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श्रीराम कथा कहने की अपनी विशिष्ट शैली के लिए वे देश-दुनिया में प्रसिद्ध हैं। अशांत मन के लिए शांति का स्वर हैं। संघर्ष के दिनों में संतुलन का उपदेश हैं। कोलाहलपूर्ण वातावरण में चित्त को शांत करने का उपाय हैं और जगत् को श्रीराममय बनाने में जुटे हुए हैं। गृहस्थ होकर भी वे संतों के लिए एक मानक हैं। उनकी सादगी के उदाहरण दिए जाते हैं। आज के समय में जब राजनीतिक दल वोट के लालच में समाज को तोड़ने में लगे हुए हैं, ऐसे में वे अपनी कथा में वंचित वर्ग के प्रतिनिधिओं को न केवल ससम्मान आमंत्रित करते हैं बल्कि उनसे रामायण की आरती कराकर समाज को एक सूत्र में पिरो समरसता का संदेश देते हैं। ऐसे हैं सहज,सरस और गोस्वामी तुलसीदास जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कथा व्यास श्री मोरारी बापू। लगभग 14 वर्ष की बाल अवस्था से शुरू हुई उनकी कथा की अनथक यात्रा को आज 5 दशक से ज्यादा समय हो गया। इस दौरान उन्होंने देश-दुनिया में 784 कथाएं की हैं। उनकी जीवन यात्रा में आए उतार-चढ़ावों एवं अध्यात्म के कुछ ऐसे सवालों, जिनकी समाज को हरदम जिज्ञासा रहती है, पर विस्तृत बातचीत की पाञ्चजन्य संवाददाता अश्वनी मिश्र ने। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की कथा करते हुए आपको 50 वर्ष पूरे हो गए हैं। यह किसका आशीर्वाद है? राम का, गुरुदेव का या व्यासपीठ का?
सबसे पहले तो मैं यह कहूूंगा कि यह मेरे सद्गुरु भगवान् का आशीर्वाद है। दूसरा, अस्तित्व का सहयोग है। व्यासपीठ और रामचरित मानस की करुणा है। तुलसीदास जी का भी उपकार कभी नहीं भूल सकते। व्यासपीठ की उदारता ने हमें बैठने के काबिल बनाया। मुझ पर आज इनकी सब कृपा है और मैं इनका ऋणी हूं।
वह बच्चा जो 60 वर्ष पहले अपने दादाजी द्वारा बताई गई 5 चौपाइयों को हर दिन याद करता था, आज विश्व के कथावाचकों में शीर्ष पर है। आप जिस विद्यालय में पढ़े, वहीं पर शिक्षक भी हुए। इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा और जीवन यात्रा के बारे में बताएं।
देखिए, हमारी पूरी प्रवाही परंपरा में श्रीराम कथा रही है। लेकिन कोई इस तरह से सार्वजनिक रूप से कथा नहीं करते थे। अपने निजानंद के लिए सबके पास रामकथा थी और उस रस का पान करते थे। मुझे दादा जी ने कहा और इस ओर प्रेरित किया। साथ ही परमात्मा की कोई व्यवस्था इस ओर रही कि मैं इस प्रवाह में आ गया। मैं परंपरा में पहले से ही था लेकिन उनकी कृपा से मैं इस बीच धार में आ गया। जैसे सूखा पत्ता भी पवन के संग से आकाश में चढ़ जाता है। ऐसे पवन पुत्र की कृपा से यह सूखा पत्ता भी आकाश में उड़ रहा है।
राम में संसार समाया है, इसकी कैसे व्याख्या करेंगे?
वैसे यह आधी व्याख्या है। ये दो हैं। भगवान श्री राम में समस्त संसार समाया हुआ है और समस्त संसार में श्री राम समाये हुए हैं। दोनों को विलग नहीं कर सकते। अथवा यूं कहें कि राम ही संसार है, संसार ही राम है। राम जन-जन की आत्मा और चेतना में हैं। उनके बिना कुछ नहीं।
भारत में हर पुरुष श्री राम और नारी सीता है, ऐसा कहा जाता है। पर आज के वातावरण में क्या ऐसा ही है?
देखिए, आज का जो भी वातावरण हो, उसका विशेलषण नहीं करना है। लेकिन हमारे देश में अवतार के रूप में भगवान् श्रीराम और जानकी आए। उनके दिव्य चरित्र ने समाज के लिए एक मापदंड स्थापित किया। अगर ये न आते तो क्या होता? उनका चरित्र समाज को जीवन पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। हमें उस दिव्य चरित्र के आदर्शों और विशाल चरित्र का जीवन पथ पर ध्यान रखना है।
मानस का हर पात्र अपने जीवन में संपूर्ण मानवता का एक संदेश देता है। लेकिन तब भी आपकी दृष्टि में वह कौन-सा पात्र है जिसका वर्णन करते हुए आपको अधिक आनंद आता है?
यह कहना बड़ा मुश्किल है क्योंकि जिस पात्र में भी आप जाओगे वह बिल्कुल शुद्ध अंतकरण से आपको खुद में डुबो देगा। और जिस पात्र में आप जाओ और वहां डूब जाओ तो फिर दूसरे पात्र के बारे में आप कुछ नहीं बोल सकते। तो हरेक पात्र साधक को अपनी ओर खींचता है। यानी श्रीराम कथा में हर पात्र अद्वितीय महत्व रखता है। इसलिए किसी एक पात्र पर कुछ कहना कठिन है।
तुलसी बाबा को क्या दृष्टि थी जो उन्होंने मानस की रचना की?
संभु प्रसाद सुमति हिय हुलसी।
राम चरितमानस कवि तुलसी।।
शिव की कृपा से उनके अंत:करण में हिलोर-तरंग उठी। आनंद की, रामानंद की, परमानंद की, ब्रह्मानंद की। उस हिलोर ने शिव प्रसाद से उनको बना दिया विश्वमय। ऐसा तुलसीदास जी खुद कहते हैं।
दुनिया के अनेक देशों में आपने कथाएं की हैं और श्रोताओं को भाव-विभोर होते देखा होगा। कोई एक विशेष स्मृति जो आपके ध्यान में हो।
देखिए, श्रीराम को साक्षात् मैंने नहीं देखा और न ही कभी दर्शन किए। लेकिन मेरी दृष्टि में तो कथा स्वयं भगवान् है। उस राम को मैंने देखा नहीं है लेकिन उस रामायण रूपी भगवान को मैं देख सकता हूं। मैं राम को छू नहीं सकता, पर रामायण को अपने हाथ में ले सकता हूं। मेरे लिए तो-तात-मात सब विधि तुलसी की!
आप कभी तीन व्यक्तियों को कथा सुनाया करते थे लेकिन आज 3 लाख लोगों को कथा सुनाते हैं। यहां तक कैसे पहुंचे?
मैं तो ये मानता हूं कि यह परमात्मा और मेरे गुरु का ही प्रतिसाद है। ये और कुछ नहीं, परमतत्व की कृपा है।
भारत में आध्यात्मिक चेतना किस स्तर पर है?
भारत आध्यात्मिकता की ओर तेज गति से मुड़ रहा है। पूरा विश्व भी इस ओर मुड़ रहा है। और मेरी दृष्टि में इस सदी में आध्यात्मिक विकास बहुत हो रहा है। यद्यपि जिस ऊंचाई पर हमारे बड़े-बुजुर्ग और ऋषि-मुनि थे, वहां तक पहुंचना बाकी है। लेकिन भारत ने रास्ते की काफी चढ़ाई चढ़ी है।
आजकल बाबा 'ब्रांड' भी हो गए। आप क्या कहेंगे?
पहले तो मेरा किसी पर कुछ भी नहीं कहना है,जो हो गए हैं उन्हें यह सोचना है। हां, इतना जरूर है कि संत प्रेम प्रकट करता है। लेकिन संत हैं कौन? इसका निर्णय कैसे करें? 21वीं सदी में संत की परिभाषा क्या है? क्या जो धोती, तिलक या अन्य ऐसे ही वेश में आए वह संत? संत की कुछ परिभाषाएं तय हैं। जो किसी भी परिस्थिति में शांत व सहज रहे, व्यक्तित्व में कुलीनता, आश्रमी निष्ठा, ज्ञान निष्ठा, सुवेश (संत का पहनावा सीधा-सादा हो), सात्विक हो, ऐसी आंख हो जिसमें उपासना हो, वासना नहीं यानी सुनेत्र और अंतिम संयमित और कम बोलना।
अपनी कथाओं में आप अनेक मुस्लिम चरित्रों के उदाहरण देते हैं। इस पर कुछ लोगों को आश्चर्य होता है। आपका इस पर क्या कहना है?
व्यासपीठ पर जो भी बैठता है, उसको हिंदू-मुस्लिम का भेद नहीं रहता। राजपीठ पर बैठने वालों को शायद हो सकता है। यहां कोई भेदाभेद नहीं। मैं कथा में लोकगीत, भजन, शायरी, गजल और फिल्मी गीत जो सुनाता हूं, उसका एक मात्र ध्येय केवल और केवल ईश्वर को रिझाना है। अगर इनसे कोई अच्छा संदेश निकलता है तो मैं गाता हूं।
आप अर्थ जगत या कंपनी लॉ के विशेषज्ञ नहीं हैं फिर भी एक कारोबारी परिवार ने झगड़े के दौरान आपको ही मध्यस्थ चुना? क्या यह आर्थिक विषय का आध्यात्मिक प्रबंधन था? आपने उन्हें क्या समझाया?
यह सवाल आप उनसे ही पूछें, कि वे क्यों मेरे पास आए। उनकी श्रद्धा होगी तो मेरा आशीर्वाद और शुभकामना लेने आए कि हमारा आपस का, परिवार का झगड़ा और कलह समाप्त हो जाए। मैं कोई अर्थ जगत का आदमी नहीं हूं, मैं उन्हें क्या बताऊंगा। मैंने उनके लिए प्रभु श्रीराम से प्रार्थना की कि सब मिलजुल कर रहें। मैं उनको ही नहीं, सबको कहता हूं, चाहें छोटा हो या फिर बड़ा। मेरा स्पष्ट मानना है कि साथ में रहो तो प्रेम से रहो। विलग होना तो प्रेम से। द्वेष से न ही अलग हो और न ही साथ रहना, ये दोनों ठीक नहीं है।
भारत का भविष्य या कहिए, भविष्य का भारत कैसा देखते हैं?
भारत का भविष्य सदैव उज्ज्वल था, उज्ज्वल है और सदैव उज्ज्वल रहेगा। हर एक नया दिन भारत के लिए नई ऊंचाइयां लेकर आ रहा है, इस बारे में कोई संशय नहीं है। हां, इसमें कितना समय लगेगा, यह कहना मुश्किल है। पर मेरे अंत:करण की प्रवृत्ति मुझसे ऐसा कहलवा रही है कि भारत ही नहीं पूरे विश्व का भविष्य उजला है।
आज भी अनेक ऐसे लोग हैं, जो माता सीता की अग्नि परीक्षा के संदर्भ में राम के निर्णय को ठीक नहीं मानते। क्या जनकसुता की अग्नि परीक्षा आपकी दृष्टि में उचित थी?
मानस में तुलसीदास जी ने सीता जी को अग्नि में समाया राम के कहने पर। उन्होंने माता से कहा कि अब मुझे नर लीला करनी है। आपका अगर ये मूल रूप होगा तो ये लीला नहीं होगी। इसलिए आप अग्नि में समा जाओ। इसलिए जब तक प्रभु ने दुष्टों का नाश किया तब तक सीता वहीं रहीं। और जब सब कुछ हो गया तो अग्नि परीक्षा के रूप में नहीं, लेकिन जो अग्नि में समाई थीं उसको सत्कार के साथ वापस बुला लिया।










