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जमीन पर दूर तक की मारक क्षमता हासिल करने के बाद भारत ने अंतरमहाद्वीपीय मार करने वाली अग्नि-5 का सफल परीक्षण करके अपनी ताकत को फौलादी मजबूती दी है
शशांक द्विवेदी
रक्षा क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारत ने अपनी सबसे ताकतवर परमाणु मिसाइल अग्नि-5 का ओडिशा के बालासोर तट से सफल परीक्षण किया है। लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम इस मिसाइल का यह चौथा विकासात्मक और दूसरा 'कैनिस्टराइज्ड' परीक्षण है। देश में तैयार अग्नि-5 भारत की पहली अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल है, जो 5,000 किलोमीटर की दूरी तक मार करने में सक्षम है। अग्नि-5 की जद में आने वाले यूरोप के कई देशों के अलावा चीन भी शामिल है। अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के बाद भारत दुनिया का पांचवां ऐसा देश है, जिसके पास अब अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल है। डीआरडीओ ने 4 साल में इस मिसाइल को तैयार किया जिसे बनाने पर करीब 50 करोड़ रुपये की लागत आई है। यह मिसाइल 17 मीटर लंबी, 2 मीटर चौड़ी और 50 टन वजनी है। यह एक टन के परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है और 20 मिनट में 5,000 कि.मी. की दूरी तय कर सकती है। अग्नि-5 दुश्मनों के सैटेलाइट नष्ट करने में भी उपयोगी है और इसके लॉन्चिंग सिस्टम में कैनिस्टर्ड तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिस वजह से इस मिसाइल को कहीं भी बड़ी आसानी से ले जाया जा सकता है। और तो और, इसे सड़क से भी लॉन्च किया जा सकता है।
रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (डीआरडीओ)के अनुसार यह मिसाइल सभी पैमानों पर खरा उतरी है। 80 फीसद से ज्यादा स्वदेशी उपकरणों से बनी इस मिसाइल ने भारत को नाभिकीय बम के साथ सुदूर लक्ष्य पर सटीक वार करने वाली अतिजटिल तकनीक का रणनीतिक रक्षा कवच दिया है। इसके जरिए भारत अपने किसी भी हमलावर को भरोसेमंद पलटवार क्षमता के साथ मुंहतोड़ जवाब दे सकता है। वास्तव में यह भारत के इतिहास की सबसे बड़ी सामरिक उपलब्धि है क्योंकि इस कामयाबी में स्वदेशी तकनीक के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम की भी पुष्टि होती है।
अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल
अग्नि-5 तीन स्तरीय, पूरी तरह से ठोस ईंधन पर आधारित मिसाइल है जो विभिन्न तरह के उपकरणों को ले जाने में सक्षम है। इसमें 'मल्टीपल इंडीपेंडेंटली टार्गेटेबल रीएंट्री व्हीकल' (एमआईटीआरवी) भी विकसित किया जा चुका है। यह दुनिया के कोने-कोने तक मार करने की ताकत रखती है तथा देश की पहली कैनिस्टर्ड मिसाइल है। अग्नि-5 को अचूक बनाने के लिए भारत ने माइक्रो नेवीगेशन सिस्टम, कार्बन कंपोजिट मैटेरियल से लेकर कंप्यूटर व साफ्टवेयर तक ज्यादातर चीजें स्वदेशी तकनीक से विकसित की हैं। अग्नि-5 का प्रयोग छोटे उपग्रह छोड़ने और दुश्मनों के उपग्रह नष्ट करने में भी किया जा सकता है। एक बार इसे दागने के बाद रोकना मुश्किल है। इसकी रफ्तार गोली से भी ज्यादा तेज है।
एक महत्वपूर्ण उपलब्धि
आज के तकनीकी युग में हजारों किलोमीटर दूर तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है, क्योंकि जिस तरह से चीन एशिया में लगातार अपनी सैन्य ताकत को बढ़ा रहा है, ऐसे में भारत को भी अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाते हुए उसे अत्याधुनिक तकनीक से लैस करते जाना होगा। तभी देश बदलते समय के साथ विश्व में अपनी मजबूत सैन्य उपस्थिति दर्ज करा सकेगा।
जमीन और सीमा विवाद को लेकर जिस तरह चीन भारत को लगातार चुनौती दे रहा है और कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देकर पकिस्तान अपने सामरिक हित पूरा कर रहा है, ऐसे में देश की रक्षा जरूरतों को देखते हुए लंबी दूरी की अग्नि-5 जैसी बैलेस्टिक मिसाइलों का परीक्षण काफी जरूरी हो गया था, क्योंकि पड़ोस में चीन के पास बैलिस्टिक मिसाइलों का अंबार लगा हुआ है जिससे एक सैन्य असंतुलन पैदा हो गया था। चीन ने दो साल पहले ही 12,000 किलोमीटर तक मार करने वाली तुंगफंग-31 ए बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास कर लिया था। लेकिन अब अग्नि-5 के सफल परिक्षण से कोई दुश्मन देश हम पर हावी नहीं हो सकेगा।
आत्मनिर्भरता ही एकमात्र विकल्प
अग्नि-5 की सफलता ने भारत की सामरिक प्रतिरोधक क्षमता की पुष्टि कर दी है और डीआरडीओ ने अपनी ख्याति और क्षमताओं के अनुरूप ही अग्नि-5 को आधुनिक तकनीक के साथ विकसित किया है। लेकिन देश की रक्षा प्रणाली में आत्मनिर्भरता और रक्षा जरूरतों को समय पर पूरा करने की जिम्मेदारी सिर्फ डीआरडीओ की ही नहीं होनी चाहिए बल्कि 'आत्म निर्भरता संबंधी जिम्मेदारी' रक्षा मंत्रालय से जुड़े सभी पक्षों की होनी चाहिए। देश में स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी को बड़े पैमाने पर विकसित करने की जरूरत है। सरकार को यह महसूस करना चाहिए कि अत्याधुनिक आयातित प्रणाली भले ही बहुत अच्छी हो लेकिन कोई भी विदेशी प्रणाली लंबे समय तक अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती। सैन्य तकनीकों और हथियार उत्पादन में आत्मनिर्भरता देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है।
अगर हम एक विकसित देश बनने की इच्छा रखते हैं तो आतंरिक और बाहरी चुनौतियों से निबटने के लिए हमें दूरगामी रणनीति बनानी पड़ेगी, क्योंकि भारत पिछले 6 दशक के दौरान अपनी अधिकांश सुरक्षा जरूरतों की पूर्ति दूसरे देशों से हथियार खरीद कर कर रहा है। गत वषार्ें में सैन्य हथियारों, उपकरणों की कीमत दोगुनी कर देने, पुराने विमान, हथियार व उपकरणों को अत्याधुनिक करने के लिए मुंहमांगी कीमत वसूलने और सौदे में मूल प्रस्ताव से हट कर ज्यादा कीमत मांगने के कई मामले देश के सामने आ चुके हैं। वहीं अमेरिका रणनीतिक रक्षा प्रौद्योगिकी में भारत को भागीदार नहीं बनाना चाहता। वह भारत को हथियार व उपकरण तो दे रहा है पर उनका किसी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल न करने व कभी भी इस्तेमाल की जांच के लिए अपने प्रतिनिधि भेजने जैसी शर्मनाक शर्तें भी लगा रहा है। वर्तमान में रक्षा मामले में आत्मनिर्भर बनने की तरफ मजबूती से कदम उठाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
कामयाबी के साथ चुनौतियां भी
अग्नि-5 के सफल परीक्षण के बाद रक्षा वैज्ञानिकों को दुश्मन मिसाइल को मार गिराने वाली 'इंटरसेप्टर मिसाइल' और 'मिसाइल डिफेंस सिस्टम' पर अधिक काम करने की जरूरत है, क्योंकि अमेरिका, रूस, फ्रांस व चीन जैसे देश इसे विकसित कर चुके हैं। मिसाइल डिफेंस सिस्टम के तहत दुश्मन देश के द्वारा दागी गई मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर दिया जाता है। इस कामयाबी के साथ ही हमारी चुनातियां भी बढ़ गई हैं क्योंकि अब चीन और पाकिस्तान इसका जवाब देने के लिए हथियारों और उपकरणों की होड़ में शामिल हो जाएंगे। इसलिए हमें सतर्क रहते हुए अपने रक्षा कार्यक्रमों को मजबूत करते जाना होगा। इस कामयाबी को आगे बढ़ाते हुए हमें अपनी सैन्य क्षमताओं को स्वदेशी तकनीक से अत्याधुनिक बनाना है जिससे कोई भी दुश्मन देश हमारी तरफ देखने से पहले सौ बार सोचे।
अग्नि का सफरनामा
अग्नि प्रक्षेपास्त्र अंतरमहाद्वीपीय दूरी तक मार करने में सक्षम प्रक्षेपास्त्रों का समूह है, जो भारत के एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम द्वारा स्वदेशी तकनीक से विकसित की गई हैं। भारत 2008 तक इस प्रक्षेपास्त्र (मिसाइल) समूह के तीन संस्करण तैनात कर चुका है।
अग्नि श्रृंखला की मिसाइलों का विकास 1983 में डॉ़ अब्दुल कलाम की अगुआई में एकीकृत मिसाइल विकास कार्यक्रम के तहत शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम को सफलता के मुकाम तक पहुंचाने के लिए डॉ. कलाम को मिसाइल पुरुष की संज्ञा भी दी गई थी। 1983 से शुरू करके आज भारत के पास अग्नि-1 (700 किमी़), अग्नि-2 (2000 किमी़) और अग्नि-3 (3500 किमी़),अग्नि-4 (4000 किमी़) और अग्नि-5 (5000 किमी़) वाली बैलिस्टिक मिसाइलों के अलावा ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और पृथ्वी की 150 से 350 किमी़ तक मार करने वाली कई मिसाइलें मौजूद हैं। अग्नि-5 मिसाइल की खासियत यह है एक साथ कम से कम तीन मिसाइलों का तैनात होना। यानी एक राकेट पर तीन मिसाइलें एक साथ छोड़ी जा सकेंगी, जो दुश्मन के इलाके में एक साथ तीन अलग-अलग ठिकानों को तबाह कर सकेंगी। इस तरह की तकनीक वाली मिसाइल को एमआइआरवी (मल्टिपल इंडिपेंडेंट टारगेटेबेल रीएंट्री व्हिकल) मिसाइल यानी कई विस्फोटक सिरों वाली मिसाइल कहते हैं।
अग्नि श्रृंखला की पहली मिसाइल अग्नि-1 का पहला परीक्षण1989 में हुआ था। तब अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत के इस मिसाइल कार्यक्रम पर घोर चिंता जाहिर की थी और भारत पर कई तरह के तकनीक आपूर्ति संबंधी प्रतिबंध लगाने की कोशिशें भी की थीं। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए ऐसी सभी तकनीक रोक दी गई थी जिनका इस्तेमाल मिसाइलों के उत्पादन में किया जा सकता था। लेकिन बीते 10 साल में भारत की ताकत अग्नि-1 मिसाइल से अब अग्नि-5 मिसाइल तक पहुंची है। 2002 में सफल परीक्षण की रेखा पार करने वाली अग्नि-1 मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल थी। अग्नि-5 भारत की पहली अंतर महाद्वीपीय यानी इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल है। यानी अब भारत की गिनती उन 5 देशों में होगी जिनके पास ये बैलिस्टिक मिसाइल यानी आईसीबीएम हैं।
(लेखक चित्तौड़गढ़ विश्वविद्यालय, मेवाड़ राजस्थान के उपनिदेशक और टेक्निकल टुडे पत्रिका के संपादक हैं)
मिसाइल तकनीक में भारत के बढ़ते कदम
नाम प्रकार पहुंच (रेंज)
अग्नि-1 मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल 700- 1,250 किलोमीटर (परिचालन)
अग्नि-2 मध्यवर्ती दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल 2,000- 3,000 किलोमीटर (परिचालन)
अग्नि-3 मध्यवर्ती दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल 3,500- 5,000 किलोमीटर (परिचालन)
अग्नि-4 मध्यवर्ती दूरी का बैलिस्टिक मिसाइल 3,000-4,000 किलोमीटर (परीक्षण)
अग्नि-5 अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल 5,000-8,000 किलोमीटर (परीक्षण)
अग्नि-6 अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल 8,000-10,000 किलोमीटर (बन रही है)
निर्मातारक्षा अनुसंधान और विकास संगठन, भारत डाईनामिक्स लिमिटेड
इकाई लागत 25 करोड़ से 50 करोड़ रु.











