| दिंनाक: 19 Dec 2016 15:00:09 |
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समाज के लिए आत्म-त्याग या बलिदान के उज्जवल उदाहरण भारत में बहुत प्राचीनकाल से ही विद्यमान रहे। महर्षि दधिचि ने समाज कल्याण के लिए अपनी देह का त्याग कर दिया था। उनकी अस्थियों से बने वज्र का उपयोग बुरी शक्तियों के विनाश के लिए किया गया था। भारतीय नवजागरण की अग्रदूत भगिनी निवेदिता यह मानती थीं कि इस देश के पुनर्जागरण के लिए दधिचि के समान ही आत्म-बलिदान की जरूरत है। तभी स्वाधीन भारत में राष्ट्रीय ध्वज निर्माण के लिए बनी ध्वज समिति को भगिनी निवेदिता ने नक्शे के रूप में यह सुझाव दिया था कि ध्वज की गेरूआ पृष्ठभूमि में वज्र का निशान हो, यह वज्र राष्ट्र निर्माण हेतु आत्मत्याग का द्योतक था। यद्यपि समिति ने नक्शे को स्वीकार नहीं किया लेकिन जगदीशचंद्र बसु ने इसका समर्थन किया। वे दुनिया के एक महान वैज्ञानिक थे और अपने शोध संस्थान बसु विज्ञान मंदिर के निर्माण में व्यस्त थे। कोलकाता का यह संस्थान विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत एक राष्ट्रीय शोध केंद्र है। आज भी इस संस्था का प्रतीक चिह्न दधिचि का वह वज्र ही है। स्वाधीन भारतवर्ष में ज्ञान और शिक्षा के लिए आत्म-बलिदान की उसी परंपरा के ज्वलंत उदाहरण प्रो. गोपालचंद्र सेन थे। सिर्फ शिक्षा का मान रक्षण करने के लिए उस दिन यादवपुर विश्वविद्यालय में दधिचि की तरह गोपालचंद्र सेन ने अपना शरीर त्याग दिया था। उन्होंने शिक्षा के आंगन में शिक्षा की मर्यादा की रक्षा करने के लिए अपना बलिदान दे दिया।
इस विषय को यादवपुर विश्वविद्यालय की स्थापना से शुरू करना अच्छा रहेगा। अंग्रेज अधिकारी मैकाले ने भारत में ऐसी शिक्षा प्रचलित की जिससे भारत के लोगों के अंतर्गत आत्मबल पैदा न हो सके, ताकि भारत के लोग ब्रिटिश राज के राजभक्त सेवक बन कर रह जाएं। लेकिन नए भारत की रचना के लिए जरूरत है विज्ञान, प्रौद्योगिकी और चिकित्साशास्त्र में प्रशिक्षित भारतीयों की। विज्ञान और प्रौद्योगिकी का प्रयोग पश्चिम का अनुकरण या धन वृद्धि के लिए नहीं, वरन् भारत की बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय की शाश्वत परंपरा होनी चाहिए। मैकाले की शिक्षा के बदले देश के कल्याण के लिए ही शिक्षा नीति होनी चाहिए। इसी विचारधारा के अनुरूप उस युग के मनीषियों में अरविंद घोष, सुबोधचंद्र मल्लिक, रवींद्रनाथ टैगोर और तारकनाथ के नेतृत्व में नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन, बंगाल का गठन हुआ। इसके पहले आचार्य थे श्री अरविंद। इसकी एक शाखा के रूप में बाद में एक इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी, यादवपुर विश्वविद्यालय ने जन्म लिया। आज भी यादवपुर विश्वविद्यालय के पीछे नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन का एक छोटा दरवाजा देखा जा सकता है। इस विश्वविद्यालय के जन्म के समय से ही इसके प्रतिष्ठाताओं ने इसके मूल दर्शन को निश्चित कर दिया था। भारत में एक प्राचीन ज्ञानसाधना के उत्तराधिकार की परंपरा है। उसी को स्मरण कर आज भी प्रतिवर्ष 24 दिसंबर को दीक्षांत समारोह में छात्र गेरूआ उत्तरीय पहन कर उपनिषद् का मंत्रोच्चार करते हुए मुक्त मंच पर उपस्थित होकर दीक्षांत व्याख्यान सुनते हैं। यह परंपरा आज भी जारी है।
स्वाधीनता के बाद से ही विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कला के क्षेत्र में यह विश्वविद्यालय प्रथम पंक्ति में है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की इस असाधारण सफलता के पीछे कई असाधारण प्रतिभा संपन्न शिक्षकों का नि:स्वार्थ और अथक प्रयास शामिल है। स्वाधीनता के बाद पांचवें ओर छठे दशक में यादवपुर विश्वविद्यालय में इन शिक्षकों ने अत्यल्प धन से ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशालाएं और कर्मशालाएं स्थापित की थीं।
एक यंत्र, किसी तरह खरीदकर उसमें अनुसंधान और प्रयोग कर अन्य उन्नत यंत्र का निर्माण होता था और इसी तरह इस विश्वविद्यालय की विजय यात्रा चल रही थी। इस महत् कार्य के अगुआ थे त्रिगुना सेन, अमिताभ भट्टाचार्य और गोपालचंद्र सेन की तरह छात्र हितकारी, देशप्रेमी और नि:स्वार्थ अध्यापक वृंद।
60 के दशक की शुरुआत से ही कोलकाता और संपूर्ण पश्चिम बंगाल में एक तरह की अराजकता व्याप्त हो चुकी थी। इसके मूल में उग्र विद्रोही भावना थी। देश के बंटवारे के समय मुस्लिम लीग के साथ मिलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान के दावे का समर्थन किया था। 1948 में कोलकाता की पार्टी के प्लेनम पर ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान का गठन हुआ। भारत की अखंडता और उन्नति आंदोलन के लिए उपयुक्त नहीं है। भारत की स्वाधीनता की शुरुआत से ही इस धारणा को कम्युनिस्ट पार्टी ने प्रचारित करना शुरू कर दिया था। 1962 के चीनी आक्रमण द्वारा भारत की शोचनीय पराजय ने इस चक्र को और गति दे दी। चीन की योजना पूर्वी यूरोप की तरह भारत पर कब्जा कर उसको छोटे-छोटे देशों में विभाजित कर वहां कम्युनिस्टों को बैठाकर शासन करने की थी और इस भावना को एक कौशलयुक्त नीति के तहत प्रांतीय स्तर पर कार्यान्वित करना था। चीन और रूस के समर्थन के आधार पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी विभक्त हो गई। कोलकाता पार्टी जिला सम्मेलन में दो प्रस्ताव निकल कर आए। जिसमें दासगुप्ता का मसौदा और अजिजूल हक का प्रस्ताव था। इसके आगे का मसौदा, अर्थात् बासपुनैया की थीसिस प्राय: निरस्त हो गई। इस नए मतवाद में चीन से भारत पर कब्जे का आह्वान किया गया जिसकी जमीन कम्युनिस्टों के द्वारा तैयार की जानी थी। इसके लिए क्षेत्रीय आधार पर स्वायत्त शासन की जरूरत थी। उत्तर बंग के नक्सलबाड़ी में पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर सशस्त्र राष्ट्रद्रोह की शुरुआत की गई। चीन के रेडियो से नक्सलबाड़ी आंदोलन का समर्थन किया गया। छात्र और युवा समाज को नक्सली नेताओं ने यह समझाने में सफलता अर्जित की कि आंदोलन की तीव्रता में वृद्धि होते ही चीन फिर से भारत में सैन्य दल भेजेगा। सर्वहारा एकनायक तंत्र, पूरी दुनिया को एकबद्ध कर वर्गविहीन समाज की रचना के दिवास्वप्न में कोलकाता के युवा छात्र विभोर हो गए।
इस अराजकता का सबसे अधिक प्रभाव शिक्षण संस्थाओं पर पड़ा। उन अतिवादी विद्रोहियों का कहना था कि यह आजादी झूठी है और इसलिए यह शिक्षा व्यवस्था शोषण का एक हथियार है। एक के बाद एक शिक्षण संस्थाओं के छात्र समर्थक अध्यापक एवं शिक्षकों की दिन-दहाड़े हत्या होती रही।
कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज और यादवपुर विश्वविद्यालय की तरह कई नामी विश्वविद्यालयों के कुछ मेधावी छात्र इस वर्ग विहीन समाज के मोह में पड़े हुए थे। लेकिन कुछ दिन बाद ही इसमें बहुत सारे ऐसे धनी लोगों के आवारा लड़के शामिल हो गए ,जो व्यक्तिगत जीवन में अतिभोगवादी थे और अतिवामपंथ उनके लिए एक 'स्टाईल स्टेटमेंट' था।
गोपालचंद्र सेन एक छात्र समर्थक शिक्षक थे। वे यादवपुर विश्वविद्यालय के मैकेनिकल इंजिनियरिंग विभाग के सफल शिक्षक थे। उनमें असाधारण पांडित्य था। प्रो. सेन 1968 में यादवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त किए गए। पश्चिम बंगाल के प्राय: सभी शिक्षा प्रतिष्ठान उस समय तक बदमाशों के कब्जे में चले गए थे। दो वर्ष तक अतिवामपंथियों के नेतृत्व में परीक्षा केंद्रों पर माध्यमिक और अन्य परीक्षाओं में माइक्रोफोन लगाकर प्रश्नों के उत्तर बता दिए गए। यादवपुर विश्वविद्यालय उग्रवादियों के लिए आतंक का अखाड़ा बन गया। 1970 में वामपंथियों के नेतृत्व में यह फतवा दिया गया कि इस वर्ष यादवपुर विश्वविद्यालय में परीक्षाएं नहीं होंगी, लेकिन प्रो. गोपालचंद्र सेन अडिग थे।
एक शाम प्रो. सेन कार्य समाप्त करने के पश्चात् अपने घर की तरफ जा रहे थे। अचानक किसी ने उनकी पीठ पर चाकू से वार किया, एक बार नहीं कई बार। खून से लथपथ प्रो. सेन वहीं गिर पड़े। उस कायर ने उनके प्राण ले लिए। लेकिन विश्वविद्यालय में शिक्षा का प्रसार जारी रहा। उस वर्ष यादवपुर विश्विद्यालय में निश्चित समय पर सारी परीक्षाएं संपन्न हुईं।
जिस कायर असंवेदनशील व्यक्ति ने यह घृणित कार्य किया था उसका नाम था राणा बसु। कोलकाता के एक रईस चिकित्सक का पुत्र। उसका क्या हुआ? राणा को सकुशल कनाडा के लिए रवाना कर दिया गया। राणा की पहचान एक उग्र वाम नेता की थी। उसने बाकी का जीवन कनाडा में व्यतीत किया। उस समय बंगाल के मुख्यमंत्री थे सिद्धार्थ शंकर राय और विपक्ष के नेता ज्योति बसु। प्रो. सेन के हत्यारे को तत्कालीन सरकार ने पकड़ने का कोई प्रयास नहीं किया और न ही विरोधियों ने उनकी हत्या का विरोध। प्रो. सेन किसी भी दल में विश्वास नहीं रखते थे, उनका सरोकार सिर्फ शिक्षा से था। जो लोग प्रो. सेन को भुलाना चाहते हैं, वे लोग उग्रवादी छात्र आंदोलन की क्रूरताओं को दबाना चाहते हैं। जबकि आज भी इसी तरह के आंदोलन के द्वारा दिल्ली या कोलकाता में असहिष्णुता और कश्मीरी विक्षोभ का मामला बना कर छात्रों को गुमराह किया जा रहा है। ऐसे आंदोलनकारियों से पूछा जाना चाहिए कि प्रो. सेन की हत्या कौन-सी आजादी प्राप्त करने के लिए की गई थी? वह किस प्रकार की असहिष्णुता थी?
आज भी यादवपुर विश्वविद्यालय में प्रो. सेन का बलिदान दिवस मनाया जाता है। लेकिन इसकी खबर कोलकाता के किसी अखबार या पत्रिका में प्रकाशित नहीं होती। कारण यह है कि प्रो. सेन की स्मृति सभा से कोई सनसनी खबर नहीं मिलती। वहीं जब इसी विश्वविद्यालय में कश्मीरी अलगाववादियों के पक्ष में नारे लगते हैं तो इसकी खबरें दुनियाभर में जाती हैं।
क्या हम सचमुच प्रो. सेन को भूल जाएंगे? देश निर्माणकारी शिक्षक के इस बलिदान को क्या हम सम्मान दे पाएंगे? आज देश के सभी विश्वविद्यालयों को 30 दिसंबर को प्रो. गोपालचंद्र सेन दिवस का आयोजन करना चाहिए और उनकी हत्या के लिए वर्तमान समाज उनके चित्र के सामने नतमस्तक होकर कहे 'हे गुरु क्षमा करो!' -प्रतिनिधि