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उरी हमले के बाद भारत सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ पूरी सख्ती दर्शाते हुए अपनी 'नो टोलरेन्स' की नीति पर अमल किया। सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए यह साफ कर दिया गया कि अब भारत पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को दुनिया के सामने उजागर कर देगा
आलोक गोस्वामी
साल दो हजार सोलह के तीन सौ पैंसठ दिन बीतते-बीतते, दिल को तसल्ली देने वाली दो खबरें पढ़ने में आई हैं। दोनों ही खबरों में आतंकवाद के खिलाफ रिकार्ड समय में तहकीकात करके आरोप पत्र दायर करने, सुनवाई करके सजा देने में भारत की प्रमुख जांच एजेंसी एनआइए की मुस्तैदी दिल को राहत देने वाली रही है। पहली खबर-पठानकोट वायु सेना हवाई अड्डे पर हुए आतंकी हमले में एनआइए ने अपने आरोप पत्र में पाकिस्तान में फल-फूल रहे आतंकी गुट जैशे-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर और उसके भाई अब्दुल रउफ असगर को दोषी ठहराया है।
दूसरी खबर—एनआइए की विशेष अदालत ने 2013 के दिलसुखनगर (हैदराबाद) के दोहरे बम कांड के पांच आरोपियों को मौत की सजा सुनाई है। 19 दिसंबर को सुनाई गई सजा से पहले 13 दिसंबर को अदालत ने पांचों को आरोपी ठहराया था। इसमें इस महत्वपूर्ण बात यह है कि कांड के मुख्य आरोपी इंडियन मुजाहिदीन का सरगना यासीन भटकल और एक पाकिस्तानी जिहादी भी मौत की सजा पाने वालों में शामिल हैं। महज 15 महीनें की जांच और सुनवाई के बाद अदालत ने त्वरित कार्रवाई करते हुए यह सजा सुनाई है। इन दोनों खबरों के साथ ही अभी 3-4 दिसंबर को अमृतसर में संपन्न हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में एशिया के शीर्ष देशों के प्र्रतिनिधियों के बीच पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज की मौजूदगी में भारत ने पाकिस्तान को आतंकी गतिविधियों और संगठनों का पोषक ठहराते हुए इस पर प्रभावी लगाम लगाने की बात की। भारत की इस तीखी प्रतिक्रिया का समर्थन करते हुए अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अब्दुल गनी ने भी पाकिस्तान की करतूतों पर खुलेआम उंगली उठाते हुए भारत के साथ अपनी नजदीकी रेखांकित किया। गनी ने कहा कि अफगानिस्तान में विकास कार्यक्रमों में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इस सम्मेलन से करीब महीना भर पहले, नवंबर 2016 में भारत ने पाकिस्तान को दक्षिण एशियाई देशों के महत्वपूर्ण मंच सार्क का बहिष्कार करके आईना दिखाया था। भारत ने साफ कहा था कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देने की अपनी जगजाहिर नीति से बाज नहीं आता, उसके साथ मंच साझा नहीं किया जाएगा। भारत के इस कदम को अफगानिस्तान, बंगलादेश और भूटान ने न सिर्फ सराहा, बल्कि वे खुद भी उस सम्मेलन से दूर रहे।
साफ है कि भारत की विदेश नीति 'प्रो-एक्टिव मोड' में है और वह अपने पड़ोसी देशों की नापाक हरकतों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेनकाब करना जारी रखे हुए है।
2016 में भारत ने इस दिशा में दोतरफा नीति अपनाई। उसने आतंकी गतिविधियों के बाद पूर्ववर्ती सरकारों की तरह अपने को सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रखा बल्कि जिहाद की जड़ पर सीधे प्रहार किया। 28 सितंबर की देर रात पीओके में भारत की सर्जिकल स्ट्राइक में 8 आतंकी लॉन्चपैठ ध्वस्त करने के साथ ही करीब 38 जिहादियों को मार गिराया गया। चोट खाया पाकिस्तानी सत्ता अधिष्ठान भले अपने लोगों के बीच चेहरा बचाए रखने को भारत की ओर से ऐसी किसी भी कार्रवाई के होने से इनकार करता रहा। लेकिन भारत के पुख्ता सबूत देने के बाद विश्व बिरादरी ने भारत के इस जांबाज कदम की सराहना की। भारत सरकार ने इससे साफ संकेत दिया कि अब पीठ पीछे वार करने की पाकिस्तान की हर हरकत का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।
अब जरा मसूद अजहर और यासीन पर शिकंजा कसने से जुड़ी खबरों पर विस्तार से नजर डालें। जनवरी 2016 में पठानकोट स्थित वायु सेना हवाई अड्डे में 4 आतंकी घुस आए थे और अंधाधुंध गोलीबारी की थी, जिसमें 7 जवान शहीद हो गए। हालांकि चारों आतंकियों को ढेर कर दिया गया था, लेकिन उस साजिश में जैशे-मोहम्मद का हाथ साफ नजर आया था। जबकि भारत के सहयोगी रुख के चलते 'जांच' करने आई पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने उस हमले में पाकिस्तान की किसी भी भूमिका से साफ इंकार कर दिया था, वैसे यह अनपेक्षित भी नहीं था। बहरहाल, इसकी जांच आई एनआइए के पास, जिसने कुल 11 महीनों की अपनी छानबीन में जैशे-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को कठघरे में खड़ा किया है। आरोप पत्र में मसूद के भाई अब्दुल रऊफ असगर और 2 साथी साजिशकर्ताओं के नाम भी हैं। केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू की मानें तो इन जिहादियों के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी करके पूछताछ की जाएगी। हालांकि इस मामले में पाकिस्तान की ओर से किस्ी भी तरह की मदद मिलने की कोई संभावना नहीं है।
उधर दिलसुखनगर बम कांड के प्रमुख आरोपी यासीन भटकल और 4 अन्य को मौत की सजा सुनाए जाने से लोगों ने राहत की सांस ली है और उन्हें पहली बार लगा है कि केंद्र में एक दमदार सरकार है जो आतंक के खिलाफ लगाम कसे हुए है।
यासीन कर्नाटक के भटकल का रहने वाला है। इस कांड में उसके साथ जिन अन्य आरोपियों को मौत की सजा दी गई है, उनमें असदुल्ला अख्तर उत्तर प्रदेश का, जियाउर्रहमान पाकिस्तान का, तहसीन अख्तर बिहार का और अहजाज शेख महाराष्ट्र का रहने वाला है। इन्होंने 21 फरवरी, 2013 को हैदराबाद में दिलसुखनगर के भीडभाड़ वाले इलाके में दो साइकिलों में बम लगाकर रखे थे। शाम 7 बजे हुए धमाकों में सैकड़ों मासूूम नागरिकों की जान चली गई थी, अनेक घायल हुए थे। यासीन एक कुख्यात आतंकी सरगना है और इंडियन मुजाहिदीन के जरिए उसने बड़ी तादाद में भटके मुस्लिम युवकों को जिहाद के रास्ते पर पहंुचाया है।
जिहाद की राह की बात से जुड़े और इस साल नजर आए एक और महत्वपूर्ण तथा चौंकाने वाले तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 'गॉड्स ऑन कंट्री' बोले जाने वाले केरल राज्य में कुख्यात आतंकी संगठन आइएसआइएस के गुर्गे या कहें, 'रिकू्रटर' सक्रिय हैं और ऊंचे दर्जे की पढ़ाई कर रहे कई युवकों को जहन्नुम की राह पर धकेला है। इसमें एक नाम जो उभर कर आया है वह है ऊंची पतलून और कोट-टाई पहनकर कई भाषाओं में गलत-सलत इस्लामी तकरीरें करके लोगों का बरगलाने में जुटा मजहबी कट्टरवादी जाकिर नाइक। जाकिर के इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन का कारिंदा आर. सी. कुरैशी रहता भले मुंबई में है पर उस पर केरल के युवाओं को बरगलाकर मुस्लिम बनने का दबाव डालने, उन्हें सीरिया भेजने और आइएसआइएस से जोड़ने का कथित आरोप है। फाउंडेशन पर फिलहाल सरकार ने पाबंदी लगाकर उसे जांच के दायरे में रखा है, लेकिन कुरैशी की गतिविधियों की छानबीन की जा रही है। अकेले केरल से साल भर में कम से कम 22 युवाओं के सीरिया जाकर आइएस से जुड़ने का अंदेशा है। अखबारों में छपी रपट की मानें तो, एनआइए को केरल के साजीर मंगलाचारी अब्दुल्ला की सरगर्मी से तलाश है। उस पर आरोप है कि उसने इस साल जुलाई में बड़ी तादाद में केरल के युवाओं को आइएस से जुड़ने के लिए उकसाया है। पूरे भारत से ऐसे संदिग्ध लोगों की संख्या 67 बताई जाती है लेकिन असल में यह बहुत ज्यादा हो सकती है। अब्दुल्ला के शिकार बनें ज्यादातर युवक उच्च डिग्रीधारी हैं। अब्दुल्ला खुद नौकरी के बहाने दुबई गया था जहां से वह 'गायब' हो गया। पता चला है कि अब उसने अफगानिस्तान के उस नांगरहर सूबे में ठिकाना बनाया है जो आइएस तक पहंुच का सबसे करीबी स्थान है। केरल के कासरगोड जिले के त्रिकारीपुर का फिरोज खान हो या तिरुअनंतपुरम में दांत चिकित्सा रही 24 साल की निमिशा (जिसने एक ईसाई लड़के से शादी की, फिर वे दोनों कन्वर्ट होकर मुस्लिम बने) या फिर कोच्चि की मेरीन (जिसने मुस्लिम बनकर याहिया नामक मुसलमान लड़के से शादी रचा ली), ये और ऐसे कई और अब्दुल्ला या उसके गुर्गों की चपेट में आकर आइएस की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, जो केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों के लिए चिंता का विषय है।
इतना ही नहीं, केरल के कुछ मुसलमानों ने एक वेबसाइट चला रखी है 'अंसारुल खलीफा' (यानी 'खलीफा के अनुयायी', फिलहाल इसे हटा लिया गया, क्योंकि मीडिया ने उसके तसलीमा नसरीन को धमकी देने का मामला उछाल दिया था)। इस वेबसाइट की उन्माद भड़काने वाली तमाम पोस्ट का एकमात्र मकसद युवकों को 'खलीफा के लिए जंग' करने को उकसाना ही होता है। इस पर बगदादी की तारीफों के पुल बांधने वाली पोस्ट डाली जाती हैं।
आलोक गोस्वामी
साल दो हजार सोलह के तीन सौ पैंसठ दिन बीतते-बीतते, दिल को तसल्ली देने वाली दो खबरें पढ़ने में आई हैं। दोनों ही खबरों में आतंकवाद के खिलाफ रिकार्ड समय में तहकीकात करके आरोप पत्र दायर करने, सुनवाई करके सजा देने में भारत की प्रमुख जांच एजेंसी एनआइए की मुस्तैदी दिल को राहत देने वाली रही है। पहली खबर-पठानकोट वायु सेना हवाई अड्डे पर हुए आतंकी हमले में एनआइए ने अपने आरोप पत्र में पाकिस्तान में फल-फूल रहे आतंकी गुट जैशे-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर और उसके भाई अब्दुल रउफ असगर को दोषी ठहराया है।
दूसरी खबर—एनआइए की विशेष अदालत ने 2013 के दिलसुखनगर (हैदराबाद) के दोहरे बम कांड के पांच आरोपियों को मौत की सजा सुनाई है। 19 दिसंबर को सुनाई गई सजा से पहले 13 दिसंबर को अदालत ने पांचों को आरोपी ठहराया था। इसमें इस महत्वपूर्ण बात यह है कि कांड के मुख्य आरोपी इंडियन मुजाहिदीन का सरगना यासीन भटकल और एक पाकिस्तानी जिहादी भी मौत की सजा पाने वालों में शामिल हैं। महज 15 महीनें की जांच और सुनवाई के बाद अदालत ने त्वरित कार्रवाई करते हुए यह सजा सुनाई है। इन दोनों खबरों के साथ ही अभी 3-4 दिसंबर को अमृतसर में संपन्न हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में एशिया के शीर्ष देशों के प्र्रतिनिधियों के बीच पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज की मौजूदगी में भारत ने पाकिस्तान को आतंकी गतिविधियों और संगठनों का पोषक ठहराते हुए इस पर प्रभावी लगाम लगाने की बात की। भारत की इस तीखी प्रतिक्रिया का समर्थन करते हुए अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अब्दुल गनी ने भी पाकिस्तान की करतूतों पर खुलेआम उंगली उठाते हुए भारत के साथ अपनी नजदीकी रेखांकित किया। गनी ने कहा कि अफगानिस्तान में विकास कार्यक्रमों में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इस सम्मेलन से करीब महीना भर पहले, नवंबर 2016 में भारत ने पाकिस्तान को दक्षिण एशियाई देशों के महत्वपूर्ण मंच सार्क का बहिष्कार करके आईना दिखाया था। भारत ने साफ कहा था कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देने की अपनी जगजाहिर नीति से बाज नहीं आता, उसके साथ मंच साझा नहीं किया जाएगा। भारत के इस कदम को अफगानिस्तान, बंगलादेश और भूटान ने न सिर्फ सराहा, बल्कि वे खुद भी उस सम्मेलन से दूर रहे।
साफ है कि भारत की विदेश नीति 'प्रो-एक्टिव मोड' में है और वह अपने पड़ोसी देशों की नापाक हरकतों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेनकाब करना जारी रखे हुए है।
2016 में भारत ने इस दिशा में दोतरफा नीति अपनाई। उसने आतंकी गतिविधियों के बाद पूर्ववर्ती सरकारों की तरह अपने को सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रखा बल्कि जिहाद की जड़ पर सीधे प्रहार किया। 28 सितंबर की देर रात पीओके में भारत की सर्जिकल स्ट्राइक में 8 आतंकी लॉन्चपैठ ध्वस्त करने के साथ ही करीब 38 जिहादियों को मार गिराया गया। चोट खाया पाकिस्तानी सत्ता अधिष्ठान भले अपने लोगों के बीच चेहरा बचाए रखने को भारत की ओर से ऐसी किसी भी कार्रवाई के होने से इनकार करता रहा। लेकिन भारत के पुख्ता सबूत देने के बाद विश्व बिरादरी ने भारत के इस जांबाज कदम की सराहना की। भारत सरकार ने इससे साफ संकेत दिया कि अब पीठ पीछे वार करने की पाकिस्तान की हर हरकत का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।











