क्रांति-गाथा-25 - पेनांग द्वीप का एक संस्मरण
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क्रांति-गाथा-25 – पेनांग द्वीप का एक संस्मरण

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Dec 12, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 12 Dec 2016 15:41:38

-परमानन्द-

नवंबर 1914। सिंगापुर में अंग्रेजों का विनाश करके भारतीय झण्डा फहराकर हम तोशामारू जहाज से भारत की ओर चले। अभी पिनांग द्वीप तक ही पहुंचे थे कि वहां स्थित गवर्नर ने हमें कैद कर लिया। हुआ ऐसा कि हम तीन हजार भारतीयों ने अंग्रेजों को सशस्त्र युद्ध में पराजित करने की जो धृष्ठता की उससे ब्रिटिश अफसर काफी सतर्क हो गए। उन्हें पता चल गया कि 300 भारतीय विद्रोही सिंगापुर से स्वदेश वापस जा रहे हैं। चार-पांच जहाजों ने पिनांग के पास हमें घेर लिया और हमारा जहाज आगे बढ़ने से रोक दिया गया।
पिनांग के सुंदर द्वीप में हमारा अनमोल जीवन संकट में पड़ गया। हम अब जीवित लौटने की आशा त्याग चुके थे। अपने मरने की सभी को फिक्र न थी। सवाल था आजादी का सपना साकार करने का। इस गंभीर परिस्थिति का सामना करने के लिए रास्ते में बार काउंसिल युद्ध समिति की एक बैठक की गई— उक्त बैठक में पं. जगतराम जी भी उपस्थित थे। जहाज पर से ही हम सबने ताक-झांक लगाकर देखा तो दूर पर एक गुरुद्वारा चमकता हुआ दिखाई पड़ा। बार काउंसिल में यह तय किया गया कि हमें सबसे पहले यहां का वातावरण क्या है, इस बात का पता लगाना चाहिए। हमने कैप्टन से कहा कि हमें लाइफ बोट में बिठाकर किनारे तक छोड़ दें तो हम गुरुद्वारे तक हो आएं। हुआ ऐसा ही। गुरुद्वारे पहुंचे और मत्था टेककर बैठ गए। आधा घंटा तक वहां बैठे बैठे कुछ सिख सैनिकों से बातचीत करके हम पुन: अपने जहाज में वापस चले गए।
रण ठानने का निश्चय
हम पहले तो यह कोशिश करते रहे कि हमारे जहाज को आगे बढ़ने की अनुमति मिल जाए लेकिन गवर्नर अपनी जिद पर था। उसने स्पष्ट शब्दों में इनकार कर दिया। अंततोगत्वा हम इस निर्णय पर पहुंचे कि जो कुछ सिंगापुर में हुआ वही यहां भी किया जाए। बेसहारा, मजबूर होकर कैद में मरने से तो अच्छा है कि लड़ते-लड़ते सम्मान के साथ मृत्यु का वरण किया जाए। इस योजना की पूर्ति के लिए तीन चार टोलियां बनाई गईं। एक टोली टेलीफोन एक्सचेंज, दूसरी कोतवाली, तीसरी वायरलेस स्टेशन की ओर भेजी गई कि वे इन सबका पता लगाकर सारी व्यवस्था ठीक रखें कि आवश्यकता पड़ने पर इन पर अपना अधिकार किया जा सके। मुझे आदेश हुआ कि मैं यहां के किले का निरीक्षण करके संपूर्ण स्थिति का पता लगाऊं।
जब अपना नाम सुना
स्थिति अत्यंत ही गंभीर हो गई थी। चारों ओर सैनिकों का पहरा था। संदेह मात्र पर हम उनकी गोली का निशाना बन सकते थे। हम इस विकट परिस्थति में किले के पास तक डेढ़ मील आगे बढ़ गए। एक मोड़ पर हम जैसे ही मुड़ने लगे तो किले के द्वार से एक कमांडर बाहर आया। संतरी ने उसे सैलूट किया और इसी समय मैंने अपने दूसरे साथी रोड़ासिंह को पास आने का संकेत दिया। हम दो-तीन कदम आगे बढ़े होंगे कि पीछे से आवाज आई—''भाई साहब, परमानन्द जी, खड़े रहो ना। '' मैं ही नहीं यह सुनकर मेरे रोंगटे भी खड़े हो गए। एक गंभीर आशंका से मैं उसकी ओर मुड़कर खड़ा हो गया।लेकिन जो कुछ हुआ वह अविस्मरणीय और अप्रत्याशित था। वह हमारे पास आया और बड़े प्यार से बोला—गुरुजी— आपने मुझे पहचाना? मेरे मना करने पर बोला—आप कल गुरुद्वारा गए थे न। मैंने आपको वहीं पहचान लिया था। फिर बोला चलो किले के अंदर चलें। यह मेरे लिए ईश्वरीय वरदान था। मैं तो उसे देखने आया ही था। उसके पीछे-पीछे हो लिया। अंदर पहुंचे—बड़े सत्कार के साथ बिठाकर नौकर को आवाज दी। जल्दी आओ—मेरे गुरु आए हैं। सामान लाओ, आज मैं अपने हाथ से चाय बनाकर इन्हें पिलाऊंगा। जब हम चाय आदि पी चुके तो वह बोला- आप अब हमें यह बताएं कि हम क्या करें? बजबज में        बाबा गुरुदत्त के 28 साथी मार दिए गए हैं। गुरुजी! आपने जो कुछ सिंगापुर में किया था, वही यहां भी क्यों नहीं करते?
सब कुछ समर्पित
मैं उसकी ओर मौन देखता रहा। फिर बोला- लेकिन यहां हमारे पास साधन क्या हैं?
यह उछल पड़ा- बोला- पेट्रोल, एक लाख टन बारूद-छह महीने तक 10 हजार सिपाही इसके सहारे निरंतर युद्ध कर सकते हैं।
लेकिन क्या तुम इस प्रकार हमारी सहायता कर सकोगे? मेरे यह पूछने पर वह बोला नहीं— जेब से स्टोर की चाभी निकाल कर हमारी ओर बढ़ाते हुए बोला-यह लीजिए सब कुछ आप को समर्पित है।
मैंने कहा—इंदरसिंह (उस सूबेदार मेजर का यही नाम था) भावुकता में बहने से काम नहीं चलेगा। यह एक गंभीर काम है। इस संबंध की वास्तविकताओं पर भी निगाह रखनी पड़ेगी हमारा लक्ष्य क्या है इस बात का भी ध्यान रखना होगा। यह मत भूलो कि हमारा यह संघर्ष इसलिए है कि हमें ब्रिटिश सत्ता को भारत से उखाड़ फेंकना है।
पहले यह बताओ कि हम कैसे छूटेंगे— हमें भारत जाने की कोई राह चाहिए। वह बोला लेकिन भाई साहब! गवर्नर बड़ा पाजी है। वह ऐसे मानने वाला नहीं है। उसके पास तक पहुंचना भी मुश्किल है। एक रास्ता है। कल मैं अपना एक हवलदार उसकी सेवा के लिए भेजूंगा। आप अपना प्रार्थनापत्र लेकर गवर्नर के पास जाएं। वह संतरी आपको बिना रोक-टोकर के उसके पास जाने देगा।
गवर्नर से सामना
हुआ यही। हम 28 साथी अपने प्रार्थना पत्र लेकर और पिस्तौलें भरकर गवर्नर के निवास पर पहुंचे। दरवाजे पर खड़े संतरी ने थोड़ी बहुत पूछताछ की— हमारे यह बताने पर कि हम अपना प्रार्थनापत्र गवर्नर को देना चाहते हैं, उसने अंदर जाने की अनुमति दे दी। हम 26 लोग अंदर घुस गए। दो को दरवाजे पर रहने का इशारा किया। 26 लोगों के जूतों की आवाज सुनकर गवर्नर आग बबूला हो गया। वह बड़बड़ाता हुआ बाहर निकला। गालियों के साथ ही क्रोधाग्नि भी बरस रही थी। वह बोला— हम तुम्हें एक कदम भी आगे न बढ़ने देगा। तुम सब वापस जाओ। इस पर हमारा एक पठान साथी भड़क उठा। उसने बाहें समेट लीं और पिस्तौल निकाल कर बोला— तो ठीक है आप इसका अंजाम भोगने के लिए तैयार हो जाएं। अब तो हम भारत जाएंगे, हमें कोई भी नहीं रोक सकता।
गोली की भाषा का परिणाम
इस साहस का परिणम यह हुआ कि गवर्नर एकदम ढीला पड़ गया। उसका गुस्सा काफूर हो गया। बोला ओ! तुम कुछ नहीं समझा। क्या हिन्दुस्तानियों की जिंदगी बचाना हमारा काम नहीं है। हम तुम्हें मरने से बचाना चाहता है। तुम्हारी जहाज को जर्मन डुबा देगा इसलिए तुम्हें रोका है। अगर तुम यह खतरा लेना चाहता है तो जाओ, हम तुम्हें नहीं रोकेगा।
हमने एक स्वर से कहा कि—हम भारत जाना चाहते हैं।
वाह री गोली की भाषा! वरदायिनी देवी!
वह बड़ी ही नम्रता से बोला- तो तुम्हें क्या-क्या सामान चाहिए। किसी चीज की कमी हो तो भेज दूं। और फिर हमारे कहने पर उसने 7 बोरे आटा, एक बोरा शकर, 4 टीन घी भेज दिया और साथ ही यह आदेश भी दिया कि आई एलाऊ यू टू पास आन (मैं तुम्हें आगे जाने की अनुमति देता हूं)।
हम वहां से वापस चले आए और फिर हमारा जहाज पिनांग से कलकत्ता की ओर रवाना हो गया। लेकिन खतरा अभी भी बाकी था। कलकत्ते में हमें गिरफ्तार करने की योजना थी। एक विशेष गाड़ी से हम कलकत्ता से लाहौर जाने वाले थे। हम सब गाड़ी में बैठ गए थे कि हमारे एक साथी ने कहा—भाई जी जाना चाहो तो चले जाओ। मौका अच्छा है।
मैंने भी अवसर देखकर हाथ में एक बाल्टी लेकर उसी गाड़ी से उतर रहे कुलियों का साथ कर लिया। उनके पीछे-पीछे स्टेशन के दरवाजे तक आया। वहां खड़े बाबू ने पूछा तुम कौन है? क्या महाराज है? मैंने कहा— जी हां। मैं रंगून में एक साहब का रसोइयां था उसने हुक्म दिया कि इन सबको स्टेशन से बाहर निकाल दो। और फिर मैं कुछ ही मिनटों के बाद स्टेशन के बाहर हो गया।  
तांगा करके आगे बढ़ा तो विचार आया कि इस प्रकार तांगे पर चलना तो खतरे से खाली नहीं है। अत: मैं तांगे से कूद पड़ा और कलकत्ते की सड़कों पर उमड़ रहे विशाल जनसागर में विलीन हो गया। कलकत्ता में मैं  कई दिनों तक रहा, कई विप्लवी नेताओं से मिला। कभी-कभी पिनांग की यह घटना याद करता हूं तो आज भी स्थिति में अजीब-सा लगता है।    ल्ल

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