| दिंनाक: 24 Oct 2016 12:57:06 |
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भारत में जन्मे ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी मेधा के दम पर आर्थिक उन्नति के शिखर पर पहुंचे हैं। बहुत से तो ऐसे हैं जो बहुत साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर अपनी शिक्षा-दीक्षा के बल पर न केवल खुद को ऊंचे सोपानों पर ले आए हैं बल्कि समाज के उन लोगों को भी आगे बढ़ा रहे हैं जिनमें काबिलियत है पर अवसर की कमी से अब तक कहीं दबे-ढके थे। ऐसे प्रेरणादायी व्यक्तित्व जहां सरस्वती के साधक होते हैं वहीं लक्ष्मी के भी कृपा पात्र बनते हैं।
भारतीय मूल के अरबपतियों की श्रेणी में जो दो नए नाम जुड़े हैं, वे दोनों भारतीय हैं। दिव्यांक और भाविन तुराखिया। कहानी की शुरुआत होती है मुंबई के अंधेरी इलाके में उनके एक ही बेडरूम से। वीडियो गेम खेलने की उम्र से। वीडियो गेम तो कोई भी खेल सकता है। लेकिन क्या कोई वीडियो गेम बना भी सकता है? यह चुनौती दिव्यांक और भाविन तुराखिया भाइयों को तब मिली, जब वे प्राथमिक स्कूल में पढ़ते थे। वह भी उनके पिता से, जो एक चार्टर्ड एकाउंटेंट थे। उनके पिता ने उन्हें इस विषय पर किताबें भी खरीद कर दीं कि वीडियो गेम कैसे बनाया जाता है। गेम प्रोग्रामिंग यहां से शुरू हुई।
13 वर्ष की उम्र में, जब दिव्यांक को स्कूल में एक कंप्यूटर प्रोजेक्ट मिला था, तो उसने और भाविन ने, जो उस समय 15 वर्ष का था, पूरा वर्ष एक बिजनेस सिमुलेशन गेम विकसित करने में लगा दिया। यह गेम इस एनीमेशन के साथ शुरू होता है कि कैसे एक व्यावसायिक पार्टनर ने खिलाड़ी को धोखा दिया है और कंपनी हथिया ली है। लिहाजा खिलाड़ी को अब खाली हाथों एक प्रतिद्वंद्वी व्यापार का निर्माण करना होता है। और अंतिम लक्ष्य बाजार में शत प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करना होता है। खिलाड़ी को पैसों का भी ध्यान रखना होता है और कर्मचारियों का भी और साथ ही बजट भी बनाना होता है और उसका प्रबंधन भी करना होता है। उसे बजट को मानव संसाधन, अनुसंधान, बिक्री और मार्केटिंग जैसे विभागों में बांटना भी होता है।
अब 21 वर्ष बाद, ये दोनों भाई सचमुच का गेम कई बार जीत कर दिखा चुके हैं।
आगे क्या हुआ? दिव्यांक जब पूरे 16 के भी नहीं हुए थे, तब अपने भाई भाविन के साथ मिलकर एक तकनीकी कंपनी शुरु कर चुके थे। पिता से 25,000 रुपए उधार लेकर। बात 1998 की है, जब भारत में इंटरनेट ने पूरी तरह पैर भी नहीं पसारे थे। आज, लगभग दो दशक बाद, उनकी हैसियत 140 करोड़ डॉलर मूल्य वाली कंपनी डायरेक्टी के मालिक की है।
उनके जीवन में 1999 में बड़ा मोड़ आया जब नैस्कम ने दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित किया, और उसमें इन दोनों युवकों को इस कॉन्फ्रेंस की कनेक्टिविटी की समस्याएं सुलझाने का काम दिया गया। इसके बाद तो जब भी किसी भी कंपनी को समस्या होती थी, और वह नैस्कम से पूछती थी, और नैस्कम वाले जवाब देते थे- हां, हम एक लड़के को जानते हैं, वह आपकी समस्या सुलझा देगा।
डिव कहे जाने वाले दिव्यांक ने 90 करोड़ डॉलर की भारी-भरकम रकम लेकर अपनी छह वर्ष पुरानी विज्ञापन प्रौद्योगिकी फर्म मीडिया डट नेट अगस्त में चीनी निवेशकों के एक समूह को बेच दी। कंपनी अमेरिका में है और सौदा बीजिंग में भाविन ने तय किया था। मार्केटिंग तकनीक क्षेत्र के बाजार में यह अब तक का तीसरा सबसे बड़ा सौदा है।
तुराखिया भाई अब तक दो कंपनियां बेच चुके हैं, जिससे उन्हें 1 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम मिली है। यह रकम कहां जाएगी? एक साझे खाते में। आज भी उनके बीच ये लकीरें नहीं हैं कि कौन सा बिजनेस किसका है। जो है, वह दोनों का है, परिवार का है। दोनों के कई व्यवसाय चल रहे हैं, और दोनों अपनी-अपनी भूमिका समझते हैं।
उनका कहना है, हमें बिना किसी से मदद लिए अपना व्यवसाय शुरु करने में कोई समस्या नहीं होती। हमारा ध्यान मूल्य सृजन करने पर होता है, न कि कीमत पर। हमने सारे व्यवसाय अपने पास उपलब्ध धन से ही शुरू किए हैं। व्यवसाय शुरू करने के लिए इधर-उधर से पैसे जुटाने का हमें कभी कोई मोह नहीं रहा।
इन दोनों भाइयों की तरह ही हैं प्रणव मिस्त्री। कम्प्यूटर साइंस ऐंड इंजीनियरिंग में डिग्री लेने के बाद आइआइटी, मुम्बई से मास्टर ऑफ डिजाइन और एमआइटी से मीडिया आर्ट्स एंड साइंसिज में मास्टर्स करके मेधा के दम पर चलते तकनीकी जगत में खूब डंका बजाया है प्रणव ने। गुजरात की पालनपुर नामक जगह से निकलकर आज वे अमेरिका में सैमसंग रिसर्च विभाग के निदेशक के साथ ही थिंक टैंक टीम के मुखिया हैं। वे माइक्रोसोफ्ट, नासा, सीएमयू, यूनेस्को और जापान साइंस एंड टेक्नोलाजी जैसे संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। आज बड़े बड़े प्रोजेक्ट पर काम करने के चलते लक्ष्मी की खूब कृपा है प्रणव पर।
इसी तरह के और भी उदाहरण हैं जो प्रेरक हैं उनके लिए जो पढ़-लिखकर जबरदस्त काम कर रहे हैं और इतना कमा रहे हैं कि समाज का भी कुछ भला कर सकें। केरल के मुस्तफा को ही लें जिन्होंने दक्षिण भारतीय जायकों को नया आयाम देते हुए बड़ी कंपनी ही नहीं बनाई बल्कि ग्रामीण युवाओं के रोजगार की भी चिंता की। अमेरिका में साफ्टवेयर कंपनी की स्वामी ज्योति रेड्डी की कहानी भी अनूठी है। खेत में मजदूरी करते हुए कम्प्यूटर साफ्टवेयर में महारत हासिल की उन्होंने। अजीत ओझा कारोबारी हैं, मर्चेन्ट नेवी में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़कर दो दर्जन कंपनियों के मालिक हैं। शांतनु विएतनाम के भारतीय दूतावास में थोड़े दिन नौैकरी करने के बाद 852 डॉलर से अपना व्यवसाय शुरू करके आज करोड़ों डालर कमा रहे हैं।
नितिन अग्रवाल आयुर्वेद की अलख जगा रहे हैं 30 देशों में। उनकी कंपनी में बनी आयुर्वेदिक दवाएं 15 देशों में निर्यात होती हैं। संध्या चंद्रशेखर ने तो सिंगापुर में पावर गर्ल प्रोजेक्ट शुरू करके लड़कियों को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है, ऊंची पगार की नौकरी है ही।
गीतांजलि शर्मा, डॉ. कृष्ण एम़ एल्ला, अमीश त्रिपाठी, अतुल तिमूरनिकर, विजय शेखर शर्मा, आदित्य भार्गव, सिरज सक्सेना, संदीप अग्रवाल आदि ऐसे विलक्षण प्रतिभा वाले व्यक्तित्व हैं जिनके बारे में जान सुनकर अचरज होता है।
दीपावली के अवसर पर ऐसे चुनिंदा दीपों से सजी यह माला खास हमारे पाठकों के लिए गुंथी गई है। इस विशेष आयोजन में हमें जितना आनंद आया है, उससे ज्यादा रोचकता यह पाठकों के अंदर जगाएगा, इसी विश्वास के साथ प्रस्तुत है यह विशिष्ठ कृति।