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अमीश त्रिपाठी 42 वर्ष लेकक
प्रेरणा दादाजी और पिताजी
उद्देश्य
प्राचीन संस्कृतियों पर अध्ययन और इन संस्कृतियों को पाठकों के सामने लाना।
जीवन का अहम मोड़
पत्नी की सलाह कि तुम इसलिए अच्छा नहीं लिख पा रहे हो, क्योंकि तुम्हारे मन में क्रिएटर होने का दंभ पल रहा है। उसे त्याग दो। मैंने ऐसा ही किया और आज यहां हूं।
ज्ञान और धन के प्रति दृष्टि
एक व्यक्ति के रूप में दबाव से बाहर आकर बेहतर प्रदर्शन करना। आपका हुनर निखरते ही धन आना शुरू हो जाएगा।
दिलचस्प आंकड़ा
4 पुस्तकों की 35 लाख प्रतियां प्रकाशित
उद्देश्य प्राचीन संस्कृतियों पर अध्ययन और इन संस्कृतियों को पाठकों के सामने लाना।
जीवन का अहम मोड़
पत्नी की सलाह कि तुम इसलिए अच्छा नहीं लिख पा रहे हो, क्योंकि तुम्हारे मन में क्रिएटर होने का दंभ पल रहा है। उसे त्याग दो। मैंने ऐसा ही किया और आज यहां हूं।
ज्ञान और धन के प्रति दृष्टि
एक व्यक्ति के रूप में दबाव से बाहर आकर बेहतर प्रदर्शन करना। आपका हुनर निखरते ही धन आना शुरू हो जाएगा।
भारतीय अध्यात्म को अंग्रेजी के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा रहे हैं लेखक अमीश त्रिपाठी। उनकी पुस्तकों की बिक्री का आंकड़ा 100 करोड़ रु. से ऊपर पहुंच चुका है
अजय विद्युत
आईआईएम कोलकाता से एमबीए कर चौदह वर्ष बैंकिंग क्षेत्र में गुजारने के बाद अमीश त्रिपाठी इन दिनों लेखन में सक्रिय हैं। उन्होंने भारतीय पौराणिक आख्यानों पर अंग्रेजी में लिखकर अंग्रेजी पाठकों में धार्मिक और पौराणिक इतिहास के प्रति उत्साह जगाया। जब उनकी पुस्तकें हिंदी में अनूदित हुईं तो लोकप्रियता के नए अध्याय रचे गए। अमीश ने शिवा त्रयी की दो पुस्तकें नौकरी के दौरान ही लिखीं। जब नौकरी से अधिक आय लेखन से होने लगी तो पूरा समय लेखन को समर्पित कर दिया। धार्मिक घटनाओं की कहानियों की तरह से व्याख्या करते हुए वे मानते हैं कि उनका लेखन एक श्रद्धालु का लेखन है- ''मुझे अपने धर्म पर बहुत गर्व है। मैं बार-बार सीना ठोककर यह बोलता हूं। हमारी प्राचीन सभ्यता में बहुत अच्छी बातें हैं जिन्हें हम सीख सकते हैं। जैसे भगवद्गीता के 18वें अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा कि अगर भगवान भी कुछ बोलें तब भी हमें अपना दिमाग इस्तेमाल करके अपने कर्म खुद करने चाहिए। क्योंकि कर्म का फल आपको ही मिलना है तो आपको ही सोचना है कि आपका कर्म आपके स्वधर्म के अनुकूल है या नहीं। ये मेरे हिसाब से तो अच्छी बात है। …मैं लिखता तो रहूंगा अगले 20-25 साल तक, कोई पढ़े या न पढ़े। किताबें नहीं चलीं तो बैंकिंग में चला जाऊंगा, पर लिखता रहूंगा।''
वे आगे कहते हैं, ''पहले तो यही संघर्ष रहा कि लिखना कैसे है। जब वह हुनर आ गया तो प्रकाशन का संघर्ष। पहली किताब- 'द इमॉर्टल्स ऑफ मेलुहा' को बहुत से प्रकाशकों ने छापने से मना कर दिया था। मुझे बस इतना याद है कि बीस से ज्यादा प्रकाशकों की ओर से मना किए जाने के बाद मैंने गिनती करनी बंद कर दी थी। बाद में खुद ही चुनौती मोल ली और इसका परिणाम भी मिला। पाठकों ने इसे पसंद किया। मेरा स्वभाव बेहद चंचल था, शायद खेलकूद से प्रेम करने की वजह से। ईश्वर कृपा न होती तो संयत और स्थिर होकर लिख ही नहीं सकता था। पता नहीं कितनी बार, लिखा और फाड़कर फेंक दिया। कुछ सुहाता ही नहीं था। आखिरकार पत्नी ने बड़े काम की सलाह दी, ''तुम इसलिए अच्छा नहीं लिख पा रहे हो क्योंकि तुम्हारे मन में 'क्रिएटर' होने का दंभ पल रहा है। उसे त्याग दो। खुद को गवाह मानो और सोचो- भगवान विचारों की गंगा को तुम्हारे मन की धरती के लिए मुक्त कर रहे हैं। उस प्रवाह को रोको नहीं, पन्नों पर बिखर जाने दो। मैंने ऐसा ही किया और फिर देखते ही देखते किताब पूरी हो गई।'' वे बताते हैं कि शिवा त्रयी और पिछले वर्ष रामचंद्र शृंखला की पहली पुस्तक सायन ऑफ इक्ष्वाकु (जिसका हिंदी अनुवाद 'इक्ष्वाकु के वंशज' है) को मिलाकर कुल चार पुस्तकों की 35 लाख प्रतियां प्रकाशित हुई हैं। कुल बिक्री का आंकड़ा 100 करोड़ रुपए से ऊपर है। शिवा त्रयी के बाद इस उधेड़बुन में था कि अब किस पर लिखूंगा? कई विषयों पर विचार चल रहा था। तभी एक प्रकाशक ने आगे की किताबों के लिए पांच करोड़ रुपए का अग्रिम चेक दिया। खुश हूं। करोड़ों रुपए अग्रिम पाने की वजह से नहीं, बल्कि अपने विश्वास की पुष्टि होने पर। ल्ल










