ईसाई जगत- 'दलित' से भेदभाव करता है चर्च
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ईसाई जगत- 'दलित' से भेदभाव करता है चर्च

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Dec 26, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 26 Dec 2016 17:49:43

कैथोलिक चर्च ने अपनी 'पॉलिसी ऑफ दलित एंपावरमेंट इन द कैथोलिक चर्च इन इंडिया' रिपोर्ट में यह मान लिया है कि 'चर्च में दलितों से छुआछूत और भेदभाव बड़े पैमाने पर मौजूद है, इसे जल्द से जल्द खत्म किए जाने की जरूरत है।' दलित ईसाइयों को उम्मीद है कि भारत के कैथोलिक चर्च की इस स्वीकारोक्ति के बाद वेटिकन और संयुक्त राष्ट्र में उनकी आवाज सुनी जाएगी।
दलित ईसाइयों को बड़े पैमाने पर छुआछूत और भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। भारत के कैथोलिक चर्च ने यह स्वीकार किया है कि जिस छुआछूत और जातिभेद के दंश से बचने को दलितों ने हिंदू धर्म त्यागा था, वे आज भी उसके शिकार हैं। वह भी उस मत में जहां कथित तौर पर उनको वैश्विक ईसाइयत में समानता के दर्जे और सम्मान के वादे के साथ शामिल कराया गया था।
देश में कैथोलिक चर्च के कुल 2 करोड़ सदस्य हैं, इनमें से 1़ 60 करोड़ दलित ईसाई यानी हिंदू धर्म से बरगलाकर कन्वर्ट कराए गए लोग हैं। उक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि दलितों के साथ अन्याय हो रहा है और चर्च में बदलाव की जरूरत है ताकि उन्हें पर्याप्त अधिकार दिए जा सकें। यह रिपोर्ट शायद उन लोगों की आंखें खोल सके, जो ईसाई मिशनरियों के कन्वर्जन को देखना नहीं चाहते। वामपंथी और कुछ दलित चिंतक अक्सर कहते हैं कि ''जो हिंदुत्व दलितों को बराबरी नहीं दे सकता, उससे निकल जाना ही बेहतर है''। इस रिपोर्ट के बहाने उन्हें यह बताना चाहिए कि आखिर वे हिंदुत्व से निकलकर भी दलदल में क्यों हैं? इसी रिपोर्ट में कैथोलिक चर्च ने दोहराया है कि हम लंबे समय से दलित ईसाइयों को आरक्षण दिलाने के लिए लड़ रहे हैं और यह उन्हें मिलना ही चाहिए।
चर्च नेतृत्व दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में शामिल कराने के लिए भारत सरकार पर लगातार दबाव डालता रहा है। भारतीय चर्च नेतृत्व पिछलेे कई दशकों से अनुसूचित जातियों से ईसाइयत में कन्वर्ट होने वालों के लिए हिंदू मूल की अनुसूचित जातियों के समान ही सुविधाओं की मांग करता आ    रहा है।  
भारत में कन्वर्जन दो कारणों से हुआ है। पहला—सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों एवं शोषण के खिलाफ विक्षोभ के चलते, तथा दूसरे, लाभ के लिए व्यक्तिवादी सोच के कारण जातिवादी व्यवस्था एवं सामाजिक उत्पीड़न-शोषण से मुक्ति की आशा में ही अनुसूचित जातियों के लोगों ने बड़ी संख्या में ईसाइयत की शरण ली। माना गया कि ईसाइयत में किसी भी प्रकार के जातिवादी भेदभाव या शोषण के लिए कोई स्थान नहीं है। लेकिन चर्च नेतृत्व ने मुक्ति की आशा में आए लोगों को महज एक संख्या ही माना, उनके विकास पर ध्यान देने की जगह वह अपना साम्राज्य बढ़ाने में लगा रहा। कन्वर्टिड ईसाइयों की इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि उन्होंने जिस चर्च नेतृत्व पर विश्वास करते हुए अपने पूर्वजों के धर्म तक का त्याग कर दिया, उसी चर्च नेतृत्व ने उनकी आस्था के साथ विश्वासघात करते हुए उन्हें वापस उसी जातिवादी व्यवस्था में धकेलने का बीड़ा उठा लिया है। चर्च नेतृत्व ने वंचित वगार्ें के बीच अपना आधार ही इस प्रलोभन के तहत बढ़ाया कि ईसाइयत के बीच जाति भेदभाव नहीं है और ईसाई मत में आने वालों के साथ समानता का व्यवहार किया जाएगा। समानता की झूठी आशा में ही दलितों ने ईसाई मत अपनाया। दलित ईसाइयों के संगठन पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट का मानना है कि यदि चर्च की पूरी शक्ति दलित ईसाइयों के पीछे लगा दी जाए, तो उनके सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। कन्वर्जन के नाम पर विदेशों से भेजी जा रही अकूत धनराशि को यदि उनके विकास पर खर्च किया जाए तो उनके जीवन में परिवर्तन आ सकता है, लेकिन सत्य कुछ और ही है। चर्च केवल अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य को ही सवार्ेपरि रखता है।
अब जब कैथोलिक चर्च की रिपोर्ट में यह मान लिया गया है कि चर्च में दलितों से छुआछूत और भेदभाव बड़े पैमाने पर मौजूद है तो उसे ईमानदारी से यह भी मान लेना चहिए कि न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय, भाषायी और अल्पसंख्यक आयोग की सिफारिशों को मानकर अगर सरकार दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल कर भी लेती है, तो इसका लाभ चर्च नेतृत्व को ही होगा। पिछलेे दिनों दलित ईसाइयों के एक प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून के नाम एक ज्ञापन देकर आरोप लगाया कि कैथोलिक चर्च और वेटिकन दलित ईसाइयों का उत्पीड़न कर रहे हैं। उन्हें चर्च में बराबर के अधिकार उपलब्ध कराए जाएं। अगर वह ऐसा नहीं करते हैं, तो संयुक्त राष्ट्र में वेटिकन को मिले स्थायी पर्यवेक्षक के दर्जे को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट ने कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया, पोप जॉन पाल, पोप बेनेडिक्ट 16 और वर्तमान पोप फ्रांसिस को कई बार पत्र लिखकर मांग की है कि करोड़ों कन्वर्टिड ईसाइयों के साथ किये गये अन्याय एवं शोषण के बदले कैथोलिक चर्च उन्हें मुआवजा दे। दलित ईसाइयों को उम्मीद है कि कैथोलिक चर्च की स्वीकारोक्ति के बाद वेटिकन और संयुक्त राष्ट्र में उनकी आवाज सुनी जाएगी।  -आऱ एल़  फ्रांसिस-
(लेखक पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं)

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