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बॉलीवुड के जादू से हुए काबू

Written byArchiveArchive
Jan 2, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 02 Jan 2017 16:03:16

 

हिन्दी सिनेमा को लेकर पाकिस्तान के हुक्मरानों की ऐंठ ज्यादा दिन नहीं चल पाई और आखिरकार बॉलीवुड की चाह ने उनसे घुटने टिकवाए

प्रदीप सरदाना

आखिरकार पाकिस्तान को अपने यहां भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर लगाए गए प्रतिबन्ध को हटाना ही पड़ा। हालांकि पाकिस्तान ने बहुत जोश में अपने यहां भारतीय फिल्मों पर गत 30 सितंबर को यह प्रतिबन्ध तब लगाया था, जब भारतीय फिल्मोद्योग ने पाक कलाकारों के काम करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। यूं भारत अपनी महान संस्कृति और उदार परम्पराओं के चलते पाकिस्तानी कलाकारों का शुरू से ही खुले दिल से स्वागत करता रहा है। लेकिन पाकिस्तान द्वारा उड़ी में भारतीय सेना पर कायराना हमले के बाद जनता में पाकिस्तान के साथ पाक कलाकारों के विरुद्ध एक ऐसा जनाक्रोश उभरा कि हमारे फिल्म निर्माताओं ने उनके यहां काम करने पर बैन लगा दिया। क्योंकि पाकिस्तान के बहुत-से साधारण-से गुमनाम कलाकार भी भारतीय फिल्मों और सीरियलों में काम करके बेशुमार दौलत और शोहरत तो जमकर कमा ही रहे थे, जिन्हें पाक में कोई जानता तक नहीं था, वे हमारी फिल्मों और सीरियल में काम करके स्टार बन रहे थे। लेकिन जब-जब पाकिस्तान के आतंकी भारत में हमले करते तो ये कलाकार उन हमलों की भर्त्सना तो दूर, उस पर अपनी प्रतिक्रिया तक नहीं देते थे। इसलिए न सिर्फ भारतीय फिल्म निर्माताओं ने यहां तक कि जी टेलेफिल्म्स के अध्यक्ष सुभाष चंद्रा ने अपने 'जिंदगी' चैनल से भी पाकिस्तान के तमाम सीरियल बंद कर दिए थे। इसी की जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान ने भी भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर प्रतिबन्ध लगा तो दिया, लेकिन इससे वहां का मनोरंजन उद्योग बर्बादी के कगार पर आ गया।

पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर प्रतिबन्ध यदि कुछ दिन और चलता तो वहां के अधिकांश सिनेमाघर बंद हो जाते और इससे बेरोजगारी का सैलाब तो आता ही, साथ ही वहां मनोरंजन की दुनिया वीरान-सी हो जाती। इसलिए पाक का यह प्रतिबन्ध हटाना उसकी ऐसी बेबसी और मजबूरी थी, जो उसे 'करो या मरो' के हालात पर ले आई थी। क्योंकि पाकिस्तान के सिनेमाघर ही नहीं, करीब-करीब वहां का पूरा मनोरंजन उद्योग ही भारतीय फिल्मों की बैसाखी पर टिका है। यह बैसाखी हटते ही वह धड़ाम से नीचे गिर पड़ता है। पाकिस्तान में जब-जब भारतीय फिल्मों पर प्रतिबन्ध लगा, तब-तब वहां ऐसा ही हुआ। असल में पाकिस्तान में उनके अपने टीवी सीरियल तो पसंद किये जाते हैं और उनके कुछ हास्य कलाकारों के कॉमेडी शो टीवी के साथ स्टेज पर भी धूम मचाते रहे हैं। लेकिन अपने अस्तित्व में आने के करीब 70 बरसों बाद भी पाकिस्तानी फिल्में देश-दुनिया में कोई जगह नहीं बना सकी हैं।

सन् 1947 में हिन्दुस्थान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में लाहौर,कराची और ढाका तीन प्रमुख फिल्म केंद्र थे। लेकिन बंगलादेश के आजाद होने के बाद वहां लाहौर और कराची की फिल्म इंडस्ट्री भी ऊपर बढ़ने की जगह नीचे ही गिरती गई। पाक सिनेमा की कमजोरी के कारण ही पहले वहां लोगों की दिलचस्पी स्टेज शो में बढ़ी और फिर टीवी सीरियल मेें। इसी के चलते वहां के 'बकरा किस्तों में' जैसे शो और 'धूप किनारे' सीरियल की लोकप्रियता मुल्क की सीमाएं लांघ दूर-दूर तक पहुंची। उधर बंटवारे के बाद पाक में शुरू में भी भारतीय फिल्में कभी प्रदर्शित होती रहीं तो कभी प्रतिबंधित। लेकिन पाकिस्तान की अवाम शुरू से ही हिंदी फिल्मों की दीवानी रही है। यहां तक कि पाकिस्तान में शादी-ब्याह के दौरान भी घरों से लेकर गली-कूंचों तक हिंदी फिल्मों के गीत ही गूंजते हैं। लेकिन वहां की सरकारें अपने राजनीतिक स्वार्थों के कारण भारतीय सिनेमा पर प्रतिबंध लगाती रही हैं। पाकिस्तान के आकाओं को इस बात का मलाल रहता है कि भारतीय सिनेमा किन ऊंचाईयों तक पहुंच गया और पाकिस्तान का सिनेमा आज भी जमीन पर मुश्किल से रेंग रहा है। ़इसलिए पाक की 'सरकारें खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' की तरह भारतीय फिल्मों पर प्रतिबन्ध लगाकर अपनी भड़ास निकालती रहती हैं।

पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों पर सबसे लंबा प्रतिबंध 1965 के युद्ध के बाद वहां के राष्ट्रपति अयूब खान ने तब लगाया जब पाकिस्तान ने बुरी तरह मुंह की खाई। हालांकि वहां जब जुल्फिकार अली भुट्टो प्रधानमन्त्री बने तब एक बार उम्मीद जगी कि यह प्रतिबन्ध हट जाएगा। शिमला समझौते के बाद भी वहां की अवाम को उम्मीद जगी थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यहां तक कि जिया उल हक के सैन्य शासन के समय तो इस प्रतिबंध को और भी सख्त कर दिया गया। लेकिन कई सख्तियों के बावजूद पाकिस्तान की अवाम ने हिंदी फिल्मों को चोरी छिपे वीडियो, सीडी के माध्यम से देखना शुरू कर दिय। जब परवेज मुशर्रफ ने अपने शासन काल में यह सब देखा तो उन्हें एहसास हुआ कि लाख चाहकर भी पाकिस्तान के लोगों के दिलो-दिमाग में बसे हिंदी सिनेमा को बाहर नहीं निकाला जा सकता। तब उन्होंने 43 साल बाद सन् 2008 में भारतीय फिल्मों पर लगे प्रतिबन्ध को हटा दिया। इससे पाक की अवाम खुशी से झूम उठी। लेकिन इतने साल तक वहां के सिनेमाघरों में किसी भारतीय फिल्म के न लगने के कारण वहां के अधिकांश सिनेमा, थिएटर बंद हो गए थे। यह स्थिति कितनी खराब थी- इस बात का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे पाकिस्तान में तब मुश्किल से 60 सिनेमाघर बचे थे।

सन् 2008 में प्रतिबंध हटने के बाद पाक में नयी उम्मीद की किरणें उठने लगीं। उन्होंने हिंदी फिल्मों को आयात करना शुरू किया। जब हमारी फिल्में वहां प्रदशित हुईं तो वीरान पड़े थिएटरों में रौनक लौटने लगी। यह देख उन सिनेमा वालों के मायूस चेहरे तो खिले से, जिन्होंने कई मुश्किलों के बाद भी अपने थिएटर को बचाए रखा था। साथ ही कुछ बंद सिनेमाघर फिर खुलने लगे और वहां आधुनिक सिनेमा यानी मल्टीप्लेक्स का निर्माण भी शुरू हो गया। हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता का आलम यह है कि पाक जिस हिंदी फिल्म को करीब चार से आठ करोड़ रुपये में खरीदता है, वह फिल्म करीब दस से बीस करोड़ तक कमा लेती है। साथ ही थिएटर में दर्शकों के आने से वहां खाने-पीने के सामान से भी अच्छी आमदनी हो जाती है। हिंदी फिल्मों से होने वाली मोटी कमाई को देख पिछले दिनों वहां बहुत से नए-पुराने थिएटर फिर से गुलजार हो उठे हैं। इस समय पाक में जहां करीब 140 सिंगल स्क्रीन सिनेमा हैं वहीं करीब 50 मल्टीप्लेक्स भी बन गए हैं। यह सब देख बहुत से लोग नए थिएटर बनाने पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं। क्योंकि हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता के हिसाब से वहां सिनेमाघर कम हैं। पाक में सर्वाधिक सिनेमाघर कराची और लाहौर में हैं। एक जानकारी के अनुसार कराची में करीब 40 सिंगल स्क्रीन थिएटर हैं और 7मल्टीप्लेक्स हैं। जबकि लाहौर में 29 सिंगल स्क्रीन थियेटर और 17 मल्टीप्लेक्स हैं। जबकि इस्लामाबाद, रावलपिंडी, फैसलाबाद, मुल्तान, बहावलपुर, पेशावर क्वेटा, सियालकोट और हैदराबाद जैसी मशहूर जगहों पर भी तीन से छह सिंगल स्क्रीन सिनेमा हाउस और करीब इतने ही मल्टीप्लेक्स हैं।

नए थिएटर पर करोड़ों रुपये निवेश करने वालों को तब जबरदस्त धक्का लगना जाहिर था जब सितंबर में अचानक शरीफ सरकार ने फिर से वहां भारतीय फल्मिों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। उधर थिएटर मालिकों को यह डर था कि यदि यह प्रतिबन्ध पहले की तरह लंबा चला तो सब बुरी तरह बर्बाद हो जायेंगे। क्योंकि हिंदी फल्मिों पर प्रतिबन्ध लगते ही सिनेमाघर फिर से वीरान होने लगे थे। इसलिए फल्मि प्रदर्शन और वितरण के कारोबार से जुड़े संघ ने मिलकर यह फैसला लिया कि इस प्रतिबन्ध को हटवाया जाए।

पाकस्तिान के एक मशहूर सिनेमाघर औट्रीम के प्रमुख और वहां की फल्मि संस्थाओं से जुड़े नदीम मांडवीवाला कहते हैं, ''इस बैन को हटाने के पीछे खास वजह यह है कि इससे सभी सिनेमा मालिकों को भारी घाटा हो रहा था। लोग गैर कानूनी तरीकों से डीवीडी और इंटरनेट के जरिए भारतीय फल्मिें देखने लगे थे। क्योंकि भारतीय फल्मिें और सितारे पाक में घर-घर पसंद किये जाते हैं। उधर फल्मि एग्जिबिटर्स ऑफ पाकस्तिान के चेयरमैन जोरेंज लशारी कहते हैं,''पाक में फल्मिों में अधिकतर राजस्व हिंदी फल्मिों से ही मिलता है। पिछले तीन महीनों में इस बैन के कारण अपने 1700 कर्मचारियों को हटाना पड़ा। हॉलीवुड और पाकस्तिान की फल्मिें मिलकर भी भारतीय फल्मिों की कमी को पूरा नहीं कर सकतीं।''

इन दो बयानों से ही पता चल जाता है कि भारतीय फल्मिों पर प्रतिबंध से वहां के मनोरंजन उद्योग के किस तरह पसीने छूट गए़ थे। वहां के सिंध बोर्ड ऑफ सेंसर के चेयरमैन फक्र ए आलम का बयान भी सभी के दर्द की तस्वीर को साफ दिखाता है। आलम कहते हैं,''अगर यह बैन और लंबा चलता तो हम फिर से उन्हीं दिनों में पहंच जाते जब इसी बैन के कारण सिनेमा हॉल को बंद करना पड़ा था। यह बैन तभी चल सकता है जब हम पाक में करीब 45 फल्मिें हर साल बनाएं लेकिन यह मुमकिन नहीं है।''

हालांकि पाक में हिंदी फल्मिों की बढ़ती लोकप्रियता से पाक के फल्मिकार खुश नहीं हैं। असल में पाकस्तिान में हर साल करीब 60 भारतीय फल्मि रिलीज होती हैं। यहां सलमान खान, आमिर खान और शाहरुख खान के अलावा अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और ऋतिक रोशन अच्छे-खासे लोकप्रिय हैं। अब जब पाक में गत 19 दिसम्बर से भारतीय फल्मिों पर प्रतिबंध हटा है तो वहां के थिएटरों में सबसे पहले 'फ्रीकी अली' फल्मि प्रदर्शित हुई है। वैसे इस फल्मि को अभी बिना किसी शोरशराबे के रिलीज किया गया है। क्योंकि वहां यह डर है कि कुछ कट्टरपंथी इसका विरोध न करें। भारतीय फल्मिों में पाक कलाकारों पर लगा प्रतिबन्ध बरकरार है और हाल-फिलहाल क्या, दूर दूर तक इस प्रतिबन्ध के हटने की कोई गुंजाइश नहीं है। क्योंकि जब तक पाकस्तिान आतंकवादियों को प्रश्रय और आसरा देता रहेगा, तब तक पाक के साथ दोस्ताना संबंध बनने के कोई आसार नहीं हैं। लेकिन 'फ्रीकी अली' के प्रदर्शन पर वहां कोई हाय-तौबा नहीं हुई। इसीलिए वहां नए साल के शुरू से ही कई भारतीय फल्मिों को धूमधाम से प्रदर्शित करने की तैयारी है। साथ ही आमिर खान की 'दंगल' को रिलीज करने के लिए तमाम कोशिशें की जा रही हैं। अब भी पाक के कुछ अखबार यह लिख रहे हैं कि 'दंगल' की रिलीज को लेकर पाक के सूचना प्रसारण मंत्रालय और वाणज्यि मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को एक पत्र लिखकर उनकी अनुमति मांगी है। इसलिए सभी की निगाहें वहां 'दंगल' पर लगी हैं। वहां सभी यह मान रहे हैं कि यदि 'दंगल' पाक में रिलीज हो जाती है तो पिछले तीन महीने में थिएटरों को जो नुकसान हुआ है उसकी काफी हद तक भरपाई हो जाएगी।

  

 

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