मुलाजिमों को यह रियायत देनी होगी।  इससे मौलवी और ताकतवर हो गए हैं। उनके तेवरों में और ज्यादा तल्खी आ गई है और बोल और ज्यादा रौबीले हो गए हैं। मानो वे तीन तलाक के मामले में मौलवियों से लड़ रही औरतों से पूछ रहे हों, ''तुम हमारे निजाम को क्या चुनौती दोगी, जब मुख्यमंत्री तक हमारी ताकत के आगे सिर झुका रहे हैं।'' 

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